Saturday, January 27, 2018

द्वैतवाद का संदेश देता है उडुपी श्रीकृष्णा मंदिर

कान्हा की नगरी उडुपी का प्रमुख आकर्षण है श्रीकृष्ण मठ मंदिर। यह मंदिर कई एकड़ में फैला है। इस मंदिर की स्थापना 13वीं सदी के महान वैष्णव संत माधवाचार्य द्वारा की गई थी।

वे द्वैतवेदांत संप्रदाय के संस्थापक थे। कहा जाता है कि माधवाचार्य ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ गीताभाष्य यहीं लिखा था। उडुपी श्रीकृष्ण मठ को अपनी धार्मिक क्रियाओं, परंपरा, द्वैतवाद के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है।

कान्हा की मोहक मूर्ति -  उडुपी के श्रीकृष्ण मंदिर के गर्भ गृह में भगवान कृष्ण की युवावस्था की एक सुंदर और मोहक मूर्ति है। मूर्ति के दाएं हाथ में मथानी और बाएं हाथ में रस्सी पकड़े हुए हैं। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण के ये मूर्ति गुजरात के द्वारका के गोपी-चंदन वन से यहां लाई गई थी। श्रद्धालु यहां कान्हा के दर्शन करके खुद को धन्य समझते हैं। यहां कान्हा के प्रति लोगों का अदभुत आस्था है। पूरा उडुपी शहर की कान्हा के प्रेम में रमा नजर आता है। 

श्रीकृष्ण मंदिर के निर्माण में लकड़ी और पत्थरों का अदभुत प्रयोग दिखाई देता है। खासतौर पर मंदिर की आंतरिक सच्चा में लकड़ी के सुंदर मेहराब बने हैं। मंदिर का गोपुरम विशाल है जो दूर से नजर आता है। 

झरोखों से दर्शन - कहा जाता है कि एक बार भगवान कृष्ण के समर्पित भक्त कनकदास को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। तब उन्होंने तन्मयता से कृष्ण की प्रार्थना की। भगवान उनसे इतने प्रसन्न हुए कि भक्त को अपना दिव्य रूप दिखाने के लिए मठ (मंदिर) के पीछे एक छोटी सी खिड़की बना दी।

आज भी भक्त उसी खिड़की के नौ झरोखों से भगवान कृष्ण के दर्शन करते हैं। मंदिर में गरुड़ और हनुमान की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

मंदिर के पृष्ठ भाग में सुंदर सरोवर है। मंदिर की विशेष पूजा में हिस्सा लेने वाले श्रद्धालु इस सरोवर में स्नान करके पूजा करते हैं। उडुपी श्रीकृष्ण मंदिर के सामने शिव का अतिप्रचीन मंदिर चंद्रमौलेश्वर मंदिर स्थित है। वहीं इसके बगल में भगवान विष्णु का अति प्रचीन अनंतेश्वर मंदिर स्थित है। इसमें विष्णु भुजंगशयनम मुद्रा में विराजमान हैं।

मंदिर के त्योहार -  श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, हनुमान जयंती, मकर संक्रांति, रथ सप्तमी, माधव नवमी, नवरात्रि महोत्सव, विजयादशमी, नरक चतुर्दशी, दीपावली मंदिर के प्रमुख त्योहार हैं। त्योहारों के दौरान श्रद्धालुओं को श्रीकृष्ण के ब्रह्मरथ को खींचने का सौभाग्य मिलता है। मंदिर परिसर के चारों तरफ रथ वीथि है, जिसमें शोभायात्रा निकाली जाती है। आम दिनों में मंदिर सुबह 5 बजे से रात्रि 9.30 बजे तक खुला रहता है।
हमलोग श्रीकृष्ण मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लग गए हैं। पर विजयादशमी का दिन होने के कारण लाइन काफी लंबी है। पर ढाई घंटे में हमें कान्हा जी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो ही गया। यह भी सुंदर संयोग रहा कि विजयादशमी का दिन होने के कारण हमें प्रभु के रथ खींचने का भी मौका मिला। कृष्ण के रथ को खींचकर मंदिर प्रांगण के बाहर खुले मैदान में लाया गया। इस रथ की लंबी मोटी रस्सी को दर्जनों श्रद्धालु मिलकर खींच रहे थे तो मैं और अनादि भी इस पुण्य कार्य में योगदान करने लगे।

उडुपी के अष्टमठ
उडुपी में श्रीकृष्ण भक्ति से जुड़े कुल आठ मठ हैं। ये सभी मठ श्रीकृष्ण मंदिर के आसपास बने हैं। इनमें पेजावर मठ प्रमुख है जिसके प्रमुख स्वामी विश्वेश तीर्थ जी हैं। दूसरे मठ हैं पालिमारु, अडामारु, पुट्टिगे, सोढे, कनियरु, शिरुर और कृष्णपुरा। हर दो साल पर होने वाले पर्याया त्योहार के दौरान श्रीकृष्ण मंदिर का प्रबंधन अगले मठ को स्थानांतरित करने की पंरपरा चली आ रही है।
उडुपी में श्रीकृष्ण मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं के रहने के लिए कई धर्मशालाएं बनी हुई हैं, जिनमें बिरला धर्मशाला प्रमुख है। कई मठों में भी श्रद्धालुओं के लिए अतिथि गृह बने हुए हैं।

उडुपी के आसपास -  कर्नाटक के इस तटीय शहर में रुककर आसपास के कई और धार्मिक और पर्यटक स्थलों तक घूमने की योजना बनाई जा सकती है। शिक्षा का प्रमुख केंद्र मनीपाल उडुपी से 8 किलोमीटर की दूरी पर है। शंकराचार्य के चार मठों में से एक श्रंगेरी मठ यहां से महज 90 किलोमीटर की दूरी पर है। यह चिकमंगलूर जिले में आता है। इसके अलावा आप चिकमंगलूर और शिवमोगा जिले के कई मनोरम स्थलों की यात्रा कर सकते हैं।

शिवमोगा जिले का प्रसिद्ध जोग फाल्स भी यहां से ज्यादा दूर नहीं है। वहीं आप मुरडेश्वर महादेव, मुकांबिका देवी और गोकर्ण के महाबलेश्वर महादेव के भी दर्शन के लिए जा सकते हैं। उडुपी से मंगलूरू भी 70 किलोमीटर के दायरे में हैं। मंगलुरू में शिव का प्रसिद्ध मंजूनाथ स्वामी मंदिर के दर्शन किए जा सकते हैं।
-        माधवी रंजना
(UDUPI SRI KRISHNA MATHA, MADHWACHARYA, ASTHA MATHA ) 
उडुपी में विजयादशमी के दिन भगवान जी का रथ खींचने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ।