Monday, March 27, 2017

जिला स्कूल मुजफ्फरपुर और डॉक्टर जयदेव

जिला स्कूल मुजफ्फरपुर। इस स्कूल में मुझे 1983 और 1984 में पढ़ने का मौका मिला। अपने भव्य भवन और विशाल परिसर के कारण यह स्कूल बिहार के कई कालेजों से ज्यादा विशाल और भव्य है। लाल रंग की दो मंजिला लंबी इमारत और बीचों बीच बना विशाल हॉल स्कूल को भव्य स्वरूप प्रदान करता है। यह स्कूल साल 1844 का स्थापित है। इसके सह संस्थापक नवाब तकी साहब थे, जिनकी तस्वीर स्कूल के हाल में लगी है। यह संयुक्त बिहार झारखंड के 17 जिला स्कूलों में से एक है। कभी इसका नाम बहुउद्देशीय जिला स्कूल हुआ करता था। अब 12वीं तक पढ़ाई होने कारण इसका नाम राजकीय इंटर कालेज हो गया है।
 जिस जमाने में मैं इस स्कूल का छात्र था यह स्कूल इसके प्रिसिंपल डाक्टर जयदेव के कारण जाना जाता था। लंबी कद काठी गौर वर्ण के डाक्टर जयदेव हमेशा धोती कुरता पहनते थे। वे बड़े कड़क प्रिंसिपल के तौर पर ख्यात थे। पर उनके व्यक्तित्व के कई और पहलू थे। डाक्टर जयदेव का पूरा नाम जयदेव झा था पर वे झा लिखते नहीं थे। अपने नाम से उन्होंने जाति सूचक शब्द हमेशा के लिए हटा दिया था। 1984 में वे जिला स्कूल मुजफ्फरपुर से ट्रांसफर होकर पटना कालेजियट के प्रिंसिपल बने। यहां से आगे वे बिहार सरकार के माध्यमिक शिक्षा के निदेशक बने। रिटायर होने पर वे हाजीपुर में रहे। इस दौरान वे कुछ गांधीवादी संस्थाओं से जुड़े रहे। इसी दौरान मेरी एक बार उनसे आखिरी मुलाकात हुई थी।

डाक्टर जयदेव की ख्याति बिहार के प्रमुख शिक्षाविद में हुआ करती थी। उनके समय में जिला स्कूल मुजफ्फरपुर अनुशासित शिक्षक और छात्रों के लिए जाना जाता था। जब 1983 में मेरा जिला स्कल में नामांकन हुआ तो सातवीं क्लास में छह सेक्शन थे। ए लेकर एफ तक हर सेक्शन में 60 छात्र। मैं सी सेक्शन में हुआ करता था। मेरे वर्ग शिक्षक रामजी झा थे। हमारे कुछ सहपाठी प्रेम प्रकाश, अजय मल्होत्रा, संजय सिंह आदि हुआ करते थे। यहां सातवीं कक्षा में नामांकन प्रवेश परीक्षा के द्वारा होता था। सीमित संख्या में छात्रों के लिए हॉस्टल की भी सुविधा है। जिला स्कूल में हमारी कक्षाओं के नाम प्रसाद सप्तम, राजेंद्र अष्टम जैसे हुआ करते थे। किसी जमाने में स्कूल में उदघोषणा करने का सिस्टम भी लगा था जो हमारे समय में खराब हो गया था।
डॉक्टर जयदेव का छात्रों के बीच ऐसा आतंक था कि कोई भी छात्र स्कूल में लंबी जुल्फें नहीं रख सकता था। अगर दिख गया तो खैर नहीं. आप जिला स्कूल के आसपास किसी भी हेयरकटिंग सैलून में चले जाएं और सैलन वाले से कहें कि जिला स्कूल का छात्र हूं वह आपके बाल उसी स्कूल के अनुरूप छोटे छोटे काट देगा। मैंने हरिसभा चौक के आसपास कई बार ऐसा कहकर बाल कटवाया था।

पर डाक्टर जयदेव के व्यक्तित्व के कई और मार्मिक पहलू भी थे। सातवीं के प्रवेश परीक्षा के दौरान एक गांव से आया छात्र स्कूल के बरामदे से लगे नाली में गिर गया। उसके कपड़े गंदे हो गए और वह रोने लगा। डाक्टर जयदेव ने उसे देखा। तुरंत उसे चुप कराया। चपरासी को अपने घर से धोती लाने के कहा। बच्चे के कपड़े बदलवाए और कहा बेटे आराम से जाकर परीक्षा दो तुम्हारा चयन जरूर होगा। एक बार हमलोग आठवीं क्लास में बैठे थे। कक्षा खाली थी। अचानक प्रिंसिपल जयदेव उधर से गुजरे। किस शिक्षक की क्लास है। हमलोगों ने कहा रहमतुल्ला सर की। उन्होंने कहा रहमतुल्ला तो आया है। खैर उन्होंने एक छात्र को कहा जाकर मेरे चेंबर से मेरा चश्मा लाओ। स्कूल के मध्य में दूसरे तल पर उनका विशाल चेंबर था। हमलोग चश्मा ले आए । उसके बाद वे हमें पढ़ाने लगे।

आपको पता है जिला स्कूल में दैनिक एसेंबली के दौरान कोई प्रार्थना नहीं होती थी। बल्कि रोज प्रतिज्ञा होती थी। हम सब भारत वासी हैं भारत देश हमारा है.... साल 1984 में जब डाक्टर जयदेव का तबादला पटना केलिए हुआ था तो उनकी एक विदाई सभा हॉल में रखी गई। कई शिक्षकों ने भावुक होकर भाषण दिया। कुछ तो रो पड़े। पर डाक्टर जयदेव ने अपने विदाई भाषण में कहा, मुझे किसी बात पर आंसू नहीं आते। जितने आंसू थे बचपन में ही बह गए। सभी छात्रों को शुभकामनाएं देते हुए अपना व्यक्तव्य समाप्त किया। तो ऐसे थे डाक्टर जयदेव। उनको लेकर हजारों छात्रों की अपनी अपनी यादें होंगी जो जिला स्कूल में 80 के दशक में पढ़े। पत्रकारिता में मेरे सीनियर अरविंद शरण परमेंद्र मोहन और चंद्रकांत प्रसाद सिंह भी इसी स्कूल के छात्र रहे।
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( ZILA, SCHOOL, MUZAFFARPUR, DR JAIDEV )