Sunday, May 21, 2017

एहोल..कर्नाटक की एक छिपी हुई विरासत

एहोल का मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर समूह। 
एहोल के मंदिरों को देखते हुए मुझे यह आश्चर्य होता है कि देश की सुंदरतम विरासत तक काफी कम लोगों की नजर क्यों पड़ी है। यह कर्नाटक की छिपी हुई विरासत है। यह आस्थावान और घुमक्कड़ लोगों की नजर में ज्यादा क्यों नहीं चढ़ा है, सोचने लायक है। इतनी अदभुत विरासत एक गांव में रची बसी है जहां पहुंचने के लिए नियमित वाहन सेवा की भी कमी है।

सूर्य नारायण देवालय - एहोल के मंदिरों की कलात्मकता देखते हुए लगता है मानो समय की सूई रूक गई हो। हम सूर्य मंदिर से मुखातिब हैं। सूर्य नारायण देवालय का निर्माण आठवीं सदी में हुआ है। इसमें चार स्तंभों और बारह अर्ध स्तंभों पर वृताकार मंडप का निर्माण किया गया है। गर्भ गृह पर गरुड़, गंगा यमुना के चित्र बनाए गए हैं। गर्भ गृह के अंदर सूर्य देव की सुंदर मूर्ति हैं। सूर्य धरती पर एक मात्र देवता हैं जो हमें रोज दिखाई देते हैं। पर उनके मंदिर देश में बहुत कम ही हैं। 


बडिगेर (सुतार) देवालय -  दरअसल एहोल में कई सूर्य मंदिर बने हुए हैं। बडिगेर देवालय नौंवी सदी का बना यह एक और सूर्य मंदिर है। इसके छत पर सूर्य का चित्र बना हुआ है। बादामी चालुक्य राजाओं द्वारा निर्मित इस देवालय से लगा हुआ एक सरोवर भी है। बाद में इसे बडिगेर यानी सुतार जिले उत्तर भारत में बढ़ई कहते हैं उनके नाम पर क्यों जाना जाना लगा यह थोड़ा कौतूहल का विषय हो सकता है। दरअसल यहां बाद में सुतार बिरादरी के लोगों ने अपना ठिकाना बना लिया था। 
एहोल का बडिगेर ( सुतार) देवालय, सूर्य नारायण का एक मंदिर। 

गौडरगुडि देवालय - सूर्यनारायण देवालय के पास पांचवी सदी का बना गौडर गुडि देवालय देखा जा सकता है। यह भी सूर्य देव का ही एक और मंदिर है। यह मंदिर भी टूटे-फूटे हालत में दिखाई देता है। कभी इस देवालय में गांव का मुखिया निवास करता था। कन्नड़ भाषा में गौड़ा का मतलब मुखिया होता है। तो इनके नाम पर इस मंदिर का नाम पड़ गया। वास्तव में गौडरगुडि मंदिर एहोल का सबसे प्राचीन मंदिर है। 
एहोल का गौडगुडि देवालय। 

यह लाडखान मंदिर से भी ज्यादा पुराना माना गया है। इसका निर्माण पांचवी सदी के आरंभ में हुआ था। गौडरगुडी मंदिर की विशेषता इसकी छत है, जो 16 स्तंभों पर आधारित है। इसके स्तंभों पर बेल और पशुओं की आकृतियां बनी हुई हैं। मंदिर के निर्माण में बौद्ध स्थापत्य कला का प्रभाव दिखाई देता है। मंदिर के पास एक तालाब भी हुआ करता था। इसका अवशेष अब भी दिखाई देता है। 
एहोल का अंबिगेर देवालय समूह। 

अंबिगेर देवालय समूह - एहोल में हमें अबिंगेर देवालय समूह दिखाई देता है। यहां कभी मछुआरों ने अपना बसेरा बना लिया था। इसलिए उनके नाम पर इस मंदिर समूह का नाम पड़ गया। वास्तव में यह तीन मंदिरों का समूह है। इसके अंदर सूर्य और विष्णु की खंडित प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। मंदिर के दायीं और बाईं ओर दो प्रवेश द्वार बने हुए हैं। मंदिर मुख्य भूमि से नीचे बना हुआ है। इसमें जाने के लिए सीढ़ियों से उतरना पड़ता है। 

एहोल में है बौद्ध चैत्यालय – एहोल के मंदिर परिसर में एक बौद्ध चैत्यालय भी देखा जा सकता है। इसका मुख पूरब की तरफ है। इसके एक बड़े हिस्से को चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसके गलियारे के मध्य में बुद्ध की मूर्ति पद्मासन के मुद्रा में बनी हुई है। उसके ऊपर छतरी है। यहां बुद्ध यों बैठे हैं मानो वे प्रशांत मुद्रा में नजर आ रहे हों। उनके घुंघराले बाल हैं, घुटने तक धोती है, और वे ध्यानमग्न नजर आ रहे हैं। 

एहोल के मंदिरों की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियों में अदभुत कला शिल्प के दर्शन होते हैं। कई मूर्तियां चमतकृत कर देती हैं। हालांकि ररखाव के अभाव में कुछ मूर्तियां खंडित हो गई हैं। 

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( AHOLE, BUDDHA, SUN TEMPLE, SHIVA ) 

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