Tuesday, May 30, 2017

बादामी का किला ... पहाड़ पर शिवालय

बादामी बाजार में स्थित हनुमान मंदिर। 
सुबह बादामी की सड़कों पर टहलते हुए सब्जी बाजार की गलियों में प्रवेश कर जाता हूं। यही रास्ता है बादामी फोर्ट की ओर जाने का। सुबह सुबह चाय की दुकानें खुल गई हैं। गांव में चौपाल सा नजारा है। यहां एक हनुमान जी का मंदिर दिखाई देता है। यह भी ऐतिहासिक मंदिर है, गांव के बीच में होने के कारण यहां नियमित पूजा होती है। मंदिर लाल पत्थरों से बना है। सुबह सुबह पुजारी जी विशाल हनुमान प्रतिमा को रगड़ रगड़ कर साफ कर रहे थे।

थोड़ा वक्त इस मंदिर में गुजारने के बाद आगे बढ़ जाता हूं। बच्चे स्कूल जाने की तैयारी कर रहे हैं। रास्ते में कुछ पुराने घर दिखाई देते हैं। चलते चलते पहुंच गया हूं पहाड़ की तलहटी में। यहां बादामी का संग्रहालय है। संग्रहालय सुबह 8 बजे खुलता है। संग्रहालय से पहले विशाल प्रवेश द्वार बना हुआ है। म्युजियम की स्थापना सन 1976 में की गई। संग्रहालय में बाहर आपको नंदी और नटराज के सुंदर शिल्प दिखाई देते हैं। कुछ टूटी हुई जैन शिल्पाकृतियों को संग्रहालय में जमा किया गया है। गैलरी में कई शिल्पाकृतियों को संजोया गया है। इस संग्रहालय में बादामी के आसपास से प्राप्त मूर्तियों को लाकर संग्रहित किया गया है। संग्रहालय भी दूर से पहाड़ों की गुफा जैसा ही प्रतीत होता है।

संग्रहालय से थोड़ा आगे चलने पर एक प्रचीन मंदिर दिखाई देता है। इसके बगल से कप्पे आरभट शिला शासन जाने का रास्ता है। इस शिलालेख में तत्कालीन कन्नड़ जीवन के बारे में लिखा गया है। सातवीं सदी के इस शिलालेख में लिखा गया है कि कन्नड़ लोग न किसी का अपमान करते थे न ही अपमान सहते थे। यहां सरोवर किनारे आठवीं सदी का बना एक सुंदर लघु देवालय भी नजर आता है।

संग्रहालय के एक तरफ से बादामी के किला की ओर जाने का रास्ता है। यह रास्ता संकरा सा है। साल 2012 में आई फिल्म राउडी राठौर जिसमें सोनाक्षी सिन्हा और अक्षय कुमार थे, उसकी फिल्म बादामी के इस हिस्से के आसपास हुई थी।

बादामी की गुफा के ठीक सामने संग्रहालय के ऊपर चालुक्यों का राजमहल था। महल का अस्तित्व ज्यादा दिखाई नहीं देता, पर किलेबंदी समझ में आती है। यहां हाथी का निवास स्थान और घुड़शाला बनी हुई है। इसके साथ ही ध्वज स्तंभ भी दिखाई देता है। उत्तरी पर्वतमाला पर जाने का रास्ता पैदल आधे घंटे का है। पर्वत पर पहुंचने पर आपको दो शिव मंदिर दिखाई देते हैं। एक को लोअर शिवालय तो दूसरे को अपर शिवालय नाम दिया गया है।

यहां 18वीं सदी के कुछ खंडहर देखे जा सकते हैं जिसे टीपू सुल्तान का कोषागार कहा जाता है। पर्वत शिखर पर वातापी गणपति का एक मंदिर हुआ करता था। पर अब वहां गणपति की प्रतिमा नहीं है। पर दक्षिण में कविताओं मे वातापी गणपति की महिमा गाई जाती है। यहां पर कभी 16वीं सदी के महान वैष्णव संत प्रसन्न वदन वेंकटदास का निवास हुआ करता था। वे यहां ध्यान करने के साथ भजन गाया करते थे।

अगर आपके पास समय हो तो बादामी में पदयात्रा करके इतिहास से रुबरु होने की प्रयाप्त संभावनाएं है। यहां थोड़ा वक्त गुजारकर आप चालुक्य राजाओं की समृद्ध विरासत को महसूस कर सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

(BADAMI FORT, CHALUKYA KING, RAUDI RATHORE ) 

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बादामी का संग्रहालय। 

( अगली कड़ी में पढ़िए -- बादामी से हंपी की ओर.... ) 

Sunday, May 28, 2017

मनमोहक अगस्त्य तीर्थ और भूतनाथ मंदिर बादामी

बादामी की गुफाओं को देखते हुए जब आप सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊंचाई पर पहुंचते हैं तो आपको नीचे पूरा शहर दिखाई देता है। साथ ही दिखाई देता है विशाल सरोवर। इस सरोवर का नाम है अगस्त्य तीर्थ। सरोवर का दायरा एक किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में है। दरअसल बादामी के ज्यादातर दर्शनीय स्थल इसी अगस्त्य तीर्थ सरोवर के चारों तरफ निर्मित किए गए हैं। एक कोने पर गुफा मंदिर है तो दूसरे कोने पर भूतनाथ मंदिर दिखाई देता है।

अगस्त्य तीर्थ सरोवर की कथा अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। कभी यहां वातापि और इल्वाल नामक राक्षस रहते थे। दोनों अपने भोजन के लिए मेहमानों को यहां बुलाते थे। इल्वाल वातापि के शरीर का भोजन बनाकर मेहमानों को खिला देता था। मेहमान के भोजन कर लेने के बाद वह आवाज लगाता था वातापि बाहर निकलो। इसके बाद वातापि जिंदा होकर मेहमान का पेट फाड़कर बाहर आ जाता था। इस तरह मेहमान की मौत हो जाती थी। एक बार अगस्त्य मुनि को उन्होने भोज पर आमंत्रित किया। पर अगस्त्य मुनि के भोजन कर लेने के बाद आवाज देने पर भी वातापि बाहर नहीं निकल सका। इस तरह वातापि मृत्यु को प्राप्त हो गया। उनके नाम पर इस विशाल सरोवर का नाम अगस्त्य तीर्थ पड़ा है।

इस विशाल सरोवर में हमेशा लबालब पानी भरा रहता था। पर 2001 से 2005 तक कम बारिश के कारण पानी नहीं था। अब इसमें हमेशा पानी रहता है। सैलानियों के लिए सरोवर में नौका विहार का भी इंतजाम है। सरोवर के एक तरफ आप अनुमति प्राप्त करके पहाड़ों पर ट्रैकिंग के लिए भी जा सकते हैं। यहां सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों का रमणीक नजारा दिखाई देता है।  

बादामी की सुबह मैं अपने होटल से अकेला टहलने निकल पड़ा हूं। रास्ता पूछते हुए अगस्त्य सरोवर तक पहुंच गया हूं। मेरी मंजिल है भूतनाथ मंदिर। सरोवर के उत्तरी कोने पर भूतनाथ मंदिर स्थित है। वैसे मंदिर सुबह 8 बजे खुलता है। इस देवालय में विशाल मुख्य मंडप, सभा मंडप, अंतराल और गर्भगृह बने हैं। कहा जाता है कि मांडव्य मुनि की अभिलाषा पर शिव ने यहां भूतनाथ के रुप में रहना स्वीकार किया था।
यहां हुई अभिषेक और ऐश्वर्या की शादी 
भूतनाथ मंदिर के एक तरफ विशाल सरोवर तो दूसरी तरफ पहाड़ी की पृष्ठभूमि है। इनके बीच मंदिर का परिदृश्य बड़ा ही मोहक बन पड़ता है। इस नजारे पर नजर पड़ी दक्षिण के फिल्मकार मणिरत्नम की। उनकी 2007 में आई फिल्म गुरू के दृश्य बादामी में ही फिल्माए गए हैं। अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्य राय की यह फिल्म तमिल, तेलुगू और हिंदी में बनी थी। इस फिल्म का गीत...कोसा है बारिश का कोसा है... बादामी में फिल्माया गया। बादामी के स्थानीय लोग बताते हैं कि फिल्म में अभि और ऐश्वर्य के विवाह वाले प्रसंग की पूरी शूटिंग भूतनाथ मंदिर के परिसर में हुई थी। खैर यह तो फिल्मी शादी थी पर वास्तविक जिंदगी में भी दोनो पति पत्नी बने। 

भूतनाथ मंदिर में एएसआई की ओर तैनात चौकीदार मुझे सुबह सुबह मंदिर को दिखाने में पूरी मदद करते हैं। मंदिर के आसपास सरोवर में सीढ़ियां बनी हुई हैं। मार्च महीने में पानी का स्तर थोड़ा कम है। पर कहते हैं कि बारिश के दिनों में बादामी के भूतनाथ मंदिर के आसपास का सौंदर्य काफी बढ़ जाता है। तो कभी बारिश के दिनों में आइए ना बादामी...
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(BHOOTNATH MANDIR, BADAMI, GURU MOVIE ) 
बादामी का भूतनाथ मंदिर (करीब से) 



Saturday, May 27, 2017

कर्नाटक में अंजता एलोरा- बादामी की गुफाएं

अगर आपने अजंता एलोरा की यात्रा की है तो कुछ इसी तरह की गुफाएं कर्नाटक के बादामी में देख सकते हैं। बादामी की गुफाएं शैव, वैष्णव और जैन मतों की प्रतिमाओं को प्रदर्शित करती हैं। इन सबको एक ही परिसर में देखा जा सकता है। अजंता की तरह यहां भी विशाल पहाड़ को काट कर गुफाओं का निर्माण किया गया है।

पट्टडकल, एहोल, महाकूटा, बनशंकरी घूमने के बाद हमलोग पहुंच गए हैं बादामी शहर में। आटो वाले हमें लेकर पहुंचे हैं बादामी की गुफाओं के पास। वे पार्किंग में आटो लगा देते हैं। हमलोग स्मारक देखने के लिए टिकट खरीदते हैं।
बादामी में पहाड़ों को काट कर कुल चार गुफाएं बनाई गई हैं। इन गुफाओं से होकर सीढ़ियां चढ़ने पर अगस्त्य सरोवर का सुंदर नजारा दिखाई देता है।


गुफा तक तक जाने के लिए कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। बादामी तक आने वाले सैलानियों को बलुआ पत्थर से बने इन गुफा मंदिरों अवश्य देखने पहुंचना चाहिए। ये मंदिर अपनी सुंदर नक्काशियों के लिए जाने जाते हैं। इन नक्काशियों में पौराणिक तथा धार्मिक घटनाएं का सुंदर चित्रण देखा जा सकता है।

भगवान शिव को समर्पित है पहली गुफा - 
पहली गुफा भगवान शिव को समर्पित है। यह 550ई में निर्मित है। बादामी की पहली गुफा मंदिर सबसे प्राचीन है। इस मंदिर में भगवान शिव के अर्धनारीश्वर और हरिहर अवतार की नक्काशियां देखी जा सकती हैं। साथ ही साथ भगवान शिव का तांडव नृत्य करते हुए नटराज का अवतार देखा जा सकता है। एक ओर भगवान शिव का हरिहर अवतार देखा जा सकता है तो बाईं ओर भगवान विष्णु का अवतार देखा जा सकता है। प्रवेश द्वार पर द्वारपाल की सुंदर आकृति बनी है। वहीं नंदी पर सवारी करते शिव को देखा जा सकता है। पहली गुफा में महिषासुर मर्दिनी तथा गणपतिशिवलिंगम और शन्मुख की मूर्तियां भी देख सकते हैं। महिषासुर मर्दिनी को आठ हाथ दिखाए गए हैं। गुफा में गर्भ गृह में शिवलिंगम स्थापित है। गुफा की बनावट ऐसी है कि यहां तक प्राकृतिक रोशनी पहुंचती रहती है। तकरीबन 1500 साल बाद भी इसका सौंदर्य मोहित करता है। पर चलिए आगे भी चलना है।

विष्णु को समर्पित है दूसरी गुफा
कोई 50 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़कर हम आ पहुंचे हैं गुफा नंबर दो में। यह छठी शताब्दी का बना हुआ है। शांत मुद्रा में खड़े दो द्वारपाल आपका यहां पर स्वागत करते हैं।
गुफा मंदिर नंबर दो भगवान विष्णु को समर्पित है। यहां दायीं ओर वामन तथा त्रिविक्रम अवतार को देखा जा सकता है। दायीं ओर नजर डालेंगे तो वराह और गण की प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। इस मंदिर की छत पर पुराणों के दृश्य दिखाए गए हैं जिनमें भगवान विष्णु का गरुड़ अवतार दिखाया गया है। यहां कृष्ण लीला का भी सुंदर चित्रण है।

गुफा नंबर तीन में भी विष्णु

इस गुफा का निर्माण चालुक्य राजा मंगलेश ने अपने सौतेले भाई कीर्तिवर्मन प्रथम के शासन काल में कराया। इसमें बाकी गुफाओं की तरह एक खुला बरामदा, स्तंभ वाला सभा मंडप बना हुआ है। यहां एक अभिलेख भी उत्कीर्ण कराया गया है जिसमें गुफा के निर्माण संबंधी जानकारी दी गई है। सौ फीट गहरे गुफा मंदिर संख्या तीन में भगवान विष्णु त्रिविक्रम और नरसिंह के अवतार दिखाए गए हैं। इसके अलावा पर्यटक यहां के भित्ति चित्रों में भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह समारोह के सुंदर नजारे भी देख सकते हैं। बरामदे के सामने वाले स्तंभ पर यहां मिथुन युग्म देखे जा सकते हैं। इंद्र, वरुण, ब्रह्मा, यम, काम रति की प्रतिमाएं भी देखी जा सकती हैं।

जैन धर्म की समर्पित है गुफा नंबर चार

कोई 150 सीढ़ियां चढ़कर सबसे ऊपर पहुंचने पर आप जैन गुफा में पहुंच जाते हैं। गुफा मंदिर 4 जैन धर्म को समर्पित है। इसका निर्माण सातवीं सदी में हुआ। जहां भगवान महावीर का बैठी अवस्था में एक चित्र है तथा साथ ही साथ तीर्थंकर पार्श्वनाथ का चित्र भी हैं। मंडप में कई और तीर्थंकरों की छोटी और बड़ी प्रतिमाएं बनाई गई हैं। यहां गुफा के निर्माण करने वाले कोलीमांची नामक शिल्पी का नाम भी उत्कीर्ण है। 

हालांकि इस गुफा का प्रवेश द्वार पूरब की तरफ से था। गुफा नंबर 3 और 4 के बीच एक दीवार हुआ करती थी। पर अब एक क्रम से सभी गुफाओं तक पहुंजा जा सकता है।
सबसे ऊपर की गुफा पर पहुंचने के बाद यहां से आप बादामी शहर का नयनाभिराम नजारा देख सकते हैं। यहां आप कुछ घंटे बैठकर शहर के सौंदर्य को निहार सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-        (BADAMI CAVE, SHIVA, JAIN, VISHNU TEMPLE )

  
बादामी के गुफा नंबर चार में जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां। 

Thursday, May 25, 2017

आदिशक्ति बनशंकरी देवी का मंदिर बादामी

बादामी शहर से पांच किलोमीटर बाहर बनशंकरी मंदिर स्थित है। आखिर कौन हैं बनशंकरी। वे देवी पार्वती का अवतार मानी जाती हैं, जो चालुक्य राजाओं की कुलदेवी थी। तिलकारण्य जंगलों में स्थित इस मंदिर का नाम दो शब्दों वन और शंकर से मिलकर बना है। पहले शब्द का अर्थ है जंगल तो दूसरे शब्द का अर्थ है भगवान शिव जो देवी पार्वती के पति हैं। मतलब हुआ वन में विराजने वाली देवी शंकरी यानी पार्वती।

शाकंभरी देवी - पर मंदिर में इन्हें शाकंभरी देवी भी लिखा गया है। देश में शाकंभरी देवी का मंदिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में बना हुआ है। बनशंकरी भी दक्षिण की शाकंभरी देवी हैं। एक अन्य कथा के अनुसार बादुब्बे नामक लोकदेवी बाद में बनशंकरी कहलाईं। यह भी तर्क दिया जाता है कि बादुब्बे निलयम की बदलकर बादामी हो गया।

काले पत्थर से निर्मित मूर्ति -  मंदिर में स्थित बनशंकरी देवी की मूर्ति काले पत्थर से निर्मित की गई है। देवी सिंह पर सवार हैं और इनके पैरों के नीचे राक्षस को दिखाया गया है। देवी के आठ हाथों में त्रिशूल, घंटा, कमलपत्र, डमरू, खडग खेता और वेद दिखाए गए हैं।

सातवीं सदी का मंदिर - बनशंकरी मंदिर का निर्माण सातवीं शताब्दी में कल्याणी के चालुक्य राजाओं ने कराया था। यह भी संदर्भ आता है कि वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण मराठा वंश के एक सरदार परशुराम आगले ने सत्रहवीं सदी में कराया। मंदिर वास्तुकला के लिहाज से द्रविड़ शैली को दर्शाता है। यह मंदिर भी भारतीय पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित किया गया है।

विशाल सरोवर हरिदा तीर्थ - मंदिर के सामने विशाल सरोवर है। इसका नाम हरिश्चंद्र तीर्थ है जिसे अब लोग हरिदा तीर्थ कहते हैं। सरोवर के चारों तरफ घाट बने हुए हैं। हालांकि इसमें सालों भर पानी नहीं रहता। सरोवर के प्रवेश द्वार पर एक विशाल तीन मंजिला बुर्ज बना हुआ है। विशाल सरोवर चारों तरफ नारियल पेड़ के खूबसूरत जंगलों से घिरा हुआ है।  



शाकंभरी प्रसाद -  मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लिखा है श्री शाकंभरी प्रसाद। प्रवेश द्वार के अंदर विशाल प्रांगण बना हुआ है। मंदिर के गर्भ गृह में श्रद्धालुओं के जाने के लिए मार्ग निर्धारित किया गया है। यह कर्नाटक के उन मंदिरों में शामिल है जहां हर रोज भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर ट्रस्ट की ओर से यहां प्रसाद काउंटर बना हुआ है। दान और विभिन्न संस्कार कराने का भी इंतजाम है।

स्कंद पुराण और पदम पुराण की कथाओं के अनुसार इस मंदिर की देवी बनशंकरी ने दुर्गमासुर नामक राक्षस का वध किया था। स्कंद पुराण की कथा के मुताबिक राक्षण दुर्गम ने वेदों को अपने कब्जे में कर लिया था। ऋषि मुनियों ने मां शाकंभरी से आग्रह किया। तब देवी शाकंभरी ने एक बड़े युद्ध में दुर्गम को पराजित कर उसका वध किया और वेद ग्रंथों की रक्षा कर उन्हें ऋषिओं को सौंपा। देवी ने एक बार अकाल पड़ने पर शाक, धान्य और आयुर्वेदिक पादपों का सृजन मानव कल्याण के लिए किया था इसलिए उन्हें शाकंभरी कहा गया। वे आदि शक्ति हैं।
बनशंकरी मंदिर के सामने स्थित सरोवर में पानी नहीं है.....

पौष माह में रथयात्रा -  अगर आप जनवरी और फरवरी के महीनों में इस मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं तो यहां विशाल मेला देखने को मिलेगा। स्थानीय लोग पौष के महीने में यहां उत्सव का आयोजन करते हैं। मंदिर में बनशंकरी रथयात्रा या बनशंकरी जात्रा का आयोजन होता है। मंदिर के बाहर बने विशाल रथ पर माता की यात्रा निकाली जाती है। मोटे मोटे रस्से से इस विशाल रथ को खींचा जा जाता है। आसपास से हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस यात्रा में हिस्सा लेने के लिए आते हैं।

माता बनशंकरी का रथ। 
कैसे पहुंचे – बनशंकरी देवी का मंदिर बादामी बस स्टैंड से पांच किलोमीटर की दूरी पर चोलाचीगुड गांव में स्थित है। बादामी रेलवे स्टेशन से दूरी 10 किलोमीटर होगी। बादामी से आपको आटो जैसे साधन यहां पहुंचने के लिए मिल जाएंगे। मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार है। यहां आपको प्रसाद की दुकानें और खाने पीने के स्टाल मिल जाएंगे।
बनशंकरी मंदिर के बाहर दुकानें।

हमलोग अपनी पट्टडकल, एहोल, महाकूटाकी यात्रा के बाद आखिरी पड़ाव से पहले बनशंकरी देवी के दरबार में पहुंचे हैं। दोपहर का समय है, लेकिन मंदिर में श्रद्धालुओं की अच्छी खासी भीड़ है। हमलोग दर्शन के लिए पंक्ति में लग जाते हैं। दर्शन के बाद मंदिर के काउंटर से लड्डू प्रसाद खरीदते हैं। तिरुपति जैसे विशाल आकार के लड्डू यहां भी मिलते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( BANSHANKARI TEMPLE, BADAMI, SHIVA, PARVATI, SKAND PURAN )

Wednesday, May 24, 2017

कर्नाटक की काशी – महाकूटा शिव देवालय

महाकूटा देवालय का प्रवेश द्वार।
कर्नाटक के महाकूटा मंदिर को दक्षिण की काशी भी कहा जाता है। यहां शिव का प्रसिद्ध मंदिर है। प्रतिदिन यहां आसपास से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। लोगों में महाकूटा शिव मंदिर को लेकर अगाध श्रद्धा का भाव है। महाकूटा का शिव देवालय अपने सुंदर शिल्प के लिए प्रसिद्ध है। नागर शैली में बना यह शिव मंदिर अपने अष्टभुजाकृति और सुंदर गुंबद के लिए भी प्रसिद्ध है।

महाकूटा बादामी के पास के एक छोटा सा गांव है। यह अत्यंत सुरम्य पहाड़ियों के बीच में बसा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार अगस्त्य मुनि ने दो असुर भाइयों वातापि और इल्वाल का यहीं पर संहार किया था। कहा जाता है कि मृत्यु के उपरांत दोनों असुर दो पहाड़ बन गए। महाकूटा मंदिर परिसर के बाहर कुछ दुकानें बनाई गई हैं। यहां मंदिर ट्रस्ट का दफ्तर भी है। मंदिर में प्रवेश के लिए एक विशाल द्वार का निर्माण किया गया है।




देवालय के अंदर, अर्ध मंडप, मुख मंडप और गर्भगृह बना हुआ  है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनो तफ द्वारपाल की मूर्तियां बनी हैं। मंदिर परिसर में कई और मूर्तियां दिखाई देती हैं। यहां सालों भर नियमित उपासना होती है। हर रोज यहां हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। महाकूटा मंदिर समूह का निर्माण बादामी चालुक्य राजाओं द्वारा छठी-सातवीं सदी में कराया गया। महाकूटा मंदिरों की संरचना एहोल से मिलती जुलती है। 


विष्णु पुष्करिणी -  महाकूटा मंदिर परिसर में एक विशाल सरोवर भी है। इसका नाम विष्णु पुष्करिणी है। इस सरोवर में पहाड़ों से निर्मल जल सालों भर आता रहता है। इसके निर्मल जल में श्रद्धालु स्नान करते हैं। कई लोग स्नान के बाद मंदिर में पूजन के लिए जाते हैं। दोपहर की गर्मी के बीच काफी लोग मंदिर के इस सरोवर के शीतल जल में स्नान करते दिखाई देते हैं।

मंदिर परिसर में एक कुआं भी है जिसे लोग पाप विनाशन तीर्थ कहते हैं। विष्णु पुष्करिणी के पास ही एक अनूठा शिवलिंगम है जिसमें पांच अलग आकृतियां बनी हुई हैं। इसे पंचलिंगम कहते हैं।


पत्र लिखकर आशीर्वाद भेजा जाता है - महाकूटा मंदिर में एक अनूठी परंपरा नजर आती है। मंदिर के कार्यालय में हजारों की संख्या में पत्र लिखे हुए दिखाई देते हैं। इन पत्रों पर कर्नाटक के अलग अगल जिलों के श्रद्धालुओं के पते लिखे हुए हैं। दरअसल ये सभी पत्र मंदिर में दान करने वाले श्रद्धालुओं के परिवार को सालों भर भेजे जाते हैं। इन पत्रों पर श्रद्धालुओं के लिए महाकुंटेश्वर महादेव का आशीर्वाद भेजा जाता है।   

महाकूटा शिलालेख - महाकूटा में एक शिलालेख भी है। यह 595 से 602 ई के बीच का है। इस स्तंभ पर संस्कृत और कन्नड़ में लिखा गया है। इस शिलालेख में चालुक्य राजा पुलकेशिन प्रथम की पत्नी दुर्लभदेवी द्वारा दान दिए जाने का उल्लेख है। इसमें पट्टडकल, एहोल समेत दस गांवों को दान दिए जाने का उल्लेख है। यह शिलालेख अब बीजापुर संग्राहलय में देखा जा सकता है।


यहां एक और शिलालेख है जो वीनापोति द्वारा लिखवाया गया है। यह चालुक्य राजा विजयादित्य की एक रानी थी। कन्नड़ में लिखा यह शिलालेख 693-733 ई के बीच का है। इस शिलालेख में रानी द्वारा महाकूटा मंदिर को दान दिए जाने का उल्लेख है।

कैसे पहुंचे – बादामी बाजार से महाकूटा मंदिर की दूरी 14 किलोमीटर है। पर यहां जाने के लिए आमतौर पर आपको निजी वाहन का सहारा लेना होगा। यह पट्टडकल मार्ग से थोड़ा सा अलग रास्ते पर है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
(MAHAKUTA SHIV TEMPLE, BADAMI ) 




Tuesday, May 23, 2017

एहोल में रावणपहाड़ी गुफा मंदिर और दस हाथ वाले शिव की तांडव मूर्ति

हमारा अगला पड़ाव है रावणफडि। यह एक गुफा मंदिर समूह है। यह एहोल के सभी स्मारकों में सबसे पुराना माना जाता है। हालांकि यह बादामी के गुफा मंदिरों से छोटा है। यह गुफा मंदिर सातवीं शताब्दी का बना हुआ है। पहाड़ों पर गुफाओं तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। पर ये सीढ़ियां बेहतर हाल में नहीं हैं।


इस मंदिर के बाहर चार खंभे दिखाई देते हैं। यहां शंखनिधि और पद्मनिधि स्तंभ दिखाई देते हैं। मंदिर में एक बरामदानुमा हॉल और आयताकार देवस्थान बना हुआ है। देव स्थान में विशाल शिवलिंगम और बाहर नंदी की प्रतिमा बनी हुई है। सभा मंडप के बरामदे में कई मूर्तियां बनी हुई हैं। इसमें हरिहर, गरुड पर सवार विष्णु और इंद्र की मूर्तियां प्रमुख हैं।


विक्रमादित्य प्रथम के शासनकाल में निर्माण-  ये गुफा मंदिर ऐलोरा की याद दिलाते हैं। इनका निर्माण काल भी ऐलोरा की गुफाओं के आसपास का ही प्रतीत होता है।  मूर्तियों का कला शिल्प आपको चमत्कृत करता है। इनका निर्माण काल चालुक्य शासक विक्रमादित्य प्रथम ( 655 -681 ) के समय का माना जाता है। उसने दुबारा चालुक्य शासन स्थापित होने पर परम महेश्वर की इस गुफा का निर्माण कराया। 

दस हाथों वाले तांडव करते शिव - सभा मंडप की कई मूर्तियों के बीच दीवार पर ऊंचे दस हाथों वाले शिव तांडव करते दिखाई देते हैं। शिव की ऐसी तांडव मूर्ति दुर्लभ है। उनके साथ पार्वती भी हैं। साथ में गणेश और कार्तिकेय भी नृत्य की मुद्रा में दिखाई देते हैं। उस महान सृजन शिल्पी को नमन करने का मन करता है जिसने बड़े मनोयोग से ये प्रतिमा बनाई होगी। एक अन्य कलाकृति में सप्तमातृकाएं शिव तांडव देखती हुई दिखाई गई हैं।



रावणफडि नाम से ऐसा लगता है कि कहीं यह वास्तव में रावण पहाड़ी तो नहीं है। इस गुफा मंदिर समूह में एक सुंदर सरोवर भी बना हुआ है। इसमें पानी मौजूद है, पर सरोवर की साफ सफाई नहीं की जाती है। कदाचित बारिश के दिनों में यहां बेहतरीन नजारा दिखाई देता होगा।


कई घंटे एहोल के प्रेम में आबद्ध रहने के बाद हमलोग अब मंदिर के इस विशाल ग्राम से निकल चुके हैं। रास्ते में गांव में फिर से कुछ देवालय दिखाई देते हैं जिसके आसपास बिल्कुल सट कर लोगों ने घर बना रखे हैं। अगर कर्नाटक सरकार चाहे तो एहोल का सौंदर्यीकरण और बेहतर ढंग से कर सकती है। गांव के इन घरों को मंदिर से थोड़ा दूर करके एहोल के बाकी मंदिरों को भी दर्शनीय बनाया जा सकता है।
एहोल गांव में मंदिर - कई मंदिरों का रखरखाव बिल्कुल नहीं होता...
एहोल को पार करके हमलोग हरे भरे सड़क पर हैं। सड़क पर बहुत कम ही वाहनों की आवाजाही दिखाई दे रही है। हालांकि कर्नाटक सरकार की ओर बेहतर सड़क का निर्माण कार्य जारी है। मलप्रभा नदी पर बने पुल को पार करके हम चल पड़े हैं दक्षिण के काशी की ओर। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( AHOLE, RAVNAPHADI CAVES, SHIVA TEMPLE ) 

Monday, May 22, 2017

एहोल का खजुराहो है हुच्चमल्ली देवालय समूह





अदभुत अनूठे हुच्चमल्ली देवालय समूह की ओर  - एहोल के मुख्य मंदिर परिसर से निकलने के बाद हमलोग अगले मंदिर की ओर चलने वाले हैं। पर हमलोग मंदिर देखते देखते थक गए है। गरमी के मौसम में तो थोड़ी तरावट की भी जरूरत है। तो गन्ने का जूस बेहतर हो सकता है। हम तीनों ही गन्ने का जूस पीते हैं। मैं दही तो पहले ही पी चुका हूं। 

अब हमलोग तकरीबन एक फर्लांग आगे चलकर पहुंचे हैं हुच्चमल्ली देवालय समूह में। यह भी पत्थरों से निर्मित अनुपम अनुकृति है। हुच्चमल्ली एक शिव मंदिर समूह है। इसके गर्भ गृह और दरवाजों पर कई सुंदर कलाकृतियों का निर्माण दिखाई देता है। इसे 11वीं सदी में कल्याणी चालुक्य राजाओं द्वारा निर्मित बताया जाता है।


इस मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार लकड़ी का बना हुआ है। इसके मूल द्वार पर भी काफी सुंदर चित्रण किया गया है। मंदिर का गर्भ गृह साढ़े आठ फीट चौड़ा और करीब इतना ही ऊंचा बना हुआ है। इसके मध्य में शिवलिंगम स्थापित है। मंदिर के गर्भ गृह के ऊपर लहरदार शिखर है। इसमें शिव तांडव मुद्रा में दिखाई देते हैं।







इस मंदिर में मुख्यमंडप, रंग मंडप और गर्भ गृह देखा जा सकता है। इस मंदिर को उत्तम शिल्प विन्यास के लिए जाना जाता है। इसमें प्रेम मग्न मिथुन के अलावा, हाथी और गंगा यमुना आदि की आकृतियां बनाई गई हैं। गर्भ गृह के ऊपर रेखानगर शिखर है जिस पर ब्रह्मा और और सूर्य की मूर्तियां बनाई गई हैं।



प्रेम मग्न मिथुन मूर्तियां -  इस मंदिर के सभा मंडप में इंद्र, यम, कुबेर आदि के चित्र बनाए गए हैं। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस मंदिर में कुछ प्रेम मग्न मिथुन मूर्तियां भी बनाई गई हैं, बिल्कुल खजुराहो की तरह। यहां शिल्पकारों की अदभुत कल्पनाशीलता नजर आती है।



पर यह अति सुंदर मंदिर एहोल में भी एक कोने में उपेक्षित प्राय दिखाई देता है। देवालय के परिसर  में एक छोटा सा तालाब भी है। इस तालाब की दीवारों पर भी देव प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। इसके साथ ही पंचतंत्र की कथाओं से संबंधित चित्र भी यहां दिखाई देते हैं। हुच्चीमल्ली मंदिर समूह में एक छोटा सा मंदिर भी है, पर अब वह नष्ट प्राय हो गया है।

हुच्चीमल्ली देवालय के पास ही एक पोखर भी  है। पोखर की दीवारों पर भी अनुपम कलाकृतियों का निर्माण किया गया है। पोखर के पास आप दिक्पाल, महिषासुर मर्दिनी, ब्रह्मा, विष्णु, लक्ष्मी, कार्तिकेय की प्रतिमाएं देख सकते हैं। यहां पर पंचतंत्र के कुछ कथानकों का भी चित्रण किया गया है। किरातअर्जुन प्रकरम के मनोरम चित्र भी यहां देखे जा सकते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( AHOLE, SHIVA TEMPLE, HUCHCHIMALI TEMPLE COMPLEX )