Tuesday, January 17, 2017

असम के महान सपूत भूपेन हजारिका की समाधि से गुजरते हुए



गुवाहाटी शहर के भीड़ भाड़ वाले इलाके से निकलकर हमलोग एयरपोर्ट रोड पर आगे बढ़ रहे हैं। गुवाहाटी से एयरपोर्ट की ओर बढ़ते समय शहर के बाहर बायीं तरफ डॉक्टर भूपेन हजारिका समाधि क्षेत्र का विशाल बोर्ड नजर आता है। असम के इस महान सपूत की यादें संजोए रखने के लिए इस समाधि क्षेत्र का निर्माण गुवाहाटी शहर में कराया गया है। 

भारतीय फिल्म संगीत और कला के क्षेत्र में भूपेन हजारिका एक अमर नाम है। उन्हें न सिर्फ असम के लोग बेइंतहा प्यार और सम्मान देते थे बल्कि हिंदी और बांग्ला लोगों के बीच भी वे उतने ही लोकप्रिय थे। उनकी आवाज में जो एक अलग किस्म की कशिश थी, उसके लोग दीवाने तो थे ही, वे जब कुछ बोलते थे तो भी उससे संगीत फूटता प्रतीत होता था।

 

बहुत पहले सरकारी माध्यम दूरदर्शन पर आए एक धारावाहिक लोहित किनारे (1988) में भूपेन का टाइटिल संगीत सुनने को मिला था। तब से उनकी आवाज कानों में रच बस गई थी। बाद में उनका प्यारा सा गीत – एक कली दो पत्तियां नाजुक नाजुक नाजुक उंगलियां सुनने को मिला। करोडो लोगों ने जब हिंदी फिल्म रुदाली (1993 ) में उन्हें दिल हुम हुम करे...गीत में सुना तो उनकी आवाज के कद्रदानों की संख्या में और इजाफा हुआ।

काफी पहले मैंने दूरदर्शन पर भूपेन दादा का एक इंटरव्यू सुना था, जिसमें वे अपने शिक्षा दीक्षा के बारे में बता रहे थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़े थे भूपेन हजारिका। वे अपने बिड़ला हास्टल के दिनों को अक्सर याद करते थे। वे पांच साल यहां पढ़े। उन्होंने पहले यहां से स्नातक की पढ़ाई की, फिर ने 1946 में काशी हिंदू विवि से ही राजनीति विज्ञान में एमए किया। अलग अलग समय पर हजारों महान विभूतियां बीएचयू में पढ़ने आईं। चूंकि मुझे भी यहां पांच साल पढ़ने का सौभाग्य मिला है इसलिए भूपेन दादा और भी अच्छे लगने लगे। 

साल 2004 में भूपेन दादा लोकसभा का चुनाव लड़े थे भाजपा के टिकट पर हालांकि वे संसद में नहीं जा सके। पर एक संगीत साधक और समाजसेवक के तौर पर उनका कद काफी ऊंचा था। साल 2016 के अक्तूबर महीने में गुवाहाटी में जालुकबाड़ी क्षेत्र में जब डाक्टर भूपेन हाजारिका समाधि क्षेत्र को देखता हूं तो बड़ी खुशी होती है कि असम के इस महान सपूत की यादों को संजोए रखने के लिए इस स्मारक का निर्माण किया गया है।
कई एकड़ में फैले इस समाधि क्षेत्र में भूपेन दादा की समाधि के साथ उनकी एक आदमकद प्रतिमा भी स्थापित की गई है। सुंदर हरित क्षेत्र के बीच पानी के फव्वारे और कृत्रिम झरनों का निर्माण किया गया है। इन झरनों के कल कल के साथ पार्श्व में भूपेन दादा के गीत बजते हैं तो माहौल मनोरम हो उठता है।  
भूपेन हजारिका का जन्म 8 नवंबर 1926 को तिनसुकिया जिले के सादिया में हुआ था। वे असमिया के कवि, गीतकार, संगीतकार के साथ संस्कृति पुरुष थे। असमिया संस्कृति का नाम उन्होंने पूरी दुनिया में ऊंचा किया। वे अपने तमाम गीत खुद लिखते, संगीत बनाते और खुद ही गाते थे। उनके गीत – ओ गंगा तू बहती क्यूं हो...ने लाखों लोगों को अंदर तक झकझोरा। भूपेन दादा को 1992 में भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजा गया। 

पांच नवंबर 2011 को 85 साल की उम्र में वे हम सब को छोड़कर चले गए, पर उनकी आवाज तो हमेशा गूंजती रहेगी। उनके निधन के 4 साल बाद साल 2015 में उनकी याद में डाक्टर भूपेन हजारिका समाधि क्षेत्र का निर्माण कराया गया है, जो अब गुवाहाटी का दर्शनीय स्थल बन गया है। यहां एक म्युजिक बूथ भी बनाया गया है जिसमें आप भूपेन दादा के पसंदीदा गीत सुन सकते हैं। इसके अलावा एक सभागार का भी निर्माण किया गया है। हर साल उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि पर बड़ी संख्या में लोग उन्हें याद करने यहां पहुंचते हैं।   



तो हमलोग पलटन बाजार से ओला कैब से एयरपोर्ट के लिए चले थे। कुल   24   किलोमीटर के एयरपोर्ट का सफर संतोषजनक रहा। बिल आया महज   349   रुपये यानी टैक्सी वाले जो मांग रहे थे उससे आधा। गुवाहाटी का एयरपोर्ट शहर से दूर थोड़ा है।  गुवाहाटी पूर्वोत्तर का सबसे बड़ा एयरपोर्ट है पर काफी भव्य नहीं है।

गुवाहाटी - लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलोई एयरपोर्ट पर इंतजार...
चेक इन के बाद लांज में इंतजार। लांज में काफी भीड़ है। कई शहरों की उडानों के लिए लोग बैठे हैं। गुवाहाटी के इस एयरपोर्ट का नाम असम की एक और महान शख्शियत लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलोई के नाम पर है। 
हमारी उड़ान दिल्ली के लिए एयर एशिया से है। उड़ान 12 बजे है। हम पर्याप्त समय पहले पहुंच गए हैं। एक जर्मनी के बुजुर्ग मिले। वे विशाल असमिया जाफी लेकर अपने वतन जा रहे हैं। असम की यादें संजोए। हमने भी छोटी जाफी ली है।
एयर एशिया से दिल्ली की ओर....
गुवाहाटी से नीयत समय पर विमान ने उड़ान भरी। हमने एयर एशिया का टिकट छह माह पहले कराया था इसलिए हमें रियायती दरों पर मिल गया था। नौ हजार में तीन लोगों का दिल्ली गुवाहाटी का टिकट। हमलोग तीन बजे दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के टी 3 पर थे। यहां से एयरपोर्ट मेट्रो सेवा का इस्तेमाल कर नई दिल्ली और फिर एक बार फिर ओला कैब से अपने घर। 11 दिनों बाद फिर से उसी दिल्ली में। पर अनादि और माधवी के जेहन में इस बार पूर्वोत्तर की ढेर सारी मीठी यादें हैं।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( BHUPEN HAZARIKA SMADHI KSHETRA, SINGER, POET, MEMORIAL, JALUKBARI, GUWAHATI )
( पूर्वोत्तर के तीन राज्यों की यात्रा के संस्मरण, आलेखों को यहां विराम। फिर कभी चलेंगे एक नई यात्रा पर, ये जिंदगी अनवरत यात्रा ही तो है ...) 

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