Saturday, February 3, 2018

धनबाद की सुबह से कोलकाता की दोपहर तक


कोल फील्डस एक्सप्रेस से हावडा का सफर -  धनबाद रेलवे स्टेशन पर इंतजार करते समय हमने मोबाइल में टाइम टेबल देखा तो पता चला कि सुबह 5.50 में कोलफील्ड्स एक्सप्रेस यहां से बनकर चलती है। यह पूरी तरह से सिटिंग ट्रेन है। यह मुझे 10 बजे के आसपास हावड़ा पहुंचा देगी। टिकट तो मेरे पास पहले से ही था। इसलिए मैं कोलफील्ड्स वाले प्लेटफार्म पर पहुंच गया। ट्रेन पहले से ही लगी हुई थी। रेलवे में छोटी दूरी वाली सिटिंग ट्रेनें अच्छी होती हैं। अगर आपको चार छह घंटे का सफर करना हो तो इसमें जगह भी मिल जाती है। सफर भी जल्दी पूरा हो जाता है।
तो मैं कोल फील्ड्स एक्सप्रेस में एक सिटिंग कोच में विंडो सीट तलाश कर बैठ गया हूं। इसमें सहयात्री भी अच्छे मिले हैं। वे चलती ट्रेन में अपने रोज के कारोबार की बातें करते जा रहे हैं। ज्यादातर लोग दैनिक यात्री हैं। रेलगाडी अपने समय से चल पडी है। धनबाद के थोडी देर बाद ही झारखंड राज्य खत्म हो जाता है। 


कोलफील्ड्स एक्सप्रेस पहले कुमारधुबी में रुकी। ये धनबाद जिले का ही रेलवे स्टेशन है। इसके बाद ट्रेन बराकर आया। यह पश्चिम बंगाल का पहला रेलवे स्टेशन है जहां पर ट्रेन रुकी। इसके बाद कुल्टी, सीतारामपुर से चलती हुई आगे आसनसोल में रुकी। आसनसोल पश्चिम बंगाल का कोलकाता के बाद दूसरा सबसे बडा शहर है। यह खनिज संपदा से भरपूर इलाका है। पर यह 2017 में अलग जिला बन पाया है। 

बचपन में हमारे घर में एक जौहरी आया करते थे। वे कहते थे कि मैं सारे रत्न आसनसोल के बाजार से खरीद कर लाता हूं। पता नहीं इसमें कितनी सच्चाई थी। इसके बाद आया रानीगंज। रानीगंज भी बडा औद्योगिक नगर है। इसके बाद रेल अंडाल रेलवे स्टेशन पर रुकी।
दुर्गापुर रेलवे स्टेशन 

इसके बाद आया वारिया। वारिया के बाद फिर आया दुर्गापुर रेलवे स्टेशन। दुर्गापुर में बडा स्टील प्लांट है। जब मैं बीएचयू में पढ़ता था तो दुर्गापुर से खूब लड़के लड़कियां बीएचयू में पढने के लिए आते थे। इनमें हमारा एक साथी था सुब्रोज्योति चक्रवर्ती। खूब पढाकू था। पूरे देश में दुर्गापुर अपने स्टील प्लांट के लिए ही जाना जाता है।

दुर्गापुर की बात करें तो यह पश्चिम बंगाल का तीसरा सबसे बड़ा शहर है। यह एक देश का बड़ा औद्योगिक शहर है। आजादी के बाद इसे 1955 में चंडीगढ़ की तरह योजनाबद्ध शहर के तौर पर बसाया गया था। मतलब यह काफी कुछ गुजरात के गांधीनगर और चंडीगढ़ जैसा है। यह शहर बर्धमान जिले में आता है। 


इसके बाद आया खाना जंक्शन। हां खाना... यह पूर्वी वर्धमान जिले का एक रेलवे स्टेशन है। यह जंक्शन इसलिए है कि यहां से झारखंड के साहेबगंज के लिए लूप लाइन निकलती है। बंगाल के सारे स्टेशन बिल्कुल साफ सुथरे नजर आ रहे हैं। बर्धमान जंक्शन पर ट्रेन रुकी थोड़ी देर। पर कोल फील्ड्स एक्सप्रेस समय से ही चल रही है।
हावड़ा से पहले रास्ते में दार्जिलिंग मेल से मुलाकात हुई। वह सामने के प्लेटफार्म पर खड़ी थी। डानकुनी जंक्शन के बाद लिलुआ फिर हावड़ा। 1991 में पहली बार हावड़ा आया था। उसके बाद 2004 में , फिर 2007 में हैदराबाद से लौटने के क्रम में, फिर आना हुआ कोलकाता 2014 में गंगा सागर यात्रा के दौरान। एक बार फिर जुलाई 2016 में अंदमान से लौटते हुए हावडा पहुंचा था।

अगर गिनती करके देखूं तो यह मेरी कोलकाता की छठी यात्रा होगी। पर हर बार सिटी ऑफ जॉय यानी कोलकाता कुछ नया सा लगता है। हावड़ा रेलवे स्टेशन के बाहर से वातानुकूलित बस लेकर मैं दोपहर तक जादवपुर विश्वविद्यालय के परिसर में पहुंच गया हूं। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MUGALSARAI, DHANBAD, DEHRADUN EXP, COALFIELDS EXP, HAWRAH ) 


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