Monday, April 30, 2018

थिंपू का शाकाहारी होटल गासिल और सोनम दोरजी

अगर आप शाकाहारी हैं और आप भूटान दौरे पर हैं तो किसी शाकाहारी होटल में ही रुके तों अच्छा होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि भूटान में मांसाहार के नाम पर सब कुछ खाया जाता है। यहां की ज्यादातर आबादी बीफ (गौमांस) भी खाती है। थिंपू शहर में होटल गासिल के अलावा शांति देवा और होटल भूटान भी शाकाहारी होटल हैं। गासिल और शांतिदेवा बजट होटल हैं, जबकि होटल भूटान तीन सितारा है।



दोस्त और बेहतरीन गाइड सोनम दोरजी -  होटल गासिल हमने दो दिनों के लिए बुकिंग डाटकाम से बुक किया था। इसके कमरे 1450 रुपये प्रतिदिन के हैं। वैसे यहां अकेले व्यक्ति के लिए 800 रुपये का भी कमरा है। नोरजिन लाम मुख्य सड़क पर स्थित होटल के आधारतल पर रेस्टोरेंट और रिसेप्शन है। ऊपर के तीन मंजिलों पर 24 कमरे हैं। होटल का वेज रेस्टोरेंट इतना लोकप्रिय है कि आसपास के लोग भी खाने आते हैं। रेस्टोरेंट वेज है पर यहां वे ड्रिंक्स पेश करते हैं। वैसे भूटान के हर छोटे बड़े रेस्टोरेंट के पास ड्रिंक्स का परमिट है, ऐसा देखकर प्रतीत होता है।
होटल गासिल के प्रबंधक सोनम दोरजी का व्यवहार काफी अच्छा है। वे बहुत अच्छे गाइड भी हैं। साथ ही भूटान आने वाले सैलानियों के बहुत अच्छे दोस्त। उन्होंने हमें भूटान घूमने का लिए बड़े ही विस्तार से और धैर्य से गाइड किया। साथ ही कम खर्चे में कैसे घूमा जाए उसकी भी टिप्स दी। स्वभाव से सोनम दोरजी बड़े विनोदी हैं। उनके एक भाई दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में भूटानी रेस्टोरेंट चलाते हैं। 
सोनम दोरजी की सलाह पर हमने एक दिन पारो में रुकने की योजना बनाई। उन्होंने अपने होटल से दो दिनों की बुकिंग में एक दिन की बुकिंग रद्द करके हमें पारो में सिटी होटल की अगले दिन की बुकिंग उपलब्ध कराई। परदेश में इतनी मदद भला कौन करता है। तो सोनम भाई ने अपने व्यवहार से हमारा दिल जीत लिया। वैसे अगर आप भूटान घूमने जा रहे हैं तो पहले या तो पारो में एक रात्रि विश्राम कर दो दिन वहां घूमें या फिर लौटते हुए पारो में एक या दो रातें ठहरने की योजना बनाएं।


भूटान में सैलानियों घूमने के लिए तीन प्रमुख शहर हैं। पारो,थिंपू और पुनाखा। अगर आप भूटान पांच रातों का कार्यक्रम बना रहे हैं तो दो रातें पारो दो थिंपू और एक पुनाखा में गुजारें। या थिंपू में ही रुककर पुनाखा दिन भर घूम कर वापस लौट सकते हैं। पुनाखा के लिए सैलानियों को अलग से परमिट लेना पड़ता है। आपके भूटान परमिट की छाया प्रति के साथ एक आवेदन करना पडता है। पास जारी करने वाला इमिग्रेशन आफिस शनिवार और रविवार को बंद रहता है। हमें 25 तारीख यानी रविवार को पुनाखा जाना है तो हमने 23 तारीख की सुबह में ही पुनाखा का परमिट निकलवा लिया। 22 तारीख की शाम को हल्की बारिश के बीच हमने क्लाक टावर के आसपास थिंपू शहर का दौरा किया। बाजार में सामान महंगे हैं।


23 की सुबह सबसे पहले हमलोग छोरटेन मेमोरियल गए। यह थिंपू शहर का प्रमुख जोंग यानी मठ-मंदिर है। सैलानियों के लिए यह सुबह 9 बजे से 5 बजे तक खुलता है। विदेशी सैलानियों के लिए 300 रुपये का प्रवेश टिकट है। छोरटेन मेमोरियल में भूटान सरकार के हाईड्रो इलेक्ट्रिक विभाग के इंजीनियर मिल गए। बातों बातों में उनसे मित्रता हो गई, उन्होंने हमें भूटान के इमिग्रेन आफिस तक छोड़ दिया। यह दफ्तर क्राफ्स बाजार के पास ही है।  
 - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( BHUTAN, THIMPU, HOTEL GHASEL, SONAM DORJEE  ) 

Sunday, April 29, 2018

फुंटशोलिंग थिंपू मार्ग पर सबसे ऊंचा प्वाइंट - चापचा


फुंटशोलिंग से थिंपू के मार्ग पर अगला कस्बा आता है चापचा। यहां पहुंचने के साथ ही फुंटशोलिंग से 120 किलोमीटर दूर आ चुके हैं हमलोग। यानी आधे  से ज्यादा सफर पूरा हो चुका है। चापचा 8163 फीट की ऊंचाई पर थिंपू मार्ग का सबसे ऊंचा प्वाइंट है। इसलिए यहां ठंड सबसे ज्यादा लगती है। चापचा के आसपास के रास्ते भी अपेक्षाकृत खतरनाक हैं। यहां कई तीखे मोड़ आते हैं।  नदी के किनारे पहाड़ों को काटकर रास्ता बनाया गया है।




एक तरफ सुहानी सी दरिया जो इठलाती हुई बह रही है, दूसरी तरफ ऊंचे पहाड़। बीच में गुजरती सर्पिली सड़क।  हम ही नहीं  रास्ते भी चल रहे हैं। इसी बीच अचानक मौसम ने करवट ली है। आसमान में बादल छा गए हैं और हल्की बारिश होने लगी है। ड्राईवर साहब ने गाड़ी रोककर छत पर रखे हमारे लगेज को प्लास्टिक की शीट से ढक दिया। उन्हें हम सबके सामान की पूरी फिक्र है। इसके बाद फिर शुरू हुआ आगे का सफर।
 


चापचा के पास आखिरी चेकपोस्ट आया जहां हमारे परिमट की एक बार फिर चेकिंग और एंट्री हुई। इस परमिट दफ्तर में सारी अधिकारी महिलाएं  हैं।  उनकी सरकारी वर्दी  काफी आकर्षक है। हमलोग फिर आगे चल पड़े हैं। इसके बाद आया वत्सा। वत्सा से थिंपू 54 किलोमीटर रह गया है। शाम गहराने लगी है। अब हमलोग अब पहुंच गए दामाचू जहां से 36 किलोमीटर दूरी रह गई है थिंपू शहर की। दूरी घटने के साथ हमारा रोमांच बढ़ता जा रहा है।

थिंपू के मार्ग पर अगला पड़ाव चूजोम है। चूजोम में पारो चू और वांग चू नदियों का संगम है। यहां से एक रास्ता पारो और एक रास्ता हा ( चीन सीमा)  के लिए अलग होता है। इसलिए थिंपू के मार्ग पर चूजोम बड़ा जंक्शन है। यहां से थिंपू 28 किलोमीटर रह गया है। चौड़ी सड़क पर गाड़ी सरपट भाग रही है। शहर से 7 किलोमीटर पहले प्रवेश द्वार आया जिस पर लिखा है वेलकम टू थिंपू।




इसके आगे शहर शुरू हो गया।   एक विशाल हाथी की मूर्ति ने हमारा स्वागत किया।   परिवेश देखकर ही लग रहा है कि हम किसी साफ सुथरे शहर में प्रवेश कर रहे हैं।  शहर के बाहरी इलाके में नए नए भवनों का निर्माण जारी है। पर इन सबके डिजाइन में एक साम्यता दिखाई दे रही है।  शहर की सड़कें चौड़ी हैं।  नदी का पुल करके हमलोग शहर के ह्रदयस्थली की ओर पहुंच रहे हैं।


करीब छह घंटे का यह  सफर  बड़ा   मनभावन रहा।  अनादि को भी इस सफर में खूब मजा आया।  पर हमलोग अब थोड़े थक भी चुके हैं। हमारे टैक्सी ड्राईवर  हमें भूटान घूमने में किसी भी तरह की मदद के लिए  अपनी ओर से ऑफर करते हैं।  उन्होने कहा कि मैं टैक्सी दिला दूंगा। आप मुझे फोन करना। हमने उनका नंबर ले लिया है।  क्या पता हमें उनकी जरूरत ही पड़ जाए। 



शाम के छह बजे हमलोग भूटान की राजधानी थिंपू के क्लॉक टावर स्कावायर पहुंच चुके हैं।  टैक्सी  वाले को हमने  धन्यवाद कहा।  हमारा होटल गासिल सामने ही है। अपना सामान लेकर टहलते हुए ही हमलोग होटल के रिसेप्शन पर पहुंच गए।   यहां होटल के प्रोपराइटर सोनम दोरजी ने हमारा गर्मजोशी से स्वागत किया, वेलकम टी के साथ। उनकी यह चाय हर  होटल में आने वाले के लिए निःशुल्क है। उसके बाद जो हमें कमरा आवंटित किया वह तीसरी मंजिल पर है। 


होटल में काम करने वाली 20 साल की बाला कर्मा हमारा सामान लेकर कमरे तक छोड़ने आई। कर्मा कामकाज में गजब फुर्तीली है। वह हमें साबुन, तौलिया देने के लिए तीन बार दौड़ती हुई तीन मंजिल तक सीढ़ियां चढ़कर उपर आई। पर किसी से कोई शिकायत नहीं। होटल के कमरे की खिड़कियां सड़क की ओर मुखातिब है। कमरे से शहर के घंटा घर स्क्वायर का सुंदर नजारा दिखाई दे रहा है।  रात का  भोजन गासिल होटल के डायनिंग हॉल में लेने के बाद हमलोग जल्द ही सो गए। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-        PHUNTSHOLING, THIMPHU, GIDU, WONKHA, CHUKHA, CHAPCHA, WATSA, DAMACHU, CHUZOM )

Saturday, April 28, 2018

फुंटशोलिंग से थिंपू – 172 किलोमीटर छह घंटे का सफर

परमिट बन जाने के बाद अपना सामान लेकर हम जैसे ही जयगांव से भूटान के फुंटशोलिंग शहर में घुसे, एक शेयरिंग टैक्सी वाले हमारे पीछे पड़ गए, थिंपू चलना है क्या दो सवारी आगे की सीट खाली है। हम यही तो चाहते थे। बाकी सीटें भर चुकी हैं, बस चलने ही  वाले हैं। फुंटशोलिंग से थिंपू की दूरी 172 किलोमीटर है। शेयरिंग सूमो, बुलेरो का किराया 600 रुपये है। जबकि छोटी कार से शेयरिंग किराया 750 रुपये है। अगर बस से जाते हैं तो किराया 221 रुपये है। समय लगता है तकरीबन 6 घंटे। हमारी टैक्सी में हमारे अलावा पीछे की सीटों पर 8 बिहारी मजदूर हैं जो वर्क परमिट लेकर थिंपू जा रहे हैं।

हमारा थिंपू के लिए सफर दोपहर के 12 बजे शुरू हुआ। ड्राईवर महोदय फुंटशोलिंग के द्रुक होटल से कुछ सरकारी सामान लेने गए। यह भूटान का विशाल होटल  है। उसके बाद हमलोग चल पड़े। फुंटशोलिंग शहर खत्म होते ही चढ़ाई शुरू हो गई। करीब 5 किलोमीटर चलकर पहला चेकपोस्ट आया जहां हमारे परमिट की एंट्री हुई। यहां पूरा सिस्टम कंप्यूटरीकृत है। हर सैलानी की जानकारी ऑनलाइन सिस्टम पर दर्ज होती है।


थिंपू जाने वाली सड़क दो लेन की चौड़ी सड़क है। इसे भारत सरकार के बीआरओ ने बनवाया है। परियोजना का नाम है दंतक। सड़क का रखरखाव भी बीआरओ के हवाले है। ये सड़क 2008 के बाद बनी है।
रास्ते में कुछ भूटानी महिलाएं फल बेचती नजर आती हैं। हमारे ड्राईवर उबले हुए मीठे आलू खरीदते हैं और हमें भी खाने को देते हैं। यह 30 रुपये में एक किलो मिल रहा है। बाकी सभी फल भूटान में महंगे हैं।

वोंखा में दोपहर का लंच -  अपने सफर पर 45 किलोमीटर के सफर के बाद हम गीदू पहुंच गए हैं। ऊंचाई बढ़ने के साथ ठंड बढ़ने लगी है तो हमने भी हल्के जैकेट निकाल लिए हैं। गीदू में भूटान सरकार का डिग्री कॉलेज है। इसके बाद हमलोग 95 किलोमीटर पर वोंखा में एक होटल में खाने के लिए रुके। होटल साफ सुथरा है। पर हमने वहां नूडल्स खाना पसंद किया।  इस रेस्तरां  में ब्लैक टी,   ग्रीन टी   20   रुपये की है तो मिल्क टी   30   रुपये की।

पूरा होटल महिलाएं चला रही हैं।   वे भारत के करेंसी नोट भी स्वीकार कर रही हैं।   हल्की ठंड के बीच मौसम सुहाना होता जा रहा है। हां इस रेस्टोरेंट में  गरमाहट प्रदान करने के लिए लकड़ी  से चलने वाला हीटर लगा हुआ।  धीरे धीरे लकड़ी जलती रहती है। इससे  डायनिंग हॉल में गरमाहट बनी  रहती है।     थोडी सी पेट पूजा के बाद हमलोग आगे चल पड़े। 

चूखा में पन बिजली परियोजना -
वोंखा के बाद चूखा नामक एक छोटा सा कस्बा आया है। यहां पर भूटान सरकार का हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट लगा है। यह पन बिजली परियोजना कभी भारत सरकार के सहयोग से बनी थी। अब हमारे साथ भूटान की प्रमुख वांगचू नदी की धारा साथ साथ चल रही है। भूटान   बौद्ध धर्म का देश है तो यहां रास्ते में  जगह जगह सड़क के किनारे बौद्ध मंत्र  की पताकाएं लहराती दिखाई दे रही हैं। ओम मने  पद्मे हम... 



भूटान का ये हमारा सफर बौद्ध धर्म के कई रूपों से साक्षात्कार का  भी है। हमारी गाड़ी में हमारे अलावा जो आठ सवारियां हैं वे सभी मजदूर लोग हैं जो अपना वर्क परमिट बनवाकर थिंपू जा रहे हैं, अगले एक साल तक काम करने के लिए।   पर इन मजदूरों में से कई ने पिछली रात और आज सुबह जमकर शराब पी है। इसका पता हमें यूं चला कि  ज्यादा पीने के कारण वे पहाड़ी रास्ते में लगातार उल्टियां कर रहे हैं।

हर थोड़ी देर पर उनमें से कोई एक मजदूर बोल पड़ता है - गाड़ी रोको रोको। इससे ड्राईवर महोदय को बार-बार गाड़ी रोकनी पड़ रही है। पर चालक महोदय का  धैर्य गजब का है वे उनका पूरा सहयोग कर रहे हैं। कई बार आपके आसपास लोग उल्टी कर रहे हों तो आपका भी मूड खराब हो जाता है। पर हमलोगों को उल्टी नहीं आई। शायद हम पहाड़ों पर सफर के अब अभ्यस्त हो चुके हैं।   सुरक्षा  के साथ हमारा सफर जारी   है।




 -        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
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Friday, April 27, 2018

भूटान में प्रवेश के लिए पासपोर्ट नहीं पर परमिट जरूरी

भूटान हमारा ऐसा पड़ोसी देश हैजहां जाने के लिए भारतीय नागरिकों को पासपोर्ट/वीजा की जरूरत नहीं पड़ती। पर हमें वहां जाने के लिए परमिट बनवाना पडता है। भारतीय नागरिकता के सबूत के लिए हमारा मतदाता पहचान पत्र (वोटर आई कार्ड)  ही वहां मान्य है। इसके आधार पर ही भूटान सरकार का इमिग्रेशन डिपार्टमेंट परमिट जारी कर देता है। पर अगर 18 साल से कम उम्र के बच्चे हों तो उनका जन्म प्रमाण पत्र जरूरी है।

अकेले व्यक्ति का परमिट नहीं - दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि भूटान का परमिट अगर आप टूरिस्ट के तौर पर जा रहे हैं तो अकेले व्यक्ति का नहीं बनता है। यानी की सैलानियों के लिए परिवार या समूह में होना जरूरी है। फुंटशोलिंग में भूटान के वीजा,परमिट का दफ्तर भूटान गेट के अंदर द्रुक होटल के पास है। वीजा-परमिट कोलकाता के भूटानी दूतावास से भी बनवाया जा सकता है। परमिट का दफ्तर सुबह 9 बजे खुल जाता है। शनिवार रविवार और भूटान सरकार के घोषित अवकाश के दिनों में दफ्तर बंद रहता है। 

आधार कार्ड मान्य नहीं - नेपाल और भूटान की यात्रा करने वाले भारतीयों के लिए ‘आधार’ वैध पहचान दस्तावेज नहीं है। यात्रा को सरल बनाने के लिए 65 साल से अधिक और 15 साल से कम आयु वाले अपनी आयु और पहचान की पुष्टि के लिए अपनी फोटो वाले दस्तावेज दिखा सकते हैं। इनमें पैन कार्डड्राइविंग लाइसेंसकेन्द्र सरकार स्वास्थ्य सेवा (सीजीएचएस) कार्ड और राशन कार्ड शामिल हैं लेकिन आधार कार्ड शामिल नहीं है।

जयगांव में सुबह सुबह नास्ते के बाद 9 बजे हमलोग भूटान में प्रवेश कर फुंटशोलिंग के परमिट दफ्तर में पहुंच गए हैं। यहां हमने दो लंबी लाइनें देखीं। पता चला कि ये लाइन भूटान में जाकर काम करने वाले भारतीय मजदूरों की है। राजमिस्त्री, बिजली, पलंबर जैसे मजदूर भूटान जाते हैं। वहां दैनिक मजदूरी भारत से ज्यादा मिलती है। ऐसे मजदूरों को छह माह या एक साल का परमिट जारी होता है। यह पीवीसी कार्ड पहचान पत्र जैसा होता है।पर भूटान में मजदूरी करने के लिए किसी एजेंट के द्वारा जाना पड़ता है। एजेंट भी काम दिलाने के नाम पर मोटा कमिशन बनाते हैं।
टूरिस्ट परमिट बनवाने के लिए ज्यादा भीड़ नहीं थी। पर वहां जाकर पता चला कि बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट होना जरूरी है। मैं 13 साल के अनादि का जन्म प्रमाण पत्र लेकर नहीं गया था। हमारी परेशानी बढ़ गई। तभी कुछ लोगों ने सलाह दी कि ह्वाटसएप पर बर्थ सर्टिफिकेट मंगा लिजिए। फिर हमने यही किया। दिल्ली माधवी को फोन कर ह्वाटसएप पर मोबाइल कैमरे से फोटो खिंचवाकर जन्म प्रमाण पत्र मंगाया। फुंटशोलिंग में सामने कैफे में जाकर उसका प्रिंट निकलवाया। फार्म पूरे कर एक बार फिर इमीग्रेशन अधिकारी के पास पहुंचा। पर आप जिस तारीख से आप भूटान की यात्रा शुरू कर रहे हैं उसी तारीख से होटल बुकिंग की रशीद भी आवश्यक है। यह रशीद हमारे पास ईमेल पर थी। हमें उसका भी प्रिंट निकलवाने के लिए एक बार फिर कैफे जाना पड़ा। इस कवायद में आधे घंटे गुजर गए। अब शुरू हुई हमारे सारे कागज की जांच।

भूटान के इमिग्रेशन अधिकारी अपने राजकीय परिधान में बैठे कागज जांच रहे थे। मेरे फार्म पर प्रोफेशन में जर्नलिस्ट लिखा देख वे चौंक गए। पूछा, आप वहां क्यों जा रहे हैं, मैंने कहा बतौर सैलानी घूमने जा रहा हूं।  उन्होंने कहा, ठीक है, पर वहां जाकर रिपोर्टिंग मत किजिएगा। हमने उन्हें आश्वस्त किया। उसके बाद फार्म के साथ हमें पहली मंजिल पर भेज दिया। वहां कई काउंटर बने थे। एक काउंटर लाइन में लग गया। वहां महिला अधिकारी ने हमारी डाटा एंट्री की, ऑनलाइन फोटो लिया, उंगलियों के निशान लिए। उसके 10 मिनट बाद दूसरे काउंटर से हमें परमिट मिल गया। हमने बाहर आकर उसका फोटो कॉपी करा लिया। यह जरूरी है क्योंकि पुनाखा जाने के लिए थिंपू में दुबारा परमिट लेना पड़ता है तब फोटो कापी की जरूरत पड़ती है। 

पर्याप्त नकदी लेकर जाएं - परमिट लेकर हमलोग वापस होटल आए। चेकआउट किया। आराम लॉज के मैनेजर नवीन जी जो सीतामढ़ी के रहने वाले हैं,  उन्होंने कहा जितनी भूटानी करेंसी चाहिए मुझसे बदलवा लिजिए बिना किसी कमिशन के। वापस आने पर बची हुई राशि देकर हमसे फिर भारतीय मुद्रा ले लिजिएगा। हालांकि भूटान में थिंपू, पारो में भारतीय करेंसी चल जाती है। पर अक्सर लोग 500 और 2000 के नोट नहीं लेते। भारतीय और भूटानी करेंसी का मूल्य बराबर ही है। पर अगर आपके पास भूटान में नकदी खत्म हो जाए तो वहां एटीएम से निकालने पर 200 रुपये प्रति ट्रांजेक्शन शुल्क लगता है। अगर कार्ड से किसी दुकानदार को पेमेंट करना चाहें तो वह 3.5 फीसदी कमीशन मांगते हैं। इसलिए पर्याप्त नकदी लेकर जाएं तो अच्छा है।
 परमिट चेकलिस्ट -
    -        मतदाता पहचान पत्र या जन्म प्रमाण पत्र
-        भूटान में होटल बुकिंग की रशीद
-        आपका टूर प्लान
-        परमिट के लिए भरा हुआ फार्म
-        एक फोटोग्राफ, ( परमिट के लिए कोई शुल्क नहीं है)   
- vidyutp@gmail.com
(BHUTAN PERMIT, JAIGOAN, BENGAL ) 

फुंटशोलिंग में भूटान परमिट के लिए लाइन मे लगे भारतीय मजदूर। 

Thursday, April 26, 2018

जयगांव - भूटान का लोकप्रिय प्रवेश द्वार

बंगाल के अलीपुर दुआर जिले का जयगांव शहर। जयगांव हमारे पड़ोसी देश भूटान का सबसे लोकप्रिय प्रवेश द्वार है। रोज हजारों लोग सैकड़ो वाहन यहां से भूटान में प्रवेश करते हैं। 

भूटान के तीन प्रवेश द्वार : वैसे भारत से भूटान जाने के लिए तीन चेकपोस्ट वाले शहर हैं जहां से भूटान में प्रवेश किया जा सकता है।
जयगांव के अलावा असम के बंगाईगांव से गलपे बार्डर से और असम से रंगिया पास समद्रुप जोंगखार बार्डर से भी भूटान में प्रवेश किया जा सकता है। पर इनमें जयगांव-फुंटशोलिंग सबसे लोकप्रिय प्रवेश मार्ग है भूटान के लिए। ज्यादातर सैलानी यहीं से प्रवेश करते हैं भूटान में। भारत से भूटान जाने वाले रसद व अन्य सामान की सप्लाई भी यहीं से होती है। जयगांव में आकर्षक भूटान गेट बना है, जिसके उस पार घड़ी अपना समय बदल लेती है। भूटान की घड़ी हमसे 30 मिनट आगे है। यहां दोनों देशों के बीच कोई नो मेन्स लैंड नहीं है। एक दीवार के इस पार भारत उस पार भूटान। सीमा की रक्षा एसएसबी के हवाले है।

भूटान में पैदल प्रवेश करने के लिए भूटान गेट बगल से छोटा सा प्रवेश द्वार है जिससे आप सुबह 6 बजे से रात्रि 10 बजे तक बेधड़क आ जा सकते हैं। गेट पर मेटल डिटेक्टर लगे हैं। आप भारतीय हैं तो भूटान गेट के अंदर 5 किलोमीटर तक यानी फुंटशोलिंग शहर में बिना किसी परमिट के जा सकते हैं। तो दिन भर भारत भूटान के बीच आवाजाही लगी रहती है। पर इस पार और उस पार का अंतर दिखाई देता है। फुंटशोलिंग शहर की सड़के साफ सुथरी चमचमाती हुई हैं, तो भारतीय पक्ष जयगांव की टूटी फूटी। जयगांव का बाजार सस्ता है तो फुंटशोलिंग महंगा।

अगर आप भूटान जाना चाहते हैं तो देश के किसी भी कोने से जयगांव पहुंचे। विमान से आए तो बागडोगरा एयरपोर्ट से सिलिगुड़ी शहर। सिलिगुड़ी शहर से बस से जयगांव। दूरी 170 किलोमीटर के आसपास है और किराया 100 से 140 रुपये। बागडोगरा से सीधे जयगांव टैक्सी बुक करके भी पहुंच सकते हैं। जयगांव का निकटतम रेलवे स्टेशन हाशीमारा है। हाशीमारा से जयगांव की दूरी 18 किलोमीटर है। आटोरिक्शा और बसें मिल जाती हैं। न्यू जलपाईगुड़ी गुवाहाटी रेल मार्ग पर फालाकाटा उतर कर भी जयगांव पहुंच सकते हैं। फालाकाटा से जयगांव 52 किलोमीटर है। बसें दिन भर मिलती हैं। सिक्किम की राजधानी गंटटोक और दार्जिलिंग कलिंपोंग से भी जयगांव के लिए शेयरिंग टैक्सियां रोज चलती हैं। पर ये टैक्सियां रोज सुबह ही दोनो तरफ से मिलती हैं।
भूटान में प्रवेश से पहले परमिट बनवाना पड़ता है। इसलिए हर सैलानी को एक रात तो अक्सर जयगांव में गुजारना ही पड़ता है। तो जयगांव में भूटान गेट के आसपास एनएस रोड और लिंक रोड पर कई होटल उपलब्ध हैं। यहां हर बजट में कमरे हैं 300 से लेकर 1500 तक।
जयगांव मतलब एक्सटेंशन ऑफ बिहार – पूरे जयगांव शहर में  बिहार के कारोबारी और मजदूर भरे हुए हैं। बंगाल का शहर होकर भी हिंदी भोजपुरी बोलता नजर आता है। यहां आप सत्तू, लिट्टी चोखा, गोलगप्पा, मोमोज सब कुछ खा सकते हैं। ज्यादातर दुकानदार बिहार के हैं।
इतना ही नहीं जयगांव से रोज बिहार के पूर्णिया, सहरसा, मुजफ्फरपुर, छपरा, सीवान, गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी के लिए सीधी बसें खुलती हैं। मतलब साफ है जयगांव की आधी से ज्यादा आबादी बिहार से संबंध रखती है। जयगांव के सड़कों पर शाम-सुबह टहलते हुए यूं लगता है जैसे बिहार में ही हों।
एनएस रोड पर गोकुल स्वीट्स नामक मिठाइयों की दुकान है। दुकानदार महोदय अलवर राजस्थान के हैं। वे कलाकंद भी बनाते हैं। रसमलाई भी और रसमाधुरी भी। सुबह नास्ते में दो छोटे भठूरे 25 रुपये के। हमने रात को मिठाइयां खाई तो सुबह छोला भठूरा। सुबह सुबह मुझे तो छपरा के साव जी एनएस रोड पर सत्तू बेचते मिले, 10 रुपये का गिलास। साव  जी 40 साल से जयगांव में हैं। 10 रुपये का एक गिलास सत्तू बनाने से पहले 50 ग्राम सत्तू तराजू में तौलते हैं फिर बड़े प्रेम से सत्तू का ग्लास तैयार करते हैं। मैंने पिया तो देखा देखी अनादि भी सत्तू पीने लगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( GOKUL SWEETS, JAIGAON , BENGAL) 

Wednesday, April 25, 2018

बीरपाड़ा से जयगांव वाया मदारीहाट-हासीमारा


पश्चिम बंगाल के अलीपुर दुआर जिले के बीरपाड़ा में हम अगली बस का इंतजार कर रहे हैं। हमें जाना है जयगांव पर हमें अगली बस मिली मदारी हाट तक की। स्थानीय लोगों ने बताया कि आप मदारी हाट तक चले जाएं,  वहां से जयगांव की बस मिल जाएगी।


बीरपाड़ा से मदारी हाट सिर्फ   12    किलोमीटर है। तो हम जल्द ही मदारीहाट पहुंच गए । मदारीहाट में उतरकर हम बस का इंतजार करने लगे पर देर तक कोई बस नहीं आई। हमारे साथ एक परिवार भी बस का इंतजार कर रहा है। उन लोगों को भी जयगांव जाना हैं। वे  लोग हिंदी  में बातें कर रहे हैं। उनकी हिंदी  भोजपुरी मिली हुई है। दरअसल दुआर्स इलाके में बड़ी संख्या में बिहार और यूपी से  कई सौ साल पहले के  माइग्रेट किए हुए लोग रहते हैं। ये लोग इधर के चाय बगानों में श्रमिक के तौर पर आए थे। हमलोग चौराहे   पर खड़े हैं लोग बता रहे हैं बस फालकाटा से भी आ सकती है और सिलिगुड़ी की तरफ से भी। मदारीहाट से जयगांव   30  किलोमीटर है। हां आप फालाकाटा से भी जयगांव पहुंच सकते हैं। 

शाम के सात   बज गए हैं। अब अंधेरा छाने लगा है। पर छोटे से कसबे मैं आश्वस्त हूं अगर बस नहीं आई तो सामने एक गेस्ट हाउस दिखाई दे रहा है। रात को यहीं रुक जाएंगे। फिर सुबह सुबह आगे का सफर शुरू करेंगे। पर थोड़ी देर में सिलिगुड़ी से आने वाली बस आ गई। हमलोग फटाफट इसमें जा बैठे। इसमें जगह भी मिल गई।


हमारी बस तेजी से से दौड़ रही है। पहले हाशीमारा रेलवे स्टेशन आयाजो न्यू हासीमारा कहलता है। जयगांव जाने के लिए हासीमारा निकटतम रेलवे स्टेशन है। इसके बाद ओल्ड हासीमारा आया। हासीमारा में हमें कुछ आवासीय होटल के बोर्ड दिखाई देते हैं। मतलब की रात हो जाए तो यहां भी रुकने का इंतजाम है। थोड़ी देर में हमलोग जयगांव बाजार पहुंच गए हैं। सरपट भागती बस ने हमें जयगांव बस स्टैंड में उतार दिया।




पर अब हमें मालूम नहीं की जाना कहां है। बस स्टैंड के आसपास आवासीय होटल नहीं दिखाई दे रहे हैं। पर वहां से शेयरिंग आटो रिक्शा मिला जिसमें   7    रुपये प्रति सवारी की दर से हम भूटान गेट ले जा रहे हैं। तो हम भी बाकी सवारियों के साथ उसमें बैठकर भूटान गेट पहुंच गए। अब हमें एक होटल की तलाश करनी थी रात में रुकने के लिए।

थोड़ी खोजबीन के बाद जयगांव के भूटान के गेट के सामने लिंक रोड पर   होटल आराम    हमारा ठिकाना बना। जयगांव में रहने के लिए किफायती और बेहतरीन जगह है। स्टाफ का व्ययवहार भी दोस्ताना है। हमें उन्होने तीसरी मंजिल पर डबल बेड रुम दिया   600    रुपये प्रतिदिन की दर पर. होटल में अच्छा भोजनालय भी है। हालांकि होटल आराम को बुक करने से पहले मैंने अनादि को वहीं छोड़कर आसपास के तीन और होटल देखे पर मुझे आराम ही बेहतर लगा।



















हमने उनके भोजनालय में ही रात का डिनर लिया। भोजन के बाद थोड़ी देर हमलोग जयगांव बाजार की सड़कों पर घूमने निकले। यह बाजार देर रात खुला रहता है। भूटान से भी लोग बड़ी संख्या में खरीददारी करने आते हैं।

जयगांव फुंटशोलिंग के बारे में हमारे हमारे फेसबुक मित्र बिबेक शाह ने भी काफी जानकारी दी थी। वे हासीमारा में रहते हैं। पर उनसे इस यात्रा के दौरान मिलना नहीं हो सका।

यात्रा मार्ग-  बाघपुल - बागरकोट- उदयबाड़ी- दमदिम- माल बाजार- चालसा- नगरकाटा-लुकसान - बनारहाट- बिनागुड़ी तेलीपाड़ा- एथलबाड़ी – बीरपाड़ा- मदारीहाट- न्यू हासीमारा- ओल्ड हासीमारा- जयगांव )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmal.com
   (DUARS TEA GARDEN, BIRPARA, MADARIHAT, HASIMARA, JAIGAON, ARAM LODGE )


Tuesday, April 24, 2018

दुआर्स के चाय बागानों से होकर गुजरते हुए


हमारा बाघ पुल से आगे का सफर शुरू चुका है। ये लोकल बस है। हर जगह रुकती हुई चल रही है। नेशनल हाईवे के साथ साथ रेलवे लाइन भी चल रही है। ये सिंगल लाइन वाली रेलवे है जो दुआर्स से होती हुई अलीपुर दुआर, कूचबिहार होते हुए असम में धुबड़ी तक चली जाती है। पर ये दुआर्स के लोगों के लिए लाइफ लाइन जैसी है। इस लाइन पर हासीमारा रेलवे स्टेशन से भी जयगांव पहुंचा जा सकता है। 



ये बस हर छोटे छोटे कस्बे में रुक रही है तो कई लोग उतर रहे हैं और चढ़ रहे हैं। भीड़ कम नहीं हो रही है। बागरकोट चाय बगान सड़क के दोनों तरफ हमारी नजरों में है। इसके बाद आया उदयबाड़ी। उदयबाड़ी के बाद दमदिम कैंटोनमेंट एरिया आया। दमदिम नाम से इल इलाके में टी एस्टेट भी है। यहां काफी लोग उतरे पर हमें बैठने की जगह नहीं मिली। 


और हमें सीट मिल गई - इसके बाद आया माल बाजार। यह जलपाईगुड़ी जिले का बड़ा बाजार है। यह नगरपालिका भी है और सब-डिवीजन भी है। माल बाजार इस इलाके का वाकई बड़ा बाजार है। यहां बाजार में रौनक दिखाई दे रही है।
यह बड़ा अच्छा रहा कि यहां मुझे और अनादि को बस में सीट मिल गई। एक सुंदर बंगाली महिला और उनकी बेटी ने सीट खाली की तो हम वहां जा बैठे। सीट मिलने से थोड़ी राहत मिली। तो हमारा आगे का सफर बैठकर होने लगा। 
तीस्ता की सहायक डायना नदी पर रेल पुल 

माल बाजार के बाद बस चालसा नामक छोटे से कसबे में रुकी। इसके बाद नगरकाटा, लूकसान और बानरहाट जैसे छोटे-छोटे कस्बे आए। यहां डायना नदी पर पुल नजर आया। अभी नदी में पानी नहीं है। पर नदी का विस्तार चौड़ा है। डायना नदी भूटान से निकल कर बंगाल के दआर इलाके में प्रवेश करती है। आगे यह तीस्ता में मिल जाती है। इसके बाद हमें डायना टी एस्टेट का विशाल चाय बगान नजर आया। यह 1911 मेें स्थापित चाय कंपनी है। इसे क्वीन ऑफ दुआर्स कहा जाता है। धुपगुड़ी इलाके में स्थित कंपनी के पास कई सौ एकड़ में फैला चाय बागान है। 

इसके बाद हम पहुंचे हैं बिनागुड़ी। यह नाम कई सालों से मेरे जेहन में है। मेरे एक परिचित कभी यहां सेना में पदस्थापित थे तो उनकी पत्नी बार बार बिनागुड़ी का नाम लिया करती थीं। बिनागुड़ी थल सेना का बड़ा कैंटोनमेंट एरिया है। बिनागुड़ी कैंटोनमेंट के प्रवेश द्वार पर बुद्ध की प्रतिमा नजर आई। बुद्ध मतलब युद्ध नहीं, यानी शांति के प्रतीक। 

बिनागुड़ी से कुछ किलोमीटर के सफर के बाद एथलबाड़ी से अलीपुर दुआर जिला शुरू हो जाता है। बंगाल के दुआर्स रीजन में चाय की कई प्रसिद्ध बगाने हैं। बंगाल का दुआर्स इलाका पूरे पश्चिम बंगाल से थोड़ा अलग है। इस तरफ के लोग हिंदी भी खूब बोलते हैं। शायद ऐसा चाय के बगानों में सदियों से काम करने आए यूपी बिहार के लोगों के कारण होगा। काफी लोग तो इसी इलाके में बस गए हैं।  
अब हमलोग बीरपाड़ा पहुंचने वाले हैं। पर बीरपाड़ा शहर से पहले भारी जाम लगा है। हमारी बस यहीं तक है। जाम में जगह बनाती हुई बस बीरपाड़ा चौराहे तक पहुंच गई। हम बस से उतर गए। अपना सामान छत से उतरवाया। बीरपाड़ा अलीपुर दुआर जिले का भीड़भाड़ वाला बाजार है। 

( यात्रा अभी जारी है- पढ़ते रहिए दानापानी ) 

( यात्रा मार्ग-  बाघपुल - बागरकोट- उदयबाड़ी- दमदिम- माल बाजार- चालसा- नगरकाटा-लुकसान - बनारहाट- बिनागुड़ी तेलीपाड़ा- एथलबाड़ी बीरपाड़ा- मदारीहाट- न्यू हाशीमारा- ओल्ड हाशीमारा- जयगांव )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmal.com
   ( DUARS TEA GARDEN, MAL BAZAR, BINAGURI, BIRPARA, RIVER )

Monday, April 23, 2018

ऐतिहासिक बाघ पुल से जयगांव की ओर

सिक्किम की लांचुग घाटी से लौटने के बाद अब हमारा भूटान जाने का कार्यक्रम है। इसके लिए बंगाल के जयगांव शहर पहुंचना है। हम टैक्सी से सिलिगुड़ी जाने के बजाय बाघ पुल पर ही उतर गए हैं। गंगटोक में ही हमें टैक्सी ड्राईवर मधुकर जी ने बताया था कि अगर आप भूटान के शहर फुंटशोलिंग, जयगांव बार्डर जाना जाहते हैं तो आपको गंगटोक से सिलिगुड़ी जाने की जरूरत नहीं है। आप लोग सिलिगुड़ी से 30 किलोमीटर पहले बाघ पुल पर ही उतर जाना। हालांकि  गंगटोक से जयगांव के लिए सीधी टैक्सी भी चलती है। पर उसका समय निकल चुका था। बाघ पुल नाम सुनकर हमलोग थोड़ा चौंके जरूर थे। इसलिए इस नाम को लेकर उत्सुकता बढ़ गई थी।

टैक्सी वाले मधुकर जी ने बताया था कि सिलिगुड़ी से जयगांव की तरफ जाने वाली सभी बसें इस पुल से होकर गुजरती हैं। यहीं से गाड़ी बदल लेने से आपका समय और पैसा दोनों बचेगा। और सचमुच हमारे दो घंटे की बचत हुई। साथ ही हमारे 200 से ज्यादा रुपये भी बच गए। गंगोटक से बाघ पुल बस का किराया 140 रुपये लगे। जबकि बाघ पुल से जयगांव का किराया 100 रुपये ही लगे।
सन 1941 में बना बाघ पुल -   अब बात इस पुल की। बाघ पुल यानी कोरोनेशन ब्रिज। यह ब्रिटिश काल का ऐतिहासिक पुल है। इसे सेवक ब्रिज के नाम से भी जाना जाता है। तीस्ता नदी पर बने इस पुल के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ दो बाघ की प्रतिमाएं लगी हैं इसलिए इसे बाघ पुल कहते हैं। नेशनल हाईवे नंबर 31 पर बना यह पुल बंगाल के दार्जिलिंग और जलपाई गुड़ी जिले को जोड़ता है। यह बंगाल के दुआर्स इलाके का प्रवेश द्वार कहा जा सकता है।   

भला बाघ पुल ही क्यों। आपको पता ही होगा कि बंगाल का बाघ से खास रिश्ता है। रायल बंगाल टाइगर की नस्ल बंगाल के जंगलों में ही निवास करती है। इस रिश्ते के कारण ही कदाचित इस पुल पर बाघों की विशाल प्रतिमा बनाई गई होगी। ब्रिटिश काल में बने कई पुल बड़े कलात्मक है। 

इंजीनयरिंग का अदभुत नमूना -  इस पुल का निर्माण 1937 में शुरू हुआ था। किंग जार्ज पंचम और महारानी एलिजाबेथ के राज्यारोहण की याद में इस पुल को नाम मिला था कोरोनेशन ब्रिज। पुल 1941 में बन कर तैयार हुआ। इस आकर्षक पुल के निर्माण में तब 4 लाख रुपये का खर्च आया था। तब 1937 में बंगाल के गवर्नर जॉन एंडरसन ने इस पुल की आधारशिला रखी थी। इस पुल का निर्माण मुंबई की कंपनी जेसी गैमन ने किया था। पुल को अगर आप दूर से देखें तो भी ये बड़ा कलात्मक नजर आता है।

बिना स्तंभों का पुल - इस पुल के निर्माण में किसी पिलर का इस्तेमाल नहीं किया गया है। तीस्ता नदी की तेज धारा के कारण ऐसा करना मुश्किल था। इसलिए इसमें आर्च इसतर बनाया गया है कि पुल का पूरा भार दोनों तरफ आ जाता है।  

स्थानीय लोग इसे कोरोनेशन ब्रिज न कहकर बाघ पुल ही कहते हैं। भारत सरकार ने बाघ पुल को हेरिटेज ब्रिज का दर्जा दिया हुआ है। बाघ पुल के सामने तीस्ता नदी पर रेलवे का भी पुल बना हुआ है।
बाघ पुल के पास ही सेवक में मां काली का भी एक प्रसिद्ध मंदिर है। अगर समय हो तो आप वहां दर्शन करने जा सकते हैं। जब आप सिलिगुड़ी से गंगटोक जा रहे होते हैं तो आपको ये पुल दाहिनी तरफ बाघ पुल दिखाई देता है। हालांकि तब आप इस पुल को पार नहीं करते। पर हमलोग तो आज के सफर में इस पुल से होकर गुजरने वाले हैं। 

अपनी बस के इंतजार के दौरान हमलोग बाघ पुल के फुटपाथ पर खड़े होकर चना जोर गरम खा रहे हैं। इसी बीच एक बस सिलिगुड़ी की तरफ से आकर बाघ पुल के बीचों बीच रुकी। हमारे जनाजोर गरम वाले ने कहा इस बस पर आपलोग चढ़ जाएं। पर ये बस जयगांव तक नहीं बल्कि बीरपाड़ा तक ही जा रही है। बस के कंडक्टर ने बताया कि बीरपाड़ा से जयगांव की बस मिल जाएगी। बस में जगह भी नहीं है। पर कंडक्टर महोदय भरोसा दिलाते हैं कि आगे जगह मिल जाएगी, तो हमलोग बस में बैठ जाते हैं। हमने अपना सामान बस की छत पर रखवा दिया है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmal.com 
     ( BAGH PUL, TEA GARDEN, TISTA RIVER, DARJEELING, ALIPUR DUAR ) 
(आगे पढ़ें - दुआर्स के चाय बगानों से होकर गुजरते हुए ) 
सेवक स्थित मां काली का मंदिर।