Wednesday, September 13, 2017

कानपुर शहर और गंगा नदी का प्रदूषण

कई साल बाद एक बार फिर कानपुर शहर में उतरा हूं। याद आता है 1993 में कानपुर आया था तो कई दिनों तक रुका था। तब कई इलाके भी घूमे थे शहर के। पर कई साल से हर बार कानपुर से होता हुआ रेल से गुजर जाता हूं। पर इस बार सुबह-सुबह कानपुर की धरती पर उतरना पड़ा है। दिल्ली से रात 12 बजे चलने वाली श्रमशक्ति एक्सप्रेस ने 40 मिनट देर से कानपुर में उतारा। 

हालांकि नई दिल्ली से खुलने के बाद श्रमशक्ति एक्सप्रेस का पड़ाव सीधे पनकी में है।पर ट्रेन फिर भी लेट हो गई है। पनकी कानपुर का बाहरी इलाका है। पर बिना किसी ठहराव के चलने वाली ट्रेन भी लेट हो गई है।श्रमशक्ति की इस देरी के कारण  मुझे लखनऊ के लिए मिलने वाली 6.30 वाली पैसेंजर ट्रेन को छोड़ना पड़ा। अब अगली ट्रेन का इंतजार है। इस बीच स्थानीय अखबार के पन्ने पलटने लगता हूं। 

कानपुर रेलवे स्टेशन वैसे तो बहुत बड़ा स्टेशन है। पर कानपुर में मुख्य शहर प्लेटफार्म नंबर एक की तरफ नहीं है। मुख्य शहर है प्लेटफार्म नंबर 8 के बाहर। मुझे अगली यात्रा का टिकट लेना है। तो प्लेटफार्म नंबर 8 के बाहर आया। इस तरफ रेलवे की ओर से यात्री सुविधाओं के नाम पर खानापूर्ति है। बाहर से देखकर लगता नहीं है कानपुर रेलवे स्टेशन है। स्टेशन के सौंदर्यीकरण और यात्री सुविधाओं के विस्तार पर रेलवे का कोई ध्यान नहीं है। टिकट काउंटर पर भीड़ है। आटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीने नहीं लगी हैं। छोटी दूरी लंबी दूरी के सभी यात्री दो काउंटरों पर टिकट के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारी तुरंत ट्रेन होती तो छूट ही जाती।

खैर टिकट लेकर वापस प्लेटफार्म नंबर एक पर आ गया हूं। पर 7.30 वाली लखनऊ पैसेंजर भी लेट हो गई है। इंतजार करते करते ट्रेन 8.20 में आई। दस मिनट बाद चल पड़ी। पहला स्टेशन आता है कानपुर गंगा तट। गंगा नदी पर पुल पार करते ही ये स्टेशन आता है। स्टेशन का नाम है कानपुर ब्रिज राइट बैंक। इस स्टेशन का नाम कुछ और होता तो बेहतर होता। बारिश के दिन है गंगा जी में पानी बढ़ रहा है। पर कानपुर में गंगा का पानी अत्यंत गंदला है। लोग गंगा जी के पुल से सिक्के फेंकना शुरू कर देते हैं। नीचे बच्चे जाल लिखे खड़े हैं। वे गंगा जी के पानी से सिक्के तलाश करते हैं। पता नहीं उनकी कितनी कमाई हो जाती होगी।

कानपुर में गंगा नदी पर पुल 
आज ही अखबार में कानपुर से चमड़े के कारोबार में लगी टेनरियों को हटाने की खबर छपी है। कानपुर के तकरीबन 450 उद्योंगो को जो गंगा के किनारे चमड़े का कारोबार करते हैं शिफ्ट होना होगा। गंगा जी में कचरा फैलाने में इन उद्योगों का बड़ा योगदान है।  उद्योगपतियों को चिंता है कि वे बरबाद हो जाएंगे। चमड़े के कारोबार से विदेशी मुद्रा आना बंद हो जाएगा। दो साल उद्योग बंद हुए तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरे देशों की कंपनियां हावी हो जाएंगी। अब भाई गंगा की सफाई और चमड़ा उद्योग दोनों की चिंता एक साथ दूर नहीं हो सकती। किसी एक को चुनना होगा।

कानपुर से 17 किलोमीटर आगे उन्नाव रेलवे स्टेशन आया। उन्नाव यूपी का जिला है पर स्टेशन छोटा सा है। इसके बाद सोनिक, अजगैन, कुसुम्भी, जैतीपुर, हरौनी, पीपरसंड रेलवे स्टेशन आए। उन्नाव जिले के दो छोटे स्टेशन लोगों के व्यवहार के मामले में खतरनाक माने जाते हैं। अमौसी  रेलवे स्टेशन के पास लखनऊ का हवाई अड्डा है। मानक नगर लखनऊ शहर का स्टेशन है। साढ़े दस बजे हमारी ट्रेन चार बाग यानी लखनऊ जंक्शन पहुंच चुकी थी।  

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( KANPUR, GANGA RIVER, UNNAO, RAIL )