Thursday, October 5, 2017

यहां है एशिया की विशालतम मसजिद


अपने पांच दिन के भोपाल प्रवास में मैं एशिया की सबसे विशालतम मसजिदों में से एक ताजुल मसजिद को भी अंदर से देखने गया। यहां गैर मुस्लिमों को अंदर जाने से कोई मनाही नहीं है। मसजिद का प्रवेश द्वार अत्यंत विशाल है।
कई लोग इसे भारत ही नहीं बल्कि एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद कहते हैं। यह भारत की सबसे बड़ी और एशिया की दूसरी सबसे बड़ी मसजिद है। ताजुल मसजिद का मतलब है मसजिदों का ताज। इसके परिसर में छात्रों के निवास के लिए 1000 के करीब कमरे बनाए गए हैं। इस मसजिद का निर्माण भोपाल के आठवें शासक शाहजहां बेगम के शासन काल में 1844-1860 के दौरान हुआ। वह आखिरी मुगल बहादुरशाह जफर की समकालीन थीं। पर तब धन की कमी से यह मसजिद पूरी नहीं हो सकी थी।
1971 में भारत सरकार के सहयोग से इस मसजिद को पूरा कराया। कई साल तक चले निर्माण के बाद 1985 में यह पूरी हो सकी। इसको पूरा कराने  में भोपा के आलमा मोहम्मद इमरान खान नदवी और मौलाना सैय्यद हशमत अली साहब की कोशिशें रहीं जो कामयाब हुईं। मसजिद में दो विशाल मीनारें हैं जो दूर से ही दिखाई देती हैं। मसजिद के निर्माण में मुगल वास्तुकला की छाप दिखाई देती है। निर्माण में लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। मसजिद का निर्माण भोपाल की विशाल झील मोतिया तालाब के बगल में कराया गया है।
हर साल ताजुल मसजिद के परिसर में सालाना इत्जिमा समारोह होता है। तब यहां लाखों लोग जुटते हैं। मसजिद के साथ विशाल मदरसा है, जिसमें हजारों छात्र तालीम पाते हैं।
 भारत की सबसे बड़ी मसजिद
4,00,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में निर्मित है ताजुल मसजिद
1,75,000 लोग एक साथ यहां नमाज पढ़ सकते हैं।
1844 में आरंभ हुआ था मसजिद का निर्माण कार्य  
18 मंजिलों वाली दो ऊंची मीनारें हैं मसजिद में 

1971 में दुबारा निर्माण कार्य आरंभ हुआ


भोपाल की थाली मतलब भरपेट - घूमते हुए कई बार भोपाल शहर में होटलों मे खाने का मौका मिला। रेलवे स्टेशन के आसपास के ज्यादातर होटलों में खाने का दरें थाली के हिसाब से थी। भोपाल में थाली का मतलब भरपेट खाने से है। रोटी या चावल की गिनती या मात्रा देखने की जरूरत नहीं है। तुलनात्मक रूप से यह खाने में सस्ता शहर लगा। भोपाल की थाली में खाने के ऊपर से अक्सर नमकीन भी परोसी जाती है। ऐसा रिवाज यहां घरों में भी देखने को मिलता है।

अपने इस पहले भोपाल यात्रा के दौरान में ओम प्रकाश कुशवाह से भी मिलने गया। वे पुल बगोदा के पास रहते थे। वे राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त काष्ठ शिल्पी हैं। इसी दौरान मैं अरेरा कालोनी स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के परिसर में भी गया। मैं आगे पत्रकार बनना चाहता था इसलिए यहां की नामांकन प्रक्रिया के बारे में जानने की इच्छा थी। जानकारी लेने के बाद वापस लौट ही रहा था कि अचानक वहां हमारी मुलाकात संजय द्विवेदी से हुई। कभी बीएचयू में विद्यार्थी परिषद के पूर्णकालिक रहे संजय आजकल वहां के छात्र थे। संयोग से बाद में संजय द्विवेदी इसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर बन गए। आजकल तो रजिस्ट्रार बन गए हैं। वे बहुत अच्छे स्तंभकार भी हैं। कई दिनों के प्रवास के बाद अब वापसी की बारी थी।

भोपाल से मेरी वापसी वाया इटारसी हुई। पर इटारसी रेलवे स्टेशन पर वाराणसी जाने वाली महानगरी एक्सप्रेस के लिए छह घंटे इंतजार करना पड़ा। हालांकि इटारसी बड़ा रेलवे स्टेशन है पर यहां पर ये इंतजार के छह घंटे काफी उबाऊ रहे। इटारसी रेलवे स्टेशन की एक और खास बात है यहां बाकी स्टेशनों की तुलना में खाना काफी सस्ता मिलता है। तब यहां प्लेटफार्म पर 30 पैसे की एक रोटी मिलती थी। इसके बाद भी कई बार इटारसी से होकर गुजरना हुआ। खाने की दरें थोड़ी बढ़ रही हैं, फिर भी इटारसी जंक्शन अन्य स्टेशनों के मुकाबले सस्ता ही है। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
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(BHOPAL, ITARSI, TAJUL MASJID, MAKHANLAL JOURNALISM UNIVERSITY )