Saturday, January 14, 2017

मां से चलता है वंश खासी जनजाति में

मेघालय में लगभग 50 फीसदी आबादी खासी जनजाति की है। इसके अलावा असम और बांग्लादेश के कुछ क्षेत्रों में खासी जनजाति के लोग रहते हैं। भारत के मेघालय में बसने वाली खासी जनजाति में महिलाओं का वर्चस्व है। यहां पुरूषों के बजाय महिलाएं प्रधान होती हैं। परंपराओं के अनुसार यहां महिलाएं कई पुरूषों से शादी कर सकती हैं। हालांकि अब ऐसा कम होता है। इतना ही नहीं पुरूषों को अपने ससुराल में रहना पड़ता है। आमतौर पर बच्चों का सरनेम भी मां के नाम पर होता है।

सादे समारोह में होती है शादी हमारे खासी समुदाय से आने वाले ड्राइवर साथी बताते हैं कि विवाह के लिए कोई विशेष रस्म नहीं है। लड़की और माता पिता की सहमति होने पर युवक ससुराल में आना जाना शुरू कर देता है और संतान होते ही वह स्थायी रूप से वही रहने लगता है। शादी के बाद संबंध विच्छेद भी अक्सर सरलतापूर्वक होते रहते हैं। यहां संतान पर पिता का कोई अधिकार नहीं होता। शादी हो जाने पर पति आमतौर पर ससुराल में ही रहता है। परंपरानुसार पुरूष की विवाह पूर्व कमाई पर मातृ परिवार का और विवाह के बाद की कमाई पर पत्नी के परिवार का अधिकार होता है। 

लड़की पैदा हो तो जश्न -  खासी जनजाति की सबसे बड़ी विशेषता उनका मातृमूलक परिवार है। यहां लड़की के जन्म पर यहां जश्न मनाया जाता है। लड़का पैदा हो तो उतनी खुशी की बात नहीं होती। यहां के बाजार और दुकानों पर भी महिलाएं ही काम करती हैं। समाजशास्त्री जेपी सिंह लिखते हैं - यद्यपि यह सही है कि शुद्ध मातृसत्तात्मकता दुनिया में कहीं नहीं है परंतु भारत की बात करें तो सबसे अधिक मातृ सत्तात्मकता खासी जनजाति में है। इनमें वंशसत्ताउत्तराधिकार लिंग के आधार पर होता है एवं बहुधा विवाहोत्तर निवास भी स्त्री-प्रधान होता है।

माता से ही चलता है वंश - खासी समाज में वंशावली नारी से चलती है और संपत्ति की स्वामिनी भी वही होती है। किसी भी खासी संयुक्त परिवार की संरक्षक हमेशा बड़ी बेटी होती है। अब कुछ खासी लोग शिलांग आदि में संयुक्त परिवार से अलग व्यापारनौकरी आदि काम भी करने लगे हैं। खासी परिवारों में परंपरागत पारिवारिक जायदाद बेचना निषिद्ध है। खासी समुदाय में सबसे छोटी बेटी को विरासत का सबसे ज्यादा हिस्सा मिलता है। क्योंकि उसे ही माता-पिताअविवाहित भाई-बहनों और संपत्ति की देखभाल भी करनी पड़ती है।

बहुत प्राचीन है खासी समाज -  मेघालय के री-भोई जिले में मिली प्राचीन शिलाएं और औजार ये संकेत देते हैं कि राज्य की सबसे बड़ी जनजातियों में से एक खासी जनजाति इस राज्य में 1200 ईसा पूर्व से मौजूद है। परंपरागत तौर पर खासी समाज में कोई धर्म नहीं होता। पर पिछले सौ सालों में बड़ी संख्या में खासी लोग ईसाई बन चुके हैं। क्योंकि चर्च ने मेघालय में खासी समाज के शिक्षा दीक्षा में काफी काम किया है। थोड़े से खासी लोग हिंदू भी बने हैं। पर उनकी संख्या कम है।


बदल रहा है खासी समाज - इधर कुछ दशकों में यह देखा गया है कि खासी युवक काम धाम कम करते हैं, ज्यादातर घर में पड़े रहते हैं। दोस्तों के साथ खाने पीने में वक्त गुजार देते हैं जबकि महिलाएं पूरी मेहनत से काम करती हैं। कुछ संस्थाएं खासी युवकों को काम करने के लिए प्रेरित करने में लगी हैं। मुझे चेरापूंजी के रास्ते में दुकान पर काम करने वाली एक खासी लड़की मिलती है, जो कालेज की छुट्टी में पार्ट टाइम जॉब कर रही है। वह कहती है पेट के लिए समय निकाल कर काम करना पड़ता है।
 मेघालय की राजधानी शिलांग खासी बहुल आबादी क्षेत्र में स्थित है। इसलिए शिलांग के आसपास के खासी लोगों पर बाहरी संस्कृति और लगातार सैलानियों से संपर्क में रहने के कारण आधुनिक सभ्यता का प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है। अब बड़ी संख्या में खासी लोग व्यापार और नौकरी करने लगे हैं। कुछ पढ़ लिखकर अध्यापक एवं वकालत जैसे पेशे में भी आ चुके हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MEGHALYA, KHASI TRIBE, WOMEN ) 

परंपरागत खासी परिधान में - आइए हम सब थोड़ी देर के लिए खासी बन जाएं।