Saturday, September 24, 2016

बैरकपुर और 1857 के शहीद मंगल पांडे

सिपाही विद्रोह यानी 1857 की क्रांति। कुछ इतिहासकार इसे क्रांति नहीं मानते। पर भारत में ब्रिटिश हूकुमत के खिलाफ देश के कई हिस्सों से आवाजें उठी थीं, कई जगह बड़ा विद्रोह हुआ। इन विद्रोह के नायकों में से एक थे मंगल पांडे। कौन मंगल पांडे। भोजपुरिया माटी के सपूत, मंगल पांडे का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ था। उन्होंने विद्रोह का बिगुल फूंका बंगाल के बैरकपुर कैंटोनमेंट में। बचपन से मंगल पांडे का नाम सुनता आया था, इसलिए बंगाल में बैरकपुर को देखने की इच्छा थी जहां मंगल पांडे ने विद्रोह किया।

सियालदह रेलवे स्टेशन से लोकल ट्रेनें जाती हैं। मैं बैरकपुर का टिकट लेकर लोकल में बैठ जाता हूं। बैठ नहीं खड़ा ही रहता हूं। भीड़ है बैठने की जगह नहीं मिली। विधाननगर, दमदम जंक्शन, बेलगढ़िया, आगरपाड़ा, सोदेपुर, खड़दह, टीटागढ़ इसके बाद आ गया बैरकपुर। हालांकि ट्रेन रानाघाट तक जा रही है।
बैरकपुर रेलवे स्टेशन के बाहर लस्सी की दुकानें 
बैरकपुर रेलवे स्टेशन से बाहर आता हूं। ढेर सारी लस्सी की दुकाने हैं। लोगों से मंगल पांडे उद्यान पूछता हुआ आगे बढ़ता हूं। सड़क का नाम एसएन बनर्जी रोड है। आगे चिड़िया मोड़ आता है। यहां से लोकल बस  में बैठ जाता हूं। थोड़ी दूर आगे कैंटोनमेंट एरिया शुरू हो जाता है। बस कंडक्टर हमें मंगल पांडे पर उतार देता है। 

कैंटोनमेंट एरिया में यहां सड़क के किनारे मंगल पांडे की प्रतिमा लगी है। इस पर उनका परिचय लिखा है --  मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को उपरी बलिया जिले के नगवा गांव में भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने 1849 में 22 साल की उम्र में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में नौकरी शुरू की। वे 34 बंगाल नेटिव इन्फेंटरी के 6ठी कंपनी में सिपाही थे। उन्हें अपने रेजिमेंट के कई अफसरों पर हमला करने के लिए प्रमुखता से जाना जाता है। सन 1857 की यह घटना भारत का पहले स्वतंत्रता संग्राम के तौर पर जानी जाती है। विद्रोह के लिए मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल हुआ। उन्हें 7 अप्रैल को फांसी की सजा सुनाई गई  और 8 अप्रैल 1857 को बैरकपुर के लाल बगान में फांसी पर लटका दिया गया।

इस चित्र के अलावा बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे की स्मृति में और कुछ दिखाई नहीं देता। काले रंग के मंच पर लाल रंग की मूंछ और पगड़ी में मंगल पांडे की प्रतिमा लगी है। पास में एक सुंदर चर्च है जिसका नाम सेंट बार्थलेम्यू कैथेड्रल है। बैरकपुर छावनी आज भी आबाद है। अब यह भारतीय सेना की प्रमुख छावनी है।

विद्रोही मंगल पांडे,  1446 नंबर के सिपाही ने 29 मार्च 1857 को दो ब्रिटिश अधिकारियों सार्जेंट मिस्टर जेम्स ह्यूसन और मिस्टर बेंपडे हेनरी वाग को मौत के घाट उतार दिया। वे 1857 के प्रथम बलिदानी थे। वे पहले सिपाही थे जिन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों पर गोली चलाने का साहस किया। मंगल पांडे के पिता का नाम सुदिष्ट पांडे था। वे तीन भाइयों में बड़े और अविवाहित थे। 

मंगल पांडे को दमदम छावनी के एक खलासी से जानकारी मिली थी कि जो नया एनफील्ड पी 53 कारतूस उन्हें दिया जाता है कि उसमें गाय और सूअर की चर्बी होती है। उस कारतूस को मुंह से लगातर खोलना पड़ता था। वे समझ गए कि अंग्रेज हमारा धर्म भ्रष्ट करने पर आमदा हैं। उन्हें अंदर विद्रोह की ज्वाला धधकने लगी। कारतूस वाली खबर से हिंदू और मुस्लिम दोनों सिपाही नाराज थे। मंगल पांडे की शहादत की खबर पूरे देश में आगर की तरह फैली। मंगल पांडे को फांसी दिए जाने के एक महीने बाद 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में भी विद्रोह हो गया। मंगल पांडे का फांसी का आदेश जबलपुर के सेना के आयुध कोर संग्रहालय में देखा जा सकता है।    

मैं बैरकपुर से वापसी के लिए मैं चिड़िया मोड से सीधे कोलकाता धर्मतल्ला वाली बस लेता हूं।
ये बस टीटागढ़, सोडेपुर, डनलप, नेताजी कालोनी, बीटी रोड, उलटाडांगा, गिरिश पार्क, चितरंजन एवेन्यू होती हुई एमजी रोड पहुंचती है। मैं अपने सहयात्री से पूछता हूं कि बड़ा बाजार कहां से नजदीक पड़ेगा।उनकी दी जानकारी के मुताबिक मैं एमजी रोड पर ही उतर जाता हूं। क्योंकि शाम को मैं एमजी रोड पर घूमना चाहता हूं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य-vidyutp@gmail.com       


अगली कड़ी में पढ़िए - एमजी रोड की एक शाम 

(MANGAL PANDY, KOLKATA, 1857 , BALIA ) 

1 comment:

  1. Most of the typical Bengali sweets have their origin in traditional household kitchens. Barrackpore

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