Thursday, September 21, 2017

नवाबों के शहर का ये दरवाजा कुछ कहता है

लखनऊ शहर में एक दरवाजा है। विशाल दरवाजा। रुमी दरवाजा। इस रूमी दरवाजा इमामबाड़े के बाहर पुराने लखनऊ का प्रवेश द्वार माना जाता है। वास्तव में लखनऊ को आजकल शहर के विस्तार के लिहाज से दो हिस्सों में बांटकर देखते हैं। पुराना लखनऊ और नया लखनऊ। अगर गोमती नदी के लिहाज से देखें तो एक हिस्सा गोमती के इस पार का है तो दूसरा हिस्सा गोमती के उस पार का। तो बाद रुमी दरवाजा की। यह दरवाजा लखनऊ के ऐतिहासिक बड़ा इमामबाड़ा के पास ही सड़क पर स्थित है। रुमी दरवाजा लखनऊ की पहचान है। यह लगभग 60 फीट उंचा है, जिसमें तीन मंजिल हैं। इस दरवाजे से आप नवाबों के शहर का भरपूर नजारा ले सकते हैं।

डिजाइन तुर्की के कांस्टेनटिनोपल के समान - 

रूमी दरवाजा को लखनऊ में तुर्कीश द्वार के नाम से भी जाना जाता है। इसका नाम 13 वीं शताब्‍दी के महान सूफी फकीरजलाल-अद-दीन मुहम्‍मद रूमी के नाम पर रखा गया था।  इसकी डिजाइन तुर्की के कांस्टेनटिनोपल के समान है। इसलिए यह कांस्टेनटिनोपल के दरवाजों के समान दिखाई देता है। इस विशालकाय संरचना के ऊपरी भाग में आठ बहुपक्षीय छतरी देखते ही बनती है। अवध वास्तुकला के प्रतीक इस दरवाजे को तुर्किश गेटवे कहा जाता है। यह इमारत 60 फीट ऊंची है। इसके निर्माण में लोहे या लकड़ी का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया गया है। सबसे ऊपरी हिस्से पर आठ पहलू की छतरी बनी हुई है। दरवाजे का निर्माण त्रिपोलिया जैसा लगता है। दरवाजे के दोनों तरफ हवादार परकोटा बना हुआ है।

22  हजार लोगों को रोजगार मिला - रूमी दरवाजे का निर्माण भी अकाल राहत प्रोजेक्ट के अन्तर्गत किया गया था। नवाब आसफउद्दौला ने यह दरवाजा 1783 ई. में अकाल के दौरान बनवाया था ताकि लोगों को रोजगार मिल सके। यह 1786 में बनकर तैयार हुआ था। इस्लाम में बेकारी और मुसीबत मे भी भीख मांगकर खाना हराम समझा जाता है। इसलिए नवाब ने लोगों को रोजगार देने के लिए इस दरवाजे का निर्माण कराया। कहा जाता है कि इसके निर्माण में 22 हजार लोगों को काम मिला।

वास्तव में रुमी दरवाजा बड़े इमामबाड़े का ही हिस्सा है। इसके रखरखाव की जिम्मेवारी भी हुसैनाबाद ट्रस्ट के ही जिम्मे है। छोटे और बड़े इमामबाड़े के बीच स्थित रुमी दरवाजे में साल 2010 में दरार आने की खबरें आईं। तब इस दरवाजे को मरम्मत की जरूरत महसूस की गई। इस दरवाजे के आसपास कुछ ब्रिटिश अधिकारियों की कब्र भी बनी हुई हैं। वे 1857 की क्रांति के समय मारे गए थे।

आजकल रुमी दरवाजे के अंदर से वाहन गुजरते हैं। यानी आज भी यह प्रवेश द्वार की तरह ही है। दरवाजे के आसपास शाम को चहल पहल रहती है। न सिर्फ बाहरी सैलानी बल्कि स्थनीय लोग भी यहां शाम को परिवार के साथ घूमने आते हैं।
यहां पर आप पुराने लखनऊ की शान तांगे वालों के साथ आधुनिक बैटरी रिक्शा भी चलते हुए देख सकते हैं। यह विशाल द्वार गोमती नदी के पास स्थित है। पास में ही गोमती नदी पर पुराना खूबसूरत पुल भी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-         (RUMI DARWAJA, LUCKNOW )