Saturday, March 17, 2018

टैगोर की आराध्या - भुवनेश्वरी देवी मंदिर -उदयपुर

त्रिपुरा के ऐतिहासिक मंदिरों में से एक है उदयपुर का भुवनेश्वरी देवी का मंदिर। यह शक्ति पीठ नहीं है पर टैगोर की दो रचनाओं में चर्चा आने से देवी का नाम साहित्य जगत में अमर हो गया। अपने जीवन काल में सात बार त्रिपुरा आने वाले कविगुरु रविंद्र नाथ टैगोर की भुवनेश्वरी देवी में जरूर आस्था रही होगी तभी उन्होंने अपनी दो रचनाओं  में इस देवी को स्थान दिया है। भुवनेश्वरी मंदिर का निर्माण महाराजा गोविंद माणिक्य द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर उदयपुर शहर के बाहरी इलाके में गोमती नदी के तट पर स्थित है। इसका निर्माण काल 1667 से 1676 के मध्य का है।
भुवनेश्वरी मंदिर का महत्व इसलिए भी है कि कविगुरु रविंद्र नाथ टैगोर की रचनाओं में इस मंदिर का नाम आया है। टैगोर के नाटक राजर्षि में भुवनेश्वरी मंदिर का प्रसंग आता है। वहीं उनके विसर्जन नाटक में भी इस मंदिर का प्रसंग आता है। गोमती नदी के किनारे हरित खूबसूरत परिसर में ये मंदिर स्थित है। मंदिर का गर्भ गृह या भवन बहुत विशाल नहीं है। पर मंदिर के अंदर मां दुर्गा की बहुत ही आकर्षक प्रतिमा है। मंदिर में मौजूद बुजुर्ग पुजारी बताते हैं कि ये मूर्ति तब राजस्थान के से मंगवाई गई थी।
भुवनेश्वर देवी के मंदिर  के आसपास कभी त्रिपुरा राजघराने का शाही महल हुआ करता था, जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। मंदिर के आसपास शाही महल के अवशेष देखे जा सकते हैं। इस मंदिर का निर्माण चौचाला शैली में किया गया है ।  ये सुन्दर मंदिर एक तीन फीट ऊंचे बरामदे में है। अगरतला के  राजधानी स्थानांतरण से पहले उदयपुर माणिक्य राजवंश की राजधानी और राजा का निवास स्थान था। 
भुवनेश्वरी देवी को भगवान शिव की अभिव्यक्ति माना जाता है। इन्हें सभी देवियों से कोमल एवं उज्जवल माना गया है। ये देवी दस महाविद्याओं में चौथे स्थान पर आती हैं। वे आदि शक्ति का रूप हैजो शक्ति का आधार है। इन्हें ओम शक्ति भी कहा जाता है।  भुवनेश्वरी देवी के बारे में माना जाता है कि वह समस्त प्रकृति को संभालती है।

मंदिर परिसर में अब कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है। मंदिर के पास ही एक नाट्यशाला का भवन है। भुवनेश्वरी मंदिर के पास ही दो और प्राचीन एतिहासिक मंदिर दिखाई देते हैं। एक मंदिर के भवन के ऊपर तो चारों तरफ घास उग आए हैं। कदाचित इनका रख रखाव ठीक से नहीं हो रहा है।
कैसे पहुंचे – उदयपुर बस स्टैंड से मंदिर की दूरी 5 किलोमीटर है। आटोरिक्शा बुक करके पहुंचा जा सकता है। राजनगर इलाके में गोमती नदी के तट पर यह मंदिर स्थित है।
त्रिपुरा का उदयपुर शहर मंदिर, सरोवर और ऐतिहासिक विरासतों को संजोए इतना प्यारा शहर है कि आप यहां दो दिन रहकर आसपास घूमने की योजना बना सकते हैं। शहर में रहने के लिए कुछ सस्ते और सुंदर होटल उपलब्ध हैं। खाने के लिए अच्छे शाकाहारी और मांसाहारी भोजनालय भी हैं। उदयपुर में रुककर आसपास के स्थलों को घूमने का भी कार्यक्रम बनाया जा सकता है। हां अगर आप उदयपुर में हैं तो त्रिपुरा का प्रसिद्ध चावल खरीदना न भूलें। यहां का गोविंदभोग चावल अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध है।
उदयपुर शहर तक अब आप अगरतला से रेल से भी पहुंच सकते हैं। वैसे अगरतला से सबरुम मार्ग पर 4 लेन हाईवे बन चुका है जिस पर दिन भर बस और टैक्सियां चलती रहती हैं।
महादेव बाड़ी, गुणावती मंदिर, भुवनेश्वरी मंदिर के दर्शन के बाद बस स्टैंड पहुंचने पर देखा की अभी मेरे पास समय है, तो एक बार पिर त्रिपुर सुंदरी मंदिर की तरफ चल पड़ता हूं। 2013 के बाद दूसरी बार 2018 में माता के दर्शन का सौभाग्य मिला। आज 5 जनवरी को मंदिर में अपेक्षाकृत तौर पर श्रद्धालुओं की अच्छी भीड़ है।

दर्शन के बाद मंदिर के परिसर के बगल में स्थित बाजार में मनोरंजन शाकाहारी भोजनालय में खाने पहुंचा। दोपहर की चावल की थाली 50 रुपये की है। स्पेशल थाली 60 रुपये की है। मैं स्पेशल थाली आर्डर करता हूं। खाना बड़े ही साफ सुथरे वातावरण में पवित्रता से परोसा जा रहा है। जमकर खाने के बाद आटो से उदयपुर बस स्टैंड फिर वहां से बस से अगरतलाके लिए चल पड़ा। बस में मेरे बगल में उदयपुर के दुकानदार राजू साहा बैठे हैं जो मुझे उदयपुर के बारे में कई रोचक जानकारियां देते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 (BHUVNESWARI TEMPLE, UDAIPUR, GOMATI RIVER, TAGORE, RICE THALI )