Tuesday, January 9, 2018

मोहिनीअट्टम और कथकली के देस में


केरल में जब आप घूम रहे हों तो यहां की दो शास्त्रीय नृत्य शैलियों की खूशबू से भला दूर कैसे रह सकते हैं। मोहिनीअट्टम और कथकली केरल की दो प्रमुख नृत्य शैलियां हैं। इनका प्रदर्शन आपको केरल के तमाम सांस्कृतिक आयोजनों में देखने को मिल सकता है। मुन्नार में हर शाम को दो छोटे छोटे आडिटोरियम में कथकली का प्रदर्शन होता है। इसका टिकट 200 रुपये का है। यहां दो शो होते हैं। शाम को 5 से 6 बजे तक कथककली का शो तो 7 से 8 बजे के बीच केरला मार्शल आर्ट का शो। आप समय निकाल कर इन शो का मजा ले सकते हैं। तो आइए जानते हैं इन नृत्य परंपराओं के बारे में।

जब विष्णु ने मोहिनी रुप धरा और छल से लिया अमृतकलश  


मोहिनीअट्टम केरल की सबसे पुरानी नृत्य शैली है। यह कथककली से भी प्राचीन मानी जाती है। मोहिनीअट्टम का शाब्दिक अर्थ मोहिनी  के नृत्य के रूप में लिया जाता है। मोहिनी का अर्थ मन को मोहने वाला होता है। कहा जाता है कि मोहिनी भगवान विष्णु का रुप है, जिसका अवतरण देव और असुरों के बीच युद्ध के दौरान हुआ था। जब असुरों ने अमृत के ऊपर अपना नियंत्रण कर लिया था। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रुप धारण कर वो अमृत का घड़ा असुरों को मोह में लेकर देवताओं को समर्पित कर दिया था। तो इस तरह यह एक हिन्दू पौराणिक गाथा है जो नृत्य शैली में प्रकट हुई है।

मोहिनीअटट्म केरल के मंदिरों में हजारों सालों से किया जाना वाला नृत्य है। मोहिनी अट्टम एक  चक्करदार नृत्य शैली है। इसमें शरीर और शरीर के अंगों की मंथरललित गति एवं आंखों और हाथ की अत्यंत भावप्रवण भंगिमाएं देखने को मिलती हैं। इसे कई महिलाएं समूह में भी करती हैं। इस नृत्य रूप के लिए विशिष्ट वस्त्र विन्यास भी होता है। सोने की जरदोजी के काम वाले वस्त्र पहले महिलाएं इस नृत्य में हिस्सा लेती हैं।



मोहिनीअट्टम का उल्लेख केरल के साहित्यिक ग्रंथों में मज्हमंगलम नारायणन नम्बु‍तिरि द्वारा 1709 में लिखित व्यवहारमाला पाठ और बाद में महान कवि कुंजन नम्बियार द्वारा लिखित घोषयात्रा  में पाया जाता है। केरल के इस नृत्य रूप की संरचना त्रावणकोर राजाओं महाराजा कार्तिक तिरुनल और उसके उत्तराधिकारी महाराजा स्वाति तिरुनल (18वीं-19वीं शताब्दी ईसवी) द्वारा की गई थी। मोहिनीअट्टम की लोकप्रियता बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में त्रिचुर और पालघाट जिलों तक सीमित थी। पर अब केरल के तमाम जिलों के शास्त्रीय नृत्य के स्कूलों मे इसका प्रशिक्षण दिया जाता है। केरल से बाहर जब भी केरल की नृत्य शैली को लेकर जाने की बात आती है तो मोहिनी अट्टम और कथकली का नाम आता है।

नौ रसों का अदभुत प्रदर्शन दिखता है कथककली में

अब केरल की एक और लोकप्रिय नृत्य शैली कथककली की बात करें। कथकली मोहिनीअट्टम की तुलना में नया है। कथकली नृत्‍य शैली केरल की प्राचीन युद्ध संबंधी कलाओं का मेल दिखाई देता है। एक दंतकथा के अनुसार जब कालीकट के जमोरिन ने अपने कृष्‍णानाट्टम कार्यक्रम करने वाले समूह को त्रावनकोर भेजने से मना कर दियातो कोट्टाराक्‍कारा का राजा इतना नाराज हो गया कि उसे रामानाट्टम की रचना करने का निर्णय लिया। उसी रामनाट्टम का का विकसित रूप है कथकली।  इस नृत्य में 24 मुद्राएं होती हैं। इसमें भरतमुनि के नव रस का सुंदर प्रदर्शन भी देखने को मिलता है। 



अत्यंत रंगीन वेशभूषा पहने कलाकार गायकों द्वारा गाए जानेवाले कथा संदर्भों को कलाकार हस्तमुद्राओं एवं नृत्य-नाट्यों द्वारा अभिनय करके प्रस्तुत करते हैं। इसमें कलाकार स्वयं संवाद नहीं बोलता है और न ही गीत गाता है।  आमतौर पर कथा के विषय को पुराणों और ऐतिहासिक कथानकों से लिया जाता है। केरल के मंदिरों के शिल्‍पों और लगभग सोलहवीं शताब्‍दी के मट्टानचेरी मंदिर के भित्तिचित्रों में वर्गाकार तथा आयताकार मौलिक मुद्राओं को प्रदर्शित करते नृत्‍य के दृश्‍य देखे जा सकते हैंजो कथकली की विशेषताओं को प्रदर्शित करते हैं।
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(MOHINIATTAM, KATHAKKALI, MUNNAR, CLASSICAL DANCE OF KERALA )