Wednesday, August 16, 2017

हर घर में टायलेट बनवाओ, पर बरजोरी तो मत करो

देश भर में घर घर में टायलेट हो जिससे कि लोगों को शौच के लिए खुले में नहीं जाना पड़े, इसके लिए सरकारी अभियान कई सालों से चलाया रहा है। पर अगस्त 2017 में इसी विषय पर एक फिल्म आ गई है टॉयलेट एक प्रेम कथा। कहानी का प्लाट ये है कि घर में टॉयलेट नहीं होने पर दुल्हन ससुराल में रहने से इनकार कर देती है। इस तरह की खबरें अखबारों में कई बार आई थीं, इसी से प्रेरित होकर अक्षय कुमार की इस फिल्म का तानाबना बुना गया है। फिल्म मनोरजंन के साथ हर घर में शौचालय बनवाने का संदेश भी देती है।

यह सही भी है कि हर समर्थ आदमी को अपने घर में टायलेट बनवाना ही चाहिए। पर शौचालय बनवाने के सरकारी अभियान को देखिए। सरकार चाहती है कि देश के सभी राज्य सभी जिले खुले में शौच से मुक्त हो जाएं। इसके लिए जिलाधिकारी अभियान चला रहे हैं। स्कूलों के शिक्षकों की मदद ली जा रही है। अभियान प्रेरणा के बल पर चले  सरकारी सहयोग के बल पर चले यहां तक तो ठीक पर है। कई जगह ये अभियान डंडे के बल पर चलाने की कोशिश की जा रही है।

बिहार के कुछ जिलों की बानगी लिजिए। प्रावधान है कि गांव का कोई व्यक्ति खुले में शौच करता पाया गया तो पंचायत उस पर जुर्माना कर सकती है। पुलिस में शिकायत की जा सकती है। सजा का प्रावधान तो नहीं है, पर उस व्यक्ति की फोटो थाने में लगाकर उसे अपमानित किया जा सकता है। मान लिजिए आप एक गांव से दूसरे गांव जा रहे हैं। रास्ते में कई किलोमीटर तक शौचालय नहीं है। आपको शौच का दबाव आया तो आप क्या करेंगे। खुले में निपटेंगे तो वालंटियर बने मास्टर जी आपकी फोटो खींच लेंगे और इस फोटो से सजा दिलाने का काम करेंगे। बिहार में तो एक बार ऐसा हुआ कि वालंटियर बने मास्टर जी को ही राह चलते शौच आ गया। उन मास्टर जी की फोटो दूसरे लोगों ने ले ली। बेचारे मास्टर जी की बहुत फजीहत हुई।

फजीहत की कहानी इतनी ही नहीं है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों से खबर आई कि अधिकारी लोग सुबह सुबह गांव के बाहर डंडा लेकर पहरा देंगे, जो खुले में लोटा लेकर शौच करने आएगा उसे धमकाया जाएगा। वापस भेज दिया जाएगा। अरे खुले में शौच मुक्ति अभियान चलाओ पर इस तरह जोर जबरदस्ती तो मत करवाओ। अधिकारी और स्कूल शिक्षक अपना असली काम छोड़कर इसी में लगे हुए हैं। सामाजिक तौर पर खुले में शौच मुक्ति का अभियान लंबे समय से चल रहा है। डॉक्टर बिंदेश्वर पाठक की अगुवाई में सुलभ इंटरनेशनल तो चार दशक से इस अभियान में लगा हुआ है।

मैं 2014 के मार्च में अपने गांव गया था। बिहार के रोहतास जिले का छोटा सा गांव सोहवलिया। सरकारी योजना का लाभ उठाकर हर घर ने शौचालय बनवा लिया था। अब कोई खुले नहीं जाता निपटारा करने। साल 2017 में हमारा प्रखंड करगहर ओडीएफ यानी खुले में शौच मुक्त ब्लॉक घोषित हो गया है। इसमें हमारे भ्राताश्री और मध्य विद्यालय बिलारी के प्राधानाध्यापक अरविंद कुमार मेहता का भी सराहनीय प्रयास रहा है। कई गांवों में जाकर उन्होंने लोगों को प्रेरित करने का प्रशंसनीय कार्य किया है। 

हालांकि हम बचपन में खुले में ही जाते थे। तब दादा जी कहते थे अपने खेत में ही जाना। क्योंकि आपका शौच बाद में खाद बन जाता है। तो खाद दूसरों के खेत में क्यों डालना।
पर जरा देश की करोड़ों वैसी आबादी के बारे में सोचिए जिसके पास रहने के लिए एक छत तक नहीं है तो वह शौचालय कैसे बनवा लेगा। एक सरकार के तौर पर अगर हम लोगों के लिए दानापानी का इंतजाम करने में सक्षम हो जाएं, और रहने  के लिए एक अदद आशियाना देने की गारंटी कर दें फिर शौचालय की अनिवार्यता की बात कर सकते हैं। पर अभी तो दानापानी और एक अदद झोपड़ी के लिए भी अभी सालों चलना होगा इस देश में।

बेंगलुरु के बसवनगुडी में बना ई टायलेंट 
पहले दिल्ली को ओडीएफ तो बनाइए - बात खुले में शौच की करें तो देश के सुदूर गांव से ज्यादा बुरी हालात दिल्ली की है। यहां जब आप सुबह सुबह रेल से पहुंचते हैं तो रेलवे पटरियों के किनारे हजारों लोग खुले में निपटान करते नजर आते हैं। चुनौती बड़ी ये है कि पहले दिल्ली को खुले में शौच से मुक्त बना लिया जाए उसके बाद गांव के बारे में सोचा जाए। दिल्ली में आबादी का घनत्व ज्यादा है इसलिए शौच जनित बीमारियों का खतरा यहां ज्यादा है। वैसे टॉयलेट – एक प्रेम कथा के बहाने इस मुद्दे को चर्चा का केंद्र बनाने के लिए निर्माताओं का शुकराना।
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( TOILET EK PREM KATHA, OPEN DEFECATION FREE VILLAGE, SWACHH BHARAT MISSION )