Friday, May 19, 2017

देश का सबसे पुराना शिवालय - एहोल का लडखान मंदिर

क्या आपको पता है कि देश का सबसे पुराना मंदिर कौन सा है। आजकल हम देश हम जितने भी ऐतिहासिक मंदिरों के दर्शन करते हैं उनमें ज्यादातर छठी से 16वीं सदी के बीच बने हैं। छठी सदी से पहले के निर्मित मंदिर बहुत कम मिलते हैं। एहोल का लडखान मंदिर जो मूल रुप से शिव का मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण काल 450 ई का बताया जाता है। इस मंदिर का निर्माण पुलकेशिन प्रथम के शासन काल में हुआ था। इस लिहाज से यह देश के सबसे पुरातन मंदिरों में शामिल है। हालांकि इससे भी पुराना मंदिर बिहार के कैमूर जिले का मुंडेश्वरी देवी का माना जाता है जो 105 ई का बना हुआ बताया जाता है। मुंडेश्वरी मंदिर में कहा जाता है कि तब से लगातार नियमित पूजन हो रहा है। हालांकि लडखान मंदिर में नियमित पूजा पाठ नहीं होता। 

पर अगर शिव मंदिरों में बात करें तो यह देश का सबसे पुराना मंदिर है। चालुक्य शासन में इस मंदिर का इस्तेमाल शाही आयोजन और विवाह समारोह आदि के लिए होता था। मंदिर में एक ही प्रवेश द्वार है। यह दूर से किसी आवास के सदृश्य ही नजर आता है। इसकी छत सीढ़ीदार बनाई गई है जिससे बारिश में पानी नहीं ठहर सके। यह दूर से किसी लकड़ी के घर होने का एहसास कराता है, पर पत्थरों की बनी हुई शानदार कलाकृति है। यह तो ईश्वर का अपना आवास है।

मंदिर में कुल 16 स्तंभ -  एहोल का लडखान मंदिर बाहर से बहुत सादगी भरा नजर आता है। इसमें कुल 16 स्तंभ हैं जिसके सहारे मंदिर की छत खड़ी है। मंदिर के पीछे की दीवार से सटे कमरे को गर्भ गृह का रूप दिया गया है। कहा जाता है कि यह प्रारंभिक तौर पर सूर्य देव का मंदिर था। पर बाद में यह शिवालय के रुप में परिणत हो गया। यह मंदिर पंचायत शैली में बना हुआ है। यह दो मंजिला है। इसकी ऊपरी मंजिल पर छोटा सा सुंदर मंडप बना हुआ है। इस मंडप पर भी देव प्रतिमा उकेरी गई है। मंदिर के हॉल में बीच में नंदी की छोटी सी प्रतिमा है। सभी मंदिरों की तरह नंदी का मुख मंदिर के गर्भ गृह की ओर है। गर्भगृह में काले रंग का शिवलिंगम स्थापित किया गया है।
छत पर जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ियां बनी हुई हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर सुंदर नक्काशी किए हुए देवी देवताओं के चित्र देखे जा सकते हैं। मंदिर की बाहरी बालकोनी पर कुछ मर्तबान (घड़े) के चित्र और नदियों की देवी गंगा का चित्र देखा जा सकता है। दूसरी तरफ प्रेम में आबद्ध एक युगल का सुंदर चित्र बना हुआ है। मंदिर की दीवारों पर चालुक्य राजाओं का प्रतीक चिन्ह भी अंकित किया गया है।

मंदिर के सभी 16 स्तंभों पर भी अदभुत नक्काशी देखी जा सकती है। इनमें राजसी वैभव के प्रतीक दिखाई देते हैं। एक छतरी, दो मशालें नीचे बैठे दो व्यक्ति स्तंभों की नक्काशी को अतीव सुंदर बनाते हैं। एक स्तंभ पर गाय और उसके साथ बाल गोपाल का चित्र नजर आता है। मंदिर में अलग अलग जगह के झरोखों से धूप आने का इंतजाम है। प्रदक्षिणा पथ में इन झरोखों का निर्माण इसलिए किया गया है कि श्रद्धालुओं को बाहर से स्वच्छ हवा मिलती रहे। 

इन झरोखों में भी जालीदार नक्काशी दिखाई देती है। मंदिर की छतों पर भी फूलों की सुंदर नक्काशियां दिखाई देती हैं। एहोल मंदिर समूह का यह पहला मंदिर लगता है अंदर की ओर से काफी मनोयोग से निर्मित किया गया था। कुछ मामलों यह बादामी के गुफा मंदिरों से साम्य रखता है। दूर से देखने पर लडखान मंदिर किसी अनगढ़ संरचना सा नजर आता है, पर करीब से देखने पर यह काफी सुंदर है।

क्यों पड़ा लाड़खान मंदिर नाम -  एहोल के मंदिर समूह में लाडखान मंदिर दुर्ग मंदिर के दक्षिण में स्थित है। इसका नाम लाडखान क्यों पड़ा इसको लेकर भी एक कहानी है। दरअसल इस मंदिर में बाद में गांव का लाडखान का परिवार रहने लगा था, इसलिए लोग इसे लडखान मंदिर के नाम से पुकारने लगे। लाडखान एक मुस्लिम राजकुमार था, जिसने इस मंदिर में थोड़े समय के लिए अपना निवास बनाया था। बाद लोग मंदिर को उसी के नाम से पुकारने लगे।
- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
( LADAKHAN TEMPLE, AHOLE, OLDEST SHIVA TEMPLE,  KARNATKA, CHALUKYA KINGS )


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