Thursday, June 30, 2016

चंबा का चुक - अरे इतना तीखा


साडे चिडिए दा चंबा वे बाबुल अस उड़ जाना... जैसे गीत में चंबा का नाम आता है। पर चंबा और भी कई चीजों के लिए जाना जाता है। अपने सर्द मौसम के साथ ही बड़े ही तीखे मिर्च के अचार के लिए चंबा की पहचान है।

चंबा का चुक। यानी इतना तीखा की खाते ही जान निकल जाए. आपने कई तरह की मिर्च खाई होगी। कुछ मिर्च इतनी तीखी होती है कि आप देर तक सी सी करते हैं. कई लोगों को मिर्च का भरवां अचार पसंद है। पर आप कभी हिमाचल के चंबा का बना चुक चख कर तो देखना। नानी न याद आ जाए तो कहना।
वास्तव में चुक एक तरह का अचार ही है जो मिर्च को कूट कर बनता है. इसमें लहसुन। अदरक समेत कई दूसरे मसाले मिलाए जाते हैं। पर ये इतना तीखा कैसे हो जाता है। एक बूंद जीभ पर गया नहीं कि दिमाग झन्ना उठता है। 




चुक बनाने वाली चंबा की ममता शर्मा सवाल सुनकर हंसने लगती हैं। वास्तव में चंबा के चुक जैसा तीखा अचार हमने पूरे देश में कहीं नहीं खाया। इतना तीखा अचार बनाने में खर्च भी बहुत आता है। तभी 200 ग्राम के चुक की बोतल वे 130 रुपये  में बेचती हैं। देश भर में ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से लगाए जाने वाले सरस मेले में उनके चुक की खूब मांग रहती है। दिल्ली के प्रगति मैदान में नवंबर में लगने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में वे हर साल आती हैं।

ममता से मेरी मुलाकात श्रीनगर में हुई जब वे सैलाब में होटल रिट्ज में फंसी हुई थीं। तब वहां वे अपना स्टाक नहीं बेच सकीं। पर दो माह बाद वे प्रगति मैदान के व्यापार मेले में पहुंची। यहां पर उनका स्टाक की खूब मांग रही।

ममता हर्बल ढंग से तैयार राजमा, शहद  और बेसन भी तैयार करती हैं। पर उनकी पहचान चुक को लेकर ही है। आपने भरवां मिर्च का अचार तो खाया होगा, पर कभी मौका मिले तो ये चुक भी चख कर जरूर देखिए।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( CHAMBA,  CHUK,  PICKLE RED CHILLY, HIMACHAL PRADESH  )

Wednesday, June 29, 2016

चंबा से पठानकोट वापसी वाया कमेरा लेक

तीन दिनों के चंबा प्रवास के बाद वापसी की यात्रा भी काफी मनोरम रही। हमारा होटल चंबा बस स्टैंड से पांच किलोमीटर आगे परेल में था। इसलिए हमें बस पकड़ने के लिए बस स्टैंड जाने की कोई जरूरत नहीं थी। टाइम टेबल देख लिया था। दोपहर 11.30 बजे चलने वाली बस 20 मिनट बाद हमारे होटल के सामने से गुजरने वाली थी।

होटल छोड़ने के समय हमारी मुलाकात होटल रायल ड्रीम्स के प्रोपराइटर हितेश कुकरेजा जी से हो गई। उनसे पहले फोन पर कई बार बात हुई थी। वे हमसे मिल कर बड़े खुश हुए। उन्होंने हमें मणि महेश यात्रा के समय एक बार फिर चंबा आने की सलाह दी। हम सारा सामान लेकर होटल के सामने खड़े हो गए। थोड़ी देर में हिमाचल रोडवेज की मनाली जाने वाली बस आई। भीड़ नहीं थी। आसानी से मनचाही जगह मिल गई। 
रावी नदी पर चंबा बनीखेत मार्ग पर बना जलाशय

रावी नदी के साथ चल रही सड़क पर हमारी बस आगे बढ़ रही थी। चंबा शहर पीछे छूटता जा रहा था। वह शहर हमें किसी सपने जैसा लग रहा था, जहां हमने तीन दिन गुजारे थे। दस किलोमीटर चलने पर चनेड़ नामक छोटा सा कस्बा आया। इसके बाद शुरू हो जाता है रावी नदी पर बने विशाल जलाशय का नजारा। सर्पीले वलय खाती सडक पर बस आगे बढ़ रही है। एक तरफ ऊंचा पहाड़ है तो दूसरी तरफ रावी नदी। नदी का जल काफी नीचे गहराई में दिखाई दे रहा था। हमने खिड़की के पास वाली जगह ली और कैमरा क्लिक करता गया। जितनी तस्वीरें ले सकता था लेता रहा। ऐसा लग रहा था मानो इन सारे खूबसूरत नजारों को  कैद कर लूं। कहीं कहीं नदी के उस पार सड़क नजर आती है। रावी नदी पर बने कमेरा जलाशय में एक स्थल है जहां पर सैलानियों के लिए जलाशय में बोटिंग की सुविधा उपलब्ध है।
रावी नदी पर जलाशय के किनारे लेक व्यू ढाबा। 

कमेरा लेक के पास आता है द्रड्डा नामक कस्बा। यह 1500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर एक पुलिस चौकी है। हाईवे पर कहीं कहीं हमें ढाबे भी नजर आते हैं। इसी मार्ग पर एक लेक व्यू ढाबा नजर आता है। द्रड्डा के बाद आता है परिहार। और परिहार के बाद गाडियार। थोड़ा आगे चलने पर गोली नामक कस्बा आता है। गोली  बनीखेत और चंबा के बीच छोटा सा कस्बा है गोली। यहां से प्रसिद्ध भलेई माता का मंदिर 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। गोली में अच्छा खासा बाजार और बैंकों की शाखाएं नजर आती हैं।
यहां से भलेई देवी के लिए रास्ता बदलता है....
इसके बाद आता है देवी देहरा नामक  बस स्टाप।  देवी देहरा से आगे बढ़े पर हम पहुंचते हैं बाथरी।  – बाथरी से बनीखेत की दूरी 7 किलोमीटर है। बाथरी बनीखेत के बीच सुकडाई बाई नामक एक गांव आता है। चंबा से बनीखेत के बीच की दूरी 47 किलोमीटर है। 

बनीखेत में सारी बसे 10 से 20 मिनट रुकती हैं। पर हमारी बस बनखेत से चलकर डलहौजी जाती है। डलहौजी में थोड़ी देर रुकने के बाद फिर बनीखेत आती है। इसके बाद आगे के सफर पर रवाना हो जाती है। 
रावी नदी पर बने जलाशय का एक और नजारा 
सुबह 11.30 बजे चंबा से चलने वाली ये बस अगले दिन सुबह 5 बजे मनाली पहुंच जाती है। बनीखेत के बाद आने वाला नैनीखड्ड में तीखे मोड़ और गहरी खाई है। पंजाब के दुनेरा में पहुंचने तक पूरा रास्ता पहाड़ी है। पहाड़ों पर बस हो या कार ड्राइविंग के लिए काफी कुशलता और धैर्य चाहिए। हमने पठानकोट पहुंचने के बाद अपने ड्राईवर महोदय को मन ही मन धन्यवाद कहा।
चंबा से मनाली जाने वाली बस। 
पठानकोट से हमारी ट्रेन धौलाधार एक्सप्रेस रात को 11.20 बजे थी। इस बीच मैं अपने पुराने मित्र शिवबरन तिवारी से मिलने पहुंचा। वे यहां दैनिक भास्कर में कार्यरत हैं। अनादि अपने दोस्त से मिलना चाहते थे जो ट्रांसफर होने के बाद पठानकोट आ गया है। उनकी भी मुराद पूरी हो गई। धौलाधार एक्सप्रेस अपने नियत समय पर खुली। पर हमारी बर्थ ए 2 कोच में है तो माधवी की ए 3 में। हम ट्रेन में अलग अलग हो गए। पूरे कोच में दिल्ली के एक निजी स्कूल, ( ग्रीनफिल्ड्स, सफदरजंग एन्क्लेव ) के 12वीं कक्षा के छात्र छात्राएं हैं जो चंबा भ्रमण करके लौट रहे हैं।

ये लोग सारी रात ट्रेन में हंगामा करते रहे। सोने का तो सवाल ही नहीं उठता। सुबह का सूरत उगा तो हमारी ट्रेन लुधियाना, धूरी, संगरूर, जाखल जैसे स्टेशनों को छोड़ती हुई जय जयवंती नाम स्टेशन से आगे बढ़ रही थी। नाम मजेदार है ना। इसी नाम का एक शास्त्रीय संगीत में राग भी है। अब बस इतना ही। फिर चलेंगे किसी और यात्रा पर।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
(CHAMBA, RAVI RIVER, BANIKHET, PATHANKOT, HIMACHAL ROADWAYS ) 
हरियाणा में है जयजयवंती रेलवे स्टेशन 



Tuesday, June 28, 2016

चंबा का रुमाल, शॉल और जूतियां

चंबा रुमाल पर राधाकृष्ण । ( सौ - होटल रायल ड्रिम्स) 
चंबा अपने शॉल, रूमाल और जूतियों के लिए जाना जाता है। अगर आप चंबा से कुछ खरीद कर ले जाना चाहते हैं तो इनमें से कुछ चुन सकते हैं। सबसे पहले बात चंबा के रुमाल की। चंबा का रुमाल वास्तव में कोई जेब में रखने वाला रूमाल नहीं होता। वास्तव में यह शानदार कढ़ाई की हुई वाल पेटिंग होती है।
चंबा के रुमाल को स्थानीय कलकार कई दिनों तक मेहनत करके तैयार करते हैं। इसे तैयार करने में 10 से दिन से दो महीने तक भी लग सकते हैं।  यह रुमाल के आकार और उसकी डिजाइन पर निर्भर करता है। जाहिर है इतना श्रम साध्य कार्य है और कला का उत्कृष्ट नमूना है तो इसकी कीमत भी ज्यादा हो गई। पर सैकड़ों साल से चंबा का रूमाल बुनने का काम क्षेत्र में चला आ रहा है। वास्तव में हिमाचल के बहुत से इलाकों के रोजी रोजगार का साधन लघु और कुटीर उद्योगों पर आधारित रहा है। इसलिए चंबा के ग्रामीण क्षेत्र में कलाकार रुमाल को अदभुत तरीके से बनाते हैं। इन रूमालों पर कृष्ण की पूरी रासलीला का अंकन देखा जा सकता है। कई रूमालों में विवाह संबंधी दृश्य का अंकन देखा जा सकता है। 

किसी जमाने में इन रुमालों का लेन देन शादी के दिनों में अधिक रहा है। इसलिए इन पर विवाह के दृश्यों का अंकन किया जाता है। इसके अलावा चंबा रुमाल में समुद्र मंथन, राधाकृष्ण, दशावतार के चित्र देखे जा सकते हैं। एक रूमाल बनाने में काफी वक्त लग जाता है। अठारहवीं सदी में चंबा रुमाल का काम शबाब पर था। राजा उमेद सिंह ( 1748- 1764) ने चंबा रुमाल बनाने वाले कलाकारों को संरक्षण दिया। बाद में धीरे धीरे उम्दा किस्म के रुमाल बनाने वाले कारीगर कम होने लगे। 

 साल 1911 में हुए दिल्ली दरबार में चंबा के राजा भूरी सिंह ने ब्रिटेन के राजा को चंबा के रुमाल की कलाकृतियां तोहफे में दी थीं।  1965 में पहली बार चंबा रुमाल बनाने वाली कलाकार माहेश्वरी देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।  हालांकि नई पीढी में लड़कियां चंबा का रुमाल बनाने की कला में कम रुचि दिखा रही हैं।

हिमाचल में कुल्लू का शॉल तो प्रसिद्ध है ही पर चंबा के शॉल भी कुल्लू के शॉल की तरह की सुंदर होते हैं। ऊनी धागे से बनने वाले ये शॉल काफी गर्म होते हैं। खादी ग्रामोद्योग भंडार की दुकानों में चंबा के शॉल 400 रुपये और उसके अधिक कीमत पर खरीदे जा सकते हैं। हमने चंबा के बाजार में कलाकारों को खड्डी पर शॉल बनाते हुए देखा।

चंबा के चप्पल और जूतियां -  चंबा अपनी जूतियों के लिए मशहूर है। चंबा शहर में घूमते हुए आप चंबा की बनी हुई जूतियां खरीद सकते हैं। ये जूतियां महिलाओं के लिए खासतौर पर बनाई जाती हैं। अपनी सुंदरता और आरामदेह बनावट के लिए मशहूर इन जूतियों की कीमत महज 250 रुपये से शुरू हो जाती है।

चंबा शहर के मुख्य बाजार में जूूतियों की कुछ दुकानें हैं। चौगान के आसपास के बाजारों में आप इन दुकानों में खरीददारी करते समय थोड़ा बहुत मोल भाव भी कर सकते हैं। पर अगर चंबा आए हैं तो एक दो जोड़ी जूतियां लेकर जरूर जाएं।
- - विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
( CHAMBA, HIMACHAL, SHAWL, RUMAL, JUTI ) 

Monday, June 27, 2016

मां चामुंडा के चरणों में बसा है चंबा शहर

चामुंडा मंदिर के बारे में कहा जाता है कि चंबा नगर बसने से पहले भी विद्यमान था। वर्तमान मंदिर मूल मंदिर के नष्ट होने के बाद फिर से बनाया गया है। सारा चंबा शहर मां चामुंडा के चरणों में बसा हुआ है। मंदिर भित्ति चित्र और काष्ठकला का अदभुत उदाहरण है। चामुंडा मंदिर पैगोडा शैली में बना हुआ है। यह चंबा के बाकी मंदिरों से काफी अलग है।


कहा जाता है कि राजा शालिवर्मन द्वारा चंबा नगर बसाने से पहले यह मंदिर यहां मौजूद था। पर आपदा में मंदिर के ध्वस्त हो जाने पर इसका दुबारा निर्माण कराया गया। पैगोडा शैली के इस मंदिर का गर्भगृह ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है। इसका मंडप खुला हुआ है। निर्माण में स्लेटी पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। छतों के किनारों में चार नक्काशीदार काष्ठ निर्मित श्रंखला देखी जा सकती है। मंडप की काष्ठ निर्मित छत नौ हिस्सों में बंटी है। इस पर काष्ठ फलक और चार सुंदर प्रतिमाएं अंकित की गई हैं। बाकी आठ वर्गों में अर्धामूर्ति पूरणीय आकृतियां बनी हैं।
पूरे छत पर मूर्ति शिल्प -  चामुंडा मंदिर का पूरा छत मूर्ति शिल्प से सज्जित है। इसके बीम पर देवी देवताओं,गंधर्वों और ऋषिओं के चित्र अंकित किए गए हैं। कई बीम पर पशु पक्षियों के भी चित्र बनाए गए हैं।

मंदिर के एक स्तंभ शीर्ष पर योगासन करती मानव आकृतियां बनी हैं। गर्भ गृह के प्रवेश द्वार पर विशाल पीतल की घंटियां बनी हैं। यहां पर एक अभिलेख भी उत्तकीर्ण किया गया है। इस अभिलेख में लिखा गया है - पंडित विद्याधर ने 2 अप्रैल 1762 में 27 सेर वजन और 27 रुपये मूल्य की इस घंटी को दान में दिया था। मंदिर की शानदार कलाकृतियां और अदभुत काम, यह सब कुछ देखकर अचरज होता है। 
काष्ठ कला का सुंदर नमूना -  चामुंडा मंदिर काष्ठ कला का उत्कृष्ट उदाहरण पेश करता है। भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने चामुंडा देवी के राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया है।  

बैशाख में विशाल मेला - चामुंडा मंदिर में बैशाख मास में मेला लगता है। इस समय बैरावली चंडी माता अपनी बहन चामुंडा से मिलने के लिए आती हैं। इस दौरान विशाल मेला लगता है। उस समय श्रद्धालुओं की तांता लग जाता है।
चामुंडा मंदिर के प्राचीर से चंबा शहर का अदभुत नजारा दिखाई देता है। मंदिर ऊंचाई पर स्थित है इसलिए नीचे की तरफ पूरा शहर दिखाई देता है। मंदिर के प्रांगण से रावी नदी और सड़कों का भी सुंदर नजारा दिखाई देता है। रात की रोशनी में तो यहां से शहर का सौंदर्य और भी बढ़ जाता है। मंदिर में रोज शाम को आरती होती है। आरती के बाद अगर आप यहां से चंबा शहर का नजारा करें तो अदभुत आनंद आता है।

कैसे पहुंचे – मंदिर तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक सड़क मार्ग से और दूसरा सीढ़ियों से। कोई 500 सीढ़ियां चढ़कर चंबा के मुख्य बाजार से चामुंडा मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। अगर सड़क मार्ग से मंदिर पहुंचना है तो झुमार जाने वाले मार्ग पर कोई दो किलोमीटर चलने के बाद मंदिर पहुंच सकते हैं।
हमलोगों ने झुमार से लौटते हुए अपनी टैक्सी वाले से आग्रह किया और उन्होंने चामुंडा मंदिर के पास गाड़ी रोक दी। हमलोग दर्शन करके शहर की ओर बढ़ चले। देवी का मंदिर झुमार जाने वाले रास्ते पर ही पड़ता है। 
चामुंडा देवी मंदिर के प्राचीर से दिखाईदेता चंबा शहर और चौगान मैदान। 

Sunday, June 26, 2016

झुमार का जम्मू नाग मंदिर – खजिनाग के बड़े भाई जम्मू नाग

हिमाचल और जम्मू कश्मीर में नाग मंदिरों की बड़ी श्रंखला है। पहाड़ों पर कहावत है 18 नारायण और 18 नाग। यानी बहुत सारे नारायण और बहुत सारे नाग। इसे 18 से इसलिए जोड़ते हैं क्योंकि यह एक पवित्र अंक है। हिमाचल प्रदेश में जगह जगह नाग मंदिर हैं। नाग देवता की पूजा की परंपरा अति प्राचीन है। हो सकता है यह परंपरा उस काल से चली आ रही हो जब इंसान कबीलों में रहता था। इन नागों में बासुकि नाग सबसे बड़े माने जाते हैं। बासुकि नाग का एक मंदिर कांगड़ा में मैकलोड गंज के पास है।

चंबा क्षेत्र में भी कई नाग मंदिर हैं। इन नाग मंदिरों प्रमुख है जम्मू नाग मंदिर। चंबा से 14 किलोमीटर दूर झुमार में चंबा के नाग मंदिरों की श्रंखला में जम्मू नाग का मंदिर स्थित है। जम्मू नाग खज्जिनाग के बड़े भाई बताए जाते हैं। वे चार भाइयों में दूसरे नंबर पर आते हैं। इस मंदिर के प्रति स्थानीय लोगों में अगाध आस्था है। वर्तमान जम्मू नाग मंदिर 18वीं सदी का बना हुआ बताया जाता है। मंदिर का भवन ज्यादातर लकड़ी का बना हुआ है। देवदार की लकड़ी इस्तेमाल ज्यादा दिखाई देता है। मंदिर के मुख्य मंडप में जम्मू नाग देवता की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर प्रवेश द्वार के पास दो विशाल जानवरों के सिंग भी देखे जा सकते हैं। मंदिर के बरामदे में कई घंटियां भी लगी हैं। मंदिर के बगल में एक छोटी सी झील है। यह झील अब बुरे हाल में है। आसपास में घने जंगल हैं। 

आसपास के श्रद्धालु पदयात्रा करके जम्मू नाग के दर्शन करने आते हैं। मंदिर में सुबह शाम परंपरागत तरीके से पूजा होती है। इसमें स्थानीय वाद्य यंत्रों का प्रमुखता से इस्तेमाल किया जाता है। जम्मू नाग मंदिर परिसर में बाद में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा भी स्थापित की गई है। शिव के गले में हमेशा नाग देवता विराजमान रहते हैं इसलिए नाग मंदिर और शिव का अन्योन्याश्रय संबंध है।
चंबा के पास झुमार में स्थित ये जम्मू नाग मंदिर 7000 फीट यानी 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मौसम सालों भर सुहाना रहता है। सर्दियों में झुमार में बर्फबारी होती है। तब ये मंदिर बर्फ से ढक जाता है।

जम्मू नाग मंदिर परिसर में बच्चों का एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय संचालित होता है। स्कूल में 55 छात्र पढ़ते है। हम जब पहुंचे तो स्कूल की कक्षाएं चल रही थीं। दो शिक्षक मौजूद थे। स्कूल के भवन पर प्रेरक वचन लिखे हुए थे। ये सरकारी स्कूल काफी व्यवस्थित लगा। मुझे प्रतीत हुए ये बच्चे भी बड़े किस्मत वाले हैं जो जम्मू नाग मंदिर परिसर में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। 
-vidyutp@gmail.com
( JAMMU NAG MANDIR, TEMPLE, JHUMHAR, CHAMBA, HIMACHAL )



Saturday, June 25, 2016

झुमार - ताल से ताल मिला....

हिमाचल में चंबा के पास झुमार पहुंच जाना यूं लगता है जैसे सपनों की दुनिया में आ गए हों। झुमार चंबा शहर से 14 किलोमीटर की दूरी पर है। रास्ता लगातार चढ़ाई वाला है। पर जब आप झुमार पहुंचते हैं तो मौसम काफी बदल चुका होता है। यह एक ग्रामीण इलाका है जहां दूर दूर तक हरियाली, सेब, चीड़ और देवदार के पेड़ दिखाई  देते हैं। झुमार का नैसर्गिक सौंदर्य फिल्मकार सुभाष घई को इतना भाया कि उन्होंने अपनी सुपर हिट फिल्म ताल की आधी शूटिंग झुमार में की। 1999 में आई इस फिल्म में चंबा का सौंदर्य निखर कर आया है। झुमार में जो सेब का बाग है उसका नाम ही ताल गार्डेन रख दिया गया है। 

हालांकि ये बाग चंबा के राजघराने का है। इस बाग में एक इसकी रखवाली करने वाले परिवार का एक छोटा सा घर है। फिल्म ताल में हमें वह घर भी दिखाई देता है। सेबों के बाग में घूमते हुए हमारी मुलाकात इस घर में रहने वाले एक बच्चे से होती है जो अब 20 साल से ज्यादा उम्र के हो गए हैं। उन्हें याद है कि उन्होंने ऐश्वर्य राय और अक्षय खन्ना को यहां शूटिंग करते हुए देखा था। झुमार में फिल्म ताल के प्रारंभिक हिस्से की शूटिंग हुई है। फिल्म का लोकप्रिय गीत दिल ये बैचन है....रस्ते पे नैन है...ताल से ताल मिला....की शूटिंग हुई है। 

यहीं पर नायक और नायिका की पहली मुलाकात होती है। उनका प्रेम परवान चढ़ता है। झुमार की फिजा में आज भी रुमानियत तैरती है, जिसे आप महसूस कर सकते हैं। मई की दोपहर में यहां चटखीली धूप खिली है, पर मौसम सुहाना है। गरमी का तो नामोनिशान नहीं है। एक बार आ गए तो यहां से जाने का दिल नहीं करता।

कैसे पहुंचे - चंबा शहर के बस स्टैंड से झुमार जाने के लिए दिन भर में चार बसें जाती हैं। एक बस सुबह 9 बजे है दूसरी 1.30 बजे तो तीसरी 3 बजे। फिर 4.00 बजे फिर 5.45 , 6.30 बजे बसें जाती है। इसी तरह वापसी के लिए भी इतनी ही बसें हैं। आपके पास दूसरा विकल्प है। अपनी टैक्सी बुक करके जाएं। हमने एक टैक्सी बुक की। टैक्सी चौगान के आसपास से मिल जाती है। टैक्सी वाले आने जाने का 600 रुपये लेते हैं। वहां आप दो तीन घंटे रूक कर घूम सकते हैं।

झुमार ग्राम पंचायत बाट में पड़ता है। जम्मू नाग मंदिर के पास ही बस स्टाप है। वैसे बात करें तो झुमार मुल्तान इलाके के एक संगीत परंपरा का नाम है। हो सकता है झुमार का नाम इसी आधार पर पड़ा हो। पर यहां आप 24 घंटे प्रकृति का संगीत सुन सकते हैं।

कहां ठहरें - अगर आप पहाड़ों पर कुछ दिन शांति के पल बीताना चाहते हैं तो झुमार में भी ठहर सकते हैं। स्वास्थ्य लाभ के लिए झुमार सुंदर जगह हो सकता है। झुमार में कुछ होटल और होम स्टे उपलब्ध हैं। एक सरकारी रेस्ट हाउस भी है। यहां आप 400 से 800 रुपये प्रति दिन की दर पर ठहर सकते हैं। कई समूह में आने वाले लोग झुमार ( JHUMHAR)  में ठहरना पसंद करते हैं।  झुमार एक गांव है इसलिए यहां सीमित दुकानें हैं और सीमित सामान उपलब्ध हैं। अगर आपकी खास जरूरत की दवाएं आदि हों तो अपने साथ ही लेकर जाएं।

ट्रैकिंग का मजा - झुमार प्रवास के दौरान आप पहाड़ों पर ट्रैकिंग कर सकते हैं। यहां की ट्रैकिंग ज्यादा चुनौतीपूर्ण नहीं है। नए लोगों के लिए ट्रैकिंग आनंददायक हो सकती है। स्थानीय लोगों की मदद से आसपास के कुछ गांवों का भ्रमण कर सकते हैं। झुमार से तीन किलोमीटर की ट्रैकिंग करके एक देवी मंदिर के दर्शन करने जा सकते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( JHUMAR, CHAMBA, TAL FILM, TRACKING, HIMACHAL ) 




Friday, June 24, 2016

चंबा शहर का दिल है ऐतिहासिक चौगान मैदान


चंपावती मंदिर के सामने विशाल हरा भरा मैदान है, जिसे चौगान कहते हैं। यह चंबा शहर का विशाल घास का मैदान है। मैदान के ठीक नीचे रावी नदी बहती हैजबकि मैदान के ऊपर शहर बसा है। आप यूं मान सकते हैं कि पूरा चंबा शहर चौगान के चारों तरफ बसा है। चौगान चंबा शहर का दिल है। लोग सुबह से शाम यहां टहलने और टाइम पास करने के लिए आते हैं। शाम को आप चौगान के किनारे बैठ कर रावी के निर्मल जल का संगीत सुन सकते हैं।

मलेशिया से मंगवाई गई थी घास - राजाओं ने बड़े ही चाव से इस चौगान मैदान को बनवाया था। इस मैदान में लगाए गए घास तब के राजाओं ने खास तौर पर मलेशिया से मंगवाया था। वहीं मैदान के चारों तरफ लगे बिजली के खंबे इंग्लैंड से मंगवाए गए थे। इस चौगान मैदान की सुंदरता लेकर चंबा में हिमाचली भाषा में बहुत से लोकगीत भी गाए जाते हैं। 
चंबा का ऐतिहासिक चौगान मैदान। 


किसी समय में चौगान एक विशाल मैदान था। पर बाद में इसे पांच हिस्सों में बांट दिया गया है। मुख्य मैदान के अलावा अब चार छोटे-छोटे मैदान हैं। छोटे मैदान में बांट देने से इसकी विशालता कम हो गई है। चौगान मैदान की कुल लंबाई लगभग एक किलोमीटर है। इसकी चौड़ाई 75 मीटर है। इसके एक तरफ समांतर बाजार की सड़क है तो दूसरी तरफ रावी दरिया। यह सब कुछ मिलकर बड़ा ही जीवंत नजारा पेश करते हैं। यहां आकर लगता है कि मानो जिंदगी ईस्टमैन कलर है। 

चौगान का मैदान सुबह से लेकर शाम तक वक्त गुजारने के लिए यादगार जगह है। यहां न सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि सैलानी भी आकर बैठते हैं और घूमते हैं। स्थानीय लोग चौगान को अपनी शान समझते हैं। तो इसी चौगान के मैदान में हमारी मुलाकात एक बार फिर ममता शर्मा से हुई। वे कश्मीर में हमें मिलीं थीं। चंबा के पास के गांव की रहने वाली हैं। हमारे चंबा में होने की खबर सुनकर वे रुक गईं हमसे मिलने के लिए। हमने उनसे बात होने पर पहले ही बोल दिया था कि चौगान में मिलेंगे। 

यहां लगता है मिंजर मेला - चौगान मैदान में ही हर साल जुलाई में चंबा का प्रसिद्ध मिंजर मेला लगता है। यह चंबा  की लोक कलाओं को पेश करने वाला मेला है। मिंजर मेले के समय चंबा में दूर दूर से सैलानी पहुंचते हैं। सात दिनों तक चलने वाला ये मिंजर मेला देश के कला संस्कृति पर आधारित मेलों में प्रमुख स्थान रखता है। मेेले में कई तरह की प्रतियोगिताएं भी होती हैं। मिंजर मेला सावन महीने के दूसरे रविवार को शुरू होता है। मेला शुरू होने के समय लोगों को मिंजर बांटा जाता है। ये मिंजर क्या है। ये कपड़ों में पहना जाने वाला एक लटकन है।

हिमाचल संस्कृति के जाने माने लेखक सतीश धर के मुताबिक- चंबा के प्राचीन मिंजर मेले की शुरुआत कुंजड़ी गायन से होती है। गीत के बोल कुछ इस तरह होते हैं -  उड़-उड़ कूजडीये...वर्ष दे दिहायडे हो ...मेरे रामा जिन्देयाँ दे मेले हो .. इसके साथ ही ऐतिहासिक चौगान मैदान नाच उठता है l इस गीत को कहरवा ताल में गाया जाता है। मान्यता है कि कुंजड़ी केवल मिंजर के दिनों में ही सुननी चाहिए। 

तो मिंजर मेले के दौरान यहां सारे लोग मिंजर धारण किए हुए रंग बिरंगे नजर आते हैं। ये उल्लास का मेला होता है। काफी लोग बाहर से भी चंबा मिंजर मेले के समय में पहुंचते हैं। हमने स्कूल को दिनों में छोटी बहन ऋतंभरा की पत्र मित्र उषा मेहता दीपा से चंबा के चौगान मैदान के बारे में सुना था। वे चंबा के पास डुगली में एक स्कूल में शिक्षिका थीं। तो आज यहां आकर बड़ा अच्छा लग रहा है। 

चंबा का मिलेनियम गेट -  मंदिर के बगल में चौगान मैदान का लाल रंग का सुदंर प्रवेश द्वार है। चौगान मैदान में एक विशाल मिलेनियम गेट का भी निर्माण कराया गया है। चौगान का एक किनारा लंबाई में रावी नदी के साथ मिलता है। यहां दो झरोखे बनाए गए हैं, जहां बैठकर आप रावी नदी की कल-कल बहती जलधारा का मुआयना कर सकते  हैं। यहीं पर एक रावी कैफे भी है। चौगान के एक तरफ हिमाचल टूरिज्म का इरावती होटल स्थित है, जो चंबा शहर का प्रमुख होटल है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य   -vidyutp@gmail.com
(CHAMBA, CHAUGAN, MINJAR MELA, IRAVATI HOTEL) 
चंबा में चौगान मैदान के पास गांधी गेट। 


Thursday, June 23, 2016

चंपावती के नाम पर पड़ा चंबा शहर का नाम

विख्यात कला पारखी और डच विद्वान डॉक्टर बोगल ने हिमाचल प्रदेश के इस चम्बा शहर को 'अचंभा' कहा था। उन्होंने यू हीं शहर को अचंभा नहीं कहा था। यहां के मंदिर कला संस्कृति में विविधता को देखते हुए उन्होंने अनायास ही यह उपाधि दे डाली थी। 

तो आइए जानते हैं चंबा शहर की कहानी। 
वैसे चंबा शहर का नाम चंबा के राजा के बेटी चंपावती के नाम पर पड़ा था।
राजा ने  इस शहर का नामकरण अपनी बेटी चम्पा के नाम पर क्यों किया था, इस बारे में एक बहुत ही रोचक कहानी सुनाई जाती है। राजकुमारी चम्पावती बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की थी। राजकुमारी हर रोज  स्वाध्याय के लिए एक साधु के पास जाती थी। 

एक दिन राजा को किसी कारण अपनी बेटी पर संदेह हो गया। शाम को जब साधु के आश्रम में बेटी जाने लगी तो राजा भी चुपके से उसके पीछे चल पड़े। बेटी के आश्रम में प्रवेश करते ही जब राजा भी अंदर गया तो उसे वहां कोई दिखाई नहीं दिया। लेकिन तभी आश्रम से एक आवाज आई – राजा तुम्हारा संदेह निराधार है। बेटी पर शक करने की सजा के रूप में उसकी निष्कलंक बेटी छीन ली जाती है। साथ ही राजा को इस स्थान पर एक मंदिर बनाने का आदेश भी मिला।

इसके बाद राजा ने देवीय आदेश का पालन करते हुए सुंदर मंदिर का निर्माण कराया। चम्बा नगर के ऐतिहासिक चौगान मैदान के पास स्थित चंपावती मंदिर को लोग चमेसनी देवी के नाम से भी पुकारते हैं। 
वास्तु कला की दृष्टि से यह मंदिर अनुपम है।
राजकुमारी चंपा के नाम पर चंबा 
इस घटना के बाद राजा साहिल वर्मा ने नगर का नामकरण राजकुमारी चम्पा के नाम कर दिया। पर यह बाद में चम्बा कहलाने लगा।

चंपावती मंदिर में शक्ति की देवी महिषासुर मर्दिनी की भी सुंदर प्रतिमा है। वहीं मंदिर परिसर में कई खूबसूरत पत्थरों की मूर्तियां दीवारों में स्थापित की गई हैं। इन मूर्तियों को आप देर तक निहार सकते हैं। चंबा के इन मंदिरों को देखते हुए लगता है मानो पूरा शहर की कोई पेंटिंग गैलरी के सरीखा हो। शहर की रचना कुछ इस तरह की है कि यह विश्व विरासत के शहर का दावेदार हो सकता है। तो आइए चलते हैं चंबा शहर के और मंदिर का दर्शन करने। 



भगवान विष्णु को समर्पित है चंबा का हरि राय मंदिर  

चंबा में चौगान मैदान के एक कोने में हरि राय मंदिर स्थित है। यह चंबा के कलात्मक मंदिरों में से एक है। यह भगवान विष्णु का एक सुंदर मंदिर है। इसका निर्माण 11वीं सदी में राजा सालबाहन द्वारा हुआ था। मंदिर के शिखर पर काफी कलात्मक काम किया गया है। यहां विष्णु को छह घोड़ों पर सवार देखा जा सकता है। मंदिर के अंदर शिव की भी प्रतिमा है। शिव यहां उमा महेश्वर के रूप में विराजमान हैं। मंदिर में नीचे से लेकर ऊपर तक इसके बाहरी दीवारों पर अदभुत काम किया गया है।  यह मंदिर भी पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। मंदिर सुबह 10 बजे से सांय 5 बजे तक खुला रहता है। चंबा के लक्ष्मीनारायण मंदिर समूह, चंपावती मंदिर, हरि राय मंदिर और मां चामुंडा मंदिर के दर्शन के लिए आपके पास पूरे एक दिन का वक्त होना चाहिए। 









- विद्युत प्रकाश मौर्य   -vidyutp@gmail.com
(CHAMBA, CHAMPAWATI TEMPLE, HARI RAI TEMPLE, VISHNU, SHIVA, 11th CENTURY ) 

Wednesday, June 22, 2016

विलक्षण है चंबा का लक्ष्मीनारायण मंदिर समूह

हिमाचल प्रदेश का छोटा सा शहर चंबा मंदिरों का नगर है। वैसे चंबा के आसपास कुल 75 प्राचीन मंदिर हैं। छोटे से शहर में ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के कई मंदिर हैं। इन मंदिरों में प्रमुख है लक्ष्मीनारायण मंदिर समूह। यह चंबा शहर का सबसे विशाल मंदिर समूह है। मंदिर मुख्य बाजार में अखंड चांदी पैलेस के बगल में स्थित है। मंदिर परिसर में श्रीलक्ष्मी दामोदर मंदिर, महामृत्युंजय मंदिर, श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर, श्री दुर्गा मंदिर, गौरी शंकर महादेव मंदिर, श्री चंद्रगुप्त महादेव मंदिर और राधा कृष्ण मंदिर स्थित है।

लक्ष्मीनारायण मंदिर समूह एक वैष्णव मत का मंदिर है। इसे दसवीं सदी में राजा साहिल वर्मन ने बनवाया था। मंदिर को स्थानीय मौसम को देखते हुए लकड़ी के इस्तेमाल से तोरण द्वार और शिखर बनवाए गए थे। विष्णु का वाहन गरुड़ की धातु की बनी प्रतिमा मुख्य द्वार पर सुशोभित हो रही है। 1678 में राजा चतर सिंह ने मुख्य मंदिर में सोने के आवरण चढ़वाया। मंदिर परिसर काफी भव्य और मनोरम है।

भगवान विष्णु पर केंद्रित यह मंदिर पांरपरिक वास्तुकारी और मूर्तिकला का उत्कृष्‍ट उदाहरण है। चंबा के 6 प्रमुख मंदिरों में यह मंदिर सबसे विशाल और प्राचीन है। कहा जाता है कि सवसे पहले यह मन्दिर चम्बा के चौगान में स्थित था परन्तु बाद में इसे वर्तमान स्थल पर स्थापित किया गया।

शिखर शैली में बने इस मंदिर परिसर में राधा कृष्ण, शिव व गौरी आदि देवी-देवताओं के मंदिरों को भी शामिल हैं।  इस मन्दिर समूह में महाकाली, हनुमान, नंदीगण के मंदिरों के अलावा विष्णु एवं शिव के तीन-तीन मंदिर हैं। 

मंदिर में स्थित लक्ष्मी नारायण की बैकुंठ मूर्ति कश्मीरी और गुप्तकालीन निर्माण कला का अनूठा संगम हैइस मूर्ति के चार मुख और चार हाथ हैं। मूर्ति की पृष्ठभूमि में तोरण है, जिस पर दस अवतारों की लीला चित्रित की गई है।

चंबा के लक्ष्मीनारायण मंदिर का इंतजाम ट्रस्ट देखता है। इसके लिए लक्ष्मीनारायण मंदिर ट्रस्ट का निर्माण किया गया है। मंदिर परिसर में एक संग्राहालय, प्रवचन कक्ष भी है। श्रद्धालुओं के शौचालय और पेयजल का भी सुंदर इंतजाम है। संग्रहालय में आप चंबा शहर के इतिहास और चंबा राज घराने से जुड़ी रोचक जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं। 


मंदिर में लगातार साधु संतों का प्रवचन - लक्ष्मीनारायण मंदिर के प्रवचन कक्ष में अक्सर साधु संतों का प्रवचन चलता रहता है। देश में लक्ष्मीनारायण के और भी कई मंदिर हैं पर इन सबके बीच चंबा का यह मंदिर अपना अनूठा स्थान रखता है।

कैसे पहुंचे – चंबा बस स्टैंड से मंदिर की दूरी एक किलोमीटर के करीब है। यहां पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। निकटम रेलवे स्टेशन पठानकोट है, जहां से 120 किलोमीटर की बस यात्रा करके चंबा पहुंच सकते हैं।


-vidyutp@gmail.com
( CHAMBA, HIMACHAL, LAXMI NRAYAN TEMPLE, VISHNU ) 

Tuesday, June 21, 2016

जायका का स्वाद जो कभी नहीं भूलता...

दोपहर में हमलोग होटल रायल ड्रीम में चेक-इन कर चुके थे। अब चंबा शहर को देखने निकलना था। चंबा में चौगान पर हमारा इंतजार ममता शर्मा कर रही थीं। वही ममता जो हमें श्रीनगर में मिली थीं। दिल्ली के प्रगति मैदान में भी दो बार मिलीं। वे अपने गांव जा रही हैं। उनका घर चंबा से 60 किलोमीटर आगे तीसा क्षेत्र में है। हमारे होटल से बस स्टैंड 5 किलोमीटर है। वहां तक जाने के लिए समय समय पर आने वाली बस ही विकल्प है। पर हमें भूख लग रही है। 

जायका रेस्टोरेंट का लजीज खाना - हमारे होटल वाले ने जायका रेस्टोरेंट में खाने की सलाह दी। तकरीबन 800 मीटर पैदल चलने के बाद बालू ब्रिज के पास होटल जायका रेस्टोरेंट आया। होटल का डायनिंग हाल विशाल है। हमने खाने का आर्डर दिया। 70 रुपये की समान्य थाली और 120 की स्पेशल थाली। समान्य थाली में दो लच्छा पराठा, चावल, दो सब्जियां, कडी पकौड़ा, दाल ।  जायका का बतरन बड़े ही सुंदर हैं। सभी सब्जियां परोसी जाने वाली कटोरियों की बनावट हमें काफी पसंद आईं। खाने का स्वाद भी अच्छा था। अगर दो लच्छा पराठा नहीं लें तो तीन बटर रोटी ले सकते हैं। जो 120 रुपये वाली स्पेशल थाली है उसमें एक पनीर वाली सब्जी, एक मिस्सी रोटी और एक स्वीट डिश (आईसक्रीम) अतिरिक्त है। हमने एक समान्य और एक स्पेशल थाली मंगाई और छक कर खाया। 

अपने चंबा प्रवास में जब-जब मौका मिला हमलोग खाने के लिए जायका में ही पहुंचे. हालांकि जायका सुबह के नास्ते में पराठे भी पेश करता है, पर हमें इसका मौका नहीं मिल सका। हमारी रेस्टोरेंटके प्रोपराइट से मुलाकात तो नहीं हो सकी, पर चंबा में इतने बेहतरीन रेस्टोरेंट के लिए धन्यवाद। ( JAYKA RESTURANT, Balu Bridge, Sultanpur, Chamba )
भरपेट खाने के बाद हमने बस स्टैंड तक जाने के लिए बस ली। बस सुल्तानपुर के बाद रावी नदी पर शीतला ब्रिज पार करके बस स्टैंड पहुंची। बस स्टैंड से दो सौ मीटर आगे जाने पर चंबा का विशाल चौगान मैदान आ जाता है। चौगान में खिली खिली धूप में ममता शर्मा हमारा इंतजार कर रही थीं। थोड़ी देर पुरानी यादें ताजा करने और सुख दुख साझा करने के बाद हमलोग आगे बढ़े। 
चंबा के बाजारों से होते हुए भूरी सिंह संग्रहालय की और बढ़े।संग्रहालय के बाद चर्च देखते हुए हम लक्ष्मीनाराय मंदिर पहुंच गए। ममता का गांव यहां से 60 किलोमीटर दूर है। उनके गांव जाने वाली आखिरी बस शाम को 4 बजे है। वे चली गईं गांव अपने। हम शाम तक चंबा के बाकी मंदिर और बाजार घूमते रहे। परेल स्थित होटल पहुंचने के लिए हमें रात 8 बजे बस मिली।

चंबा शहर में आटो रिक्शा या छोटे वाहन नहीं चलते। चूंकि हमारा होटल पठानकोट मुख्य मार्ग पर है इसलिए बनीखेत पठानकोट जाने वाली सारी बसें वहां से होकर गुजरती हैं। रात का खाना अपने होटल से सामने वाले ढाबे में खाने के बाद मीठी नींद में चले गए। कल फिर किसी नई जगह पर।
vidyutp@gmail.com

(CHAMBA, HIMACHAL, ZAIKA PISHORI DHABA, BALU BRIDGE)