Saturday, March 31, 2018

द ग्रेट ईस्टर्न होटल और अतीत की यादें


कई मुलाकातें इतिहास बन जाती हैं। कई बैठकें इतिहास बन जाती हैं। तो कुछ भवन ऐसे होते हैं तो तमाम महान लोगों की बातों मुलाकातों के गवाह बनते हैं। ऐसा ही एक भवन है कोलकाता का द ग्रेट ईस्टर्न होटल।
कोलकाता का द ग्रेट ईस्टर्न होटेल अब एक हेरिटेज होटेल की सूची में शुमार हैं। यह होटल कोलोनियल समय मे स्थापित किया गया था। यह उस समय के महत्वपूर्ण होटलों में से शामिल था। इस होटेल की स्थापना 19 नवंबर 1840 को की गई थी। तब डेविड विल्सन ने इसकी स्थापना की थी और इसका नाम आकलैंड होटल रखा था। होटल खोलने से पहले डेविड विलसन इसी स्थान पर बेकरी चलाया करते थे। बाद में होटल का विस्तार हुआ तो इसमें 100 कमरे और एक डिपार्टमेंटल स्टोर खोला गया। 1865 में पूर्ण विस्तार होने पर इसका नाम द ग्रेट ईस्टर्न होटल रखा गया। इससे पहले लोक इसे विल्सन होटल के नाम से भी जानते थे। 1883 में इस होटल के कमरों में बिजली आई। बिजली की सुविधा वाला यह देश का पहला होटल था।

अंग्रेजी के जाने माने लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने इस होटल का जिक्र अपनी कहानी सिटी ऑफ ड्रेडफुल नाइट्स में किया है। इस होटल को लेकर कई कहावतें प्रचलित थीं। जो इस होटल में एक तरफ से घुसता है तो वह खरीददारी करके, खानापीना करके और शादी का उपहार खरीदकर दूसरी तरफ से बाहर निकलता था। कोलकाता के भद्रलोक के बीच इस होटल की अपनी प्रतिष्ठा बनी, जो लंबे समय तक बरकरार रही।
यह वो दौर था जब कोलकाता ईस्ट इंडिया का एक महत्वपूर्ण केन्द्र हुआ करता था। अपने प्रसिद्धि के दिनों मे इस होटल को ज्वेल ऑफ द ईस्ट कहा जाता था।
यह होटल इतिहास के कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों के आगमन और उनकी मुलाकातों का साक्षी रहा है। इस होटल में मार्क ट्वेन, एलिजाबेथ द्वितीय, महात्मा गांधी, होची मिन्ह जैसे लोगों का आगमन हो चुका है।
भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी इस होटल की प्रतिष्ठा बरकरार रही। हालांकि एक समय में इसकी साख में थोड़ी गिरावट आई। बाद में इसका प्रबंधन सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। पर 2005 में एक बार फिर इसका प्रबंधन निजी हाथों में चला गया है। 2005 में निजी हाथों में जाने के बाद इस होटल के कमरों का नवीनीकरण किया गया। ललित सूरी समूह ने 52 करोड़ में इस होटल की 90 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली। सात साल तक इसे रिस्टोर करने का काम चलता रहा।


इसके नवीकरण में तकरीबन 260 करोड़ खर्च किए गए। 2013 में 19 नवंबर को जब इसे दुबारा खोला गया तो यह होटल ललित ग्रेट ईस्टर्न होटल के नाम से जा जाने लगा। अब इसका स्वामित्व ललित समूह के पास है। अब इसमें तीन ब्लाक हैं। हेरिटेज1, हेरिटेज2 और न्यू ब्लॉक।
इस होटल में कुल 5 रेस्टोरेंट संचालित किए जा रहे हैं। इस होटल में आजकल 221 कमरे और 21 सूइट्स हैं। द ग्रेट ईस्टर्न होटल को ऐशिया का सबसे पुराना चलता हुआ होटल होने का श्रेय प्राप्त है। अपने इतिहास में कई बार इसका नाम बदला और कई बार मालिकाना हक बदला पर होटल हमेशा संचालन में रहा। आजकल यहां आपको 6500 से लेकर 14000 तक प्रतिदिन में कमरे मिल सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, March 30, 2018

कोलकाता की गलियां और जेम्स हिक्की

कोलकाता के दिल चौरंगी के उत्तर में है डेकर्स लेन। अब इसे कोलकाता में सस्ते खाना खाने वाली गली के तौर पर जाना जाता है। कई बार इस गली से गुजरा हूं। पर साल 2011 में डेकर्स लेन का नाम बदलकर जेम्स हिक्की सरनी किया गया। हालांकि अभी भी लोग इसे डेकर्स लेन के नाम से ही बुलाते हैं। कोलकाता म्युनिसिपल कारपोरेशन ने हिक्की के सम्मान में एक सड़क को उसके नाम पर किया। आखिर कौन था हिक्की।

भारत में प्रकाशित होने वाला एक अंग्रेजी भाषा का पहला समाचार पत्र बंगाल गजट या ओरिजिनल कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर था। इसके प्रकाशक जेम्स आगस्टस हिक्की ( James Augustus Hickey ) थे। जेम्स ऑगस्टस हिक्की ईस्टक इंडिया कंपनी के मुलाजिम के रूप में भारत आए थे ।
हिक्की का अखबार एक साप्ताहिक पत्र था जो कोलकाता से सन् 1780 में 29 जनवरी को आरम्भ हुआ। इसका प्रकाशन हिक्की स्वयं किया करता था। 'हिकी गजट' के प्रवेशांक में हिक्की ने स्वयं को ऑनरेबल कंपनी का मुद्रक घोषित किया हुआ था।

हिक्की गजट के प्रकाशन का एक कारण बाजार के लिए सूचनाएं उपलब्ध कराना था। यह भी माना जाता है कि वह अंग्रेजी प्रशासन के विरोध के लिए निकाला गया समाचार पत्र था। इसमें अंग्रेजी प्रशासन में व्याप्त भ्रप्टाचार और रिश्वतखोरी के समाचार प्रमुखता से होते थे।

हिक्की ने अपनी निष्पसक्ष लेखनी से उन्हों  ने किसी को भी नहीं बख्शाम, यहां तक कि वायसराय जैसे ताकतवर औहदेदार वारेन हेस्टिंग्स के द्वारा किए गए स्वेमच्छा चार और कंपनी के धन का निजी हितों के इस्तेमाल पर लिखा। हिक्की को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। अंग्रेज होने के बाबजूद उन्हें कई बार कंपनी की जेल में भी जाना पड़ा। कंपनी की आलोचना करने पर हिक्की पर 80 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया। जुर्माना नहीं देने पर वारेन हेस्टिंग्स ने हिक्की को जेल में डाल दिया। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि 'हिक्की गैजेट्स' पहला भारतीय अखबार सिर्फ अफवाहों से भरा हुआ करता था।
 कटाक्ष करने में बेहद दक्ष संपादक
जेम्स हिक्की सरकारी कर्मियों पर कटाक्ष करने में बेहद दक्ष संपादक माने जाते थे। जनता में जितने लोकप्रिय थे, सरकार के बीच उतने ही अलोकप्रिय। हिक्की का जन्म 1740 में आयरलैंड में हुआ था। उसका निधन 1802 में हुआ। वह 1772 में कोलकाता आए। वह पेशे से सर्जन और कारोबारी थे।
वास्तव में हिक्की भारत में आधुनिक पत्रकारिता की नींव डालने वाले पत्रकार थे। वे अपनी निष्पक्ष लेखनी के लिए जाने जाते हैं। हिकी ने 1779 में कलकत्ता (अब कोलकता) में प्रेस लगाया था। इससे 12 वर्ष पूर्व 1768 में में विलियम बोल्ट नामक कम्पनी से नौकरी छोड़ने के बाद कलकत्ता से ही पत्र प्रकाशित करना चाहा था लेकिन उसे बंगाल छोड़ने का आदेश दिया गया। उसके बाद यूरोप जाने को कहा गया जिसके कारण वह पत्र आरंभ न हो सका।

यह संयोग है कि जेम्स हिकी सरनी में ही कोलकाता से प्रकाशित हिंदी दैनिक प्रभात खबर का दफ्तर है। इसके साथ ही कई ऐसे रेस्टोरेंट हैं जहां लाइव म्युजिक बैंड का परफारमेंस रोज शाम को होता रहता है। पर दिन भर किसी भी समय चले जाइए जेम्स हिक्की लेन खाने पीने के शौकीनों से गुलजार रहता है। कुछ प्रसिद्ध चाय की दुकानें, चाउमीन से लेकर बंगाली मिठाईतक सब कुछ यहां मिलता है। कोलकाता में सस्ता खाने की बेहतरीन जगहों में शामिल है हिक्की लेन।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
 (James Augustus Hickey , First English News Paper of INDIA) 

जेम्स हिकी लेन में स्थित प्रभात खबर में कार्यरत पत्रकार अजय विद्यार्थी और मैं। 

Thursday, March 29, 2018

देश में सबसे पुराना है- कोलकाता मेट्रो रेल

देश में सबसे पुराना मेट्रो रेल नेटवर्क कौन सा है तो जवाब होगा कोलकाता। भले ही आज दिल्ली के पास मेट्रो रेल का सबसे लंबा नेटवर्क है। पर देश में मेट्रो की सेवा सबसे पहले कोलकाता में ही आरंभ हुई। कोलकाता मेट्रो रेल का संचालन भारतीय रेलवे करती है। यह रेलवे का एक जोन है। जबकि दूसरे शहरों में चलने वाली मेट्रो रेलों के लिए अलग अलग कारपोरेशन का निर्माण किया गया है।
कोलकाता मेट्रो फिलहाल नेताजी सुभाष चंद्र बोस हवाई अड्डा के निकटस्थ नोआपाड़ा से लेकर पाटुली के निकटस्थ कवि सुभाष स्टेशन तक विस्तारित है। व्यस्त शहर के इलाके में यह भूमिगत है।  कोलकाता मेट्रो रेलवे का निर्माण 1972 में आरंभ हुआ। 12 सालों के बाद इसका एक हिस्सा 1984 में खोल दिया गया। इस तरह देखा जाए तो इसका निर्माण बहुत ही धीमी गति से हुआ। दमदम से टॉलीगंज (महानायक उत्तम कुमार) तक 16.450 किलोमीटर लंबा प्रथम चरण 1995 में जाकर पूरा हो सका। पर 1984 में जब कोलकाता में मेट्रो रेल चली तो यह देश के लिए गर्व का क्षण था क्योंकि यह देश की पहली मेट्रो रेल थी।
तब कोलकाता मेट्रो रेलवे को कोच भी दिल्ली की तरह वातानूकुलित नहीं थे। इनमें फोर्स हिटिंग और कूलिंग का इंतजाम किया गया है। हालांकि इसके दरवाजे आटोमेटिक खुलते और बंद होते थे। पर इसके टिकट की व्यवस्था टोकन वाली और स्मार्ट कार्ड वाली नहीं थी। हालांकि यहां भी दिल्ली मेट्रो की तरह टोकन और स्मार्ट कार्ड शुरू कर दिया गया है। पर साल 2017 में ही कोलकाता मेट्रो किराया के लिहाज से देश में सबसे सस्ती है। यहां अभी भी न्यूनतम किराया 5 रुपये से आरंभ होता है। अभी अधिकतम किराया 15 रुपये ही है।
कोलकाता में मेट्रो संचालन की बात आई तो इसके लिए ब्राडगेज का ( 1676 मिमी) ट्रैक का चयन किया गया। दिल्ली मेट्रो के भी शुरुआती ट्रैक ब्राडगेज के हैं। पर अब देश में सभी मेट्रो स्टैंडर्ड गेज यानी 1435 मिमी चौड़ाई वाले पटरियों वाले बनाए जा रहे हैं।
अब अतीत में चलते हैं। 1969 में पहली बार कोलकाता में मेट्रो रेल चलाने का विचार आया। बात कागजों पर दौड़ती रही। 1971 में इस पर अंतिम मुहर लगी। शहर में 97 किलोमीटर के तीन कारीडोर बनाने  पर विचार किया गया। साल 1972 में इंदिरा गांधी ने कोलकाता मेट्रो की आधारशिला रखी। 1984 में संचालन आरंभ होने के बाद भी कोलकाता मेट्रो के विस्तार की गति बहुत धीमी रही। दिल्ली, बेंगलुरू में अब मेट्रो का नेटवर्क दूरी के लिहाज से कोलकाता से आगे निकल चुका है।
दमदम जंक्शन पर भारतीय रेलवे से संपर्क - कोलकाता मेट्रो दमदम जंक्शन रेलवे स्टेशन पर भारतीय रेल के साथ मिलती है। कोलकाता मेट्रो को अभी तक कोलकाता के प्रमुख रेलवे स्टेशन जैसे हावड़ा, सियालदह या एयरपोर्ट से नहीं जोड़ा जा सका है। हालांकि एयरपोर्ट लिंक पर काम जारी है।


फिल्मों में कोलकाता मेट्रो - विद्या बालन की फिल्म कहानी में कोलकाता मेट्रो के रविंद्र सरोवर स्टेशन पर शूटिंग की गई है। सत्यजीत राय ने दूरदर्शन के एक धारावाहिक की शूटिंग इस मेट्रो रेल के अंदर की थी।


कोलकाता मेट्रो- एक नजर 
रैपिड ट्रांसपोर्ट लाइनों की संख्या -2
स्टेशनों की संख्या 24, भूमिगत – 15, भूमिपर 2 ऊपर- 07
प्रतिदिन की सवारियां – 5.5 लाख  से 6 लाख तक
संचालन आरंभ – 1984
मेट्रो प्रणाली की लंबाई – 27.39 किमी

पटरी गेज – 1676 मिमी ( 5 फीट 6 ईंच) – ब्रॉडगेज

---vidyutp@gmail.com


Wednesday, March 28, 2018

कोलकाता की लोकल ट्रेन – प्लेटफार्म पर कब्जा है जी...


कोलकाता को आम आदमी का शहर कहा जाता है। यहां खाना पीना घूमना अन्य शहरों की तुलना में निश्चित तौर पर सस्ता है। पर जब आप कोलकाता और आसपास के शहरों को लोकल ट्रेन से घूमने निकलेंगे तो आपको कुछ अलग नजारा दिखाई देगा। यहां के तकरीबन सभी रेलवे स्टेशनों पर बाजार सजा हुआ दिखाई देगा। ये बाजार कुछ यूं है कि रेलवे की संपत्ति पर सालों से अवैध वेंडरों का कब्जा है।
आमतौर पर देश के किसी भी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर कुछ चयनित स्थलों पर दुकानों या स्टाल की अलाटमेंट होती है। पर कोलकाता में आपको हर लोकल रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म पर लंबा बाजार सजा हुआ दिखाई देगा। जब कुछ साल पहले 2014 में मैंने सियालदह से काकद्वीप की तरफ गंगा सागर जाने के लिए ट्रेन यात्रा की थी तो हर स्टेशन के प्लेटफार्म पर लंबा चौड़ा बाजार सजा देखा था।
प्लेटफार्म पर गन्ने का जूस भी सब्जी बाजार भी....
इस बार की यात्रा में भी इसी तरह का बाजार देखने को मिला। जादवपुर हो या बालीगंज, दमदम हो या फिर कोई और स्टेशन हर स्टेशन पर प्लेटफार्म पर कई सौ दुकानें सजी हुई दिखाई देती हैं। आमतौर आपने रेलवे स्टेशन पर टी स्टाल, फूड स्टाल, दवा , बुक स्टाल आदि देखा होगा। पर कोलकाता के रेलवे स्टेशन पर आप खानेपीने के निहायत ही स्थानीय स्टाल के अलावा सब्जियों की दुकानें, रेडिमेड कपड़ो की दुकानें, खिलौनों की दुकानें सब कुछ देख सकते हैं। यानी आपको खरीददारी के लिए बाजार जाने की कोई जरूरत नहीं है। सबकुछ यहीं से खरीद लें।
वैसे तो मुंबई में फुट ओवर ब्रिज पर भी दुकानें सजी दिखाई देती हैं। पर कोलकाता के रेलवे स्टेशनों पर कब्जा करके स्थायी दुकानें बना ली गई हैं। कई दशक से कोई भी सरकार आए जाए भारत सरकार की संपत्ति पर लोगों का इस कदर कब्जा है कि इसको हटाना मुश्किल हो गया है। कई रेलवे स्टेशनों पर तो इतनी बुरी तरह कब्जा हो गया है कि रेलवे स्टेशन के नाम पट्टिकाएं भी ढक गई हैं।
इन रेलवे स्टेशनों पर दुकाने चलाने वाले लोग कई दशकों से यहां जमे हुए हैं। कई इसमें लोकल दंतमंजन बेचने वाले, चना, चूड़ा, घुघनी बेचने वाले, अंडे का आमलेट बेचने वाले भी हो सकते हैं। ये दुकानें सुबह से लेकर देर रात तक गुलजार रहती हैं।
ऐसा नहीं  है कि चेकिंग नहीं होती।कभी कभी रेलवे की ओर चेकिंग की औपचारिकता निभाई जाती है। इस दौरान सारे दुकानदार दुकानें बंद करके थोड़ी देर के लिए फरार हो जाते हैं। देश के कई और हिस्सों में रेलवे के जमीन पर कब्जा हो सकता है पर कोलकाता में जिस तरह प्लेटफार्म पर दुकानें सजी हैं वह आपको कहीं और देखने को नहीं मिलेंगी।
हो सकता है इन दुकानों से कुछ लोगों को सुविधा होती हो, बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिला हो, पर सिटी ऑफ जॉय का यह एक बदरंग चेहरा ही तो है।

मैं जनवरी 2018 के अखबार में एक खबर पढ़ता हूं - हावड़ा स्टेशन को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए रेलवे की ओर से शनिवार को अभियान चलाया गया।रेल सुरक्षा बल समेत रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में नोटिस दी गई 19 दुकानों पर कार्रवाई की गई। स्टेशन के विभिन्न प्लेटफार्म पर अवैध तरीके से संचालित की जा रही दुकानों और ट्रालियों पर हथौड़ा चला। 10 दुकानों 9 ट्रालियोंपर कार्रवाई की गई। 

लेकिन क्या ऐसी ही कार्रवाई कोलकाता और आसपास के सभी स्टेशनों पर हो सकती है क्या।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KOLKATA, LOCAL RAIL, MARKET )

Tuesday, March 27, 2018

इंडियन म्युजियम कोलकाता मतलब जादू घर

तो आइए चलते हैं देश के सबसे पुराने संग्रहालय की सैर पर। कोलकाता का इंडियन म्युजियम। कोलकाता वाले इसे जादू घर भी कहते हैं। क्यों भला। इतना विशाल संग्रह है कि जादुई लगता है। साल 1814 में स्थापित इंडियन म्युजियम ने 2014 में अपनी स्थापना के 200 साल पूरे किए। अगर आप कोलकाता पहुंचे हैं और इतिहास में थोड़ी भी रूचि है तो इंडियन म्युजियम जरूर पहुंचिए। नहीं -नहीं सिर्फ इतिहास ही क्यों विज्ञान खास कर जीव विज्ञान, मानव विकास, भू भौतिकी जैसे विषयों के छात्र हैं शोधकर्ता हैं तो भी ये संग्राहलय आपके लिए महत्व रखता है।

इंडियन म्यूजियम कोलकाता शहर के मुख्य इलाके चौरंगी में स्थित है। कोलकाता में कहीं से भी यहां पहुंचना आसान है। मेट्रो का निकटम स्टेशन एस्प्लानेड हो सकता है। प्रवेश के लिए 20 रुपये का टिकट है। यह हर रोज 10 से 5 बजे तक खुला रहता है। टिकट काउंटर के पास बैगेज लेफ्ट यानी क्लाक रुम की सुविधा उपलब्ध है। म्युजिम के अंदर पानी, टायलेट आदि की भी सुविधा है। यहां से आप संग्रहालय का प्रकाशन, चित्रों के कलेक्शन अलबम आदि चाहें तो खरीद भी सकते हैं।
जब 1991 में पहली बार कोलकाता आना हुआ था तो एक दिन पूरा समय इंडियन म्युजियम के नाम किया था। कई साल बाद कई कोलकाता यात्रा के बाद साल 2017 में एक बार इंडियन म्युजियम के लिए कुछ घंटे का वक्त निकाला।
संग्रहालय में प्रवेश करते ही बायीं तरफ मानव विकास, जीवाष्म आदि की गैलरी है। यहां आप अत्यंत पुराना पेड़ देख सकते हैं तो पत्थर में तब्दील हो गया। कई जानवरों की कंकाल देख सकते हैं।
दाहिनी तरफ अलग अलग कालखंड के मूर्तियों की गैलरी है। ये मूर्तियां बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के अलग अलग स्थलों से लाकर यहां प्रदर्शित की गई हैं। संग्रहालय में मध्य प्रदेश के सतना के पास भरहूत से प्राप्त कलाकृतियों का विशाल संग्रह है।
इंडियन म्युजियम का भवन दो मंजिला है। पहली मंजिल पर दाहिनी तरफ जाने पर आप इजिप्ट गैलरी में पहुंचे। यहां आप सैकड़ो साल पुरानी ममी देख सकते है। ममी वाली गैलरी में फोटोग्राफी प्रतिबंधित है।
इंडियन म्युजियम में आधार तल पर  बायीं तरफ जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया की गैलरी है। इस गैलरी में आप अलग अलग तरह के धातुओं का विशाल संग्रह देख सकते हैं। यहां पर आप धातुओं के बनने की कहानी को भी समझने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसा एक पत्थर देख सकते हैं जो मुड़ जाता है। यहां आप अलग अलग तरह के क्रिस्टल का भी संग्रह देख सकते हैं।

एशिया का सबसे बड़ा संग्रहालय - इंडियन म्युजियम में प्राचीन वस्तुओं, युद्ध सामग्री, गहने, कंकाल, ममी, जीवाश्म और मुगल चित्रों का दुर्लभ संग्रह है। इसकी स्थापना डॉक्टर नथानियल वालिक नामक डेनमार्क के वनस्पतिशास्त्री ने 2 फरवरी सन 1814 में की थी। हालांकि इसकी स्थापना की योजना कई सालों से बन रही थी। 

संग्रहालय आम जनता के लिए 1840 में खोला गया। वर्तमान भवन जिसमें यह संग्रहालय है इसका निर्माण 1867 में आरंभ हुआ और 1875 में पूरा हुआ। अब यह एशिया का सबसे पुराना और भारत का सबसे बड़ा संग्रहालय है। इतना ही नहीं यह विश्व के प्राचीनतम संग्रहालयों में शुमार है।

अब इस संग्रहालय का भवन भी आइकोनिक भवनों की श्रेणी में आ गया है। दो मंजिला विशाल भवन के बीच में बड़ा सा आंगन है। अगर आप घूमते घूमते थक गए हैं तो यहां थोड़ी देर आराम भी फरमा सकते हैं। (https://indianmuseumkolkata.org/)
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com


Monday, March 26, 2018

कोलकाता में फेंकू मियां का साइकिल रिक्शा

जब भी कोलकाता आता हूं साइकिल रिक्शा को बड़ी हशरत से देखता हूं। इन रिक्शा में अगला पहिया नहीं होता। दो पहियों के भारी भरकम रिक्शे पर दो सवारियां बिठाकर या फिर माल लादकर रिक्शा लेकर आदमी दौड़ जाता है। लार्ड विलियम बेंटिक स्ट्रीट पर रात को आठ बजे मेरी मुलाकात फेंकू मियां से होती है। वे अपने रिक्शा के साथ फुटपाथ पर बैठे हैं।
उमर 65 साल हो गई है, पर अब भी पूरे दमखम से रिक्शा को लेकर दौड़ पड़ते हैं। मिट्टी के करुए में चाय की चुस्की के साथ मैं फेंकू मियां से संवाद स्थापित करने की कोशिश करता हूं। फेंकू मियां 40 साल से कोलकाता में रिक्शा लेकर दौड़ रहे हैं। कोलकाता की हर गली हर सड़क से वे बाबस्ता है। 25 साल के थे जब इस भारी भरकम रिक्शे को थामा था। तब से यही जिंदगी बन गई। बताते हैं कि रिक्शा 30 रुपये किराये पर 24 घंटे के लिए मिल जाता है। नया खरीदो तो आजकल 30 हजार का आता है। इसलिए अपना रिक्शा नहीं खरीदा, किराये पर ही चला रहा हूं। पूरे देश में कोलकाता और महाराष्ट्र का एक हिल स्टेशन माथेरन है जहां इस तरह का रिक्शा चलन में है।
रिक्शे पर बातों के साथ फेंकू मियां पुरानी यादो में खो जाते हैं। मैं इस रिक्शे पर सवारी लेकर टीटागढ़ तक जा चुका हूं। मतलब तकरीबन 30 किलोमीटर। सवारी बिठाकर दौड़ते हुए। टीटागढ़ क्या एक बार तो नैहाटी भी चला गया था। कोई दाम देगा तो क्यों नहीं जाउंगा। रोजी रोटी का सवाल है।
फेकूं मियां बताते हैं कि एक बार एक लाश लेकर नैहाटी तक गया था, करीब 35 किलोमीटर। उस लाश को कोई ले जाने को तैयार नहीं था। बड़े शान से कहते हैं इस रिक्शे पर दो टन वजन लेकर दौड़ सकता हूं।
इस रिक्शे की कमाई से कोलकाता के बाहरी इलाके ठाकुर पुकुर में जमीन खरीदकर घर भी बनाया। आठ कमरे बना लिए हैं , उन्हें किराये पर भी लगा दिया है। दो बेटियों की शादी कर चुका हूं। हालांकि बेटे को परिवार से बेदखल कर दिया है। क्यों भला। उसने मेरी मर्जी के खिलाफ जाकर दूसरी जाति में प्रेम विवाह कर लिया है। उसे मुहब्बत हो गई थी, ये मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ।
आखिर कोलकाता में तीन पहिये वाला रिक्शा या बैटरी रिक्शा इस दोपहिये वाले रिक्शे का विकल्प क्यों नहीं बन पा रहा..कैसे बनेगा..भीड़भाड़ वाले इलाके में यही रिक्शा सफल है। कई बार इसको कोलकाता से हटाने की बात चली पर ये हो नहीं पाया।
आजकल कितना कमा लेते हैं। यही कोई 200 से 400 रुपये रोज। ग्राहक मिलने पर है। क्या नए लोग भी रिक्शा खींचने आ रहे हैं।क्यों नहीं आएंगे। कोलकाता में रोजी रोजगार के साधन नहीं है। पुराने उद्योग धंधे बंद हो गए। नए लगे नहीं। कोई काम नहीं मिलेगा तो क्या करेंगे। रिक्शा खींचकर पेट भरने लायक तो कमा लेंगे, नहीं तो भूखे ही सोना पड़ेगा। किसी दिन ज्यादा ग्राहक मिल गए किसी दिन कम पर, फेंकू मियां जिंदगी से निराश नहीं है। मैं उन्हें सलाम करता हूं और आगे बढ़ जाता हूं।
-विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KOLKATA , HAND  PULLED RICKSHAW )



Sunday, March 25, 2018

कोलकाता में कान्हा – 8पीएम – बाई वन गेट वन फ्री...


कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस विमान बंदर पर तीसरी बार उतरा हूं। हमारे साथी अजय ने बता दिया था कि एयरपोर्ट से बाहर निकलने पर पेट्रोल पंप के पास से आपको हमारे घर के लिए शेयरिंग आटोरिक्शा मिल जाएगा तो 7 रुपये देकर मैं अजय के घर पहुंच गया। मेरी ट्रेन रात को है तो तय किया कि थोड़ा जल्दी हावड़ा रेलवे स्टेशन के आसपास पहुंचकर शाम को थोड़ा कोलकाता शहर घूमा जाए। तो दुर्गानगर रेलवे स्टेशन से दमदम लोकल ट्रेन से। दमदम से मेट्रो ट्रेन से एस्प्लानेड पहुंचा।
यहां पास में ही डेकर्स लेन में प्रभात खबर का दफ्तर है। वहां अपना लगेज रखकर आसपास में घूमने का कार्यक्रम था। प्रभात खबर के कोलकाता संपादक श्री तारकेश्वर मिश्र जी से मुलाकात हुई। मैं उनके साथ महुआ चैनल में काम कर चुका हूं। उन्होंने डायरी और कैलेंडर दिया। उनका स्नेह है अपार है। वहीं हमारे पुराने साथी नवीन श्रीवास्तव से मिलना हुआ जो अमर उजाला जालंधर में हमारे साथ थे।
मैं कोलकाता के लार्ड विलियम बेंटिक स्ट्रीट पर हूं। इससे पहले केसी दास में गया था। पर रसगुल्ले के लिए प्रसिद्ध इस रेस्टोरेंट में आज कुछ खाया नहीं। वैसे केसी दास के डिब्बाबंद रसगुल्ले कई बार ले जा चुका हूं। इस बार बेंटिंग स्ट्रीट पर मुझे कान्हा नजर आता है। यह मिठाइयों की प्रसिद्ध दुकान है। मैं कान्हा में अंदर प्रवेश करता हूं। कूपन लेकर अपनी पसंद का खाने वालों की भीड़ लगी है।
पर कान्हा में एक बोर्ड लगा है। आफ्टर 8पीएम बाई वन गेट वन फ्री। मैंने घड़ी देखी आठ बजने में 5 मिनट रह गए हैं। वहां जाने पर पता चला कि कचौड़ी, ढोकला, समोसे जैसे तमाम स्नैक्स वाले आईटम की कीमत रात आठ बजे के बाद आधी हो जाती है। मतलब एक पर एक फ्री। तो मैं तय करता हूं कि डिनर के बजाए कान्हा में ही कुछ नमकीन और मिठाइयां खाई जाएं। तो मिठाई इस बार राजभोग। कान्हा में खानेपीने वालों की काफी भीड़ जुटती है। मेरे सामने एक नेता टाइप के आदमी खड़े हैं। ऊपर से नीचे तक सफेद, जूते भी सफेद और गले में रस्सी जैसी मोटी सोने की चेन। वे भी मेरी तरह कई तरह के स्वाद ले रहे हैं। हाथ में तीन मोबाइल फोन है, किसी से बीच में बातचीत में भी लगे हैं।  
तीन रुपये की चाय - बेंटिंग स्ट्रीट पर वापस लौटता हूं। एक चाय की दुकान दिखाई दे जाती है। मिट्टी के कप में चाय। दो रेट की चाय है। बड़े कप में10 रुपये की और छोटे कप में तीन रुपये की। तीन रुपये की चाय वह भी महानगर में अब कहां मिलती है। पर जनाब कोलकाता में मिल रही है। वह भी चाय तांबे के विशाल समवार में बन रही है। चाय बनाने के सबसे पुराने तरीके से। चाय पीकर आनंद आ गया। कोलकाता यूं ही आम आदमी का शहर नहीं है।
16 रुपये में भरें पेट - चाय के बाद अब कुछ खाने पीने की बात हो जाए। देश में सबसे सस्ता खाना आप अब भी कोलकाता में खा सकते हैं। कोलकाता के फुटपाथ पर पति पत्नी सब्जी और रोटी बनाकर बेचते नजर आते हैं। सब्जी एक बार बनाकर रख ली जाती है। रोटियां ग्राहक के आने पर बनती हैं। 16 रुपये में 4 रोटी और साथ में सब्जी। अब इससे सस्ता खाना शायद ही कहीं मिल पाता हो।
 - vidyutp@gmail.com 
( KANAHA, KOLKATA, TEA, ROTI  ) 

Tuesday, March 20, 2018

ग्रेटर त्रिपुरा की मांग और कोलकाता वापसी

अगरतला के शकुंतला रोड पर ही अब रविंद्र शतवार्षिकी भवन नामक विशाल सभागार बन चुका है। त्रिपुरा के साथ रबी ठाकुर के रिश्ते को लोगों ने बड़े प्यार से संभाल कर रखा है। रखें भी क्यों नहीं टैगोर को अगरतला से बड़ा लगाव जो था। वे सात बार यहां पर आए थे। 
पास में एक विशाल मार्केटिंग कांप्लेक्स भी दिखाई दे रहा है जो हाल में ही बनकर तैयार हुआ है। रविंद्र भवन के बाहर एक विशाल पोस्टर लगा है जिसमें 2017 में त्रिपुरा में हमले में मारे गए दो पत्रकारों के  मौत की सीबीआई जांच की मांग की जा रही है। यहां की पत्रकार बिरादरी लंबे समय से धरना प्रदर्शन कर रही है।
अगरतला की सड़कों पर एक पोस्टर दिखाई देता है जिसमें ग्रेटर त्रिपुरा के निर्माण की मांग की गई है। इस नक्शे में उन इलाकों को भी दिखाया गया है जो कभी त्रिपुरा सम्राज्य के हिस्सा थे, पर अब बांग्लादेश और असम के हिस्सा बन गए हैं। पर क्या अब ऐसा संभव है।
त्रिपुरा के माणिक्य राजघराने के दौरान राज्य का मानचित्र वर्तमान त्रिपुरा से बड़ा था। एक तरफ इसकी सीमा बंगाल को छूती थी तो इसके हिस्से में असम के कछार का भी इलाका था। वहीं लुसाई हिल्स का भी इलाका त्रिपुरा राज के अधीन था जो आजकल मिजोरम का हिस्सा बन गया है। बांग्लादेश का कोमिल्ला क्षेत्र भी त्रिपुरा राजघराने में आता था। सचिन देव बर्मन के पिता कोमिल्ला में ही रहते थे। त्रिपुरा राजघराना देश के सबसे प्राचीन राजघराना में से है। तेरहवीं सदी से लेकर 1949 तक यहां एक ही राजवंश से शासन किया।
अलग जनजातीय राज्य की मांग - हालांकि त्रिपुरा की इंडीजीनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) त्रिपुरा के अंदर ही अलग जनजातीय राज्य बनाने की मांग दशकों से कर रही है। आईपीएफटी 2009 से टीटीएडीएसी को ही अपग्रेड करके अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन कर रहा है। टीटीएडीएसी मतलब त्रिपुरा ट्राईबल एरिया आटोनोमस डेवलपमेंट काउंसिल (त्रिपुरा आदिवासी क्षेत्र स्वशासी जिला परिषद) इस परिषद का गठन आदिवासी संगठनों की मांग पर किया गया था। इसका गठन के लिए 23 मार्च 1979 को प्रस्ताव पास किया गया था। यह परिषद 1982 से सक्रिय है। इसकी सभा और परिषद् अगरतला से 26 किलोमीटर दूर पश्चिम त्रिपुरा के खुमुलुङ नमक नगर में बनाया गया है। 

आईपीएफटी राज्य के 10,491 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र जो राज्य का दो तिहाई से अधिक इलाका होगा को अलग राज्य बनाने की मांग कर रही है। इस क्षेत्र में 12 लाख आबादी रहती है। राज्य में 19 प्रमुख जनजातियां निवास करती हैं।इन जनजातीय लोगों का का प्रतिनिधित्व आईपीएफटी करने का दावा करता है। इसके अलावा आईपीएफटी त्रिपुरा की प्रमुख जनजातीय भाषा कोकबोरोक को  संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भी कर रहा है। 

त्रिपुरा से अब चला चली की वेला है। मैं होटल से चेकआउट कर अगरतला एयरपोर्ट के लिए निकल पड़ा हूं। कमान चौमुहानी के आसपास से एयरपोर्ट से लिए शेयरिंग आटोरिक्शा एयरपोर्ट के लिए चलते हैं। कुल 11 किलोमीटर की दूरी का किराया है 20 रुपये। आटोरिक्शा बिल्कुल एयरपोर्ट के पोर्च में जाकर छोड़ते हैं। अगरतला देश के चंद उन एयरपोर्ट में शामिल है जहां आप इतने सस्ते में समाजवादी तरीके से पहुंच सकते हैं।
कोलकाता की उड़ान बांग्लादेश के आसमान से -
पिछली बार मैं अगरतला से ट्रेन से गुवाहाटी पहुंचा था। पर इस बार वायु मार्ग से कोलकाता जाना है। इंडिगो की उड़ान है। संख्या 6ई 275 कोलकाता होकर चेन्नई और फिर कोयंबटूर तक जाती है। अगरतला एयरपोर्ट पर जेट की लाइन में लग गया। तभी एक जेट कर्मचारी आकर बोलती हैं लाइए मैं आपका बोर्डिंग पास निकाल लाती हूं। थोड़ी ही देर में मैं विमान में अपनी सीट पर हूं। कैप्टन हैं जयमूर्ति और वाइस कैप्टन ताशी भूटिया। क्रू के हेड हैं मणिपुर के मेरान। भूटिया महिलाएं विमान भी उड़ा रही हैं, गर्व की बात है।
कैप्टन बताते हैं कि अगरतला से कोलकाता की 40 मिनट की उड़ान में हम ज्यादातर समय बांग्लादेश के आसमान से उड़ेंगे। तो सारे रास्ते हमें विमान की खिड़की से बांग्लादेश के नदी, पहाड़ और खेत धुंधले ही सही नजर आते रहे हैं। वह सारा भू भाग जो कभी हमारे अपने देश का ही हिस्सा हुआ करता था। पर 1947 में एक दीवार खींच गई। मेरे जेहन में ख्याल आता है, क्या ये दीवार कभी गिरेगी। तभी कैप्टन घोषणा करते हैं- हम कोलकाता उतरने वाले हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( TRIPURA, AGARTALA AIRPORT, BANGLADESH ) 

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Monday, March 19, 2018

अगरतला - केसर चमचम, मालपुआ और शाकाहारी भोजन

पुराने अगरतला से लौटते हुए मुझे सड़क पर एक स्टाल में हास ( मतलब हंस या बतख) नामक स्थानीय चिड़िया का मांस बिकता हुआ दिखाई दिया। दुकानदार भाई ने उस चिड़िया की तस्वीर भी लगा रखी थी। वे उस चिडिया के मांस के साथ बिरयानी की प्लेट 80 रुपये की बेच रहे थे। जैसा कि उन्होने बताया कि इस चिड़िया का मांस सर्दियों में गर्म होता है इसलिए लोग खाते हैं। बाद में पता चला कि यह हंस है इसे लोग यहां हास बोलते हैं। हंस माने कि बतख।  भले ही त्रिपुरा बंगाली बहुल शहर हो पर यहां के रेस्टोरेंट में चिकेन, मटन, मछली, पोर्क और कई तरह की चिड़िया का मांस आपको बिकता हुआ दिखाई देता है।

पर घबराइए मत अगरतला में शाकाहारी खाने के लिए तमाम विकल्प मौजूद हैं। पुराने मोटर स्टैंड के पास निरामिष भोजनालय स्थित है। यहां पर पांच रुपये की चपाती और अलग अलग सब्जियां 20, 30 और 40 रुपये की हैं। यहां पर मुझे कटहल की सब्जी की प्लेट भी दिखाई देती है। हर सब्जी की प्लेट का नमूना स्वागत कक्ष के काउंटर पर लगा रखा है। खाना संतोषजनक है। पर इस बार मुझे एक और बेहतरीन शाकाहारी भोजनालय दिखाई दे गया अगरतला की सड़कों पर।
उज्जयंत पैलेस के पास एलएनबाड़ी रोड पर है मां शेरावली स्वीट्स । यह मिठाईकी दुकान के साथ एक होटल भी है। एक तरफ मिठाई की दुकान दूसरी तरफ डाइनिंग हॉल।
अगरतला के शेरावली स्वीट्स में आपको हर तरह की मिठाइयां मिल जाएंगी। मालपुआ, केसर चमचम, केसर बर्फी, चना टोस्ट, स्ट्राबेरी बर्फी के अलावा वे शुगर फ्री मिठाइयां भी बनाते हैं। सुबह के नास्ते में आपको यहां गुजराती स्वाद ढोकला, खमण आदि भी मिल जाएगा।

वहीं लंच और डिनर में दक्षिण भारतीय खाना, गुजराती थाली और उत्तर भारतीय थाली के विकल्प भी मौजूद हैं। मेरे पास अब समय नहीं है इसलिए सुबह नास्ते में मैं यहां ढोकला लेता हूं। इसके बाद वापस अपने होटल के निकल जाता हूं। अपनी पिछली यात्रा में मैं शकुंतला रोड स्थित गुजरात भोजनालय गया था। अब उस होटल की पुरानी बिल्डिंग गिराई जा चुकी है। गुजरात भोजनालय अब नए भवन में शिफ्ट हो चुका है। हालांकि इस बार में इस शाकाहारी भोजनालाय में खाने का समय नहीं निकाल सका।


इस बार की अगरतला यात्रा में मेरी मुलाकात विभूति देववर्मा से भी हुई। सूचना देने पर विभूति मुझसे मिलने होटल में आए। उनके साथ अगरतला के एक पत्रकार भी थे। संजय सेन संवाद नामक बांग्ला अखबार में काम करते हैं। मुलाकात के बाद विभुति अपने घर और ससुराल भी ले गए। विभूति मेरे फेसबुक की फ्रेंडलिस्ट में हैं। वे त्रिपुरा सरकार में कर्मचारी और सामाजिक मोर्चों सक्रिय रहने वाले नौजवान हैं। विभुति के साथ कभी बांग्लादेश का दौरा करने पर चर्चा भी हुई।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( MA SHERAWALI SWEETS, AGARTALA AIRPORT, ) 

Sunday, March 18, 2018

उज्जयंत पैलेस के चारों कोनों पर चार मंदिर

अगरतला के राजमहल उज्जयंत पैलेस की खास बात है कि इसके चारों कोने पर चार मंदिर बने हैं। अगरतला के राजा बड़े ही धार्मिक प्रवृति के रहे हैं। इसलिए वे जहां भी रहे उन्होंने अपने महल के आसपास सुंदर मंदिरों का निर्माण जरूर कराया। हालांकि वे जातिगत दृष्टि से देखें तो जनजातीय समाज (आदिवासी) वर्ग से आते हैं। पर हिंदू धर्म में उनकी रूचि उदयपुर, पुराना अगरतला और नए अगरतला में हर जगह दिखाई देती है। उनकी राजधानी जिस कालखंड में जहां भी रही उन्होने सुंदर मंदिर और विशाल सरोवर का निर्माण कराया।
उज्जयंत पैलेस के मुख्यद्वार के सामने भी दो विशाल सरोवर हैं। महल के चारों कोने पर चार मंदिर देखे जा सकते हैं। अब ये चारों मंदिर राजधानी अगरतला के प्रमुख मंदिर गिने जाते हैं। ये चार मंदिर हैं – लक्ष्मीनारायण बाड़ी, काली बाडी, जगन्नाथ बाड़ी और दुर्गा बाड़ी।
लक्ष्मी नारायण मंदिर के नाम पर किले से होकर गुजरती एक सड़क है जिसका नाम ही लक्ष्मीनारायण बाड़ी रोड है। इनमें ज्यादातर मंदिरों की बाहरी दीवारें सफेद रंग की हैं। मंदिर का भवन भी सफेद रंग का है। जो उज्जयंत पैलेस से साम्यता रखता है। सफेद रंग के कारण उज्जयंत पैलेस को श्वेत महल के नाम से भी जाना जाता है।
लक्ष्मीनारायण बाड़ी - लक्ष्मीनारायण बाड़ी किले के मुख्यद्वार के दायीं तरफ स्थित है। इसकी दीवारें सफेदी लिए हुए हल्के नीले रंग की हैं। मंदिर के मुख्यद्वार पर लक्ष्मी के सवारी उल्लू की दो विशाल प्रतिमाएं स्थापित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा वीरेंद्र किशोर माणिक्य बहादुर ने 1909 से 1923 के बीच अपने शासन काल के दौरान कराया था। इस मंदिर का निर्माण उन्होंने 1910 में अपने पिता महाराजा राधाकिशोर माणिक्य देव की याद में करवाया था। इस मंदिर में कुल 14 देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं।




जगन्नाथ जी का मंदिर - उज्जयंत पैलेस के पास स्थित जगन्नाथ जी का मंदिर चैतन्य गोड़ीय मठ के अधीन है। इस मंदिर के अंदर एक छोटा सा सरोवर है। मंदिर में प्रवेश करने के बाद आपको कृष्ण लीला से जुडी अदभुत और मनोरम झांकियां देखने को मिलेंगी। यहां कृष्ण का जन्म उनका बचपन और कृष्ण से जुडी अन्य कथाओं को झांकियों में देखा जा सकता है।
मंदिर परिसर में एक गौशाला भी है। इस सुव्यवस्थित मंदिर में अतिथि निवास भी बना है। परिवार के साथ आने वाले श्रद्धालुओं के रहने के लिए यहां अच्छी संख्या में कमरे बने हुए हैं। जगन्नाथ मंदिर के सभी विग्रह और झांकियों को देखने के लिए आपको कम से कम एक घंटे का वक्त निकालना होगा।
मां दुर्गा की पूजा तो पूरे बंगाल में होती है, इसलिए जब चार मंदिर बने हैं तो उसमें एक मंदिर मां दुर्गा को समर्पित है, तो दूसरा उनके ही दूसरे रूप मां काली को समर्पित है। इन सभी मंदिरों को राजकीय महत्व का दर्जा दिया गया है और उनकी व्यवस्था राज्य सरकार देखती है।

दो क्रांतिकारियों की प्रतिमाएं - उज्जयंत पैलेस के मुख्य द्वार के सामने लॉन में अब दो प्रसिद्ध क्रांतिकारियों की प्रतिमा स्थापित की गई है। एक तरफ खुदीराम बोस की प्रतिमा की स्थापना की गई है तो दूसरी तरफ महान क्रांतिकारी सूर्योसेन की प्रतिमा स्थापित की गई है।
अपनी 2013 की अगरतला यात्रा के दौरान मैंने उज्जयंत पैलेस का भ्रमण किया था और इसके संग्रहालय को देखा था। इसलिए इस बार संग्रहालय के अंदर नहीं जा रहा हूं। तो अब चलें वापस।


-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( UJJYANT PALACE, FOUR TEMPLES, LAXMINARAYAN BARI, DURGA BARI, KAL IBARI )