Friday, February 2, 2018

दिल्ली से कोलकाता वाया मुगलसराय, धनबाद

दिल्ली से चला हूं 26 दिसंबर की रात को भागलपुर एक्सप्रेस से। नई दिल्ली से इस ट्रेन के खुलने का समय रात के 12 बजे है। माधवी और अनादि एसी3 में हैं तो मैं बगल वाली स्लीपर कोच में। उनका पटना जाने का कार्यक्रम पहले से तय था तो मेरा बाद में बना। योजना ये है कि उन्हें पटना छोड़कर मैं आगे कोलकाता की ट्रेन ले लूंगा। भागलपुर एक्सप्रेस पटना 3 बजे दिन में पहुंचती है। जबकि हावडा के लिए गरीब रथ वहां से रात 8.30 बजे है। दिल्ली से ट्रेन 12 के बजाए 1.15 बजे चली। रात भर चलते चलते इलाहाबाद पहुंचने से पहले ट्रेन पांच से छह घंटे लेट हो चुकी है। अब मुझे पटना से कोलकाता गरीब रथ मिलने संभावना कम नजर आ रही है।



रेल में साथ चल रहे हमारे कुछ अनुभवी सहयात्रियों ने भी कहा कि टिकट रद्द कर देना अच्छा होगा। तो मैंने अपने मोबाइल एप से तीन बजे टिकट रद्द कर दिया। इसमें मुझे आधा रिफंड मिलेगा। मुगलसराय से पहले चुनार रेलवे स्टेशन पर ठंडी शाम में साधु बाबा प्लेटफार्म पर आराम फरमाते हुए नजर आए।

शाम पांच बजे के आसपास मैं मुगलसराय में उतर गया। माधवी और वंश ने अपनी यात्रा जारी रखी। यहां से हावड़ा की अगली ट्रेन तीन घंटे बाद है। पता चला कि दून और जोधपुर हावडा भी लेट चल रही हैं। इस बीच मुगलसराय में रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर रोटी दाल खाई। इसके बाद एक हावड़ा का जनरल टिकट खरीदा। वापस प्लेटफार्म पर आ गया। प्लेटफार्म नंबर 1-2 पर सर्वोदय बुक स्टाल  से कुछ अल्पमोली अनमोल पुस्तकें खरीदीं। इस स्टाल के प्रभारी प्रकाश जी बड़े जानकार व्यक्ति हैं। कभी मुगलसराय उतरिएगा तो उनसे जरूर मिलिएगा। मेरा पटना नहीं जाने का फैसला ठीक ही रहा। बाद में माधवी से पता चला कि भागलपुर एक्सप्रेस रात 11 बजे के बाद पटना पहुंची। तो मेरी हावडा की ट्रेन नहीं मिलनी तय थी।



मुगलसराय में दून एक्सप्रेस आ गई। पर जनरल डिब्बे में चढ़ना मुश्किल था। टीटीई से बात की। कहा कि स्लिपर में चढ़िए, आकर पेनाल्टी बना दूंगा। तो मैं उनके बताए स्लिपर कोच में चढ गया। मेरे गांव के स्टेशन कुदरा और सासाराम रात को गुजर गए। मैं  बहुत दिनों बाद बिना आरक्षण के लंबी यात्रा कर रहा हूं। टीटी बाबू ने पेनाल्टी लेकर बर्थ भी दे दी। पर वह सीट हमें पारसनाथ मे खाली करनी पड़ी। दरअसल टीटी बाबू ने जो सीट दी उसमें पारसनाथ से आगे दूसरे लोगों का आरक्षण था। टीटी बाबू उतर चुके थे। मैं अब किससे शिकायत करता। उन्होंने आधे रास्ते में खाली होने वाली बर्थ दे दी थी। एक तरह से मैं ठगा गया था। अब आगे की यात्रा मुश्किल थी,  इसलिए मैं अगले बडे स्टेशन यानी धनबाद रेलवे स्टेशन पर उतर गया।
सुबह के 5 बजे धनबाद रेलवे स्टेशन। 


स्टेशन से बाहर निकला तो सुबह सुबह अखबार वाले अखबार छांटते दिखाई दिए। वही अखबार जो मैं रात को बनाता हूं। सुबह सुबह यह नजारा देखकर बडा अच्छा लगता है। धनबाद हिंदुस्तान अखबार का प्रकाशन केंद्र भी है। यहां इन दिनों मेरे साथी गीतेश्वर प्रसाद सिंह संपादक हैं। पर इतनी सुबह उन्हें फोन करने का कोई मतलब नहीं है। धनबाद रेलवे स्टेशन पर मुझे हावडा की ट्रेन के लिए लगभग एक घंटे से ज्यादा इंतजार करना पडा। हां, इस दौरान  धनबाद स्टेशन पर 5 रुपये मिलने वाली नींबू वाली चाय खूब पसंद आई। झारखंड, बंगाल और असम में नींबू चाय का चलन खूब है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MUGALSARAI, DHANBAD, DEHRADUN EXP, COALFIELDS EXP, HAWRAH ) 

1 comment:

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