Wednesday, September 27, 2017

अदभुत है दीदारगंज की यक्षिणी की मुस्कान

पटना का संग्रहालय इतिहास प्रेमियों के लिए शानदार संग्रह समेटे हुए है। पर यहां की सबसे अदभुत कृति है दीदारगंज की यक्षिणी की प्रतिमा। यह देश की सबसे प्रचीनतम प्रतिमाओं में से एक है।

पटना शहर का पूर्वी इलाका। यहां है मुहल्ला दीदारगंज। यहीं 1917 में एक विशाल प्रतिमा प्राप्त हुई। मूर्ति की लंबाई 5 फीट दो इंच है। यह 1 फीट 3.5 ईंच की चौकी पर विराज रही है। चुनार के बलुआ पत्थर से बनी इस मूर्ति पर आज भी अद्भुत चमक देखी जा सकती है। मूर्ति के एक हाथ में चंवर है।

ऐसे हुई प्रतिमा की खोज -  मूर्ति की खोज के बारे में पटना संग्रहालय का प्रकाशन का कहता है कि तत्कालीन पटना के कमिश्नर ईएचएस वाल्स इस मूर्ति की तलाश का श्रेय गुलाम रसूल नामक स्थानीय व्यक्ति को देते हैं। इसकी तलाश 18 अक्तूबर 1917 को हुई थी। यह प्रतिमा सैकड़ो साल तक मिट्टी में दबी हुई थी। वहीं एक अन्य कथा है कि इसे दीदारगंज के धोबी घाट पर कपड़ा धोते समय धोबियों ने ढूंढ निकाला था।

वास्तव में कपड़े धोने के दौरान एक सांप बिल में घुस गया। उस सांप की तलाश में जब खुदाई शुरू की गई तो यह अदभुत मूर्ति निकल आई। बहरहाल मूर्ति के प्राप्त होने पर पहले हिंदुओं ने इसे देवी प्रतिमा मानते हुए दीदारगंज गांव में रखा गया। बाद में 17 दिसंबर 1917 को इसे पटना संग्रहालय में लाकर रखा गया।

कला प्रेमी दीदारगंज की यक्षी को अपने अपने नजरिए से देखते हैं। पर यह प्रतिमा पूरे विश्व में चर्चा में रही है और दुनिया भर के मूर्तिकारों को चकित करती है।

दीदारगंज की यक्षी प्राचीन भारतीय स्त्री सौंदर्य का आदर्श मानक पेश करती है। यक्षी के गले में दो मालाएं हैं। इसका वस्त्र विन्यास और केश सज्जा भी आकर्षित करती है। पूर्ण वक्ष प्रतिमा, पतली कमर तथा व्यापक नितंब के साथ कामुक भाव में है। कमर पर मांसल उभार सुंदरता की निर्धारित मानदंड के अनुरूप है। यक्षी सीधे खड़े होने के बजाय आगे की ओर थोड़ी झुकी हुई है जो विनम्रता का प्रतीत है। उसके होंठों पर अदभुत मुस्कान है।

यह एक गोल आकृति वाली मूर्ति है जिसे किसी भी कोण से देखा-निहारा जा सकता है। प्रतिमा का बायां वक्ष दाएं वक्ष की तुलना में थोड़ा छोटा है। यह प्रतिमा का मातृत्व भाव प्रकट करती है। माना जाता है कि बाएं वक्ष में दूध की मात्रा कम होती है। शिल्पकार ने प्रतिमा के चेहरे पर जो मुस्कान चित्रित की है,उसकी तुलना लोग मोनालिसा की मुस्कान से करते हैं।

दीदारगंज की यक्षी मौर्यकालीन कला का उत्कृष्ट नमूना है। इसके काल निर्धारण पर लंबी बहस चली। इसे तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है। इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल ने इस प्रतिमा को यक्षयक्षी सम्प्रदाय, जो बुद्ध एवं परवर्ती काल में काफी लोकप्रिय था, से सम्बन्ध करते हुए इसे यक्षी कहा। काशी प्रसाद जायसवाल और कई दूसरे इतिहासकार भी उनसे सहमत हैं।  
सालों धरती में दफन रहने के कारण प्रतिमा को नुकसान पहुंचा है। इसकी नाक थोड़ी सी टूट गई है। पर हल्के विध्वंस के बावजूद यह प्रतिमा अदभुत आकर्षण रखती है।
संग्रहालय में अक्सर पटना कला महाविद्यालय के कलाकार प्रतिमा के पास बैठककर उसकी अनुकृति बनाने में लगे रहते हैं। मैं जब इस प्रतिमा को निहार रहा हूं तो दो ऐसे ही छात्र छात्रा वहां बैठकर कला को रुप देने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। बता रहे हैं तीन दिन में प्रतिमा की अनुकृति बना पाए हैं।

नए स्थान पर दीदारगंज की यक्षिणी – साल 2017 में यानी पटना संग्रहालय की स्थापना के सौ साल बाद दीदारगंज की यक्षिणी का स्थान बदला जा रहा है। अब यह प्रतिमा पटना संग्रहालय के बजाय बेली रोड पर पटना उच्चन्यायालय के पास नए बने बिहार  म्यूजियम की शोभा बढ़ाएगी।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  
(PATNA MUSEUM, DIDARGANJ, YAKASHHINI, STATUE )