Sunday, March 11, 2018

खोवाई के हरे भरे जंगलों से गुजरते हुए अगरतला

कैलाशहर में दोपहर के 12 बजे से पहले कैलाशहर के होटल श्रीकृष्ण को चेकआउट किया। बस स्टैंड जाते हुए एक बार फिर आटो वाले साधन मालाकार दिखे। उन्होंने मुस्कुराकर अलविदा कहा। मैंने भी उन्हें प्रतिउत्तर दिया। अब मेरे पास अगरतला जाने के लिए मेरे पास दो विकल्प हैं, पहला बस से अगरतला जाना दूसरा कुमारघाट जाकर ढाई बजे सिलचर अगरतला पैसेंजर रेल पकड़ना। ट्रेन मार्ग से मैं सफल पहले भी कर चुका हूं, सो इस बार बस मार्ग से जाना तय किया। क्यों, इसलिए कि त्रिपुरा के कुछ नए इलाकों से रूबरू होने का मौका मिलेगा।
मुझे जानकारी मिली थी कि कैलाशहर से हर रोज सुबह 6 बजे और दोपहर 12 बजे अगरतला के लिए बस सेवा है। बस स्टैंड में बस तैयार खडी है। आयशर की मिनी बस है। किराया 105 रुपये। यहां से अगरतला की दूरी 140 किलोमीटर है।
कैलाशहर का बस स्टैंड शानदार बना हुआ है। यात्री भवन के अंदर प्नतीक्षालय बना है, जिसमें  आरामदायक कुर्सियां लगी हैं। टिकट काउंटर से टिकट लेने के बाद मैं बस में बैठ गया। सवारी के तौर मेरे अलावा बस में 5 या 6 लोग ही हैं। बस 12.30 बजे रवाना हुई। छह घंटे के सफर के बाद बस ने हमें शाम 6.30 बजे अगरतला आईएसबीटी पहुंचाया।
कैलाशहर से अगरतला का सफर में पूरे रास्ते बस हरे भरे जंगलों से होकर गुजर रही है। इस बस के सफर का दूसरा बड़ा फायदा हुआ कि मैं त्रिपुरा का कमालपुर और खोवाई जैसे शहरों से होकर गुजरा। यह वो इलाके हैं जहां 2005 से पहले किसी बाहरी आदमी के लिए आना असंभव था। पर इस बार हर तरफ चुनावी माहौल नजर आ रहा था।
कैलाशहर अगरतला सड़क मार्ग के रास्ते में ढलाई नदी मिली। 
यात्रा मार्ग - एनएएच 208 - पंचमनगर - दुर्गा चौमुहानी-  कमालपुर (ढलाई जिला) – खोवाई (वेस्ट त्रिपुरा) पदमबिल – हेजामारा- सिद्धमोहनपुर- शांतिवाड़ा- अगरतला।
अगरतला से आगे चलने पर बस टेढे मेढे ग्रामीण रास्तों से गुजर रही है। कहीं  एनएच 208 लिखा हुआ भी दिखाई देता है। कई जगह साफ दिखाई दे रहा है कि पहाड़ों को काट कर सड़क हाल के सालों में ही बनाई गई है। पंचम नगर के पास दुर्गा चौमुहानी पर बस रूकी। इसके बाद आया कमालपुर। यह ढलाई जिला (दक्षिण त्रिपुरा) का एक शहर है। शहर से पहले ढलाई नदी पर पुल भी आया। ढलाई नदी भी त्रिपुरा की बाकी नदियों मनु और गोमती की तरह बांग्लादेश में चली जाती है। कमलापुर चौराहे पर शहीद भगत  सिंह की प्रतिमा लगी है। यहां भाजपा, कांग्रेस, टीेएमसी सभी दलों को झंडे नजर आ रहे हैं।


कमालपुर चौराहे पर शहीद भगत सिंह की प्रतिमा। 
कमालपुर में 15 मिनट बस रूकी। कमालपुर से अगरतला 90 किलोमीटर रह गया है। रास्ते में बस में ज्यादा भीड़ कभी नहीं हुई। लोग चढ़ते उतरते रहे। कई जगह सड़क बांग्लादेश की सीमा के आसपास चलती नजर आई। उस पार बांग्लादेश के खेत नजर आ रहे हैं। आपको पता होगा कि त्रिपुरा की 880 किलोमीटर सीमा बांग्लादेश से लगती है। यह राज्य तीन ओर से बांग्लादेश से घिरा है।
हरे भरे जंगलों में केले और तांबूल के पेड़ नजर आ रहे हैं। मैं जिस रास्ते से गुजर रहा हूं त्रिपुरा में उग्रवाद के दौर में यहां कहीं भी गुजरना किसी बाहरी आदमी के लिए असंभव था। कदम कदम पर मौत का खतरा था। अगर कोई प्रशासन की गाड़ी इधर चलती भी तो कॉनवाय में। उसके आगे पीछे सुरक्षा दस्ता चलता था। पर अब बड़ा खुशनुमा माहौल है।
खोवाई जिले मे सड़क के किनारे लगा साप्ताहिक बाजार। 
रास्ते में एक जगह त्रिपुरा स्टेट राइफल्स का कैंप नजर आता है। इस पर एक नारा लिखा है। पसीना बहाओ, खून बचाओ। वाकई खून व्यर्थ बहाना निरी मूर्खता ही है। श्रम ही जीवन का मूल मंत्र है। पसीना बहाओ मतलब श्रम।
कोकबरोक भाषा और खोवाई शहर - कमालपुर से आगे चलकर हम पहुंच चुके हैं खोवाई। खोवाई 2012 में जिला बना है। यह खोवाई नदी के किनारे बसा एक शहर भी है। शहर की सीमा बांग्लादेश से भी लगती है। पूरे जिले में 61 किलोमीटर बांग्लादेश की सीमा है। शहर की आबादी 22 हजार के आसपास है। यहां बांग्ला और कोकबरोक भाषा बोली जाती है। खोवाई और उसके आगे आया कस्बा पदमबिल सघन वनों वाला क्षेत्र हैं। ये राज्य का आदिवासी बहुल इलाका है। प्रकृति ने इस क्षेत्र पर अपना पूरा आशीर्वाद उड़ेला है।
खोवाई से अगरतला की दूरी 55 किलोमीटर रह गई है। रास्ते में पदमबिल, हेजामारा, सिद्धमोहनपुर जैसे छोटे कस्बे आते हैं। अब शाम गहराने लगी है, और हमारी बस अगरतला शहर के पास पहुंच गई है। हम शांतिवाड़ा पहुंचे हैं, यह एयरपोर्ट के पास का इलाका है। इसके बाद लीची बगान और अगरतला आईएसबीटी। चार साल बाद मैं दूसरी बार अगरतला में हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य , vidyutp@gmail.com
(KAMLAPUR, KHOWAI, BUS, AGARTALA, DHALAI )