Monday, February 27, 2017

जोधपुर शहर की सुबह...पटवा हवेली की तलाश में

देश के कुछ वे शहर जो सचमुच में हमारी सांस्कृतिक विरासत के प्रतिनिधि हो सकते हैं उनमें शामिल है जोधपुर। शहर का पुराना स्वरूप, खानपान, शानदार किले और उद्यान और यहां के मस्त और दोस्ताना लोग शहर को बाकी शहरों से अलहदा बनाते हैं। जोधपुर शहर में उतरने के बाद सबसे पहली जरूरत ठिकाने की थी। तो हमने गोआईबीबो डाट काम से बुक किया था, पटवा हवेली। हालांकि कई होटल रेलवे स्टेशन के आसपास हो सकते थे। पर हमने ठिकाना ढूंढा था पुराने शहर में। जैसा की नाम से जाहिर है पटवा हवेली यानी यह कोई पुरानी हवेली होगी। स्टैंडर्ड कमरे 700 रुपये प्रतिदिन के हैं पर मुझे ऑनलाइन डील में यह महज 38 रुपये का पड़ा था। जोधपुर पहुंची बस से रेलवे स्टेशन के पास उतर गया था। 
सुबह के पांच बजे के अंधेरा था। हमने लोगों से पूछा सराफा बाजार कहां है। और पैदल ही चल पड़ा। वह सुबह की सैर थी, जोधपुर की खाली सड़कों पर। रेलवे स्टेशन से आधे किलोमीटर पर साजोती गेट आया। सोजाती दरवाजा का निर्माण नगर की सुरक्षा के लिए 1724 से 1749 के बीच जोधपुर के राजा राजेश्वर महाराज ने कराया था। इस दरवाजे से सोजात शहर की ओर जाने का मार्ग निकलता था इसलिए इसे सोजाती गेट कहा जाता है। नगर में मेड़तिया दरवाजा और नागौरी दरवाजे का निर्माण भी इसी तरह नगर की सुरक्षा के लिए हुआ था। आप अगर स्टेशन के आसपास रहना चाहते हैं तो सोजाती गेट के पास किसी होटल में ठिकाना बना सकते हैं। यहां से हम शहर के संकरे रास्तों में आगे बढ़ते हैं। 

काफी हद तक बनारस की गलियों की तरह। सुबह होने के कारण बाजार बंद है। पर साइन बोर्ड देखकर लग रहा है कि दिन में यहां भीड़ का क्या आलम रहता होगा। चलते चलते पहुंचता हूं त्रिपोलिया बाजार। लोगों के बताने के मुताबिक रास्ता बदल कर त्रिपोलिया चौराहा से बायीं तरफ मुड़ जाता हूं। मकानों में पुराने विशालकाय नक्काशीदार लकड़ी के गेट लगे हैं। ये सब पुरानी हवेलियां हैं। कंदोई बाजार, तंबाकू बाजार, कतला बाजार, चूड़ी बाजार, मिर्ची बाजार से होता हुआ आगे बढ़ रहा हूं। एक मंदिर आता है, कुंज बिहारी जी का मंदिर। लिखा है कि इस मंदिर का निर्माण 1790 में जोधपुर के धर्मनिष्ठ महाराजा विजय सिंह जी की उपपत्नी श्रीमती गुलाब राय ने कराया। यह मंदिर कतला बाजार में स्थित है।

शहर के प्रमुख पुराने मंदिरों में से एक है। मंदिर के बाद आता है गोलियों की पोल और सांडो पोल। पोल का मतलब राजस्थानी में दरवाजे से है। अब ये पुराने शहर का लैंडमार्क बन गए हैं। खैर मिर्ची बाजार के बाद सर्राफा बाजार में पहुंचता हूं। यहां सराफों की पोल (गेट) के अंदर पटवा हवेली है। गेट के अंदर प्रवेश करने पर एक आंगन है जिसके चारों तरफ घर हैं। हर दरवाजे पर अच्छी तरह निगाह दौड़ाता हूं, कहीं होटल का बोर्ड नहीं दिखाई देता है। मैं आसपास के लोगों से पूछता हूं कोई सुराग नहीं लग पाता। फिर होटल के नंबर पर फोन करके अपनी लोकेशन (स्थिति) बताता हूं।
पटवा हवेली में जाने का संकरा रास्ता, मोटा आदमी फंस जाए...
वह आने की बात कहता है। थोड़ी देर में एक नेपाली भाई आते हैं मेरे पास और साथ चलने को कहते हैं। 

मैं उनके पीछे पीछे चल पड़ता हूं। इसी आंगन में दाहिनी तरफ के कोने पर डेढ फीट पतला रास्ता है। यह गली नहीं है क्योंकि ऊपर छत है, मानो हम किसी सुरंग में जा रहे हों।

मैं नेपाली भाई के पीछे पीछे चल रहा हूं। कोई 20 फीट अंदर जाने पर वे दाहिनी तरफ के दरवाजे में अंदर ले जाते हैं। तो ये है पटवा हवेली। बाकी की कहानी आगे....
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( PATWA HAWELI, JODHPUR, SAJOTI GATE, TRIPOLIA, SARAFA BAJAR, KUNJ BIHARI TEMPLE )  

Saturday, February 25, 2017

विरासत - जोधपुर रेलवे स्टेशन पर नैरो गेज का स्टीम लोकोमोटिव


जैसलमेर से जोधपुर के लिए हनुमान ट्रैवल्स की बस बुक की थी। बुकिंग गोआईबीबो एप से की थी। ये बस शहर के प्रमुख चौराहे हनुमान जंक्शन से रात 10.15 बजे खुलने वाली थी। मैं दो घंटे पहले ही यहां पहुंच गया हूं। ट्रैवल कंपनी के दफ्तर में अपना बैग रखकर आसपास में टहलने लगता हूं। दिसंबर के आखिरी दिन बारिश ने ठंड और बढ़ा दी है। पर हनुमान जंक्शन रात में जगमगा रहा है। 

रात के भोजन के लिए कुछ होटल देखता हूं। फिर एक होटल में दाल बाटी चूरमा खाने के लिए आर्डर करता हूं। 120 रुपये की थाली है दाल बाटी चूरमा की। बस अपने नीयत समय पर चल पड़ती है। बस में नींद आ जाती है। यह 31 दिसंबर की रात है। एक जनवरी 2017 की सुबह पांच बजे के आसपास देखता हूं कि बस जोधपुर रेलवे स्टेशन के पास से गुजर रही है। तो मैं यहीं उतर जाता हूं।

उत्तर पश्चिम रेलवे का प्रमुख स्टेशन जोधपुर। स्टेशन के बाहर एक लोकोमोटिव इतराता हुआ खड़ा है। रात की रोशनी में भी लोकोमोटिव चमकते हुए रेलवे की समृद्ध विरासत और इतिहास की याद दिलाता है। नैरोगेज के इस लोकोमोटिव को इस तरह सजा संवार कर यहां स्थापित किया गया है मानो यह चलने को तैयार खड़ा हो। भारतीय रेलवे द्वारा सरंक्षित किए गए तकरीबन 225 लोकोमोटिव में से यह एक है। लोकोमोटिव के अग्र भाग पर देदीप्यमान सूरज की तस्वीर लगी है।


120 जेडी बी सीरीज का यह लोकोमोटिव साल 1959 का निर्मित है। ड्यूरो डाकविक द्वारा निर्मित यह नैरो गेज का स्टीम लोकोमोटिव था जिसे 7 अक्तूबर 2002 को भारतीय रेलवे के स्वर्णिम 150 साल होने के उपरांत जोधपुर रेलवे स्टेशन के बाहर लाकर स्थापित किया गया। यह लोकोमोटिव भारतीय रेल के नैरो गेज यानी 2 फीट 6 इंच के मार्ग पर अपनी सेवाएं दे रहा था। पहियों के लिहाज से 2-6-2 श्रेणी का ये लोकोमोटिव है। इसका निर्माण स्लोवांसकी ब्रोड, यूगोस्लाविया की कंपनी ने किया था।

यह यूगोस्लाविया के जाने माने वामपंथी नेता ड्यूरो डॉकविक के नाम पर यह बनी कंपनी थी। कंपनी स्टील से जुडे भारी उत्पादों के निर्माण में जुडी थी। साल 1921 में कंपनी ने मेटल इंजीनियरिंग सेक्टर में निर्माण के साथ अपनी शुरुआत की। कंपनी के बनाए नैरो गेज स्टीम लोकोमोटिव के कई देश खरीददार थे। 1950 से 1970 के दशक में कंपनी ने बड़ी संख्या में स्टीम और डीजल लोकोमोटिव का निर्माण किया। कंपनी अभी भी उत्पादन कर रही है पर 1990 में कंपनी निजी क्षेत्र में चली गई है।


जोधपुर रेलवे स्टेशन के बाहर अब आराम से खड़ा ये लोकोमोटिव भारतीय रेलवे का लंबे समय हिस्सा रहा है। पर इसने किस रेलवे लाइन पर कहां अपनी सेवाएं दी, इसके बारे में कोई जानकारी यहां पर लिखकर नहीं लगाई है। इसकी सेवाओं के बारे यहां सूचना पट्ट लगाया जाता तो यह आम लोगों के लिए काफी जानकारी परक हो सकता था। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( NARROW GAUGE STEAM LOCOMOTIVE,  120 ZB, DURO DAKOVIC 1959, SLAVONSKI BROD, YOGOSLAVIA,  JODHPUR, 07 OCT 2002

Thursday, February 23, 2017

रेत के टीलों के बीच डूबता सूरज – एन इवनिंग इन सम सैंड ड्यून्स

सम सैंड ड्यून्स। जैसलमेर की सबसे रोचक और रोमांटिक लोकेशन है। हर जैसलमेर आने वाला सैलानी वहां जाना चाहता है। जाए भी क्यों नहीं। जिस तरफ आप पहाड़ों पर बर्फ और समंदर के किनारे लहरें देखने जाते हैं ठीक उसी तरह लोग थार में सैंड ड्यून्स देखने आते हैं। न जाने कितनी फिल्मों की शूटिंग इन रेगिस्तानों में हुई है। रेशमा और शेरा, सेहरा, लम्हे जैसी फिल्मों में रेगिस्तान के नजारे देखे जा सकते हैं। सैंड ड्यून्स मतलब रेत के टीले। जहां आप कभी ऊपर कभी नीचे उतर चढ सकें और रेगिस्तान का असली मजा ले सकें।

जैसलमेर के निकटस्थ सम सैंड ड्यून्स की दूरी शहर से 40 किलोमीटर है। ज्यादातर सैलानी यहां शाम को जाना पसंद करते हैं। दिन भर बालू गर्म रहता है। वहीं शाम को यहां सूर्यास्त देखने का नजारा अदभुत होता है। सैलानियों को लुभाने के लिए अक्तूबर से फरवरी तक सम में टेंट सिटी बस जाती है। तमाम होटल वाले यहां टेंट में रात्रि विश्राम का पूरा इंतजाम करते हैं। ये टेंट लग्जरी के हिसाब से अपनी दरें तय करते हैं। कम से कम ढाई हजार रुपये एक रात के लेकर इससे ऊपर कुछ भी हो सकता है। आमतौर पर इस पैकेज में खाना नास्ता और मनोरंजन शामिल होता है।

सैंड ड्यून्स में टेंट सिटी में रात गुजारने के लिए पैकेज आप जैसलमेर के होटल से ही ले सकते हैं. इस तरह का पैकेज तमाम टैक्सी वाले भी दिलाते हैं। इन सबमें उनका कमीशन तय होता है। कुछ सैंड ड्यून्स में स्थित टेंट सिटी की वेबसाइट भी है जहां आप सीधे बात कर सकते हैं। इन टेंट सिटीं में आम तौर पर रात को मनोरंजन के लिए राजस्थानी लोक संगीत का इंतजाम होता है। आपका पारंपरिक तरीके से स्वागत होता है। बोनफायर जलाकर राजस्थानी लोकनृत्य देखना और फिर बफे डिनर का आनंद उठाना, यहां आने वाले सैलानियों का प्रिय मनोरंजन का साधन है।

हमारी टैक्सी शाम को चार बजे कनोई गांव पहुंचती है। दोनों तरफ टेंट सिटी आरंभ हो चुकी है। कुछ लोग पारा ग्लाइडिंग के भी मजे ले रहे हैं। पार्किंग के पास पहुंचने पर अनगनित गाड़ियों की कतार दिखाई दे रही है। हमारे पास कुछ ऊंट और ऊंट गाड़ी वाले आ जाते हैं। कैमल सफारी के लिए। ऊंट गाड़ी में जाने के लिए 300 रुपये तक. इसमें कई लोग बैठ सकते हैं। वहीं ऊंट पर सवारी के लिए 100 रुपये या अधिक। ऊंट पर दो लोग बैठ सकते हैं।

अक्सर नव विवाहित युगल ऊंट पर बैठना पसंद करते हैं। कोई आधे किलोमीटर का सफर है। हमने पैदल चलना पसंद किया। चहलकदमी करते ऊंटों को देखते हुए। कई बार ऊंट रेगिस्तान में तेजी से दौड़ लगते हैं। ऊंट के बारे में बचपन से पढ़ता आया हूं कि इन्हें मरुस्थल का जहाज कहते हैं। द्वारका और पोरबंदर में ऊंट की सवारी का मजा भी ले चुका हूं। यहां मैंने ऊंटों के बोलते हुए सुना। वे अपने महावत से संवाद करते हैं। कई बार चलने को कहते हैं तो कई बार अड़ जाते हैं।

दो घंटे इन रेगिस्तानों में हजारों लोगों को मौज मस्ती करते देखना सुखकर लगता है। लोग बालू पर फिसलते नजर आते हैं। बीच बीच में राजस्थानी लोक गायक आपके मनोरंजन के लिए तान छेड़ते नजर आते हैं। कई जगह समूह में आए लोग मस्ती में डूबे नजर आते हैं। इसी बीच कुछ लोग जीप सफारी के नाम पर मरुस्थल में अपनी जीप घुसा देते हैं। पर बड़ी-बड़ी एसयूवी यहां फंस जाती है और लोग उसे निकालने की कोशिश में नजर आते हैं। इस रेगिस्तान में चाय बेचने वाले कुछ बालक नजर आते हैं। न चाहते हुए उनसे एक चाय लेकर पी लेता हूं। उनकी मेहनत को सलाम। और सूरज पश्चिम में डूबने लगा है। अंधेरा होने लगा है। पर लोग जाने का नाम नहीं ले रहे हैं। यहां बिजली का कोई इंतजाम नहीं है इसलिए अपने टेंट की ओर लौटना ही पड़ेगा।

सड़क के किनारे चाय नास्ते की दुकानें चल रही हैं। पर हमें यहां रात नहीं गुजारनी। हम अपनी टैक्सी से वापस रात नौ बजे तक पहुंच जाते हैं जैसलमेर शहर के हनुमान जंक्शन। यहां से हनुमान ट्रैवल्स की लग्जरी बस से रात 10.15 बजे हमें जोधपुर के लिए प्रस्थान करना है। मैं हनुमान ट्रैवल्स के दफ्तर में अपना बैग रख देता हूं और बदल के एक होटल में खाने पहुंच जाता हूं। भला राजस्थान में क्या खाना। वही दाल बाटी चूरमा।    
- vidyutp@gmail.com

(A EVENING IN SUM SAND DUENS, KANOI VILLAGE, JAILSALMER, CAMEL SAFARI )

Tuesday, February 21, 2017

कुलधरा - पालीवाल ब्राह्मणों का एक अभिशिप्त गांव

एक गांव जो कभी आबाद था। हजारों लोग रहते थे। सुबह शाम संगीत गूंजता था। पर अब सिर्फ खंडहर। हम बात कर रहे हैं कुलधरा की। आज इसकी गिनती देश के कुछ प्रमुख भुतहा स्थलों में होती है।
 जैसलमेर आने वाले ज्यादातर सैलानी रेगिस्तान जरूर देखना चाहते हैं। अक्सर शाम को लोग जैसलमेर शहर से 40 किलोमीटर दूर सम सैंड ड्यून्स का रूख करते हैं। इस रास्ते में आता है कुलधरा गांव। यह गांव अब सैलानियों का प्रमुख आकर्षण है। देखने के नाम पर यहां अब सिर्फ खंडहर है। पर ये खंडहर चुपचाप एक दास्तां सुनाते हैं।
कुलधरा कभी पालीवाल ब्राह्मणों का आबाद गांव हुआ करता था। यहां 600 परिवार रहते थे। पर यह एक ऐसा गांव है जो रात ही रात में वीरान हो गया था। आखिर क्या थी कहानी। क्यों खाली हो गया गांव। इसके पीछे गांव की इजज्त का सवाल था। आप कल्पना कर सकते हैं कि एक लड़की की सुन्दरता न केवल उसके परिवार को बल्कि एक साथ 84 गांवों को रातों रात सुनसान उजाड़ में बदलने पर मजबूर कर देगी। जैसलमेर के पास स्थित इस कुलधारा की कुछ ऐसी ही कहानी है।
दीवान सालम सिंह की बुरी नजर - कुलधरा को जिस व्यक्ति की बुरी नजर लग गई, वो शख्स था रियासत का दीवान सालम सिंह। गांव के एक पुजारी की बेटी पर सालेम सिंह इस कदर मोहित हो गया कि वह उससे शादी करने की जिद पर आ गया। गांव वाले इसके लिए तैयार नहीं थे। सालेम सिंह ने उस लड़की से शादी करने के लिए गांव के लोगों को चंद दिनों की मोहलत दी। अब ये लड़ाई गांव की एक कुंवारी लड़की के सम्मान की बन गई थी और गांव के आत्म सम्मान की भी।
और रातों रात खाली हो गया गांव 
गांव की चौपाल पर पालीवाल ब्राह्मणों की बैठक हुई और 5000 से ज्यादा परिवारों ने अपने सम्मान के लिए जैसलमेर की रियासत छोड़ने का फैसला ले लिया। अगली शाम कुलधरा गांव को सारे लोग छोड़ कर चले गए। रह गई सिर्फ विरानगी। आज परिंदे भी उस गांव की सरहदों में दाखिल नहीं होते। कुलधरा पहुंचने पर आपको अब तमाम घरों के खंडहर दिखाई देते हैं। बीच में चौड़ा रास्ता और दोनों तरफ व्यवस्थित तरीके से बने मकानों की ईंटे इस बात की गवाही दे रही हैं कि कभी यहां कितना गुलजार मौसम रहा होगा। लोग बताते हैं कि गांव छोड़ते वक्त उन ब्राह्मणों ने इस जगह को श्राप दिया था कि यह जगह कभी फलेगा फूलेगा नहीं।
कहा जाता है कि पालीवाल ब्राह्मण काफी अमीर थे। उन्होने काफी सोना जमीन में गाड़कर रखा हुआ था। गांव खाली होने के बाद काफी लोग यहां सोने की तलाश में आए और खुदाई करके सोना ले गए।

रुहानी ताकतों का बसेरा - कहा जाता है कि उस समय से लेकर आज तक ये वीरान गांव रूहानी ताकतों के कब्जे में है। अक्सर यहां आने वालों को इन रुहानी ताकतों का एहसास होता है। बदलते वक्त के साथ 82 गांव तो दोबारा आबाद हो गए, लेकिन दो गांव तमाम कोशिशों के बावजूद आबाद नहीं हो सके। इनमें से एक है कुलधरा और दूसरा खाभा।

अब ये दोनों गांव भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैं। इन गांवों को दिन सैलानियों के लिए खोल दिया जाता है। यहां सैकड़ों पर्यटक आते हैं। पर रात में यहां आने की मनाही है। पर इस गांव में एक मंदिर है जो आज भी श्राप से मुक्त है। एक बावड़ी भी है जहां से लोग तब पानी लिया करते थे। कहा जाता है कि शाम ढलने के बाद अक्सर यहां कुछ आवाजें सुनाई देती हैं। लोग मानते हैं कि वो आवाजें दो सौ साल पहले के पालीवाल ब्राह्मणों का रुदन है। यह भी कहा जाता है कि गांव के कुछ मकान हैं, जहां रहस्यमय परछाई अक्सर नजरों के सामने आ जाती है।

कैसे पहुंचे - जैसलमेर शहर से कुलधरा की दूरी 18 किलोमीटर है। अब कुलधरा को सैलानियों के लिए विकसित किया जा रहा है। सैलानियों से 10 रुपये प्रति व्यक्ति प्रवेश टिकट लिया जाता है। वहीं प्रति वाहन 50 रुपये प्रवेश टिकट है। 

कुलधरा में एक घर को दोबारा निर्मित किया गया है जिससे आप अतीत में गुलजार रहे इस गांव को महसूस कर सकें। यहां पहुंचने वाले लोग इस घर के साथ खूब तस्वीरें खिंचवाते हैं। पर शाम ढलने से पहले यहां से निकल जाना पड़ता है। कुलधरा में रात में प्रवेश की बिल्कुल इजाजत नहीं है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
KULDHARA, JAISALMER, RAJSTHAN, HAUNTED VILLAGE, PALIWAL BRAHMAN )


Sunday, February 19, 2017

नवेली दुल्हन सा सिंगार किए पटवा हवेली

जैसलमेर की पटवा हवेली। शहर की सभी पुरानी हवेलियों में सबसे समृद्ध। वैसे तो जैसलमेर के टूरिस्ट मैप में पटवा हवेली, नाथमल की हवेली, सलीम सिंह की हवेली जैसे कई नाम गिनाए जाते हैं। पर हमारे टैक्सी ड्राईवर राजू चौधरी ने कहा था कि आप पटवा हवेली देख लेंगे तो बाकि हवेलियां देखना जरूरी नहीं रह जाएगा।

वह हमें जैन मंदिर से पहले छोड़ देते हैं। पतली गलियों में आटो रिक्शा चले जाते हैं टैक्सियां नहीं जाती। थोड़ा पैदल चलकर हमलोग पटवा हवेली पहुंच गए। रास्ते में मिलने वाली सभी हवेलियों में लकड़ी के विशाल द्वार बने हैं।

सौ साल से ज्यादा पुरानी पटवा हवेली किसी नवेली दुल्हन सी आपका स्वागत करती नजर आती है। सर्दियों की चटख धूप में हवेली का सौंदर्य और भी बढ़ जाता है। पटवा हवेली वास्तुकला का दिलचस्प नमूना है। यह हवेली पांच छोटे छोटे कलस्टर में बनी है। पहली हवेली को निजी संग्रहालय का रूप दिया गया है। इसके बाद वाले हिस्से में सरकारी संग्रहालय है। हवेली वाली गली में राजस्थानी कला शिल्प का जीवंत बाजार है। बैठकर सुस्ताने केलिए बेंचे बनी है। राजस्थानी परिधान किराये पर देने वाले यहां पर कई हैं। 

यहां पर लोग अति उत्साह से राजस्थानी लिबास में बनी ठनी बनकर हवेली के झरोखे के साथ फोटो खिचंवाते नजर आते हैं। फुटपाथ पर टी शर्ट, लेडिज पर्स, हैंडबैग से लेकर कठपुतलियों की दुकानें सजी हैं। आप खरीदें या नहीं पर यहां बैठकर कुछ घंटों का टाइम पास कर सकते हैं।  पटवा हवेली में प्रवेश का टिकट 100 रुपये का है। पर अंदर जो कुछ भी देखने लायक है उसके लिए यह 100 रुपये का टिकट ज्यादा नहीं है।

पटवा हवेली को गुमन चंद पटवा ने साल 1805 ई में अपने पांच बेटों के लिए बनवाया गया था। पटवा परिवार का कारोबार सिंध, बलूचिस्तान से लेकर पश्चिम एशिया तक फैला हुआ था। कीमत लकड़ी, मसाले और अफीम का कारोबार कर उन्होंने काफी धन कमाया था। कहा जाता है कि पटवा परिवार को एक जैन संत ने जैसलमेर छोड़ने की सलाह दी थी। वे जैसलमेर से बाहर गए और उनका कारोबार खूब बढ़ा। बाद में लाला गुमनचंद पटवा संत की सलाह को दरकिनार करते हुए अपनी मिट्टी के पास वापस आए। यहां उन्होने अपने पांच बेटों के लिए पांच अलग अलग हवेलियां बनवाना तय किया।

पटवा परिवार के बारे में कहा जाता है कि जैसलमेर से बाहर उनका कारोबार चरम पर था, पर जैसलमेर में निवास करने पर उनका कारोबार फिर घटने लगा। एक बार फिर परिवार जैसलमेर छोड़कर चला गया। गुमनचंद पटवा बाफना गोत्र के जैन थे। पटवई उनका पेशा था जिसका मतलब होता है गूंथना। परिवार सोने और चांदी के तारों का जरी का काम करता था। जैसलमेर के राजा ने उन्हे पटवा की उपाधि दी थी।
पटवा हवेली के निर्माण में पीले बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इन इमारतों के निर्माण में 50 साल लग गए। उस समय हवेली के निर्माण का कुल खर्च आया था 10 लाख रुपये। हालांकि पटवा हवेली को देखते हुए लगता है कि इसका निर्माण किसी वास्तुविद से डिजाइन करवाकर नहीं कराया गया।

हवेली के निर्माण के बारे में कहा जाता है कि पटवा परिवार के पास जैसे जैसे पैसा आता गया हवेली रूप लेती चली गई। इसलिए इसकी आंतरिक बनावट बिल्कुल अनगढ़ है। पर हवेली के अंदर रखे संग्रह को देखकर आंखे चौंधिया जाती हैं। हवेली के हर कोने में हर मंजिल पर कारोबारी परिवार का राजशी ठाठ नजर आता है। उनका संगीत प्रेम, उनका कपड़ों के प्रति प्रेम नजर आता है। 

पटवा हवेली के अग्रभाग में बारीक नक्काशी देखने को मिलती है। विविध प्रकार की कलाकृतियों से युक्त खिड़कियों, छज्जे और रेलिंग आपका मनमोह लेती हैं। 

भूल भुलैया है हवेली - पटवा हवेली में प्रवेश की सीढ़ियां काफी संकरी हैं। ये हवेली एक तरह से भूल भुलैया है। सबसे ऊपर की मंजिल पर पहुंचने के बाद आपको एकबारगी नीचे आने का रास्ता नजर नहीं आता है। तब हवेली में मौजूद स्टाफ से मदद लेनी पड़ती है। हवेली के अंदर आप पटवा परिवार द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली विविध वस्तुओं का संग्रह देख सकते हैं। यह ड्रेसिंग, टेबल, रसोई के सामान और शानदार बिस्तर से लेकर इस्तेमाल किए जाने वाले बरतनों के रूप में है। इसके उनके वैभव और ऐश्वर्य का पता चलता है।

रसोई घर में इस्तेमाल किए जाने वाले बर्तन से लेकर बेडरूम, साड़ियां, कपड़े और वाद्ययंत्रों का भी अनूठा संग्रह है इस हवेली में। आजकल पटवा हवेली की पहली और मुख्य हवेली मालिक एक कारोबारी कोठारी परिवार है। जीवनलाल कोठारी के परिवार ने इसे संग्रहालय का रूप प्रदान किया है। हवेली के आधार तल राजस्थानी साड़ियों लहंगो और कपड़ो की दुकान भी है।
खुलने का समय – दर्शकों के लिए पटवा हवेली सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक खुली रहती है। इसके प्रवेश टिकट 100 रुपये का है। कैमरे का इस्तेमाल करने के लिए अलग से शुल्क है। हवेली के बगल में एक सरकारी संग्रहालय भी है। इसका प्रवेश शुल्क 50 रुपये है। आप चाहें तो दोनों देख सकते हैं। पटवा हवेली देखकर भी मन नहीं भरा हो और आपके पास समय है तो आसपास की तीन और हवेलियां देख सकते हैं। इनमें हवेली सलीम सिंह प्रमुख है। 

पटवा हवेली की आंतरिक सज्जा....

 यहां दलालों से रहें सावधान -

पटवा हवेली में घूमते हुए दलालों और गाइडों से तनिक सावधान रहें। वास्तव में आपको कोई गाइड करने की जरूरत नहीं है। 

आप संकेतक के सहारे सब कुछ देख समझ सकते हैं।  यहां बिकने वाले उत्पादों के लोभ में भी न आएं। वे मोटे कमीशन पर बेचे जाते हैं। 

हां आप चाहें तो हवेली का बाहर स्ट्रीट मार्केट से शॉपिंग कर सकते हैं। यहां वाजिब कीमत पर चीजें उपलब्ध हैं।खास तौर पर यहां से राजस्थानी हस्तशिल्प की वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। ये यहां पर दिल्ली मुंबई की तुलना में सस्ती मिलती हैं। कई कलाकार यहां पर लाइव कलाकृतियों का निर्माण करते भी दिखाई दे जाते हैं। खास तौर पर आप यहां शिल्पियों को लकड़ी की मूर्तियां गढ़ते हुए देख सकते हैं। 


 ( PATWA HAWELI, JAISALMER, GUMAN CHAND PATWA, KOTHARI )    

Friday, February 17, 2017

जैसलमेर की शान – सोनार किला

मशहूर बांग्ला फिल्मकार सत्यजीत रे ने एक फिल्म बनाई थी सोनार किला। 1974 में रीलिज यह फिल्म बंगाली मानुष के बीच खूब लोकप्रिय हुई। यह 1971 के एक उपन्यास पर बनी फिल्म थी। फिल्म पुनर्जन्म की कहानी पर आधारित थी। ये सब बातें क्यों बता रहा हूं भला। दरअसल इस बांग्ला फिल्म की शूटिंग जैसलमेर के प्रसिद्ध किले में हुई थी। जैसलमेर आने वाले सैलानियों के लिए बड़ा आकर्षण है जैसलमेर का सोनारकिला। सोनार किला मतलब सोने का किला। यह विश्व विरासत के स्थलों में शुमार है साथ ही राजस्थान के शानदार और जीवंत किलों में से एक है।

जैसलमेर का यह किला शहर की शान है। यह शहर के केन्द्र में स्थित है। इसे 'सोनार किला' या 'स्वर्ण किले' के रूप में इसलिए भी जाना जाता है क्योंकि यह पीले बलुआ पत्थर से बना है। यह किला सूर्यास्त के समय अगर देखें तो सोने की तरह दमकता है। इस किले का निर्माण 1156 ई में भाटी शासक जैसल द्वारा कराया गया। किला कुल सात साल में बनकर तैयार हुआ था। त्रिकुरा पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित यह किला शहर के कई हिस्सों स दिखाई देता है। किले के परिसर में कई खूबसूरत हवेलियां या मकान, मंदिर और सैनिकों तथा व्यापारियों के आवासीय परिसर भी हैं।

सोनार किला राजपूत और मुगल स्थापत्य शैली का आदर्श उदाहरण है। सोनार किला 250 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। यह 30 फीट की ऊंची दीवार से घिरा हुआ है। यह कुल 99 बुर्जों वाला किला है। किले की दिवारें 2.5 मीटर मोटी और 3.5 मीटर ऊंची हैं। पर किले के अंदर स्थानीय लोगों को निवास भी है। 1722 के बाद राजा अखे सिंह के शासन काल में लोग आकर किले में बसने लगे थे। शहर की एक चौथाई आबादी किले के अंदर रहती है। मजे की बात कि इसमें राजपरिवार का कोई नहीं रहता बल्कि पुष्करणा ब्राह्मण और जैन समाज के लोग रहते हैं। 

किला के परिसर में कई कुएं भी हैं जो यहां के निवासियों के लिए जल का स्रोत हैं। किले के अंदर आप दुकानें और बाजार देख सकते हैं। स्थानीय निवासी बाइक से आते जाते रहते हैं, इसलिए किले में हमेशा भीड़भाड़ रहती है।
इस किले में सूरज पोल और गणेश पोल, अखाई पोल, हवा पोल जैसे द्वार हैं। राजस्थानी में पोल मतलब द्वार। सभी द्वारों में अखाई पोल या प्रथम द्वार अपनी शानदार स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रवेश द्वार को वर्ष 1156 में बनाया गया था और शाही परिवारों और विशेष आगंतुकों द्वारा यही प्रवेश द्वार उपयोग किया जाता था। किले की परिधि पांच किलोमीटर में है।

किले का दर्शनीय हिस्से में जाने के लिए मार्ग संकेतक बने हुए हैं। इसे बिना गाइड के भी घूमा जा सकता है। पर वहां गाइड भी उपलब्ध रहते हैं। वे किले के विभिन्न कक्ष को दिखाते हुए भाटी राजाओं की बहादुरी की दास्तां सुनाते हैं। किले की अंदर से बनावट अनगढ़ है। ज्यादातर कमरों में प्रकाश आने का बेहतर इंतजाम नहीं दिखाई देता। सीढ़ियां संकरी हैं। किले के अंदर की गैलरी में भाटी राजाओं की वंशावली उनकी तस्वीरें आदि देखी जा सकती हैं। राजतंत्र खत्म हो गया पर यहां राजशाही औपचारिक तौर पर जारी है। जैसलमेर के वर्तमान राजा महारावल बृजराज सिंह हैं जिनका राज्याभिषेक 13 मार्च 1982 को हुआ था। किले के कई कमरों की छत के निर्माण में लकड़ी का इस्तेमाल किया गया है। भाटी राजाओं में एक राजा हुए महाराजा शालिवाहन सिंह (1890-1914), उनके बारे में कहा जाता है कि वे साढ़े सात फीट लंबे थे।

एक बार फिर बात फिल्म सोनारकिला की। फिल्म का ज्यादातर हिस्सा कोलकाता से जैसलमेर की यात्रा का है। फिल्म का क्लाइमेक्स जैसलमेर के इसी किले में शूट किया गया है। यही कारण है कि हर साल बड़ी संख्या में बंगाली सैलानी जैसलमेर का सोनारकिला देखने आते हैं।

प्रवेश टिकट - किले में प्रवेश के लिए 100 रुपये का टिकट है। किला दर्शकों के लिए सुबह 9 बजे खुल जाता है और सूर्यास्त तक खुला रहता है। बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी रोज इस किले को देखने आते हैं। किले के मुख्य द्वार से प्रवेश के बाद आप देखेंगे कि दोनों तरफ राजस्थानी कला शिल्प की दुकानें सजी हुई हैं। इन दुकानों के साथ साथ राजस्थानी कलाकार लोक संगीत की तान छेड़ते भी नजर आ जाते हैं।
-        vidyutp@gmail.com
(SONAR KILA, SATYAJIT RAY, JAISALMER, FORT, TEMPLE, WORLD HERITAGE SITE)



Wednesday, February 15, 2017

जैसलमेर - मैजिक बेडशीट... नो नीड टू वियाग्रा

देस मेरा रंगरेजी बाबू। क्या क्या अनूठी चीजें नहीं हैं अपने इस देश में । क्या आपने किसी ऐसी मैजिक बेडशीट के बारे में सुना है जिस पर सोने के बाद वियाग्रा की कोई जरूरत नहीं रह जाए। तो चलिए आपको दिखाते हैं ऐसी मैजिक बेडशीट। जैसलमेर फोर्ट से निकलने के बाद थोड़ी भूख लगी थी। सोचा पेट पूजा कर ली जाए। एक दुकान पर पोहा खाने गया। 20 रुपये में मे पोहा की प्लेट। प्याज टमाटर, सेव धनिया पत्ते के साथ सजा कर पेश किया। पोहा खाते खाते समाने एक बोर्ड पर नजर पड़ी। जिस पर लिखा था, मैजिक बेडशीट। नो नीड टू वियाग्रा। मैं नजदीक जाकर उस बेडशीट को निहारता हूं।
मेरी तरह सैकड़ो लोग ऐसा करते होंगे। कुछ लोग खरीद कर ले भी जाते होंगे। बड़ी संख्या में विदेशी सैलानियों को लुभाने के लिए भी यह बोर्ड लगा है। ऐसे बोर्ड जैसलमेर के फुटपाथ पर हस्तशिल्प से बने सुंदर कढ़ाई वाले बेडशीट की कई दुकानों पर लगे दिखाई दे जाते हैं। राजस्थान के बेडशीट अपनी सुंदर कढ़ाई के लिए ख्यात हैं। इन पर हाथी घोडे की तस्वीरें भी काढ़ी जाती हैं। आप चाहें तो इसे जाजीम की तरह बिस्तर पर बिछाएं या फिर दीवार पर चंदोबा की तरह सजा दें तो यह किसी वाल पेंटिंग की तरह नजर आता है। मोल भाव करके आप यहां से खरीद सकते हैं।
पर इनका वियाग्रा कनेक्शन। आखिर इस बेडशीट में कैसी ताकत है जो जोशवर्धक की तरह काम करता है। आगे के बेडशीट वाले दुकानदार से मैं अपनी जिज्ञासा रखता हूं। वह राजफाश करता है। भाई साहब बेडशीट में बेलबूटे की कढ़ाई भर है इसमें कोई जोशवर्धक दवा नहीं मिलाई जाती है। हां ये इन बेडशीट का सौंदर्य एक खुशनुमा वातावरण तैयार करने में मददगार जरूर हो सकता है। पर कोई मैजिक तो नहीं है इनमें। यह तो बस एक मार्केटिंग टूल भर है। बेचने का तरीका है। वाह भाई...आपने तो बडे बडे प्रबंधन संस्थानों को भी मात दे दिया। आईआईएम वालों के भी आकर इनसे कुछ सीखना चाहिए।

सुंदर गड़िसर झील प्रदूषण की चपेट में -  हमारी अगली मंजिल है गड़ीसर झील। गड़ीसर झील जैसलमेर शहर के बीचों बीच स्थित सुंदर झील है। इसमें नौका विहार का आनंद लिया जा सकता है। पैडल से चलाए जाने वाले बोट रियायती दरों पर उपलब्ध हैं। इन बोट के नाम देखिए राजस्थान के अमर प्रेमी ढोला मारू के नाम पर है। गड़ीसर झील के पास सूर्योदय और सूर्यास्त देखने का प्वाइंट भी है। खासतौर पर यहां शाम का नजारा अदभुत होता है।
गड़ीसर झील एक कृत्रिम सरोवर है। इसका निर्माण जैसलमेर के राजा महारावल गड़सी ने 1367 में शहर में जलापूर्ति के लिए करवाया था। झील को चारों ओर मंदिर और बगीचों का निर्माण कराया गया। इसके साथ ही पूजा अर्चना के लिए ब्राह्मणों की नियुक्ति की गई। झील की तरफ जाने के लिए सुंदर द्वार का निर्माण टीलों नामक राज नर्तकी ने करवाया। यह दो मंजिला प्रवेश द्वार सुंदर झरोखों से सजा है। यह राजस्थानी स्थापत्य कला का सुंदर नमूना है। इस प्रवेश द्वार के साथ बाहर से आने वाले साधु संतों के लिए रहने का भी इंतजाम किया गया है। 

मुख्य द्वार के आसपास सुंदर छतरियां बनी हैं। झील के मुख्य द्वार पर दिन भर चहल पहल रहती है। लोग राजस्थानी वेश भूषा में तस्वीरें खिंचवाने में मस्त दिखाई देते हैं। सड़क के दोनों तरफ राजस्थानी कला शिल्प का बाजार सजा है तो खाने पीने के लिए स्ट्रीट फूड का भी इंतजाम है। नौका विहार न करें तो खाने पीने में अपना वक्त लगाएं। या फिर राजस्थानी लोकसंगीत का आनंद लें। एक रजास्थानी कलाकार सड़क के किनारे बैठे मिले। वे रावणहत्था से सुर निकाल रहे हैं। साथ वाद्य यंत्र और सीडी डीवीडी आदि भी बेच रहे हैं।

झील के बाहर नोटिस लगा है कि यहां नहाना, कपड़े धोना और गंदगी फैलाना मना है। हकीकत है कि झील का पानी काफी दूषित हो चुका है। प्रशासन और स्थानीय लोगों की उपेक्षा की शिकार हो गई है झील। झील का पानी इतना गंदा है कि जानवरों के पीने लायक भी नहीं रह गया है। कभी इस झील का निर्माण इंसानों के लिए पेयजल के इंतजाम के लिए कराया गया था। पर्यटक और स्थानीय लोग भी झील में गंदगी फैलाने के लिए काफी हद तक जिम्मेवार हैं।

-    ---- विद्युत प्रकाश मौर्य
(MAGIC BEDSHEET, VIAGRA, GADISAR LAKE, JAISALMER, RAJSTHAN)




Monday, February 13, 2017

जैसलमेर में तनोट देवी का चमत्कारी मंदिर

देश के कुछ चमत्कारी मंदिरों में शामिल है तनोट भवानी का मंदिर। यह मंदिर राजस्थान में जैसलमेर शहर से 130 किलोमीटर दूर पाकिस्तान की सीमा पर है। तनोट भवानी मंदिर को पाकिस्तान हिंगलाज भवानी का रुप माना जाता है। यह सीमा सुरक्षा बल की आराध्य देवी हैं। तनोट मां को तन्नोट मां के नाम से भी जानते हैं। हिंगलाज भवानी का ही एक रूप मानी जाने वाली तनोत माता राजस्थान और आसपास के भक्तो में अगाध श्रद्धा है। हिंगलाज माता का मंदिर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में है। वहां जाना मुश्किल है, पर तनोट तक पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं है। 


बड़ी संख्या में यहां आने वाले श्रद्धालु मन्नत भी मांगते हैं। मन्नत मांगने वाले श्रद्धालु रुमाल में रुपये बांध कर यहां रख जाते हैं। मन्नत पूरी होने पर वापस आकर रुमाल खोलकर रुपये दानपात्र में चढ़ा जाते हैं।
तनोट माता के मंदिर का निर्माण छह शताब्दी में हुआ था। भाटी राजपूत नरेश तणुराव ने विक्रम संवत 828 में तनोट का मंदिर बनवाकर मूर्ति को स्थापित की थी। इसके बाद भाटी तथा जैसलमेर के पड़ोसी इलाकों के लोग भी तनोट माता की पूजा करते आ रहे है। कहा जाता है देश आजाद होने से पूर्व सिंध और अफगानिस्तान जाने वाले व्यापारियों के ऊंटों का कारवां यहीं से गुजरता था। तनोट राय मंदिर में हर साल दो बार नवरात्र के दौरान मेला लगता है। हर सुबह शाम मंदिर में विधि पूर्वक आरती होती है।

 जब 1965 में चमत्कार हुआ-
भारत पाकिस्तान के बीच 1965 कि लड़ाई में पाकिस्तानी सेना कि तरफ से करीब 3000 बम गिराए गए पर इन बमों से इस मंदिर पर खरोच तक नहीं आई। यहां तक कि मंदिर परिसर में गिरे 450 बम तो फटे तक नहीं। अब सीमा सुरक्षा बल की ओर से इन बमों को सहेज कर रखा गया है। मंदिर आने वाले श्रद्धालु उन्हें देख सकते हैं। तभी से सीमा सुरक्षा बल के जवान काफी श्रद्धा भाव रखते है और तनोट माता को युद्ध की देवी भी कहा जाता है। मंदिर का पूरा प्रबंधन सीमा सुरक्षा बल की यहां मौजूद बटालियन करती है। तनोट में भारत पाकिस्तान युद्ध की याद में एक विजय स्तंभ का भी निर्माण कराया गया है।

श्रद्धालुओं के रहने का इंतजाम - आस्था स्थल तनोट राय माता मंदिर में दर्शनार्थ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए ठहरने और भोजन की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। राजस्थान के देवस्थान विभाग की ओर से करीब 1.03 करोड़ की लागत से विश्राम गृह बनवाया गया है। विश्राम गृह का संचालन मंदिर की सेवा और पूजन व्यवस्था करने वाली बीएसएफ की बटालियन न लाभ न हानि के आधार पर करती है।
परिचय पत्र जरूरी - चूंकि यह इलाका सामरिक दृष्टि से संवेदनशील सीमा क्षेत्र में है इसलिए विश्राम गृह में श्रद्धालुओं को पूरी जांच और परिचय पत्र होने पर ही रात्रि को ठहरने की अनुमति दी जाती है। तीन बीघा जमीन पर बने विश्राम गृह में 60.94 लाख की लागत से कुल 7 कक्ष बनाए गए हैं। टॉयलेट ब्लॉक में 3 टॉयलेट और 2 बाथरूम के अलावा 42.23 लाख से भोजन शाला में एक हॉल, किचन व स्टोर रूम बनाया गया है। तनोट माता मंदिर की व्यवस्था एक पंजीकृत ट्रस्ट देखता  है।

कैसे पहुंचे – राजस्थान के जैसलमेर शहर से तनोट जाने  के लिए आप टैक्सी बुक कर सकते हैं। आधे दिन का समय रखने पर जैसलमेर से तनोट जाकर लौट सकते हैं। राजस्थान रोडवेज की बस रोज शाम को  4 बजे तनोट के लिए जाती है। इसमें जाने वाले श्रद्धालु वहीं रुक जाते हैं। बस अगले दिन सुबह जैसलमेर वापस लौटती है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

( TANOT BHAWANI MANDIR, JAISALMER, RAJSTHAN, BSF )