Sunday, August 9, 2015

बीएचयू के मेस के महाराज और फोसला के मेंबर

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आचार्य नरेंद्र देव छात्रावास में तीन साल रहा। यह सामाजिक विज्ञान संकाय का नया हॉस्टल था। मैं यहां 1990 से 1993 तक। इस दौरान की तमाम यादें हैं लेकिन सबसे अलहदा है मेस का खाना और मेस के महाराज। 
देश भर के तमाम विश्वविद्यालयों के छात्रवास में मेस चलते हैं। पर बीएचयू यानी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मेस संचालन का तरीका थोड़ा अलग है।
हॉस्टल में कमरा आवंटित हो जाने के तुरंत बाद मेस शुरू नहीं हुआ। तब हमलोग फैकल्टी में मैत्री जलपान गृह तो रात में कहीं और पेट पूजा कर रहे थे। जुलाई 1990 का माह था कुछ दिनों बाद मेस शुरू होने की प्रक्रिया शुरू हुई। हमारे हास्टल में चार मेस थे। वैसे बड़े हास्टल जैसे बिड़ला और ब्रोचा में 18 से 20 मेस हैं। बीएचयू के मेस में छात्रों के बीच से ही कोई मेस मैनेजर तय होता था। वह एक नोटिस चिपका देता था नोटिस बोर्ड पर अमुक तारीख से मेस नंबर 2 शुरू होगी आप कमरा नंबर 22  में संपर्क करें। आपकी पसंद है आप चारों में से कोई भी मेस ज्वाएन करें। तो मुझे याद आता है हमारे पहले मेस मैनेजर थे हमारे सीनियर संजीव मिश्र। एएनडी हॉस्टल में फैकल्टी ऑफ सोशल साइंसेज के बीए प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष के छात्र रहते थे।   




एक मेस में अधिकतम 50 सदस्य

एक मेस में अधिकतम 50 सदस्य हो सकते थे। कम से कम 30 से भी मेस चलता था। मेस के लिए स्थान बरतन
, फर्नीचर विश्वविद्यालय उपलब्ध कराता था। महाराज यानी मेस के रसोइया को थोड़ा सा मासिक वेतन भी विश्वविद्यालय के फंड से मिलता है। पर मेस को नो प्राफिट नो लास के सिद्धांत पर चलाना छात्रों की यानी मेस के मैनेजर की जिम्मेवारी है। यही बीएचयू के मेस की सबसे बड़ी विशेषता है। रविवार से लेकर शनिवार तक का मीनू आप खुद तय करो। कितनी बार मांसाहार अंडे आदि लेना है आप तय करो। रोटी घी चुपडी हो या सादी आप तय करो। पूरी छूट है। हमारे मेस का समान्य मीनू होता था दिन में रोटी, चावल, दाल, सब्जी और एक फल, रात में रोटी सब्जी, दाल चावल और एक मिठाई। हर रविवार की दोपहर ग्रैंड फीस्ट। इसमें एक साबुत मुर्गा का आधा हिस्सा। पूरियां, पुलाव, मिठाइयां आदि। जो शाकाहारी हैं उनके लिए कोफ्ता और पनीर के आईटम । रविवार को हम जमकर खाते थे उसके बाद दोपहर में लंबी नींद। रविवार शाम को मेस बंद रहता था। रात का खाना बाहर लंका पर सेवक होटल में। हां रविवार की दोपहर खाने के बाद मेस के महाराज का स्टाफ हर कमरे में बख्शीश मांगने आता था सिनेमा देखने के लिए।
आप पूछेंगे मेस का खाना कैसा होता था। मेस में आमतौर पर हफ्ते में 4 या 5 शाम नॉन वेज आइटम जरूरत होते थे।  जो शाकाहारी हैं उनके लिए उसके समतुल्य डिश होती थी। आमतौर पर पनीर का आईटम या फिर कोफ्ता। बीएचयू में कुछ मेस सालों भर शाकाहारी भी होते थे। आईआईटी में कुछ शाकाहारी मेस ऐसे थे जहां रोज घी वाली रोटी पेश की जाती थी। 

मेस का मैनेजर बनने की होड़ - हमारे मेस की विशेषता थी स्पेशल आइटम छोड़कर बाकी चीजें चाहे जितनी मर्जी खाओ। कई लोगों की तो हास्टल में आकर डाइट बढ़ जाती थी। पढ़ाई के साथ शरीर पर चर्बी छाने लगती थी। कुछ लोग तो मेस के खाने के कारण यूनीवर्सिटी छोड़ना नहीं चाहते थे। हां तो बात मेस मैनेजर की। कई छात्रों में मेस मैनेजर बनने की होड़ रहती थी। कहा जाता है कि मैनेजर बजट में थोड़ा हेरफेर करके अपने खाने का तो पैसा बचा ही लेता था। जब मैनेजर नई जींस खरीदता था तो हम कहते थे मेस की कमाई से खरीदा लगता है। सीधे सादे छात्र मैनेजर बनकर बदनामी मोल नहीं लेना चाहते थे।
हमारे अगले मैनेजर बने आशुतोष त्रिपाठी और शिवलखन सिंह। कई बार शक होने पर मेस की एक कमेटी बना दी जाती थी और मैनेजर का पद रोटेशन पर कर दिया जाता था। पर महाराज और मैनेजर के साठगांठ की बातें हवा में तैरती थीं। मेस के खाने क्वालिटी गिरने पर मैनेजर से शिकायत और बकझक के हालात भी कई बार बनते थे। आपके पास एक मेस को छोड़कर दूसरे मेस में ज्वाएन करने का विकल्प भी  हमेशा खुला रहता था। इसलिए आमतौर पर एक मेस से दूसरे मेस की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती थी।



और मेस के टेबल पर बौद्धिक चर्चाएं -  मेस की टेबल पर बैठकर हम एक घंटे तक खाते थे खासकर रात को। इस दौरान टेबल देश दुनिया की बौद्धिक चर्चा से लेकर वीमेंस कालेज की गर्ल फ्रेंड्स और सहपाठियों के नए अफेयर और ब्रेक अप पर भी चर्चा होती थी। जिनकी किस्मत में कोई लड़की नहीं वे फोसला के मेंबर होते थे। ( फ्रस्टेर्टेड वन साइडेट लवर्स एसोशिएशन ) कई टेबल पर बार खाते खाते बहस उग्र रूप भी ले लेती थी। तब कोई सीनियर मामले पर मिट्टी डालने की कोशिश करता।

हम सीनियरों का काफी लिहाज करते थे। पर ज्यादातर ऐसी बहस ज्ञान बढ़ाने वाली हुआ करती थीं। क्योंकि इतिहास, राजनीति शास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र और समाज शास्त्र में आनर्स की पढ़ाई करने वाले छात्र अपने अपने विषय का ज्ञान मेस की टेबल पर उड़ेलते थे। 
बीएचयू में -एएनडी हॉस्टल के वे दिन।  मनोज बोस और राजेश रंजन सहाय के साथ। 
देवरिया वाले मेस के महाराज - हर साल नया सत्र शुरू होने पर  हर हास्टल में महाराज लोग चक्कर लगाना शुरू कर देते थे। महाराज मतलब रसोईया। यानी कुक। उनका आग्रह होता था कि हमें महाराज रखकर मेस चलाओ। कुछ महाराज की अच्छी प्रतिष्ठा थी जो क्वालिटी का खाना बनाते थे, कुछ की खराब। बीएचयू के मेस में काम करने वाले महाराज ज्यादातर यूपी के देवरिया जिले के रहने वाले होते थे। वे और उनके सहायक भोजपुरी बोलते थे। हम लोग खराब खााना होने पर शिकायत करते तो महाराज शालीनता से पेश आते। आमतौर पर महाराज लोग बडे़ सहनशील थे।
 बीए तृतीय वर्ष  यानी साल 1992 से 1995 तक मैंने एएनडी और राजाराम छोड़कर अय्यर हास्टल का मेस ज्वाएन कर लिया था। अय्यर विज्ञान संकाय के शोध छात्रों का हास्टल था। इस मेस की खास बात थी कि यह गर्मी की छुट्टियों में में भी बंद नहीं होता था। इस मेस की सदस्यता मुझे अपने सहपाठी परमेश्वर प्रताप के बड़े भाई सिध्देश्वर सिंह मौर्य के कारण मिली थी। अगर मेस कमेटी चाहे तो दूसरे हास्टल के छात्रों को सदस्यता दे सकती है।

अब बात बजट की भी कर लें। साल 1990 में मेस का मासिक बजट 350 रुपये के आसपास आ रहा था। जब 1995 में बीएचयू छोड़कर दिल्ली आ रहा था तब मासिक बजट 550 तक आ रहा था। एक ही समय मे गुणवत्ता के हिसाब से अलग अलग मेस की डायट राशि अलग अलग हो सकती थी। यह तब के बाजार के हिसाब से किफायती खाना था। तमाम खट्टी मीठी यादें हैं मेस को लेकर। पर बस इतना ही कह सकता हूं अपने हास्टल की मेस को हम हमेशा मिस करते हैं।- -- विद्युत प्रकाश मौर्य   - vidyutp@gmail.com

( BHU, AND HOSTEL, MESS, FOOD, VARANASI, FOSLA ) 


1 comment:

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