Thursday, June 30, 2016

चंबा शहर - यहां से वापसी का दिल नहीं करता


झुमार की हरी-भरी वादियों से लौटने के बाद आधा दिन का समय है हमारे पास। चंबा शहर तो पूरा घूम चुके हैं। तो क्या हुआ चंबा से अभी दिल नहीं भरा। अभी और घूमेंगे शहर।   चौगान मैदान के पास चंबा शहर का जिला एवं  सत्र न्यायालय का छोटा सा भवन है।  भले  ही चंबा  शहर आबादी में बड़ा न  हो पर जिले का भौगोलिक दायरा बहुत बड़ा है।


चौगान मैदान के किनारे रावी नदी के तट पर   पदयात्रियों के लिए सुंदर ट्रैक बना हुआ है। इस ट्रैक के साथ ही छोटे छोटे आरामगाह भी बने हुए हैं।  दोपहरिया में यहां  बैठना या आराम से लेट जाना बड़ा सुखकर लगता है।   बेतकल्लुफ होकर। दुनिया के सारे रंजोगम से दूर।


थोड़ी देर आराम करने के बाद अनादि की इच्छा बाजार में  घूमने की हुई तो हमलोग चल पड़े चंबा की गलियों में।  पहाड़ों के बाजार बड़े प्यारे लगते हैं।   यहां दूर-दूर से गांव के लोग खरीददारी करने आते हैं।  और शाम होने से  पहले अपने गांव की ओर लौट जाते हैं।  अगर आखिरी बस छूट जाए तो इसी शहर में रुकना पड़ेगा। 


तो ऐसे लोगों  के लिए चंबा में रहने के वास्ते सस्ते गेस्ट  हाउस भी हैं जो टूरिस्टों की   तुलना में उन्हे सस्ती दरों पर मिल जाते हैं। पर फिलहाल अनादि की इच्छा आइसक्रीम खाने की है। तो मैंने उनकी इच्छा पूरी करवा दी है। और वे  आइसक्रीम लेकर बड़े आह्लादित हैं।


चंबा शहर में घूमते हुए भी आपको प्रकृति के कई रूपों से साक्षात्कार का मौका मिलता है। जरा ऊपर की ओर नजर उठाएं तो हिमालय की पर्वतमाला नजर आती है। बर्फ से  ढकी हुई हिमालय की चोटियां नजर आती हैं। मौसम साफ होने पर मणि महेश के  यहां से दर्शन हो जाते हैं।  अब जरा नीचे की ओर नजर फेेरें। 


नीचे इरावती यानी रावी नदी अपनी मस्ती में  आगे बढ़ती नजर आती है।  इन नदियों की जलधाराएं और इन पर्वत श्रंखलाओं को  देखते हुए सारा दिन काटा जा सकता है। भला इससे अच्छी छुट्टियां और क्या हो सकती हैं।  मुझे लगता है वे लोग बड़े ही सौभाग्यशाली  हैं जिन्हें   हमेशा इन्ही वादियों में रहने का  मौका मिला हुआ है। 


तो अब घूमते हुए शाम हो गई है। तो अब वापसी अपने  होटल की ओर चलें।  चंबा के बस स्टैंड या चौगान मैदान से हमारा होटल पांच किलोमीटर की दूरी पर है।   पर जान के लिए अच्छा साधन है कि किसी  पठानकोट की तरफ जाने वाली बस  में बैठ जाएं और अपने होटल के पास उतर जाएं। 


चंबा में हमारे होटल के पास रावी नदी के तट पर भी  एक सुंदर  सा मंदिर समूह है। ये मंदिर नया बना हुआ है। मंदिर परिसर में विशाल शिव की प्रतिमा है।  मंदिर के दीवारों पर पानी का मोल समझाती हुई पंक्तियां लिखी हैं।   भले ही पहाड़ों पर पानी  की कमी नहीं पर यहां लोग पानी का मोल खूब समझते हैं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
( CHAMBA, HIMACHAL, MARKET, RAVI RIVER, IRAVATI ) 


Wednesday, June 29, 2016

चंबा का रुमाल, शॉल और जूतियां

चंबा रुमाल पर राधाकृष्ण । ( सौ - होटल रायल ड्रिम्स) 
चंबा अपने शॉल, रूमाल और जूतियों के लिए जाना जाता है। अगर आप चंबा से कुछ खरीद कर ले जाना चाहते हैं तो इनमें से कुछ चुन सकते हैं। सबसे पहले बात चंबा के रुमाल की। चंबा का रुमाल वास्तव में कोई जेब में रखने वाला रूमाल नहीं होता। वास्तव में यह शानदार कढ़ाई की हुई वाल पेटिंग होती है।
चंबा के रुमाल को स्थानीय कलकार कई दिनों तक मेहनत करके तैयार करते हैं। इसे तैयार करने में 10 से दिन से दो महीने तक भी लग सकते हैं।  यह रुमाल के आकार और उसकी डिजाइन पर निर्भर करता है। जाहिर है इतना श्रम साध्य कार्य है और कला का उत्कृष्ट नमूना है तो इसकी कीमत भी ज्यादा हो गई। पर सैकड़ों साल से चंबा का रूमाल बुनने का काम क्षेत्र में चला आ रहा है। वास्तव में हिमाचल के बहुत से इलाकों के रोजी रोजगार का साधन लघु और कुटीर उद्योगों पर आधारित रहा है। इसलिए चंबा के ग्रामीण क्षेत्र में कलाकार रुमाल को अदभुत तरीके से बनाते हैं। इन रूमालों पर कृष्ण की पूरी रासलीला का अंकन देखा जा सकता है। कई रूमालों में विवाह संबंधी दृश्य का अंकन देखा जा सकता है। 

किसी जमाने में इन रुमालों का लेन देन शादी के दिनों में अधिक रहा है। इसलिए इन पर विवाह के दृश्यों का अंकन किया जाता है। इसके अलावा चंबा रुमाल में समुद्र मंथन, राधाकृष्ण, दशावतार के चित्र देखे जा सकते हैं। एक रूमाल बनाने में काफी वक्त लग जाता है। अठारहवीं सदी में चंबा रुमाल का काम शबाब पर था। राजा उमेद सिंह ( 1748- 1764) ने चंबा रुमाल बनाने वाले कलाकारों को संरक्षण दिया। बाद में धीरे धीरे उम्दा किस्म के रुमाल बनाने वाले कारीगर कम होने लगे। 

 साल  1911 में हुए दिल्ली दरबार में चंबा के राजा भूरी सिंह ने ब्रिटेन के राजा को चंबा के रुमाल की कलाकृतियां तोहफे में दी थीं।  1965 में पहली बार चंबा रुमाल बनाने वाली कलाकार माहेश्वरी देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।  हालांकि नई पीढी में लड़कियां चंबा का रुमाल बनाने की कला में कम रुचि दिखा रही हैं।



शॉल बनते हुए भी देखें -
हिमाचल में कुल्लू का शॉल तो प्रसिद्ध है ही पर चंबा के शॉल भी कुल्लू के शॉल की तरह की सुंदर होते हैं। ऊनी धागे से बनने वाले ये शॉल काफी गर्म होते हैं। खादी ग्रामोद्योग भंडार की दुकानों में चंबा के शॉल 400 रुपये और उसके अधिक कीमत पर खरीदे जा सकते हैं। हमने चंबा के बाजार में कलाकारों को खड्डी पर शॉल बनाते हुए देखा।

चंबा के चप्पल और जूतियां -  चंबा अपनी जूतियों के लिए मशहूर है। चंबा शहर में घूमते हुए आप चंबा की बनी हुई जूतियां खरीद सकते हैं। ये जूतियां महिलाओं के लिए खासतौर पर बनाई जाती हैं। अपनी सुंदरता और आरामदेह बनावट के लिए मशहूर इन जूतियों की कीमत महज 250 रुपये से शुरू हो जाती है।


चंबा शहर के मुख्य बाजार में जूूतियों की कुछ दुकानें हैं। चौगान के आसपास के बाजारों में आप इन दुकानों में खरीददारी करते समय थोड़ा बहुत मोल भाव भी कर सकते हैं। पर अगर चंबा आए हैं तो एक दो जोड़ी जूतियां लेकर जरूर जाएं।
- - विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
( CHAMBA, HIMACHAL, SHAWL, RUMAL, JUTI ) 

Tuesday, June 28, 2016

मां चामुंडा के चरणों में बसा है चंबा शहर



झुमार से लौटते हुए हमलोग चामुंडा मंदिर के पास रुक गए हैं। दरअसल यह मंदिर चंबा शहर से ऊपर झुमार के   रास्ते में ही है।  इसलिए हमने तय किया था झुमार  से वापसी में माता के दर्शन करेंगे। टैक्सी वाले भाई साहब ने दर्शन के लिए हमें समय दे दिया है। 

चामुंडा मंदिर के बारे में कहा जाता है कि चंबा नगर बसने से पहले भी विद्यमान था। वर्तमान मंदिर मूल मंदिर के नष्ट होने के बाद फिर से बनाया गया है। सारा चंबा शहर मां चामुंडा के चरणों में बसा हुआ है। मंदिर भित्ति चित्र और काष्ठकला का अदभुत उदाहरण है। चामुंडा मंदिर पैगोडा शैली में बना हुआ है। यह चंबा के बाकी मंदिरों से काफी अलग है।


कहा जाता है कि राजा शालिवर्मन द्वारा चंबा नगर बसाने से पहले यह मंदिर यहां मौजूद था। पर आपदा में मंदिर के ध्वस्त हो जाने पर इसका दुबारा निर्माण कराया गया। पैगोडा शैली के इस मंदिर का गर्भगृह ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है। इसका मंडप खुला हुआ है। निर्माण में स्लेटी पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। छतों के किनारों में चार नक्काशीदार काष्ठ निर्मित श्रंखला देखी जा सकती है। मंडप की काष्ठ निर्मित छत नौ हिस्सों में बंटी है। इस पर काष्ठ फलक और चार सुंदर प्रतिमाएं अंकित की गई हैं। बाकी आठ वर्गों में अर्धामूर्ति पूरणीय आकृतियां बनी हैं।

पूरे छत पर मूर्ति शिल्प -  चामुंडा मंदिर का पूरा छत मूर्ति शिल्प से सज्जित है। इसके बीम पर देवी देवताओं,गंधर्वों और ऋषिओं के चित्र अंकित किए गए हैं। कई बीम पर पशु पक्षियों के भी चित्र बनाए गए हैं।

मंदिर के एक स्तंभ शीर्ष पर योगासन करती मानव आकृतियां बनी हैं। गर्भ गृह के प्रवेश द्वार पर विशाल पीतल की घंटियां बनी हैं। यहां पर एक अभिलेख भी उत्तकीर्ण किया गया है। इस अभिलेख में लिखा गया है - पंडित विद्याधर ने 2 अप्रैल 1762 में 27 सेर वजन और 27 रुपये मूल्य की इस घंटी को दान में दिया था। मंदिर की शानदार कलाकृतियां और अदभुत काम, यह सब कुछ देखकर अचरज होता है। 
काष्ठ कला का सुंदर नमूना -  चामुंडा मंदिर काष्ठ कला का उत्कृष्ट उदाहरण पेश करता है। भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने चामुंडा देवी के राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया है।  

बैशाख में विशाल मेला - चामुंडा मंदिर में बैशाख मास में मेला लगता है। इस समय बैरावली चंडी माता अपनी बहन चामुंडा से मिलने के लिए आती हैं। इस दौरान विशाल मेला लगता है। उस समय श्रद्धालुओं की तांता लग जाता है।
चामुंडा मंदिर के प्राचीर से चंबा शहर का अदभुत नजारा दिखाई देता है। मंदिर ऊंचाई पर स्थित है इसलिए नीचे की तरफ पूरा शहर दिखाई देता है। मंदिर के प्रांगण से रावी नदी और सड़कों का भी सुंदर नजारा दिखाई देता है। रात की रोशनी में तो यहां से शहर का सौंदर्य और भी बढ़ जाता है। मंदिर में रोज शाम को आरती होती है। आरती के बाद अगर आप यहां से चंबा शहर का नजारा करें तो अदभुत आनंद आता है।


कैसे पहुंचे – मंदिर तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक सड़क मार्ग से और दूसरा सीढ़ियों से। कोई 500 सीढ़ियां चढ़कर चंबा के मुख्य बाजार से चामुंडा मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। अगर सड़क मार्ग से मंदिर पहुंचना है तो झुमार जाने वाले मार्ग पर कोई दो किलोमीटर चलने के बाद मंदिर पहुंच सकते हैं।   हमलोग दर्शन करके शहर की ओर बढ़ चले हैं। 
चामुंडा देवी मंदिर के प्राचीर से दिखाईदेता चंबा शहर और चौगान मैदान। 

Monday, June 27, 2016

झुमार का जम्मू नाग मंदिर – खजिनाग के बड़े भाई जम्मू नाग

हिमाचल और जम्मू कश्मीर में नाग मंदिरों की बड़ी श्रंखला है। पहाड़ों पर कहावत है 18 नारायण और 18 नाग। यानी बहुत सारे नारायण और बहुत सारे नाग। इसे 18 से इसलिए जोड़ते हैं क्योंकि यह एक पवित्र अंक है। हिमाचल प्रदेश में जगह जगह नाग मंदिर हैं। नाग देवता की पूजा की परंपरा अति प्राचीन है। हो सकता है यह परंपरा उस काल से चली आ रही हो जब इंसान कबीलों में रहता था। इन नागों में बासुकि नाग सबसे बड़े माने जाते हैं। बासुकि नाग का एक मंदिर कांगड़ा में मैकलोड गंज के पास है।

चंबा क्षेत्र में भी कई नाग मंदिर हैं। इन नाग मंदिरों प्रमुख है जम्मू नाग मंदिर। चंबा से 14 किलोमीटर दूर झुमार में चंबा के नाग मंदिरों की श्रंखला में जम्मू नाग का मंदिर स्थित है। जम्मू नाग खज्जिनाग के बड़े भाई बताए जाते हैं। वे चार भाइयों में दूसरे नंबर पर आते हैं। इस मंदिर के प्रति स्थानीय लोगों में अगाध आस्था है। 


वर्तमान जम्मू नाग मंदिर 18वीं सदी का बना हुआ बताया जाता है। मंदिर का भवन ज्यादातर लकड़ी का बना हुआ है। देवदार की लकड़ी इस्तेमाल ज्यादा दिखाई देता है। मंदिर के मुख्य मंडप में जम्मू नाग देवता की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर प्रवेश द्वार के पास दो विशाल जानवरों के सिंग भी देखे जा सकते हैं। मंदिर के बरामदे में कई घंटियां भी लगी हैं। मंदिर के बगल में एक छोटी सी झील है। यह झील अब बुरे हाल में है। आसपास में घने जंगल हैं। 

आसपास के श्रद्धालु पदयात्रा करके जम्मू नाग के दर्शन करने आते हैं। मंदिर में सुबह शाम परंपरागत तरीके से पूजा होती है। इसमें स्थानीय वाद्य यंत्रों का प्रमुखता से इस्तेमाल किया जाता है। जम्मू नाग मंदिर परिसर में बाद में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा भी स्थापित की गई है। शिव के गले में हमेशा नाग देवता विराजमान रहते हैं इसलिए नाग मंदिर और शिव का अन्योन्याश्रय संबंध है।
चंबा के पास झुमार में स्थित ये जम्मू नाग मंदिर 7000 फीट यानी 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मौसम सालों भर सुहाना रहता है। सर्दियों में झुमार में बर्फबारी होती है। तब ये मंदिर बर्फ से ढक जाता है।

जम्मू नाग मंदिर परिसर में बच्चों का एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय संचालित होता है। स्कूल में 55 छात्र पढ़ते है। हम जब पहुंचे तो स्कूल की कक्षाएं चल रही थीं। दो शिक्षक मौजूद थे। स्कूल के भवन पर प्रेरक वचन लिखे हुए थे। ये सरकारी स्कूल काफी व्यवस्थित लगा। मुझे प्रतीत हुए ये बच्चे भी बड़े किस्मत वाले हैं जो जम्मू नाग मंदिर परिसर में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। 
-vidyutp@gmail.com
( JAMMU NAG MANDIR, TEMPLE, JHUMHAR, CHAMBA, HIMACHAL )



Sunday, June 26, 2016

झुमार - ताल से ताल मिला....

रावी दरिया के तट पर  स्थित होटल में सुबह चिड़ियों की  चहचहाहट के साथ होती है। हमलोग  आज झुमार जाने वाले हैं। तो सुबह  बस से पहले चंबा के बस स्टैंड पहुंच गए हैं।  चंबा का छोटा सा बस स्टैंड बड़ा प्यारा सा है। यहां एक ढाबे में हल्के  नास्ते के बाद झुमार जाने के लिए टैक्सी वाले से बात की। 

  एक  टैक्सी   वाले से  सौदा पट गया है।  झुमार जाना वहां इंतजार करना और फिर बस  स्टैंड वापसी।   
चंबा की एक सुहानी सुबह हमलोग झुमार के लिए चल पड़े हैं। हमारी टैक्सी पहाडों पर चढ़ने लगी है। चंबा शहर नीचे छूटता जा रहा है।  


कोई आधे घंटे के सफर के बाद हम एक अलग दुनिया में पहुंच गए हैं। यहां सामने एक  नन्हें बच्चों का स्कूल और एक दुकान दिखाई दे रही है। एक छोटी सी दुकान है।  यहां  चाय, मैगी, अंडे आदि मिल रहे हैं। तो ये है झुमार का बस स्टैंड।  पर हम आखिर झुमार क्यों आए हैं।


हिमाचल में चंबा के पास झुमार पहुंच जाना यूं लगता है जैसे सपनों की दुनिया में आ गए हों। झुमार चंबा शहर से 14 किलोमीटर की दूरी पर है। रास्ता लगातार चढ़ाई वाला है। पर जब आप झुमार पहुंचते हैं तो मौसम काफी बदल चुका होता है। यह एक ग्रामीण इलाका है जहां दूर दूर तक हरियाली, सेब, चीड़ और देवदार के पेड़ दिखाई  देते हैं। 


झुमार का नैसर्गिक सौंदर्य फिल्मकार सुभाष घई को इतना भाया कि उन्होंने अपनी सुपर हिट फिल्म ताल की आधी शूटिंग झुमार में की। 1999 में आई इस फिल्म में चंबा का सौंदर्य निखर कर आया है। झुमार में जो सेब का बाग है उसका नाम ही ताल गार्डेन रख दिया गया है। 

हालांकि हमें स्थानीय लोगों ने बताया कि ये बाग चंबा के राजघराने का है। इस बाग में  इसकी रखवाली करने वाले परिवार का एक छोटा सा घर है। फिल्म ताल में भी हमें वह घर भी दिखाई देता है।  फिल्म में तो यह बाग और भी भव्य बनकर दिखाई देता है।  दरअसल फिल्में लार्जर दैन लाइफ होती हैं। और अगर कैमरा सुभाष घई जैसे शोमैन का हो तो कहना ही क्या...


सेबों के बाग में घूमते हुए हमारी मुलाकात इस घर में रहने वाले एक बच्चे से होती है जो अब 20 साल से ज्यादा उम्र के हो गए हैं। उन्हें याद है कि उन्होंने ऐश्वर्य राय और अक्षय खन्ना को यहां शूटिंग करते हुए देखा था। झुमार में फिल्म ताल के प्रारंभिक हिस्से की शूटिंग हुई है। फिल्म का लोकप्रिय गीत दिल ये बैचन है....रस्ते पे नैन है...ताल से ताल मिला....की शूटिंग हुई है। 

यहीं पर नायक और नायिका की पहली मुलाकात होती है। उनका प्रेम परवान चढ़ता है। झुमार की फिजा में आज भी रुमानियत तैरती है, जिसे आप महसूस कर सकते हैं। मई की दोपहर में यहां चटखीली धूप खिली है, पर मौसम सुहाना है। गरमी का तो नामोनिशान नहीं है। एक बार आ गए तो यहां से जाने का दिल नहीं करता।

कैसे पहुंचे - चंबा शहर के बस स्टैंड से झुमार जाने के लिए दिन भर में चार बसें जाती हैं। एक बस सुबह 9 बजे है दूसरी 1.30 बजे तो तीसरी 3 बजे। फिर 4.00 बजे फिर 5.45 , 6.30 बजे बसें जाती है। इसी तरह वापसी के लिए भी इतनी ही बसें हैं।


पर यहां आने के लिए आपके पास दूसरा विकल्प भी है। अपनी टैक्सी बुक करके जाएं। हमने एक टैक्सी बुक की। टैक्सी चौगान के आसपास से मिल जाती है। टैक्सी वाले आने जाने का 600 रुपये लेते हैं। वहां आप दो तीन घंटे रूक कर घूम सकते हैं।

झुमार ग्राम पंचायत बाट में पड़ता है। जम्मू नाग मंदिर के पास ही बस स्टाप है। वैसे बात करें तो झुमार मुल्तान इलाके के एक संगीत परंपरा का नाम है। हो सकता है झुमार का नाम इसी आधार पर पड़ा हो। पर यहां आप 24 घंटे प्रकृति का संगीत सुन सकते हैं।
कहां ठहरें - अगर आप पहाड़ों पर कुछ दिन शांति के पल बीताना चाहते हैं तो झुमार में भी ठहर सकते हैं।  स्वास्थ्य लाभ के लिए झुमार सुंदर जगह हो सकता है। झुमार में कुछ होटल और होम स्टे उपलब्ध हैं। 


यहां एक सरकारी रेस्ट हाउस भी है। यहां आप 400 से 800 रुपये प्रति दिन की दर पर ठहर सकते हैं। कई समूह में आने वाले लोग झुमार ( JHUMHAR)  में ठहरना पसंद करते हैं।  झुमार एक गांव है इसलिए यहां सीमित दुकानें हैं और सीमित सामान उपलब्ध हैं। अगर आपकी खास जरूरत की दवाएं आदि हों तो अपने साथ ही लेकर जाएं।

ट्रैकिंग का मजा - झुमार प्रवास के दौरान आप पहाड़ों पर ट्रैकिंग कर सकते हैं। यहां की ट्रैकिंग ज्यादा चुनौतीपूर्ण नहीं है। नए लोगों के लिए ट्रैकिंग आनंददायक हो सकती है। स्थानीय लोगों की मदद से आसपास के कुछ गांवों का भ्रमण कर सकते हैं। झुमार से तीन किलोमीटर की ट्रैकिंग करके एक देवी मंदिर के दर्शन करने जा सकते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( JHUMAR, CHAMBA, TAL FILM, TRACKING, HIMACHAL ) 




Saturday, June 25, 2016

चंबा शहर का दिल है ऐतिहासिक चौगान मैदान


चंपावती मंदिर के सामने विशाल हरा भरा मैदान है, जिसे चौगान कहते हैं। यह चंबा शहर का विशाल घास का मैदान है। मैदान के ठीक नीचे रावी नदी बहती हैजबकि मैदान के ऊपर शहर बसा है। आप यूं मान सकते हैं कि पूरा चंबा शहर चौगान के चारों तरफ बसा है। चौगान चंबा शहर का दिल है। लोग सुबह से शाम यहां टहलने और टाइम पास करने के लिए आते हैं। शाम को आप चौगान के किनारे बैठ कर रावी के निर्मल जल का संगीत सुन सकते हैं।

मलेशिया से मंगवाई गई थी घास - राजाओं ने बड़े ही चाव से इस चौगान मैदान को बनवाया था। इस मैदान में लगाए गए घास तब के राजाओं ने खास तौर पर मलेशिया से मंगवाया था। वहीं मैदान के चारों तरफ लगे बिजली के खंबे इंग्लैंड से मंगवाए गए थे। इस चौगान मैदान की सुंदरता लेकर चंबा में हिमाचली भाषा में बहुत से लोकगीत भी गाए जाते हैं। 
चंबा का ऐतिहासिक चौगान मैदान। 


किसी समय में चौगान एक विशाल मैदान था। पर बाद में इसे पांच हिस्सों में बांट दिया गया है। मुख्य मैदान के अलावा अब चार छोटे-छोटे मैदान हैं। छोटे मैदान में बांट देने से इसकी विशालता कम हो गई है। चौगान मैदान की कुल लंबाई लगभग एक किलोमीटर है। इसकी चौड़ाई 75 मीटर है। इसके एक तरफ समांतर बाजार की सड़क है तो दूसरी तरफ रावी दरिया। यह सब कुछ मिलकर बड़ा ही जीवंत नजारा पेश करते हैं। यहां आकर लगता है कि मानो जिंदगी ईस्टमैन कलर है। 

चौगान का मैदान सुबह से लेकर शाम तक वक्त गुजारने के लिए यादगार जगह है। यहां न सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि सैलानी भी आकर बैठते हैं और घूमते हैं। स्थानीय लोग चौगान को अपनी शान समझते हैं। तो इसी चौगान के मैदान में हमारी मुलाकात एक बार फिर ममता शर्मा से हुई। वे कश्मीर में हमें मिलीं थीं। चंबा के पास के गांव की रहने वाली हैं। हमारे चंबा में होने की खबर सुनकर वे रुक गईं हमसे मिलने के लिए। हमने उनसे बात होने पर पहले ही बोल दिया था कि चौगान में मिलेंगे। 

यहां लगता है मिंजर मेला -   चौगान मैदान में ही हर साल जुलाई में चंबा का प्रसिद्ध मिंजर मेला लगता है। यह चंबा  की लोक कलाओं को पेश करने वाला मेला है। मिंजर मेले के समय चंबा में दूर दूर से सैलानी पहुंचते हैं। सात दिनों तक चलने वाला ये मिंजर मेला देश के कला संस्कृति पर आधारित मेलों में प्रमुख स्थान रखता है। मेेले में कई तरह की प्रतियोगिताएं भी होती हैं। मिंजर मेला सावन महीने के दूसरे रविवार को शुरू होता है। मेला शुरू होने के समय लोगों को मिंजर बांटा जाता है। ये मिंजर क्या है। ये कपड़ों में पहना जाने वाला एक लटकन है।


हिमाचल संस्कृति के जाने माने लेखक सतीश धर के मुताबिक- चंबा के प्राचीन मिंजर मेले की शुरुआत कुंजड़ी गायन से होती है। गीत के बोल कुछ इस तरह होते हैं -  उड़-उड़ कूजडीये...वर्ष दे दिहायडे हो ...मेरे रामा जिन्देयाँ दे मेले हो .. इसके साथ ही ऐतिहासिक चौगान मैदान नाच उठता है l इस गीत को कहरवा ताल में गाया जाता है। मान्यता है कि कुंजड़ी केवल मिंजर के दिनों में ही सुननी चाहिए। 

तो मिंजर मेले के दौरान यहां सारे लोग मिंजर धारण किए हुए रंग बिरंगे नजर आते हैं। ये उल्लास का मेला होता है। काफी लोग बाहर से भी चंबा मिंजर मेले के समय में पहुंचते हैं। हमने स्कूल को दिनों में छोटी बहन ऋतंभरा की पत्र मित्र उषा मेहता दीपा से चंबा के चौगान मैदान के बारे में सुना था। वे चंबा के पास डुगली में एक स्कूल में शिक्षिका थीं। तो आज यहां आकर बड़ा अच्छा लग रहा है। 

चंबा का मिलेनियम गेट -  मंदिर के बगल में चौगान मैदान का लाल रंग का सुदंर प्रवेश द्वार है। चौगान मैदान में एक विशाल मिलेनियम गेट का भी निर्माण कराया गया है। चौगान का एक किनारा लंबाई में रावी नदी के साथ मिलता है। यहां दो झरोखे बनाए गए हैं, जहां बैठकर आप रावी नदी की कल-कल बहती जलधारा का मुआयना कर सकते  हैं। यहीं पर एक रावी कैफे भी है। चौगान के एक तरफ हिमाचल टूरिज्म का इरावती होटल स्थित है, जो चंबा शहर का प्रमुख होटल है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य   -vidyutp@gmail.com
(CHAMBA, CHAUGAN, MINJAR MELA, IRAVATI HOTEL) 
चंबा में चौगान मैदान के पास गांधी गेट।