Sunday, June 12, 2016

डलहौजी से मिनी स्विटजरलैंड की ओर...

हमारी अगली मंजिल थी खजियार। जिसे हिमाचल प्रदेश का स्विटरजरलैंड कहा जाता है। जहां हमने अगले तीन दिन रहना तय किया था। बड़ी संख्या में ऐसे सैलानी होते हैं जो डलहौजी में रुकते हैं। यहीं से गाड़ी बुक करके खजियार जाते हैं। वहां चार घंटे गुजारने के बाद लौट आते हैं। पर हमारी योजना तो वहां कुछ दिन और रातें गुजराने की थी।


हमें बनीखेत  से खजियार जाना है। हमने एक दिन पहले पता कर लिया था कि डलहौजी बस स्टैंड से 9 बजे और 10 बजे बस जाती है। पहाड़ों पर बसें कम चलती हैं।   डलहौजी से खजियार जाने के लिए टैक्सी वाले 850 से 1050 मांग रहे थे। 850 में सिर्फ खजियार ड्राप करने का तो 1050 में चार घंटे इंतजार कर वापस लाने का शामिल था।   सुबह-सुबह हमलोग होटल से चेकआउट कर बनीखेत से निकल पड़े। डलहौजी तक के लिए शेयरिंग टैक्सी मिल गई। दस रुपये प्रति सवारी। 


 डलहौजी बस स्टैंड पर हमलोग समय से काफी पहले पहुंच गए। तो शुरू हुआ बस का इंतजार।   डलहौजी में कहीं भी आसपास भ्रमण करने के लिए टैक्सी बुक करने के लिए बस स्टैंड के पास प्रिंस टूर एंड ट्रैवल्स आदर्श टूर आपरेटर हैं। ( संपर्क – गुरबचन सिंह- 94180 10519 )   छोटे से डलहौजी बस स्टैंड पर हमें एक घंटे से ज्यादा अगली बस का इंतजार करना पड़ा। 

 
खजियार  मैदान के सामने स्थित होटल पारुल जहां हमारा ठिकाना बना...





 मिनी बस आई पीछे बनीखेत की तरफ से ही। ये  क्या बस तो ठसाठस भरी हुई है। पर देखते-देखते डलहौजी में बस खाली हो गई। और हमें जगह आसानी से मिल गई। बस चल पड़ी। पहले सुभाष चौक फिर गांधी चौक आया।

नास्ते में पंजाबी पराठे ...और क्या 
 

आगे बस स्नोडेन की ओर बढ़ चली। कंडक्टर महोदय ने किराया लिया डलहौजी से खजियार 22 किलोमीटर के लिए 30 रुपये प्रति सवारी यानी ढाई टिकट के 75 रुपये। डलहौजी से रास्ता अत्यंत मनोरम है। धूप नहीं है। बारिश भी नहीं है। पहाड़ों की चक्करघिन्नी वाली सड़क है। एक तरफ ऊंचे पहाड़ हैं तो दूसरी तरफ गहरी घाटियां।


 बस में रास्ते में कुछ लोग उतरे तो कुछ लोग चढ़े भी। रास्ते में कुछ चिकनी भौजाइयां भी बस में चढ़ी। रंग बिरंगी साड़ियों में लिपटी हुईं। चेहरे पर गाढ़ा मेकअप पोता हुआ। बोली पटनिया बोल रही थीं। वे परिवार के साथ खजियार जा रही थीं। रविवार की छुट्टी है तो थोड़ा तफरीह हो जाए।  छोटा सा बस का सफर  अच्छा रहा।  
खजियार मैदान का विहंगम नजारा 

तकरीबन एक घंटे में बस खजियार पहुंच गई। हिमाचल टूरिज्म का होटल देवदार दिखाई दिया। कुछ लोग यहीं उतरने लगे। अनादि को विशाल हरा भरा ग्राउंड दिखाई दिया। उस ग्राउंड में एक बिल्डिंग जिसके तिकोने छत पर होटल पारुल लिखा। हमें वहीं पहुंचना था। बस चौराहे से चंबा की तरफ के लिए मुड़ते हुए नीचे उतरी। फिर स्टाप पर रुकी। सामने होटल पारुल एंड रेस्टोरेंट दिखाई दे रहा था। हमने इस होटल को गोआईबीबो डाट काम से बुक किया था। 



कंटिनेंटल प्लान में यानी सुबह के नास्ते के साथ। हमें तीसरी मंजिल पर कमरा नंबर 402 मिला। खिडकियों से खजियार का विहंगम नजारा दिखाई देता है। मैं बनीखेत वाले होटल से ही गर्म पानी से नहाकर चला था। इसलिए हमलोग रेस्टोरेंट में जाकर नास्ते पर टूट पड़े।   रेस्टोरेंट के बाहर कैनोपी लगी थी जिसके नीचे सजी कुर्सियों से पूरा खजियार ग्राउंड दिखाई दे रहा था। नास्ते में आलू पराठा, पनीर पराठा। तंदूर के बने हुए। दही के साथ। तो अनादि ने छोले भठूरे का आर्डर किया। 


खजियार ग्राउंड की चहलकदमी का नजारा करते हुए जमकर नास्ता किया। माधवी पहाड़ों की चक्करघिन्नी सड़कों पर सफर के कारण एहतियात बरतते हुए बिना कुछ खाए पीए ही चलीं थी। सो यहां पनीर पराठा साथ में दही और धनिया पुदीना चटनी खाकर दिल खुश हो गया। माधवी अब एक दो घंटे आराम करना चाहती थीं। पर हमें और अनादि को चैन कहां। हम चल पड़े ग्राउंड में घूमने। आगे की कहानी अगली कड़ी में पढ़ते रहिए...





    
      विद्युत प्रकाश मौर्य -    vidyutp@gmail.com
(KHAJJIYAR, MINI SWIS, HOTEL PARUL, HOTEL DEVDAR )    
आगे पढ़िए - स्विटजरलैंड 6194 किलोमीटर  

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