Thursday, October 5, 2017

यहां है एशिया की सबसे बड़ी मसजिद


आपसे कोई ये सवाल पूछे की देश की सबसे बड़ी मसजिद कहां है तो जवाब होगा भोपाल में। साल 1995 में अपने पांच दिन के भोपाल प्रवास में मैं एशिया की सबसे विशाल मसजिद ताजुल मसजिद को भी अंदर से देखने गया। यहां गैर मुस्लिमों को अंदर जाने से कोई मनाही नहीं है। मसजिद का प्रवेश द्वार अत्यंत विशाल है। यह भारत की सबसे बड़ी और एशिया की दूसरी सबसे बड़ी मसजिद है। ताजुल मसजिद का मतलब है मसजिदों का ताज।

इस मसजिद में महिलाएं भी पढ़ती हैं नमाज - इस मसजिद की दूसरी बड़ी खासियत है कि यहां महिलाओं को भी नमाज पढ़ने की इजाजत है। इसके लिए खास तौर पर मसजिद में एक हिस्सा बनाया गया है जहां महिलाएं बैठकर नमाज अदा कर सकती हैं। हालांकि मसजिद परिसर में मगरिब (शाम की नमाज) के बाद महिलाओं को रहने की इजाजत नहीं है। 

छात्रों का हॉस्टल -  ताजुल मसजिद परिसर में छात्रों के निवास के लिए 1000 के करीब कमरे बनाए गए हैं। इन कमरों में मसजिद परिसर में चलने वाले दारुल उलूम के छात्र रहते हैं। इस मसजिद का निर्माण भोपाल के आठवें शासक शाहजहां बेगम के शासन काल में 1844-1860 के दौरान हुआ। वह आखिरी मुगल बहादुरशाह जफर की समकालीन थीं। पर तब धन की कमी से यह मसजिद पूरी नहीं हो सकी थी।

1971 में भारत सरकार के सहयोग से इस मसजिद को पूरा कराया। कई साल तक चले निर्माण के बाद 1985 में यह पूरी हो सकी। इसको पूरा कराने  में भोपा के आलमा मोहम्मद इमरान खान नदवी और मौलाना सैय्यद हशमत अली साहब की कोशिशें रहीं जो कामयाब हुईं। मसजिद ऊंचे जगत पर बनी है। एक तरफ से इसके प्रवेश द्वार पर सड़क की ओर से 54 सीढ़ियां बनी हैं। 
दो विशाल मीनारें - इस मसजिद में दो विशाल मीनारें हैं जो दूर से ही दिखाई देती हैं। मसजिद के निर्माण में मुगल वास्तुकला की छाप दिखाई देती है। निर्माण में लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। मसजिद का निर्माण भोपाल की विशाल झील मोतिया तालाब के बगल में कराया गया है।
हर साल इत्जिमा -  हर साल ताजुल मसजिद के परिसर में सालाना इत्जिमा समारोह होता है। तब यहां लाखों लोग जुटते हैं। मसजिद के साथ विशाल मदरसा है, जिसमें हजारों छात्र तालीम पाते हैं।
 भारत की सबसे बड़ी मसजिद
4,00,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में निर्मित है ताजुल मसजिद
1,75,000 लोग एक साथ यहां नमाज पढ़ सकते हैं।
1844 में आरंभ हुआ था मसजिद का निर्माण कार्य  
18 मंजिलों वाली दो ऊंची मीनारें हैं मसजिद में 
1971 में दुबारा निर्माण कार्य आरंभ हुआ

कैसे पहुंचे- ताजुल मसजिद भोपाल शहर के बीचों बीच स्थित है। रेलवे स्टेशन से तकरीबन 5 किलोमीटर की दूरी पर है। इस मसजिद के पास शहर की जीपीओ और रायल मार्केट स्थित है। ताजुल मसजिद से थोड़ी दूरी पर आप मोती मस्जिद भी देख सकते हैं। 


भोपाल की थाली मतलब भरपेट - घूमते हुए कई बार भोपाल शहर में होटलों मे खाने का मौका मिला। रेलवे स्टेशन के आसपास के ज्यादातर होटलों में खाने का दरें थाली के हिसाब से थी। भोपाल में थाली का मतलब भरपेट खाने से है। रोटी या चावल की गिनती या मात्रा देखने की जरूरत नहीं है। तुलनात्मक रूप से यह खाने में सस्ता शहर लगा। भोपाल की थाली में खाने के ऊपर से अक्सर नमकीन भी परोसी जाती है। ऐसा रिवाज यहां घरों में भी देखने को मिलता है।

अपनी इस पहली भोपाल यात्रा के दौरान मैं ओम प्रकाश कुशवाह से भी मिलने गया। वे पुल बगोदा के पास रहते थे। वे राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त काष्ठ शिल्पी हैं। इसी दौरान मैं अरेरा कालोनी स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के परिसर में भी गया। मैं आगे पत्रकार बनना चाहता था इसलिए यहां की नामांकन प्रक्रिया के बारे में जानने की इच्छा थी। जानकारी लेने के बाद वापस लौट ही रहा था कि अचानक वहां हमारी मुलाकात संजय द्विवेदी से हुई। कभी बीएचयू में विद्यार्थी परिषद के पूर्णकालिक रहे संजय आजकल वहां के छात्र थे। संयोग से बाद में संजय द्विवेदी इसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गए। आजकल तो रजिस्ट्रार बन गए हैं। वे बहुत अच्छे स्तंभकार भी हैं। कई दिनों के प्रवास के बाद अब वापसी की बारी थी।

भोपाल से मेरी वापसी वाया इटारसी हुई। पर इटारसी रेलवे स्टेशन पर वाराणसी जाने वाली महानगरी एक्सप्रेस के लिए छह घंटे इंतजार करना पड़ा। हालांकि इटारसी बड़ा रेलवे स्टेशन है पर यहां पर ये इंतजार के छह घंटे काफी उबाऊ रहे। इटारसी रेलवे स्टेशन की एक और खास बात है यहां बाकी स्टेशनों की तुलना में खाना काफी सस्ता मिलता है। तब यहां प्लेटफार्म पर 30 पैसे की एक रोटी मिलती थी। इसके बाद भी कई बार इटारसी से होकर गुजरना हुआ। खाने की दरें थोड़ी बढ़ रही हैं, फिर भी इटारसी जंक्शन अन्य स्टेशनों के मुकाबले सस्ता ही है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
 , 
(BHOPAL, ITARSI, TAJUL MASJID, MAKHANLAL JOURNALISM UNIVERSITY ) 

1 comment:

  1. मस्जिद के विषय में दिलचस्प जानकारी। उधर जाना हुआ तो एक बार जरूर देखना चाहूँगा। अकसर यात्रा के दौरान कई बार ऐसा अनुभव होने लगता है जब कि बोरियत का एहसास होता है मैं ऐसे वक्त के लिए कोई न कोई किताब अक्सर साथ में रखता हूँ। अक्सर ये हल्का फुल्का ही होता है तो वक्त कट जाता है। कई बार तो स्टेशन में मौजूद बुक स्टाल्स में घुमते हुए ही कुछ न कुछ रोचक मिल जाता है।
    अगले लेख का इन्तजार।

    ReplyDelete