Tuesday, May 1, 2018

फुंटशोलिंग से थिंपू – 172 किलोमीटर छह घंटे का सफर

परमिट बन जाने के बाद अपना सामान लेकर हम जैसे ही जयगांव से भूटान के फुंटशोलिंग शहर में घुसे, एक शेयरिंग टैक्सी वाले हमारे पीछे पड़ गए, थिंपू चलना है क्या दो सवारी आगे की सीट खाली है। हम यही तो चाहते थे। बाकी सीटें भर चुकी हैं, बस चलने ही  वाले हैं। फुंटशोलिंग से थिंपू की दूरी 172 किलोमीटर है। शेयरिंग सूमो, बुलेरो का किराया 600 रुपये है। जबकि छोटी कार से शेयरिंग किराया 750 रुपये है। अगर बस से जाते हैं तो किराया 221 रुपये है। समय लगता है तकरीबन 6 घंटे। हमारी टैक्सी में हमारे अलावा पीछे की सीटों पर 8 बिहारी मजदूर हैं जो वर्क परमिट लेकर थिंपू जा रहे हैं।

हमारा थिंपू के लिए सफर दोपहर के 12 बजे शुरू हुआ। ड्राईवर महोदय फुंटशोलिंग के द्रुक होटल से कुछ सरकारी सामान लेने गए। यह भूटान का विशाल होटल  है। उसके बाद हमलोग चल पड़े। फुंटशोलिंग शहर खत्म होते ही चढ़ाई शुरू हो गई। करीब 5 किलोमीटर चलकर पहला चेकपोस्ट आया जहां हमारे परमिट की एंट्री हुई। यहां पूरा सिस्टम कंप्यूटरीकृत है। हर सैलानी की जानकारी ऑनलाइन सिस्टम पर दर्ज होती है।


थिंपू जाने वाली सड़क दो लेन की चौड़ी सड़क है। इसे भारत सरकार के बीआरओ ने बनवाया है। परियोजना का नाम है दंतक। सड़क का रखरखाव भी बीआरओ के हवाले है। ये सड़क 2008 के बाद बनी है।
रास्ते में कुछ भूटानी महिलाएं फल बेचती नजर आती हैं। हमारे ड्राईवर उबले हुए मीठे आलू खरीदते हैं और हमें भी खाने को देते हैं। यह 30 रुपये में एक किलो मिल रहा है। बाकी सभी फल भूटान में महंगे हैं।

वोंखा में दोपहर का लंच -  अपने सफर पर 45 किलोमीटर के सफर के बाद हम गीदू पहुंच गए हैं। ऊंचाई बढ़ने के साथ ठंड बढ़ने लगी है तो हमने भी हल्के जैकेट निकाल लिए हैं। गीदू में भूटान सरकार का डिग्री कॉलेज है। इसके बाद हमलोग 95 किलोमीटर पर वोंखा में एक होटल में खाने के लिए रुके। होटल साफ सुथरा है। पर हमने वहां नूडल्स खाना पसंद किया।  इस रेस्तरां  में ब्लैक टी,   ग्रीन टी   20   रुपये की है तो मिल्क टी   30   रुपये की।

पूरा होटल महिलाएं चला रही हैं।   वे भारत के करेंसी नोट भी स्वीकार कर रही हैं।   हल्की ठंड के बीच मौसम सुहाना होता जा रहा है। हां इस रेस्टोरेंट में  गरमाहट प्रदान करने के लिए लकड़ी  से चलने वाला हीटर लगा हुआ।  धीरे धीरे लकड़ी जलती रहती है। इससे  डायनिंग हॉल में गरमाहट बनी  रहती है।     थोडी सी पेट पूजा के बाद हमलोग आगे चल पड़े। 

चूखा में पन बिजली परियोजना -
वोंखा के बाद चूखा नामक एक छोटा सा कस्बा आया है। यहां पर भूटान सरकार का हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट लगा है। यह पन बिजली परियोजना कभी भारत सरकार के सहयोग से बनी थी। अब हमारे साथ भूटान की प्रमुख वांगचू नदी की धारा साथ साथ चल रही है। भूटान   बौद्ध धर्म का देश है तो यहां रास्ते में  जगह जगह सड़क के किनारे बौद्ध मंत्र  की पताकाएं लहराती दिखाई दे रही हैं। ओम मने  पद्मे हम... 



भूटान का ये हमारा सफर बौद्ध धर्म के कई रूपों से साक्षात्कार का  भी है। हमारी गाड़ी में हमारे अलावा जो आठ सवारियां हैं वे सभी मजदूर लोग हैं जो अपना वर्क परमिट बनवाकर थिंपू जा रहे हैं, अगले एक साल तक काम करने के लिए।   पर इन मजदूरों में से कई ने पिछली रात और आज सुबह जमकर शराब पी है। इसका पता हमें यूं चला कि  ज्यादा पीने के कारण वे पहाड़ी रास्ते में लगातार उल्टियां कर रहे हैं।

हर थोड़ी देर पर उनमें से कोई एक मजदूर बोल पड़ता है - गाड़ी रोको रोको। इससे ड्राईवर महोदय को बार-बार गाड़ी रोकनी पड़ रही है। पर चालक महोदय का  धैर्य गजब का है वे उनका पूरा सहयोग कर रहे हैं। कई बार आपके आसपास लोग उल्टी कर रहे हों तो आपका भी मूड खराब हो जाता है। पर हमलोगों को उल्टी नहीं आई। शायद हम पहाड़ों पर सफर के अब अभ्यस्त हो चुके हैं।   सुरक्षा  के साथ हमारा सफर जारी   है।




 -        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-        ( PHUNTSHOLING, THIMPHU, GIDU, WONKHA, CHUKHA, CHAPCHA, WATSA, DAMACHU, CHUZOM )

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