Monday, June 6, 2016

अमृतसर से पठानकोट वाया वेरका - पैसेंजर का सफर


अमृतसर में डेढ़ दिन गुजारकर हम  प्रमुख  स्थल देख चुके थे।  मैं व माधवी पहले भी आ चुके थे यहां पर अनादि पहली बार आए थे।    
यहां से हमारा अगला पड़ाव है डलहौजी। ये मेरी डलहौजी की दूसरी यात्रा होगी। तो डलहौजी जाने के लिए हमें पहले पहुंचना था पठानकोट। अमृतसर से पठानकोट पहुंचने के लिए 106 किलोमीटर सफर रेल या सड़क मार्ग से तय किया जा सकता है। हमने रेल से जाना तय किया। अमृतसर से सुबह 4.40 में और फिर 6.45 में पठानकोट के लिए पैसेंजर चलती है।
वेरका रेलवे स्टेशन


तो  हमने 6.45 वाली पैसेंजर पकड़ना तय किया। होटल रीवोली से रेलवे स्टेशन पास ही था। टहलते हुए प्लेटफार्म नंबर 8 की तरफ बने टिकट काउंटर पहुंचे। थोड़ी लंबी लाइन थी पर टिकट मिल गया। 54613 पैसेंजर ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 1ए से चलती है। ट्रेन समय से आधे घंटे देर से चली। पर हमें जगह आसानी से मिल गई। भीड़ इतनी कम थी कि माधवी तो ऊपर वाली बर्थ पर जाकर सो गई। 

अमृतसर के बाद अगला स्टेशन आता है वेरका जंक्शन। यह अमृतसर के पास का एक गांव है। वेरका के नाम पर पंजाब के मिल्क ब्रांड का नाम है। वेरका का दूध, घी पंजाब के बाहर भी लोकप्रिय हैं। घी तो कई राज्यों तक पहुंचती है। अमृतसर शहर को दूध घी को खास तौर पर जाना जाता है।  वेरका के उत्पाद हरियाणा और दिल्ली के बाजारों मे भी मिलते हैं। 


बाबा बूड्ढा और कत्थूनंगल -  वेरका से चलकर पैसेंजर पहुंची है कत्थूनंगल रेलवे  स्टेशन।  अमृतसर जिले का  छोटा सा कस्बा  है कत्थूनंगल।  कस्बा क्या गांव कहिए। पर यह पंजाब के प्राचीनतम गांवों में से एक है। इस गांव का सिख इतिहास में  महत्व है। कत्थूनगल का  रिश्ता महान सिख संत बाबा बूड्ढा  से है।   उनका जन्म कत्थूनंगल में 1506 में हुआ था। वे कुल 124 साल जीवित रहे।   उन्हें कुल पांच सिख गुरुओ का सानिध्य मिला था।  


इसके बाद जयंतीपुरा फिर बटाला जंक्शन। बटाला गुरदासपुर जिले का कस्बा है। बड़ा शहर है। पंजाब के बड़े शायर शिव बटालवी का शहर।  जब हमने अमर उजाला में योगदान किया था तो हमारे दोस्त अनिल पांडे की पोस्टिंग बटाला में हुई थी। अगला स्टेशन है बटाला शुगर मिल्स। नाम से ही जाहिर है कि यहां चीनी मिल है।
इसके अगला स्टेशन है चिन्ना। चिन्ना  के बाद रेल आ  पहुंची है धारीवाल। धारीवाल नाम बचपन से ही जाना पहचाना है। किसी जमाने में धारीवाल वूलेन्स का पूरे देश में नाम हुआ करता था। बाजार में लाल ईमली और धारीवाल की जोड़ी मशहूर थी।  मेरे पिताजी ने बचपन में मेरे  लिए एक धारीवाल की शॉल खरीदी थी। 

गुरदासपुर रेलवे स्टेशन
 सोहल और झावर के बाद आया गुरदासपुर। गुरदासपुर जिला है पर स्टेशन छोटा सा है। यहां बटाला जैसी रौनक नहीं है। गुरदासपुर के बाद दीनानगर, परमानंद, जाकोलारी, फिर सरना रेलवे स्टेशन आता है।   हमने देखा है पंजाब में लोग अपने नाम के आगे गांव का नाम टाइटिल के तौर पर लगाते हैं। तो कत्थूनंगल और सरना टाइटिलें खूब सुन रखी हैं। 
इसके आगे आया भारोली फिर रेल ने पठानकोट जंक्शन में दस्तक दे दी है। 
सुखद आश्चर्य... आधे घंटे देर से चलने वाली ट्रेन समय से पठानकोट जंक्शन पहुंच गई। बीच में मैंने स्पीड चेक किया तो यह कई स्टेशनों के बीच 80 से 90 के रफ्तार में भी दौड़ रही थी। भारतीय रेल की पैसेंजर ट्रेन समय से चले और जगह मिल जाए तो यात्रा आरामदायक और सस्ती हो जाती है। कुल 100 किलोमीटर के लिए एक व्यक्ति का किराया 30 रुपये है।  इतनी दूरी के लिए बस में 80 से 100 रुपये लग जाते। तो धन्यवाद भारतीय रेल को। फिर चलेंगे छुक-छुक  करते हुए।
पठानकोट जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंची अमृतसर पैसेंजर। 

विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( RAIL, AMRITSAR, VERKA, 
BATALA,   DHARIWAL, GURDASPUR, SARNA, PATHANKOT )

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