Wednesday, March 29, 2017

झांसी रेलवे स्टेशन पर तीन साहित्यकार

जौरा (मुरैना) से शाम को निकल पड़ा हूं, खजुराहो के लिए। मुरैना तक बस से पहुंचा। मुरैना बस स्टैंड के पास दही बड़े खाए। मुरैना के दही बड़े बड़े सुस्वादु थे। यहीं से ग्वालियर की बस मिल गई। बस ने ग्वालियर रेलवे स्टेशन से थोड़ा पहले उतार दिया। टहलते हुए स्टेशन पहुंचा। झांसी के लिए कोई ट्रेन आधे घंटे  आने वाली थी। हमने टिकट तो खजुराहो तक का डाइरेक्ट ही ले लिया। इस ट्रेन के जनरल डिब्बे में काफी भीड़ थी। इसी भीड़ में ट्रेन झांसी से पहले आधे घंटे बियाबां में रुक भी गई। फरवरी का सर्द महीना था इसलिए भीड़ बर्दाश्त कर लिया। देर रात झांसी में ट्रेन ने उतार दिया। झांसी बुंदेलखंड का ऐतिहासिक शहर। इस रेलवे स्टेशन का अंगरेजी कोड JHS है।
मध्य रात्रि में झांसी रेलवे स्टेशन पर हूं। हालांकि झांसी से होकर अनगिनत बार गुजरा हूं पर उतरने का मौका दूसरी बार मिला है। पिछली ओरछा यात्रा में झांसी से उतर कर आगे के सफर पर गया था। इस बार खजुराहो के लिए अगली ट्रेन दो घंटे बाद है। तो यहां कुछ घंटे इंतजार करना है। झांसी दिल्ली-मुंबई और दिल्ली चेन्नई लाइन का प्रमुख स्टेशन है। यहां आजकल कुल सात प्लेटफार्म हैं। झांसी से ग्वालियर, बीना, इलाहाबाद और कानपुर के लिए लाइनें जाती हैं। 

1880 में बने झांसी रेलवे स्टेशन पर शुरुआत में तीन ही प्लेटफार्म हुआ करते थे। रेलवे स्टेशन का भवन विशाल है। यह बुंदेलखंड क्षेत्र का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन है। शहर की तरफ जाने के लिए प्लेटफार्म नंबर एक से बाहर निकल सकते हैं। दरअसल झांसी का रेलवे स्टेशन शहर से बाहर है। स्टेशन से बस स्टैंड जाने के लिए आटो रिक्शा आदि मिलते हैं। रेलवे स्टेशन के पास ही मंडल रेल कार्यालय (डीआरएम) है।स्टेशन के सामने झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की विशाल प्रतिमा भी लगाई गई है।
झांसी रेलवे स्टेशन के बाहर स्थापित तीन साहित्यकारों की प्रतिमाएं। 
इंडियन मिडलैंड रेलवे जिसका मुख्यालय झांसी में था, उसके द्वारा इटारसी से भोपाल और आगे झांसी तक रेलवे लाइन बिछाने का काम 1870 के बाद किया गया। झांसी को इस बाद का भी श्रेय प्राप्त है कि देश की पहली शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन झांसी से दिल्ली के बीच चली थी।
तीन महान साहित्यकारों की प्रतिमाएं
मैं झांसी रेलवे स्टेशन के बाहर निकलने पर देखता हूं। पोर्च में तीन बड़े साहित्यकारों की प्रतिमाएं लगी दिखाई देती हैं। मैथिलीशरण गुप्त, महावीर प्रसाद दिवेदी और वृंदावनलाल वर्मा की प्रतिमाएं यहां लगी हैं। इन प्रतिमाओं के नीचे उनका विस्तार से परिचय भी दिया गया है। इन तीनो का झांसी से गहरा रिश्ता रहा है।  
हालांकि झांसी से कई और साहित्यकारों का भी रिश्ता रहा है। पर सबका नाम परिचय यहां समेटना आसान नहीं है। लोकप्रिय गीतकार इंदीवर बरुआ सागर के रहने बाले थे,जो जनपद झांसी में है। पर आते जाते लोगों को साहित्यिक विभूतियों से परिचित कराने के लिए रेलवे का यह प्रयास सराहनीय है। देश के दूसरे रेलवे स्टेशनों पर भी इस तरह का काम होना चाहिए। कई बार तो लोगों को अपने शहर के बड़े साहित्यकारों के बारे में पता नहीं होता। नई पीढ़ी को ज्ञान देने के लिए इस तरह की पट्टिकाएं बहुत काम की हैं। 


झांसी रेलवे स्टेशन के बाहर एक कैंटीन भी है जिसमें सारी रात खाना मिलता है। पर मुझे भूख नहीं लगी, सो यहां नहीं खाता हूं। थोड़ी देर में उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति आ गई। इसके दीनदयालू कोच में सवार हो गया खजुराहो के लिए। 
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(JHANSI, RAIL, HINDI, KHAJURAHO )