Wednesday, December 21, 2016

मुखौटों की रंग बिरंगी दुनिया और शामा गौरी सत्र ((18))

असम के नदी द्वीप माजुली में अभी तक हमने कई उदासीन सत्रों का दौरा किया है। अब चलते हैं एक गृहस्थ सत्र की ओर। इन गृहस्थ सत्रों में सबसे महत्वपूर्ण है शामा गौरी सत्र। गृहस्थ सत्र का मतलब है कि यहां रहने वाले भगत लोग विवाह करते हैं। अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सत्र में रहते हैं। इसलिए ये सत्र एक कालोनी की तरह हैं। पर शामा गौरी सत्र की देश विदेश में पहचान मुखौटा बनाने के केंद्र यानी मास्क मेकिंग के लिए भी है। यहां सत्राधिकार का और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मास्क मेकिंग कलाकार हेमचंद्र गोस्वामी से आपकी मुलाकात हो सकती है। यहां आप तरह तरह के मुखौटों से रूबरू हो सकते हैं।

शामा गौरी सत्र कमलाबाड़ी बाजार से 11 किलोमीटर दक्षिणापथ सत्र वाले मार्ग पर ही है। अगर आप दक्षिणापथ जा रहे हैं तो इसके साथ ही शामागौरी सत्र भी देखते हुए आ सकते हैं। एक नहर पर आने वाले पुल से बायीं तरफ उतर रहे रास्ते में एक किलोमीटर अंदर शामा गौरी सत्र स्थित है।

शामा गौरी सत्र के प्रवेश द्वार पर हमारी मुलाकात हेमचंद्र गोस्वामी के भतीजे और उनकी पत्नी से होती है। उनके गोद में एक नन्हा सा बच्चा भी है। यहां हमारा गृहस्थ सत्र से पहला साक्षात्कार होता है। प्रवेश द्वार से आगे बढ़ने पर हमें लॉन में कुछ कलाकार मुखौटे बनाने में व्यस्त नजर आते हैं। सत्र के द्वार पर कई मुखौटे सजा रखे हैं। अंदर जाने पर पहले से कुछ सैलानी वहां मौजूद थे। 


वयोवृद्ध हेमचंद्र गोस्वामी से हमारी यहीं मुलाकात होती है। वे दिन भर आने  वाले सैलानियों को मुखौटों के बारे में जानकारी देते हैं। सौम्य व्यवहार के हेमचंद्र के व्यक्तित्व पर कहीं से भी इतने बड़े कलाकार होने वाले अहंकार का अंशमात्र नहीं दिखाई देता है। वे हमें तरह तरह के मुखौटे दिखाते हैं। इसके बाद पत्नी और बेटे को बारी बारी से कुछ मुखौटे पहनने का आग्रह करते हैं। पत्नी को मोहिनी का मुखौटा देते हैं। वहीं बेटे अनादि जटायु और ताड़का का मुखौटा पहनकर देखते हैं।

माजुली में मुखौटा बनाने की कला उतनी ही पुरानी है जितनी पुरानी की ये सत्र व्यवस्था। वैष्णव संत शंकर देव और माधव देव ने कई नाटक लिखे हैं। इन नाटकों में खासतौर पर जानवरों के चरित्र का अभिनय करने के लिए इन मुखौटों का सहारा लिया जाता है। इन मुखौटों का इस्तेमाल नाटक के अलावा रासलीला में भी किया जाता है। इसलिए यहां हमें रामकथा से जुड़े हुए मुखौटे दिखाई देते हैं। इनमें रावण, कुंभकर्ण, गणेश, हनुमान, जटायु, पूतना, शूर्पनखा, जांबवंत आदि के मुखौटे प्रमुख हैं। हर साल माजुली में होने वाली रासलीलाओं में भी इन मुकौटों का खूब इस्तेमाल होता है।

इन मुखौटों के बनाने की प्रक्रिया काफी जटिल है। सबसे पहले जिस पात्र का भी मुखौटा बनाना हो उसका बांस की महीन पट्टियों से खांचा तैयार किया जाता है। दूसरे चरण में इस खांचे के ऊपर मिट्टी की परत चढ़ाई जाती है। इसमें कार्ड बोर्ड, गाय के गोबर आदि का भी इस्तेमाल होता है। एक मुखौटा कम से कम तीन दिनों में जाकर तैयार होता है। तैयार मुखौटे को उसकी जरूरत के हिसाब से अलग अलग रंगों में पेंट भी किया जाता है।
अगर मुखौटा काफी जटिल हो तो कई दिन भी लग सकते हैं। हेमचंद्र गोस्वामी की कई पीढ़ियां यहां मुखौटा बनाने के काम में जुटी हुई हैं। यहां से आप कई तरह के मुखौटे खरीद भी सकते हैं। सम्मानित कलाकार हेमचंद्र गोस्वामी मुखौटा बनाने के साथ शामा गौरी सत्र में गृहस्थ जीवन जीते हैं। वे आश्रम के नियमों के मुताबिक सुबह शाम अपने परिवार के सदस्यों के साथ प्रार्थना में भी हिस्सा लेते हैं। खुद हेमचंद्र गोस्वामी और उनकी अगली पीढ़ी के मुखौटा कलाकार दिल्ली के इंदिरा गांधी कला केंद्र में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं।
  
- विद्युत प्रकाश मौर्य

(ASSAM MAJULI, SAMAGAURI SATRA, HEM CHANDRA GOSWAMI, MASK MAKING ) 

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