Monday, April 30, 2018

भूटान में प्रवेश के लिए पासपोर्ट नहीं पर परमिट जरूरी

भूटान हमारा ऐसा पड़ोसी देश हैजहां जाने के लिए भारतीय नागरिकों को पासपोर्ट/वीजा की जरूरत नहीं पड़ती। पर हमें वहां जाने के लिए परमिट बनवाना पडता है। भारतीय नागरिकता के सबूत के लिए हमारा मतदाता पहचान पत्र (वोटर आई कार्ड)  ही वहां मान्य है। इसके आधार पर ही भूटान सरकार का इमिग्रेशन डिपार्टमेंट परमिट जारी कर देता है। पर अगर 18 साल से कम उम्र के बच्चे हों तो उनका जन्म प्रमाण पत्र जरूरी है।

अकेले व्यक्ति का परमिट नहीं - दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि भूटान का परमिट अगर आप टूरिस्ट के तौर पर जा रहे हैं तो अकेले व्यक्ति का नहीं बनता है। यानी की सैलानियों के लिए परिवार या समूह में होना जरूरी है। फुंटशोलिंग में भूटान के वीजा,परमिट का दफ्तर भूटान गेट के अंदर द्रुक होटल के पास है। वीजा-परमिट कोलकाता के भूटानी दूतावास से भी बनवाया जा सकता है। परमिट का दफ्तर सुबह 9 बजे खुल जाता है। शनिवार रविवार और भूटान सरकार के घोषित अवकाश के दिनों में दफ्तर बंद रहता है। 

आधार कार्ड मान्य नहीं - नेपाल और भूटान की यात्रा करने वाले भारतीयों के लिए ‘आधार’ वैध पहचान दस्तावेज नहीं है। यात्रा को सरल बनाने के लिए 65 साल से अधिक और 15 साल से कम आयु वाले अपनी आयु और पहचान की पुष्टि के लिए अपनी फोटो वाले दस्तावेज दिखा सकते हैं। इनमें पैन कार्डड्राइविंग लाइसेंसकेन्द्र सरकार स्वास्थ्य सेवा (सीजीएचएस) कार्ड और राशन कार्ड शामिल हैं लेकिन आधार कार्ड शामिल नहीं है।

जयगांव में सुबह सुबह नास्ते के बाद 9 बजे हमलोग भूटान में प्रवेश कर फुंटशोलिंग के परमिट दफ्तर में पहुंच गए हैं। यहां हमने दो लंबी लाइनें देखीं। पता चला कि ये लाइन भूटान में जाकर काम करने वाले भारतीय मजदूरों की है। राजमिस्त्री, बिजली, पलंबर जैसे मजदूर भूटान जाते हैं। वहां दैनिक मजदूरी भारत से ज्यादा मिलती है। ऐसे मजदूरों को छह माह या एक साल का परमिट जारी होता है। यह पीवीसी कार्ड पहचान पत्र जैसा होता है।पर भूटान में मजदूरी करने के लिए किसी एजेंट के द्वारा जाना पड़ता है। एजेंट भी काम दिलाने के नाम पर मोटा कमिशन बनाते हैं।
टूरिस्ट परमिट बनवाने के लिए ज्यादा भीड़ नहीं थी। पर वहां जाकर पता चला कि बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट होना जरूरी है। मैं 13 साल के अनादि का जन्म प्रमाण पत्र लेकर नहीं गया था। हमारी परेशानी बढ़ गई। तभी कुछ लोगों ने सलाह दी कि ह्वाटसएप पर बर्थ सर्टिफिकेट मंगा लिजिए। फिर हमने यही किया। दिल्ली माधवी को फोन कर ह्वाटसएप पर मोबाइल कैमरे से फोटो खिंचवाकर जन्म प्रमाण पत्र मंगाया। फुंटशोलिंग में सामने कैफे में जाकर उसका प्रिंट निकलवाया। फार्म पूरे कर एक बार फिर इमीग्रेशन अधिकारी के पास पहुंचा। पर आप जिस तारीख से आप भूटान की यात्रा शुरू कर रहे हैं उसी तारीख से होटल बुकिंग की रशीद भी आवश्यक है। यह रशीद हमारे पास ईमेल पर थी। हमें उसका भी प्रिंट निकलवाने के लिए एक बार फिर कैफे जाना पड़ा। इस कवायद में आधे घंटे गुजर गए। अब शुरू हुई हमारे सारे कागज की जांच।

भूटान के इमिग्रेशन अधिकारी अपने राजकीय परिधान में बैठे कागज जांच रहे थे। मेरे फार्म पर प्रोफेशन में जर्नलिस्ट लिखा देख वे चौंक गए। पूछा, आप वहां क्यों जा रहे हैं, मैंने कहा बतौर सैलानी घूमने जा रहा हूं।  उन्होंने कहा, ठीक है, पर वहां जाकर रिपोर्टिंग मत किजिएगा। हमने उन्हें आश्वस्त किया। उसके बाद फार्म के साथ हमें पहली मंजिल पर भेज दिया। वहां कई काउंटर बने थे। एक काउंटर लाइन में लग गया। वहां महिला अधिकारी ने हमारी डाटा एंट्री की, ऑनलाइन फोटो लिया, उंगलियों के निशान लिए। उसके 10 मिनट बाद दूसरे काउंटर से हमें परमिट मिल गया। हमने बाहर आकर उसका फोटो कॉपी करा लिया। यह जरूरी है क्योंकि पुनाखा जाने के लिए थिंपू में दुबारा परमिट लेना पड़ता है तब फोटो कापी की जरूरत पड़ती है। 

पर्याप्त नकदी लेकर जाएं - परमिट लेकर हमलोग वापस होटल आए। चेकआउट किया। आराम लॉज के मैनेजर नवीन जी जो सीतामढ़ी के रहने वाले हैं,  उन्होंने कहा जितनी भूटानी करेंसी चाहिए मुझसे बदलवा लिजिए बिना किसी कमिशन के। वापस आने पर बची हुई राशि देकर हमसे फिर भारतीय मुद्रा ले लिजिएगा। हालांकि भूटान में थिंपू, पारो में भारतीय करेंसी चल जाती है। पर अक्सर लोग 500 और 2000 के नोट नहीं लेते। भारतीय और भूटानी करेंसी का मूल्य बराबर ही है। पर अगर आपके पास भूटान में नकदी खत्म हो जाए तो वहां एटीएम से निकालने पर 200 रुपये प्रति ट्रांजेक्शन शुल्क लगता है। अगर कार्ड से किसी दुकानदार को पेमेंट करना चाहें तो वह 3.5 फीसदी कमीशन मांगते हैं। इसलिए पर्याप्त नकदी लेकर जाएं तो अच्छा है।
 परमिट चेकलिस्ट -
    -        मतदाता पहचान पत्र या जन्म प्रमाण पत्र
-        भूटान में होटल बुकिंग की रशीद
-        आपका टूर प्लान
-        परमिट के लिए भरा हुआ फार्म
-        एक फोटोग्राफ, ( परमिट के लिए कोई शुल्क नहीं है)   
- vidyutp@gmail.com
(BHUTAN PERMIT, JAIGOAN, BENGAL ) 

फुंटशोलिंग में भूटान परमिट के लिए लाइन मे लगे भारतीय मजदूर। 

Sunday, April 29, 2018

जयगांव - भूटान का लोकप्रिय प्रवेश द्वार

बंगाल के अलीपुर दुआर जिले का जयगांव शहर। जयगांव हमारे पड़ोसी देश भूटान का सबसे लोकप्रिय प्रवेश द्वार है। रोज हजारों लोग सैकड़ो वाहन यहां से भूटान में प्रवेश करते हैं। 

भूटान के तीन प्रवेश द्वार : वैसे भारत से भूटान जाने के लिए तीन चेकपोस्ट वाले शहर हैं जहां से भूटान में प्रवेश किया जा सकता है।
जयगांव के अलावा असम के बंगाईगांव से गलपे बार्डर से और असम से रंगिया पास समद्रुप जोंगखार बार्डर से भी भूटान में प्रवेश किया जा सकता है। पर इनमें जयगांव-फुंटशोलिंग सबसे लोकप्रिय प्रवेश मार्ग है भूटान के लिए। ज्यादातर सैलानी यहीं से प्रवेश करते हैं भूटान में। भारत से भूटान जाने वाले रसद व अन्य सामान की सप्लाई भी यहीं से होती है। जयगांव में आकर्षक भूटान गेट बना है, जिसके उस पार घड़ी अपना समय बदल लेती है। भूटान की घड़ी हमसे 30 मिनट आगे है। यहां दोनों देशों के बीच कोई नो मेन्स लैंड नहीं है। एक दीवार के इस पार भारत उस पार भूटान। सीमा की रक्षा एसएसबी के हवाले है।

भूटान में पैदल प्रवेश करने के लिए भूटान गेट बगल से छोटा सा प्रवेश द्वार है जिससे आप सुबह 6 बजे से रात्रि 10 बजे तक बेधड़क आ जा सकते हैं। गेट पर मेटल डिटेक्टर लगे हैं। आप भारतीय हैं तो भूटान गेट के अंदर 5 किलोमीटर तक यानी फुंटशोलिंग शहर में बिना किसी परमिट के जा सकते हैं। तो दिन भर भारत भूटान के बीच आवाजाही लगी रहती है। पर इस पार और उस पार का अंतर दिखाई देता है। फुंटशोलिंग शहर की सड़के साफ सुथरी चमचमाती हुई हैं, तो भारतीय पक्ष जयगांव की टूटी फूटी। जयगांव का बाजार सस्ता है तो फुंटशोलिंग महंगा।

अगर आप भूटान जाना चाहते हैं तो देश के किसी भी कोने से जयगांव पहुंचे। विमान से आए तो बागडोगरा एयरपोर्ट से सिलिगुड़ी शहर। सिलिगुड़ी शहर से बस से जयगांव। दूरी 170 किलोमीटर के आसपास है और किराया 100 से 140 रुपये। बागडोगरा से सीधे जयगांव टैक्सी बुक करके भी पहुंच सकते हैं। जयगांव का निकटतम रेलवे स्टेशन हाशीमारा है। हाशीमारा से जयगांव की दूरी 18 किलोमीटर है। आटोरिक्शा और बसें मिल जाती हैं। न्यू जलपाईगुड़ी गुवाहाटी रेल मार्ग पर फालाकाटा उतर कर भी जयगांव पहुंच सकते हैं। फालाकाटा से जयगांव 52 किलोमीटर है। बसें दिन भर मिलती हैं। सिक्किम की राजधानी गंटटोक और दार्जिलिंग कलिंपोंग से भी जयगांव के लिए शेयरिंग टैक्सियां रोज चलती हैं। पर ये टैक्सियां रोज सुबह ही दोनो तरफ से मिलती हैं।
भूटान में प्रवेश से पहले परमिट बनवाना पड़ता है। इसलिए हर सैलानी को एक रात तो अक्सर जयगांव में गुजारना ही पड़ता है। तो जयगांव में भूटान गेट के आसपास एनएस रोड और लिंक रोड पर कई होटल उपलब्ध हैं। यहां हर बजट में कमरे हैं 300 से लेकर 1500 तक।
जयगांव मतलब एक्सटेंशन ऑफ बिहार – पूरे जयगांव शहर में  बिहार के कारोबारी और मजदूर भरे हुए हैं। बंगाल का शहर होकर भी हिंदी भोजपुरी बोलता नजर आता है। यहां आप सत्तू, लिट्टी चोखा, गोलगप्पा, मोमोज सब कुछ खा सकते हैं। ज्यादातर दुकानदार बिहार के हैं।
इतना ही नहीं जयगांव से रोज बिहार के पूर्णिया, सहरसा, मुजफ्फरपुर, छपरा, सीवान, गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी के लिए सीधी बसें खुलती हैं। मतलब साफ है जयगांव की आधी से ज्यादा आबादी बिहार से संबंध रखती है। जयगांव के सड़कों पर शाम-सुबह टहलते हुए यूं लगता है जैसे बिहार में ही हों।
एनएस रोड पर गोकुल स्वीट्स नामक मिठाइयों की दुकान है। दुकानदार महोदय अलवर राजस्थान के हैं। वे कलाकंद भी बनाते हैं। रसमलाई भी और रसमाधुरी भी। सुबह नास्ते में दो छोटे भठूरे 25 रुपये के। हमने रात को मिठाइयां खाई तो सुबह छोला भठूरा। सुबह सुबह मुझे तो छपरा के साव जी एनएस रोड पर सत्तू बेचते मिले, 10 रुपये का गिलास। साव  जी 40 साल से जयगांव में हैं। 10 रुपये का एक गिलास सत्तू बनाने से पहले 50 ग्राम सत्तू तराजू में तौलते हैं फिर बड़े प्रेम से सत्तू का ग्लास तैयार करते हैं। मैंने पिया तो देखा देखी अनादि भी सत्तू पीने लगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( GOKUL SWEETS, JAIGAON , BENGAL) 

Saturday, April 28, 2018

बीरपाड़ा से जयगांव वाया मदारीहाट-हासीमारा


पश्चिम बंगाल के अलीपुर दुआर जिले के बीरपाड़ा में हम अगली बस का इंतजार कर रहे हैं। हमें जाना है जयगांव पर हमें अगली बस मिली मदारी हाट तक की। स्थानीय लोगों ने बताया कि आप मदारी हाट तक चले जाएं,  वहां से जयगांव की बस मिल जाएगी।


बीरपाड़ा से मदारी हाट सिर्फ   12    किलोमीटर है। तो हम जल्द ही मदारीहाट पहुंच गए । मदारीहाट में उतरकर हम बस का इंतजार करने लगे पर देर तक कोई बस नहीं आई। हमारे साथ एक परिवार भी बस का इंतजार कर रहा है। उन लोगों को भी जयगांव जाना हैं। वे  लोग हिंदी  में बातें कर रहे हैं। उनकी हिंदी  भोजपुरी मिली हुई है। दरअसल दुआर्स इलाके में बड़ी संख्या में बिहार और यूपी से  कई सौ साल पहले के  माइग्रेट किए हुए लोग रहते हैं। ये लोग इधर के चाय बगानों में श्रमिक के तौर पर आए थे। हमलोग चौराहे   पर खड़े हैं लोग बता रहे हैं बस फालकाटा से भी आ सकती है और सिलिगुड़ी की तरफ से भी। मदारीहाट से जयगांव   30  किलोमीटर है। हां आप फालाकाटा से भी जयगांव पहुंच सकते हैं। 

शाम के सात   बज गए हैं। अब अंधेरा छाने लगा है। पर छोटे से कसबे मैं आश्वस्त हूं अगर बस नहीं आई तो सामने एक गेस्ट हाउस दिखाई दे रहा है। रात को यहीं रुक जाएंगे। फिर सुबह सुबह आगे का सफर शुरू करेंगे। पर थोड़ी देर में सिलिगुड़ी से आने वाली बस आ गई। हमलोग फटाफट इसमें जा बैठे। इसमें जगह भी मिल गई।


हमारी बस तेजी से से दौड़ रही है। पहले हाशीमारा रेलवे स्टेशन आयाजो न्यू हासीमारा कहलता है। जयगांव जाने के लिए हासीमारा निकटतम रेलवे स्टेशन है। इसके बाद ओल्ड हासीमारा आया। हासीमारा में हमें कुछ आवासीय होटल के बोर्ड दिखाई देते हैं। मतलब की रात हो जाए तो यहां भी रुकने का इंतजाम है। थोड़ी देर में हमलोग जयगांव बाजार पहुंच गए हैं। सरपट भागती बस ने हमें जयगांव बस स्टैंड में उतार दिया।




पर अब हमें मालूम नहीं की जाना कहां है। बस स्टैंड के आसपास आवासीय होटल नहीं दिखाई दे रहे हैं। पर वहां से शेयरिंग आटो रिक्शा मिला जिसमें   7    रुपये प्रति सवारी की दर से हम भूटान गेट ले जा रहे हैं। तो हम भी बाकी सवारियों के साथ उसमें बैठकर भूटान गेट पहुंच गए। अब हमें एक होटल की तलाश करनी थी रात में रुकने के लिए।

थोड़ी खोजबीन के बाद जयगांव के भूटान के गेट के सामने लिंक रोड पर   होटल आराम    हमारा ठिकाना बना। जयगांव में रहने के लिए किफायती और बेहतरीन जगह है। स्टाफ का व्ययवहार भी दोस्ताना है। हमें उन्होने तीसरी मंजिल पर डबल बेड रुम दिया   600    रुपये प्रतिदिन की दर पर. होटल में अच्छा भोजनालय भी है। हालांकि होटल आराम को बुक करने से पहले मैंने अनादि को वहीं छोड़कर आसपास के तीन और होटल देखे पर मुझे आराम ही बेहतर लगा।



















हमने उनके भोजनालय में ही रात का डिनर लिया। भोजन के बाद थोड़ी देर हमलोग जयगांव बाजार की सड़कों पर घूमने निकले। यह बाजार देर रात खुला रहता है। भूटान से भी लोग बड़ी संख्या में खरीददारी करने आते हैं।

जयगांव फुंटशोलिंग के बारे में हमारे हमारे फेसबुक मित्र बिबेक शाह ने भी काफी जानकारी दी थी। वे हासीमारा में रहते हैं। पर उनसे इस यात्रा के दौरान मिलना नहीं हो सका।

यात्रा मार्ग-  बाघपुल - बागरकोट- उदयबाड़ी- दमदिम- माल बाजार- चालसा- नगरकाटा-लुकसान - बनारहाट- बिनागुड़ी तेलीपाड़ा- एथलबाड़ी – बीरपाड़ा- मदारीहाट- न्यू हासीमारा- ओल्ड हासीमारा- जयगांव )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmal.com
   (DUARS TEA GARDEN, BIRPARA, MADARIHAT, HASIMARA, JAIGAON, ARAM LODGE )


Friday, April 27, 2018

दुआर्स के चाय बागानों से होकर गुजरते हुए


हमारा बाघ पुल से आगे का सफर शुरू चुका है। ये लोकल बस है। हर जगह रुकती हुई चल रही है। नेशनल हाईवे के साथ साथ रेलवे लाइन भी चल रही है। ये सिंगल लाइन वाली रेलवे है जो दुआर्स से होती हुई अलीपुर दुआर, कूचबिहार होते हुए असम में धुबड़ी तक चली जाती है। पर ये दुआर्स के लोगों के लिए लाइफ लाइन जैसी है। इस लाइन पर हासीमारा रेलवे स्टेशन से भी जयगांव पहुंचा जा सकता है। 



ये बस हर छोटे छोटे कस्बे में रुक रही है तो कई लोग उतर रहे हैं और चढ़ रहे हैं। भीड़ कम नहीं हो रही है। बागरकोट चाय बगान सड़क के दोनों तरफ हमारी नजरों में है। इसके बाद आया उदयबाड़ी। उदयबाड़ी के बाद दमदिम कैंटोनमेंट एरिया आया। दमदिम नाम से इल इलाके में टी एस्टेट भी है। यहां काफी लोग उतरे पर हमें बैठने की जगह नहीं मिली। 


और हमें सीट मिल गई - इसके बाद आया माल बाजार। यह जलपाईगुड़ी जिले का बड़ा बाजार है। यह नगरपालिका भी है और सब-डिवीजन भी है। माल बाजार इस इलाके का वाकई बड़ा बाजार है। यहां बाजार में रौनक दिखाई दे रही है।
यह बड़ा अच्छा रहा कि यहां मुझे और अनादि को बस में सीट मिल गई। एक सुंदर बंगाली महिला और उनकी बेटी ने सीट खाली की तो हम वहां जा बैठे। सीट मिलने से थोड़ी राहत मिली। तो हमारा आगे का सफर बैठकर होने लगा। 
तीस्ता की सहायक डायना नदी पर रेल पुल 

माल बाजार के बाद बस चालसा नामक छोटे से कसबे में रुकी। इसके बाद नगरकाटा, लूकसान और बानरहाट जैसे छोटे-छोटे कस्बे आए। यहां डायना नदी पर पुल नजर आया। अभी नदी में पानी नहीं है। पर नदी का विस्तार चौड़ा है। डायना नदी भूटान से निकल कर बंगाल के दआर इलाके में प्रवेश करती है। आगे यह तीस्ता में मिल जाती है। इसके बाद हमें डायना टी एस्टेट का विशाल चाय बगान नजर आया। यह 1911 मेें स्थापित चाय कंपनी है। इसे क्वीन ऑफ दुआर्स कहा जाता है। धुपगुड़ी इलाके में स्थित कंपनी के पास कई सौ एकड़ में फैला चाय बागान है। 

इसके बाद हम पहुंचे हैं बिनागुड़ी। यह नाम कई सालों से मेरे जेहन में है। मेरे एक परिचित कभी यहां सेना में पदस्थापित थे तो उनकी पत्नी बार बार बिनागुड़ी का नाम लिया करती थीं। बिनागुड़ी थल सेना का बड़ा कैंटोनमेंट एरिया है। बिनागुड़ी कैंटोनमेंट के प्रवेश द्वार पर बुद्ध की प्रतिमा नजर आई। बुद्ध मतलब युद्ध नहीं, यानी शांति के प्रतीक। 

बिनागुड़ी से कुछ किलोमीटर के सफर के बाद एथलबाड़ी से अलीपुर दुआर जिला शुरू हो जाता है। बंगाल के दुआर्स रीजन में चाय की कई प्रसिद्ध बगाने हैं। बंगाल का दुआर्स इलाका पूरे पश्चिम बंगाल से थोड़ा अलग है। इस तरफ के लोग हिंदी भी खूब बोलते हैं। शायद ऐसा चाय के बगानों में सदियों से काम करने आए यूपी बिहार के लोगों के कारण होगा। काफी लोग तो इसी इलाके में बस गए हैं।  
अब हमलोग बीरपाड़ा पहुंचने वाले हैं। पर बीरपाड़ा शहर से पहले भारी जाम लगा है। हमारी बस यहीं तक है। जाम में जगह बनाती हुई बस बीरपाड़ा चौराहे तक पहुंच गई। हम बस से उतर गए। अपना सामान छत से उतरवाया। बीरपाड़ा अलीपुर दुआर जिले का भीड़भाड़ वाला बाजार है। 

( यात्रा अभी जारी है- पढ़ते रहिए दानापानी ) 

( यात्रा मार्ग-  बाघपुल - बागरकोट- उदयबाड़ी- दमदिम- माल बाजार- चालसा- नगरकाटा-लुकसान - बनारहाट- बिनागुड़ी तेलीपाड़ा- एथलबाड़ी बीरपाड़ा- मदारीहाट- न्यू हाशीमारा- ओल्ड हाशीमारा- जयगांव )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmal.com
   ( DUARS TEA GARDEN, MAL BAZAR, BINAGURI, BIRPARA, RIVER )

Thursday, April 26, 2018

ऐतिहासिक बाघ पुल से जयगांव की ओर

सिक्किम की लांचुग घाटी से लौटने के बाद अब हमारा भूटान जाने का कार्यक्रम है। इसके लिए बंगाल के जयगांव शहर पहुंचना है। हम टैक्सी से सिलिगुड़ी जाने के बजाय बाघ पुल पर ही उतर गए हैं। गंगटोक में ही हमें टैक्सी ड्राईवर मधुकर जी ने बताया था कि अगर आप भूटान के शहर फुंटशोलिंग, जयगांव बार्डर जाना जाहते हैं तो आपको गंगटोक से सिलिगुड़ी जाने की जरूरत नहीं है। आप लोग सिलिगुड़ी से 30 किलोमीटर पहले बाघ पुल पर ही उतर जाना। हालांकि  गंगटोक से जयगांव के लिए सीधी टैक्सी भी चलती है। पर उसका समय निकल चुका था। बाघ पुल नाम सुनकर हमलोग थोड़ा चौंके जरूर थे। इसलिए इस नाम को लेकर उत्सुकता बढ़ गई थी।

टैक्सी वाले मधुकर जी ने बताया था कि सिलिगुड़ी से जयगांव की तरफ जाने वाली सभी बसें इस पुल से होकर गुजरती हैं। यहीं से गाड़ी बदल लेने से आपका समय और पैसा दोनों बचेगा। और सचमुच हमारे दो घंटे की बचत हुई। साथ ही हमारे 200 से ज्यादा रुपये भी बच गए। गंगोटक से बाघ पुल बस का किराया 140 रुपये लगे। जबकि बाघ पुल से जयगांव का किराया 100 रुपये ही लगे।
सन 1941 में बना बाघ पुल -   अब बात इस पुल की। बाघ पुल यानी कोरोनेशन ब्रिज। यह ब्रिटिश काल का ऐतिहासिक पुल है। इसे सेवक ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है। तीस्ता नदी पर बने इस पुल के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ दो बाघ की प्रतिमाएं लगी हैं इसलिए इसे बाघ पुल कहते हैं। नेशनल हाईवे नंबर 31 पर बना यह पुल बंगाल के दार्जिलिंग और जलपाई गुड़ी जिले को जोड़ता है। यह बंगाल के दुआर्स इलाके का प्रवेश द्वार कहा जा सकता है।   

भला बाघ पुल ही क्यों। आपको पता ही होगा कि बंगाल का बाघ से खास रिश्ता है। रायल बंगाल टाइगर की नस्ल बंगाल के जंगलों में ही निवास करती है। इस रिश्ते के कारण ही कदाचित इस पुल पर बाघों की विशाल प्रतिमा बनाई गई होगी। ब्रिटिश काल में बने कई पुल बड़े कलात्मक है। 

इंजीनयरिंग का अदभुत नमूना -  इस पुल का निर्माण 1937 में शुरू हुआ था। किंग जार्ज पंचम और महारानी एलिजाबेथ के राज्यारोहण की याद में इस पुल को नाम मिला था कोरोनेशन ब्रिज। पुल 1941 में बन कर तैयार हुआ। इस आकर्षक पुल के निर्माण में तब 4 लाख रुपये का खर्च आया था। तब 1937 में बंगाल के गवर्नर जॉन एंडरसन ने इस पुल की आधारशिला रखी थी। इस पुल का निर्माण मुंबई की कंपनी जेसी गैमन ने किया था। पुल को अगर आप दूर से देखें तो भी ये बड़ा कलात्मक नजर आता है।

बिना स्तंभों का पुल - इस पुल के निर्माण में किसी पिलर का इस्तेमाल नहीं किया गया है। तीस्ता नदी की तेज धारा के कारण ऐसा करना मुश्किल था। इसलिए इसमें आर्च इसतर बनाया गया है कि पुल का पूरा भार दोनों तरफ आ जाता है।  

स्थानीय लोग इसे कोरोनेशन ब्रिज न कहकर बाघ पुल ही कहते हैं। भारत सरकार ने बाघ पुल को हेरिटेज ब्रिज का दर्जा दिया हुआ है। बाघ पुल के सामने तीस्ता नदी पर रेलवे का भी पुल बना हुआ है।
बाघ पुल के पास ही सेवक में मां काली का भी एक प्रसिद्ध मंदिर है। अगर समय हो तो आप वहां दर्शन करने जा सकते हैं। जब आप सिलिगुड़ी से गंगटोक जा रहे होते हैं तो आपको ये पुल दाहिनी तरफ बाघ पुल दिखाई देता है। हालांकि तब आप इस पुल को पार नहीं करते। पर हमलोग तो आज के सफर में इस पुल से होकर गुजरने वाले हैं। 

अपनी बस के इंतजार के दौरान हमलोग बाघ पुल के फुटपाथ पर खड़े होकर चना जोर गरम खा रहे हैं। इसी बीच एक बस सिलिगुड़ी की तरफ से आकर बाघ पुल के बीचों बीच रुकी। हमारे जनाजोर गरम वाले ने कहा इस बस पर आपलोग चढ़ जाएं। पर ये बस जयगांव तक नहीं बल्कि बीरपाड़ा तक ही जा रही है। बस के कंडक्टर ने बताया कि बीरपाड़ा से जयगांव की बस मिल जाएगी। बस में जगह भी नहीं है। पर कंडक्टर महोदय भरोसा दिलाते हैं कि आगे जगह मिल जाएगी, तो हमलोग बस में बैठ जाते हैं। हमने अपना सामान बस की छत पर रखवा दिया है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmal.com 
     ( BAGH PUL, TEA GARDEN, TISTA RIVER, DARJEELING, ALIPUR DUAR ) 
(आगे पढ़ें - दुआर्स के चाय बगानों से होकर गुजरते हुए ) 
सेवक स्थित मां काली का मंदिर। 

Wednesday, April 25, 2018

बुद्धा इन गंगटोक – गोंजांग मोनेस्ट्री

गंगटोक शहर में कई बौद्ध मठ हैं। पिछली बार मैं  प्राचीन छोरटेन मोनेस्ट्री देख चुका था। इस बार हमलोग पहुंचे हैं गोंजांग मोनेस्ट्री। इस बौद्ध मठ का परिसर विशाल है। आपको सड़क से सीढ़ियां उतरकर मठ में आना पड़ता है। परिसर में बौद्ध भिक्षुओं के लिए विशाल आवास भी बना हुआ है। इस पांच मंजिला आवासीय परिसर में कई बौद्ध भिक्षु स्मार्ट फोन के साथ लैस और उसमें व्यस्त भी नजर आए।
मंदिर के परिसर में अत्यंत शांति का वातावरण है।   मुख्य मंदिर के अंदर आचार्य पद्मसंभव और गौतम बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं हैं। अंदर की दीवारों पर अत्यंत सुंदर चित्रकारी है। इन चित्रों में सिक्किम और भूटान में बौद्ध धर्म के प्रसार की गाथा अंकित है। मंदिर परिसर में गुरु पद्म संभव की कुल 25 प्रतिमाएं बनी हुई हैं, जो उनके द्वारा सिक्किम, नेपाल, तिब्बत और भूटान में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार की गाथा सुनाते हैं। 

सुबह 7 से शाम 5 बजे तक खुला - गोंजांग मठ सैलानियों के लिए सुबह सात बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में आकर अदभुत शांति का एहसास होता है। आप यहां अपने लिए एक घंटे से ज्यादा का समय रखें। यहां हमलोगों ने विशाल धर्म चक्र भी घुमाया और शांति  समृद्धि की कामना की। यहां से पवित्र प्रेरणा लेने के बाद अब   हमलोग गोंजांग मठ से आगे की यात्रा पर चल पड़े हैं। 

मेडिसीन बुद्ध की मूर्ति -  गंगटोक शहर के रास्ते में हमें मेडिसीन बुद्धा की मूर्ति दिखाई देती है। मान्यता है कि बुद्ध की यह मूर्ति आपको स्वस्थ और निरोग होने का आशीर्वाद देती है। यहां बुद्ध की परिकल्पना एक फिजिशियन के तौर पर की गई है। एक ऐसा फिजिशयन जो आपको बाह्य और आंतरिक दोनों तरह के रोगों से मुक्ति दिलाता है।
वह अंतर को शुद्ध करता है और आपको सत्य के मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा देता है।   सड़क के किनारे पत्थरों पर बने मेडिसीन बुद्ध की मूर्ति के नीचे सिक्किम सैन्य पुलिस द्वारा उनकी विशेषताएं लिखवाई गई हैं। हम भी बुद्ध से स्वस्थ निरोग रहने की प्रार्थना करते हुए आगे की राह पर बढ़ चले हैं। 


रास्ते में स्कूल में पढ़ने वाली दो भूटिया बालिकाएं कार में लिफ्ट मांगती हैं। ड्राईवर मुझसे अनुमति मांगते हैं। मैं कहता हूं बिठा लिजिए। पहाड़ों पर देर तक कोई वाहन नहीं मिलता कई बार।  दो  किलोमीटर आगे वह बालिकाएं उतर गई।   


गंगटोक में देवराली की ओर जाते हुए आगे एक और झरना आया। यहां पर सैलानियों की खूब भीड़ लगी थी। कुछ मनोरंजन का भी इंतजाम था। यूं लग रहा है लोग पिकनिक मना रहे हैं। थोड़ी देर यहां रुक कर हमलोग फिर आगे बढ़ चले। इस बीच हमें बुजुर्ग टैक्सी वाले मधुकर भाई ने कई और जानकारियां दी गंगटोक के बारे में।  



गंगटोक से वापसी - अब सिक्किम से चला चली की वेला है। पर तीसरी बार भी सिक्किम आने की इच्छा बनी हुई है। गंगटोक के देवराली स्टैंड पर मेरे पिता की उम्र के टैक्सी ड्राईवर मधुकर भाई ने हमें टैक्सी के बजाय बस से जाने की सलाह दी।  उन्होंने कहा, इससे समय और पैसा दोनों बचेगा। बस में गंगटोक सिलिगुड़ी का किराया 160 रुपये है, जबकि टैक्सी में 250 रुपये। सस्ता होने के बावजूद बस का सफर ज्यादा आरामदेह है। छोटी बस है जिसमें लेग स्पेस अच्छा है। सामान रखने की जगह भी है। हमें बाघ पुल उतरना है तो वहां तक का किराया 140 रुपये ही है। बस तुरंत चल पड़ी।

रंगपो में वापसी के समय...

सिक्किम के आखिरी पड़ाव रंगपो में बस पांच मिनट के लिए रुकी। हमने यहां जूस की बोतलें खरीदी। बाकी के छोटे-छोटे स्थलों पर अगर कोई सवारी उतरने चढ़ने वाली हो तो रुक जाती है, वरना अपनी गति से चलती जा रही है। बस में सीट से ज्यादा सवारियां नहीं है। तीस्ता के साथ वापसी का भी सफर सुहाना है। हमलोग 11.30 बजे गंगटोक में बस में बैठे थे। तकरीबन ढाई बजे बस ने हमें सेवक से पहले कोरोनेशन ब्रिज यानी बाघ पुल पर उतार दिया। तो अलविदा सिक्किम।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य   - vidyutp@gmail.com   ( GONJANG MONASTERY, MEDICINE BUDDHA, GANGTOK, SIKKIM, ) 
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Tuesday, April 24, 2018

यहां से मिलता है पूरे गंगटोक शहर को पानी....

 

गंगटोक का वाटर रिजरवायर -   पूरे   गंगटोक शहर को पानी कहां से मिलता है।  यहां कोई कुआं या  हैंडपंप नहीं है।    हमें ड्राईवर साहब गंगटोक शहर का वाटर रिजरवयार दिखाते हैं। पहाड़ो से झरनों से आने वाला पानी यहां स्टाक किया जाता है। फिर उसे प्यूरीफाई करके पूरे शहर को सप्लाई किया जाता है। पूरे गंगटोक शहर को यहीं से पानी मिलता है। कहीं कोई हैंडपंप या बोरिंग की जरूरत नहीं है। यह जल संरक्षण का सुंदर नमूना है। 

प्लांट कंजरवेशन सेंटर - इसके बाद हम  चलकर रुक जाते हैं प्लांट कंजरवेशन सेंटर के पास। यहां पर अलग अलग तरह के  पौधों को  तैयार किया जाता है। उनपर शोध भी होता है। इसके अंदर जाकर भी हमने थोड़ी देर घूमा।  यहां लगे बोर्ड के मुताबिक 10 अप्रैल 2015 को मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग ने इस कंजरवेटरी का उदघाटन किया। यह सिक्किम के वन विभाग के अंतर्गत आता है।
इस केंद्र  के अंदर रंग बिरंगे फूलों के संग हम कुछ वक्त गुजारते हैं। उद्यान बड़ा है। समय होता तो थोड़ा और वक्त गुजारते थे। पर वक्त रुकता कहां है किसी के लिए...  हमारे मन में वह गीत याद आता है - फिर छिड़ी बात फूलों की...रात  है या बारात फूलों की...ये फूल भी ना जिंदगी के हर मोड़ पर चले आते हैं  किसी न किसी रूप में।


ताशी  व्यू प्वाइंट से नजारा -  
इसके बाद हमारा अगला पड़ाव है ताशी व्यू प्वाइंट।    ताशी व्यू प्वाइंट से पहाड़ों का नजारा करने के लिए लोग जुटते हैं। इस व्यू प्वाइंट के अंदर एक सोवनियर शॉप  भी बना हुआ है। यहां पर हमारी मुलाकात बनारस के एक शिक्षक दंपति से हुई जो हमें एक दिन पहले युमथांग वैली में भी मिले थे। घूमते हुए कई लोगों का बार-बार टकरा जाना बड़ा रोचक लगता है। 


ताशी व्यू प्वाइंट के पास एक  माइल स्टोन लगा है। इस पर लिखा है नाथुला 54 किलोमीटर। चुंगथांग 90 किलोमीटर।  सिलिगुड़ी 129 किलोमीटर और गंगटोक 6 किलोमीटर। मतलब ये एक चौराहा है जहां से कई रास्ते अलग अलग दिशाओं की ओर जाते हैं।


सच ही कहा है कि सिर्फ हम ही नहीं ये  रास्ते भी चलते रहते हैं। और  कहां से कहां हम पहुंच जाते हैं  यूं ही चलते हुए। पर हमें चलना ही पड़ेगा क्योंकि चलना  ही जीवन की निशानी है। यहां पर मुझे एक सिक्किम के सज्जन मिलते हैं  वे टोकरी और कुल्हाड़ी लेकर निकल पड़े हैं। लकड़ियां काटने के लिए।   मैं उनकी फोटो लेता हूं तो वे देखकर मुस्कुराते हैं। 

ल्हासा फाल्स  - इसके बाद  हम ल्हासा फाल्स नामक झरना  के पास पहुंच जाते  हैं। यह चुंगथांग रोड पर  स्थित है। फिलहाल इस झरने  में पानी कम आ रहा है। बारिश के दिनों में इसमें खूब पानी आता है। झरने के आसपास ढेर सारी बौद्ध पताकाएं फहरा रही हैं।   ऐसा प्रतीत होता है कि इस झरने का आध्यात्मिक महत्व है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
(WATER RESERVOIR GANGTOK, PLANT CONSERVATERY, TASHI VIEW POINT, LAHASA FALLS )          
   

Monday, April 23, 2018

गंगटोक से गणेश टोक - गणपति विराज रहे हैं...

सुबह सुबह हमारी इच्छा गंगटोक के स्थानीय स्थलों के दर्शन की थी। बिसमिल्लाह भाई की पत्नी के हाथों बनाए पराठे खाने के बाद हमलोग निकल पड़े। अनादि को पराठा इतना पसंद आया कि उन्होने एक पैक भी करा लिया। टैक्सी वाले सोनम भूटिया (87689-40513) को फोन लगाया, पर वे नामची चले गए हैं।


उन्होंने कहा आप नाराज न हों मैं दूसरे साथी को भेजता हूं। पर हमारे पास मधुकर भाई टैक्सी वाले ( 97490-62299 ) का नंबर है। उनसे बात हुई और मधुकर भाई 9 बजे टैक्सी लेकर होटल के बाहर हाजिर हो गए। सात प्वाइंट 700 रुपये में देखना तय हुआ था। हमने होटल से चेकआउट करके अपना सामान भी टैक्सी में डाल लिया। तय हुआ कि गंगटोक दर्शन के बाद वे हमें देवराली टैक्सी स्टैंड छोड़ देंगे।
मधुकर भाई की उम्र 73 साल है। वे नेपाली हैं। 60 की उम्र में सिक्किम सरकार की नौकरी से रिटायर हो गए हैं। पर रिटायर होने के बाद घर में नहीं बैठे। कहते हैं अगर काम नहीं करूंगा तो बीमार हो जाउंगा। तो 73 साल की उम्र में कुशलता से टैक्सी चला रहे हैं। लंबी उम्र के कारण उनके पास जानकारियों का खजाना है। उन्होंने कहा है कि मैं सभी दर्शनीय स्थलों पर मैं पार्किंग में वाहन न लगाकर थोड़ा दूर सड़क पर पार्क करूंगा इस तरह आपका पार्किंग का खर्च बच जाएगा।
तो हमारा पहला पड़ाव है। फ्लावर गार्डन। एमजी से थोड़ा आगे यह एक छोटा सा निजी उद्यान है। 20 रुपये का प्रवेश टिकट है। मुन्नार के बोटानिकल गार्डन से काफी छोटा है। पर देखने में कोई बुराई नहीं है। छोटे से उद्यान में कई किस्म के फूलों को संवार कर रखा गया है। इस गार्डन में तिब्बती बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा भी आ चुके हैं।

सिक्किम के गणपति -  इसके बाद हमलोग पहुंचे हैं गणेश टोक।   गगंटोक शहर में दो ऊंचे मंदिर हैं। हनुमान टोक और गणेश टोक। गणेश टोक की दूरी सिक्किम एक एमजी रोड से 7 किलोमीटर है। मंदिर का परिसर बड़ा ही भव्य और सुंदर है। मंदिर के प्राचीर से गंगटोक शहर का सुंदर नजारा दिखाई देता है। गणेश टोक की ऊंचाई 6500 फीट है। मंदिर शहर से भले  ज्यादा दूर नहीं  है पर  यहां पहुंचने के लिए आपको टैक्सी बुक करनी पड़ेगी।


गणेश टोक मंदिर में जूते घर में पांव के जूते उतारने के बाद तीन मंजिले मकान के बराबर सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। मंदिर के अंदर नेपाली पुजारी तैनात दिखाई देते हैं। वे भक्तों को प्रसाद देते हैं और हाथों में कलावा बांध देते हैं। मंदिर के अंदर गणेश जी की विशाल और सुंदर प्रतिमा है। मंदिर के चारों तरफ परिक्रमा पथ बना है।
प्रथम पूज्य गणपति का यह मंदिर ऐतिहासिक नहीं है, पर यह गंगटोक आने वाले सैलानियों की सूची  में शामिल हो चुका है। इस मंदिर के परिक्रमा पथ से गंगटोक शहर का बड़ा ही सुंदर नजारा दिखाई देता है। कुछ लोग यहां से देर तक जी भर के शहर का नजारा करते हैं। तो कुदरत के बेहतरीन नजारे के लिए भी आप यहां जरूर पहुंचे। इस मंदिर परिसर में एक गिफ्ट शॉप भी है। मंदिर परिसर में कार पार्किंग और शौचालय, पेयजल आदि का बेहतर इंतजाम भी है।

सिक्किम का हिमालयन जूलोजिकल गार्डन -  गणेश टोक के ठीक सामने गंगटोक को जूलोजिकल गार्डन का प्रवेश द्वार है। आपके पास समय है तो अंदर घूमने जा सकते हैं। पर हम इस  सफर में उद्यान के अंदर नहीं  गए वक्त थोड़ा कम है। जूलोजिकल गार्डन में प्रवेश के लिए टिकट का प्रावधान है।  

 इस जूलोजिकल गार्डन में आप स्नो लेपर्ड, रेड पांडा, ब्लू शीप, बार्किंग डियर आदि से मिलने का मौका प्राप्त कर सकते हैं। यह 205 हेक्टेयर  क्षेत्र में फैला हुआ है। इस पार्क का संरक्षण  राज्य का वन विभाग करता  है। यह सुबह नौ बजे से तीन बजे तक खुला रहता है।   अपने वाहन के साथ  अंदर जाना चाहते हैं तो वाहन के लिए 100 रुपये एंट्री फी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
(FLOWER GARDEN, GANESH TOK, ZOOLOGICAL GARDEN, GANGTOK