Sunday, April 22, 2018

फुंटशोलिंग से थिंपू – 172 किलोमीटर छह घंटे का सफर

अपना सामान लेकर हम जैसे ही जयगांव से भूटान के फुंटशोलिंग शहर में घुसे, एक शेयरिंग टैक्सी वाले हमारे पीछे पड़ गए, थिंपू चलना है क्या दो सवारी आगे की सीट खाली है। हम यही तो चाहते थे। बाकी सीटें भर चुकी हैं बस चलना है। फुंटशोलिंग से थिंपू 172 किलोमीटर है। शेयरिंग सूमो, बुलेरो का किराया 600 रुपये है। जबकि छोटी कार से शेयरिंग किराया 750 रुपये है। अगर बस से जाते हैं तो किराया 221 रुपये है। समय लगता है तकरीबन 6 घंटे। हमारी टैक्सी में हमारे अलावा पीछे की सीटों पर 8 बिहारी मजदूर हैं जो वर्क परमिट लेकर थिंपू जा रहे हैं।

हमारा थिंपू के लिए सफर दोपहर के 12 बजे शुरू हुआ। ड्राईवर महोदय द्रुक होटल से कुछ सरकारी सामान लेने गए। उसके बाद चल पड़े। फुंटशोलिंग शहर खत्म होते ही चढ़ाई शुरू हो गई। 5 किलोमीटर चलकर पहला चेकपोस्ट आया जहां हमारे परमिट की एंट्री हुई। पूरा सिस्टम कंप्यूटरीकृत है। हर सैलानी की जानकारी ऑनलाइन सिस्टम पर दर्ज होती है। थिंपू जाने वाली सड़क दो लेन की चौड़ी सड़क है। इसे भारत सरकार के बीआरओ ने बनवाया है। परियोजना का नाम है दंतक। सड़क का रखरखाव भी बीआरओ के हवाले है। ये सड़क 2008 के बाद बनी है।
रास्ते में कुछ भूटानी महिलाएं फल बेचती नजर आती हैं। हमारे ड्राईवर उबले हुए मीठे आलू खरीदते हैं और हमें भी खाने को देते हैं। यह 30 रुपये में एक किलो मिल रहा है। बाकी सभी फल भूटान में महंगे हैं।

अपने सफर पर 45 किलोमीटर के सफर के बाद हम गीदू पहुंच गए हैं। ऊंचाई बढ़ने के साथ ठंड बढ़ने लगी है तो हमने भी हल्के जैकेट निकाल लिए हैं। गीदू में भूटान सरकार का डिग्री कॉलेज है। इसके बाद हमलोग 95 किलोमीटर पर वोंखा में एक होटल में खाने के लिए रुके। होटल साफ सुथरा है। पर हमने वहां नूडल्स खाना पसंद किया। पूरा होटल महिलाएं चला रही हैं। वे भारत के नोट भी स्वीकार कर रही हैं। ब्लैक टी, ग्रीन टी 20 रुपये की है तो मिल्क टी 30 रुपये की। पेट पूजा के बाद हमलोग आगे चल पड़े। 

चूखा नामक एक छोटा सा कस्बा आया है। यहां पर भूटान सरकार का हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट लगा है। यह परियोजना कभी भारत सरकार के सहयोग से बनी थी। अब हमारे साथ भूटान की प्रमुख वांगचू नदी की धारा साथ साथ चल रही है।

हमारी गाड़ी में हमारे अलावा जो आठ सवारियां हैं वे सभी मजदूर लोग हैं जो अपना परमिट बनवाकर थिंपू जा रहे हैं, अगले एक साल तक काम करने के लिए। पर इन मजदूरों में से कई ने पिछली रात और आज सुबह जमकर शराब पी है। इसके कारण वे पहाड़ी रास्ते में लगातार उल्टियां कर रहे हैं। हर थोड़ी देर पर उनमें से कोई एक बोल पड़ता है गाड़ी रोको रोको। इससे ड्राईवर महोदय को बार बार गाड़ी रोकनी पड़ रही है। पर हमलोगों को उल्टी नहीं आई। शायद हम पहाड़ों पर सफर के अब अभ्यस्त हो चुके हैं।

अगला कस्बा है चापचा। फुंटशोलिंग से 120 किलोमीटर दूर आ चुके हैं हमलोग। चापचा 8163 फीट की ऊंचाई पर थिंपू मार्ग का सबसे ऊंचा प्वाइंट है। इसलिए यहां ठंड सबसे ज्यादा लगती है। हल्की बारिश होने लगी है। ड्राईवर साहब ने गाड़ी रोककर छत पर रखे हमारे लगेज को ढका। फिर शुरू हुआ आगे का सफर। चापचा के पास आखिरी चेकपोस्ट आया जहां हमारे परिमट की एक बार फिर चेकिंग और एंट्री हुई। वत्सा से थिंपू 54 किलोमीटर रह गया है। शाम गहराने लगी है। हमलोग अब पहुंच गए दामाचू जहां से 36 किलोमीटर दूरी रह गई है थिंपू शहर की।

अगला पड़ाव चूजोम है। चूजोम में पारो चू और वांग चू नदियों का संगम है। यहां से एक रास्ता पारो और एक रास्ता हा के लिए अलग होता है। इसलिए चूजोम बड़ा जंक्शन है। यहां से थिंपू 28 किलोमीटर रह गया है। चौड़ी सड़क पर गाड़ी सरपट भाग रही है। शहर से 7 किलोमीटर पहले प्रवेश द्वार आया जिस पर लिखा है वेलकम टू थिंपू।

शाम के छह बजे हमलोग भूटान की राजधानी थिंपू के क्लॉक टावर स्कावायर पहुंच चुके हैं। हमारा होटल गासिल सामने ही है। अपना सामान लेकर टहलते हुए ही हमलोग होटल के रिसेप्शन पर पहुंच गए।
यहां होटल के प्रोपराइटर सोनम दोरजी ने हमारा स्वागत किया, वेलकम टी के साथ। उसके बाद जो हमें कमरा आवंटित किया वह तीसरी मंजिल पर है। होटल में काम करने वाली 20 साल की बाला कर्मा हमारा सामान लेकर कमरे तक छोड़ने आई। कर्मा कामकाज में गजब फुर्तीली है। वह हमें साबुन, तौलिया देने के लिए तीन बार दौड़ती हुई सीढ़ियां चढ़कर आई। पर कोई शिकायत नहीं। होटल के कमरे की खिड़कियां सड़क की ओर मुखातिब है। कमरे से शहर के घंटा घर स्क्वायर का सुंदर नजारा दिखाई दे रहा है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-        ( PHUNTSHOLING, THIMPHU, GIDU, WONKHA, CHUKHA, CHAPCHA, WATSA, DAMACHU, CHUZOM )