Saturday, June 11, 2016

डलहौजी - बावड़ी का पानी पीकर स्वस्थ हुए सुभाष बाबू

यह साल 1937 की बात है। महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जेल में अंगरेजी सरकार की यातना के दौर में तपेदिक ( टीबी) की बीमारी हो गई। वे दवाओं से ठीक नहीं हो पा रहे थे। तब उनकी चिकित्सा में लगे डॉक्टरों ने उन्हें स्वास्थ्य लाभ के लिए किसी ठंडी जगह में जाकर रहने की सलाह दी। तब सुभाष बाबू लोगों की सलाह पर हिमाचल प्रदेश के डलहौजी शहर में आए। 


पांच महीने डलहौजी में रहे नेताजी - सुभाष चंद्र बोस यहां अपने मित्र डॉक्टर धर्मबीर के घर पंजपौला रोड पर रुके। अपने डलहौजी प्रवास के दौरान नेताजी रोड पंजपोला रोड पर सुबह सैर करने निकलते थे और यहां एक बावड़ी का पानी पीते थे। धीरे-धीरे इस पानी के प्रभाव से वह स्वस्थ होने लगे।   नेताजी मई 1937 से अक्तूबर 1937 तक कुल पांच महीने डलहौजी में रहे। पूरी तरह ठीक होने के बाद वे डलहौजी से चले गए। 

अब सुभाष बाबू की याद में डलहौजी में सुभाष चौक बनाया गया है। यहां पर उनकी विशाल प्रतिमा लगी है। यहां से पहाड़ और घाटियों का सुंदर नजारा दिखाई देता है। सुभाष चौक पर ही एक पुराना चर्च है। जिस बावड़ी का पानी सुभाष बाबू पीया करते थे उसका नाम ही सुभाष बावड़ी पड़ गया है। डलहौजी बस स्टैंड से सुभाष चौक एक किलोमीटर है। आप टहलते हुए पहुंच सकते हैं। सुभाष चौक सैलानियों से दिनभर गुलजार रहता है।

जब डलहौजी पहुंचे कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर   -   न सिर्फ नेताजी सुभाष चंद्र बोस बल्कि महान साहित्यकार और कवि नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्र नाथ टैगोर की यादें भी डलहौजी से जुड़ी हैं। दरअसल बांग्ला के प्रसिद्ध साहित्यकार टैगोर अपने बालपन में यहां अपने पिता के साथ आए थे। वह 1873 के गर्मियों का समय था जब टैगोर यहां पहुंचे। तब उनकी उम्र महज 12 साल थी। अप्रैल 1873 में रबि ठाकुर अपने पिता महर्षि देवेंद्र नाथ टैगोर की उंगलियां पकड़े यहां पहुंचे। 



तब डलहौजी के नैसर्गिक सौंदर्य ने किशोर रविंद्र के मन पर गहरी छाप छोड़ी। इसका असर टैगोर के साहित्य में कई जगह दिखाई देता है।   कविगुरु रविंद्रनाथ टैगोर अपनी कविताओं, पत्रों और आत्मकथा में डलहौजी की चर्चा करते हैं। साल 1910 में अपने एक मित्र को लिखे पत्र में उन्होंने डलहौजी की पर्वत मालाओं को याद किया है।


यहां से उन्हें शांति निकेतन में शिक्षण प्रशिक्षण में नए प्रयोग करने की प्रेरणा मिली।   टैगोर डलहौजी के बकरोटा स्थित ऐतिहासिक भवन में ठहरे थे। इस भवन में आजकल एक स्कूल चलता है। स्नोडेन में एक संगमरमर की पट्टिका लगाकर टैगोर को याद किया गया है। ये पट्टिका 25 जुलाई 1994 को लगाई गई है। इस स्थल पर अब डलहौजी हिलटाप स्कूल का संचालन होता है।

विशाल तिरंगा लहराया – डलहौजी में आजकल हिमाचल प्रदेश का सबसे विशाल तिरंगा लहरा रहा है। 120 फीट के पोल पर लगे इसे तिरंगे की लंबाई 30 फीट चौड़ाई 20 फीट है। यहां आने वाले सैलानियों के लिए यह एक नया आकर्षण है। इसे स्नोडेन इलाके में चोटी पर लगाया गया है। यह डलहौजी में हर जगह से दिखाई देता है। यह तिरंगा इतनी ऊंचाई पर है कि कई बार पठानकोट जिले के कुछ स्थलों से भी दिखाई देता है। तिरंगा डलहौजी पब्लिक स्कूल के कैंपस में लगाया गया है।
 -विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com

आगे पढ़िए - डलहौजी से  मिनी स्विटजरलैंड की ओर...
( SUBHASH, NETAJEE, RABINDRA NATH TAGORE, TIRANGA, DALHOUSIE )


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