Friday, March 30, 2018

मुखौटों की रंगबिरंगी दुनिया और कोलकाता से वापसी

कोलकाता की शाम को घूमते हुए प्रेस क्लब पहुंच गया हूं। कोलकाता प्रेस क्लब बिल्कुल शहर के हृदय स्थल में स्थित है। प्रेस क्लब में इन दिनो को मेला लगा हुआ। कला शिल्प की दुकानें सजी हैं। यहां हम पहुंच गए है मुखौटों की रंग बिरंगी दुनिया में।
नए साल पर यहां क्रिसमस कार्निवल मनाया जा रहा है। इसमें ग्राम कृषि उत्सव भी एक हिस्सा है। इस हिस्से में कोलकाता के अलग अलग जिलों से कुछ शिल्पी अपने उत्पाद और कौशल के साथ पहुंचे हैं।
तो मुखौटा बनाने वाले शिल्पी मुख्य रुप से मां दुर्गा और काली के मुखौटे लेकर आए हैं। ये मुखौटे छोटे मध्यम और बड़े आकार के हैं। इनकी कीमत भी उसी हिसाब से एक हजार से लेकर छह हजार तक है। मुखौटे पूरी तरह लकड़ी के बने हुए हैं। ये कई साल तक खराब नहीं होंगे।

यहां पर शिल्पी विनय कुमार सरकार महोदय लाइव मुखौटे बनाते हुए भी दिखे। लकड़ी पर उनकी छेनी बड़ी ही बारीकी से चल रही है और वे लकड़ी को अलग अलग आकार देने में व्यस्त हैं। इसी दौरान मेरी उनसे थोड़ी बात होती है। एक मध्यम आकार का मुखौटा तैयार करने में तीन दिन तक लग जाता है। सरकार के परिवार में कई पीढ़ियो से मुखौटा बनाने का काम चल रहा है। हालांकि अब उनके बेटे पढ़ाई करके दूसरे पेशे में जा रहे हैं। बताते हैं कि इस पेशे में अब ज्यादा लाभ नहीं रहा।

विनय सरकार दक्षिण दीनाजपुर जिले के अत्यंत पिछड़े गांव सारंगा के रहने वाले हैं। गांव में अभी तक सड़क नहीं पहुंच सकी है। पर उनकी कला फलफूल रही है।
वे रामायण के पात्र रावण और जटायू के मुखौटे भी बनाते हैं। आर्डर मिले तो उसके अनुरूप भी मुखौटे तैयार कर सकते हैं। पर अब बाजार में इन मुखौटों की मांग ज्यादा नहीं है।
बांबे मेल से वापसी - कोलकाता से वापसी का वक्त हो चला है। रात को 10 बजे मेरी ट्रेन है। हावड़ा जंक्शन से बांबे मेल।  बांबे मेल वही ट्रेन है जिसकी रफ्तार से मैं बचपन से बावस्ता हूं। कभी मैं इस ट्रेन से गया से सासाराम तक का छोटा सा सफर करता था पिताजी के साथ। तब इसमें सफर करना शान समझता था। कभी बांबे गया नहीं था पर इस पर चढकर यह रोमांच होता था कि यह ट्रेन बांबे जाती है। इस बार इसके स्लिपर कोच में सवार हुआ हूं सासाराम के लिए। ट्रेन हावड़ा से समय पर चल पड़ी। रात का भोजन ले चुका हूं तो ट्रेन में आकर बस सो जाना है। गया जंक्शन पहुंचने के बाद ट्रेन थोड़ी लेट होने लगी है। आगे यह हर छोटे स्टेशन पर भी रुक जा रही है। ठंड बढ़ती जा रही है। सुबह 8.15 पर सासाराम में उतर गया। बाहर कुहरा छाया हुआ है। पर रेलवे ट्रैक के सहारे गौरक्षिणी मुहल्ले में प्रवेश कर गया हूं।
माताजी-पिताजी के अलावा कुछ पुराने दोस्तों से मिलना हुआ। हमारी दिल्ली की ट्रेन गरीब रथ रात को 9 बजे है पर वह सर्दी के असर से लेट होते होते अगले दिन सुबह 9 बजे सासाराम से रवाना हुई। सारी रात घर में ट्रेन का स्टेट्स चेक करते गुजरी। मैंने माताजी को बताया सुबह साढ़े सात बजे घर से निकलूंगा। मां सुबह 4 बजे ही जग गईं। मेरे लिए नास्ता तैयार किया और ट्रेन में रास्ते में खाने के लिए टिफिन पैक कर दिया। वही मीठी रोटियां जो बचपन में बनाकर देती थीं। मैंने मना किया ट्रेन में खाना मिलता है ले लूंगा। आप बढ़ती उम्र में क्यों भला इतनी ठंड में सुबह सुबह उठकर परेशान हो रही हैं। पर मां नहीं मानी। सुबह का तापमान 3 डिग्री के आसपास है। सासाराम में हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ रही है।
चला चली की बेल है। भोजपुरी में कहा जाता है ...अब नेह बिसरावल जाव...मैं मां से विदा लेता हूं। उनके चरण स्पर्श करता हूं। पर चलने से पहले रुक जाता हूं। मां से गले लग कर रोने लगता हूं। पर मां की आंखें में आंसू नहीं छलकते। वे बोलती हैं – अरे रोता है। मतलब मां का संदेश साफ है मजबूत बने रहो। जाने क्यों बार-बार इच्छा हो रही है। एक बार फिर अपने बचपन को जीना चाहता हूं। उस सोहवलिया गांव में। मां के आंचल की छांव में। पर क्या ऐसा हो सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  Email - vidyutp@gmail.com 
 ( KOLKATA, MUKHAUTA, HOWRAH,  MUMBAI MAIL, SASARAM, GARIB RATH )