Tuesday, May 31, 2016

हरिद्वार में लें पंडित जी पूरी वाले का स्वाद

शाकाहारी खाने में हरिद्वार का जवाब नहीं। मुझे लगता है पूरे देश में सबसे सस्ता रेस्टोरेंट में खाना हरिद्वार में मिल जाता है। आज भी (2016) में हरिद्वार में 30 से 40 रुपये की थाली मिलती है। 40 रुपये की थाली में 6 रोटियां, तीन सब्जी आदि मिल सकती है। हरिद्वार पवित्र शहर घोषित है इसलिए शहर की धार्मिक सीमा के अंदर मांस मछली, अंडा मदिरा का सेवन प्रतिबंधित है। इसलिए हरिद्वार में शाकाहारी खाने की बहार है। 

खास तौर पर हर की पौड़ी के पास अपर रोड पर कई रेस्टोरेंट हैं जहां आप अपनी पसंद का स्वाद ले सकते हैं। इनमें भी होशियारपुरी का ढाबा पंजाबी खाने के लिए प्रसिद्ध है। अगर आप हर की पौड़ी के पास हैं तो इसके बगल वाली गली में प्रवेश करें। मथुरा की पूड़ी सब्जी वाली दुकाने नजर आएंगी। हर पत्ते के दोने में पूड़ी और सब्जी खाइए। दावा है कि पूडी देशी घी में बनती है। स्वाद तो अच्छा लगता है। यहां आप कचौड़ी, समोसे आदि का भी स्वाद ले सकते हैं। कई किस्म की मिठाइयां भी हैं।

पर पूरी का बेहतरीन स्वाद लेना है तो पहुंचिए पंडित जी पूरी वाले के पास। इनकी दुकान गली में थोड़ा आगे जाने पर कुशावर्त घाट के पास है। बैठने के लिए काफी जगह है। 50 रुपये की पूरी की प्लेट में 4 पूरी के साथ तीन किस्म की सब्जियां परोसी जाती हैं। आपका खाकर दिल खुश हो जाएगा।



 अगर और स्वाद बढ़ना चाहते हैं तो पूरी के साथ रायता का ग्लास मंगा लें। 15 रुपये बढ़ जाएंगे पर आनंद दुगुना हो जाएगा। पंडित जी पूरी वाले के पास कई तरह के पूरी की प्लेट हैं। इनके नाम भी रोचक रखे गए हैं। दरबारी, युवराज, महाराज, आमरस और केलाराम। इनमें से कौन सा प्लेट लेना पसंद करेंगे आप। महाराज वाली प्लेट में लस्सी के साथ प्रसिद्ध चंद्रकला मिठाई का भी स्वाद मिलेगा।


पूड़ी के अलावा यहां आप खाने का भी आनंद ले सकते हैं। 60 रुपये की थाली में 6 रोटी के साथ तीन सब्जियां मिलेंगी। यहां छोला भठूरा और छोले चावल आदि का भी आप आर्डर दे सकते हैं। वहीं स्पेशल थाली 120 रुपये की है। इसमें दाल, पनीर, मिक्स वेज, मट्ठा, मिठाई, पापड़, रोटी, चावल सबका स्वाद मिलेगा।

 -  विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com

( HARIDWAR, FOOD, HAR KI PAURI,  PANDIT JEE PURI WALE, HOSHIYARPURI, DHABA ) 
हरिद्वार का प्रसिद्ध होशियारपुरी ढाबा, 1937 से चल रहा है। 

Monday, May 30, 2016

मां गंगा में आस्था की डूबकी...हरिद्वार हर की पौड़ी

HARIDWAR - NEW BRIDGE AT LALTARAO GHAT.
हरिद्वार वह जगह है जहां पावन गंगा पहाड़ों से आगे बढ़कर हिमालय का साथ छोड़ते हुए मैदानों को तृप्त करतीहुई आगे बढ़ती है। सालों भर हर रोज हजारों लोग हरिद्वार में इसी पतित को पावन करने वाली गंगा में डूबकी  लगाने हरिद्वार पहुंचते है।   साल का कोई भी दिन हो आपको हरिद्वार में हर रोज लघु भारत का दर्शन होता है। यहां गंगा के घाट पर देश के हर राज्य के लोग मिल सकते हैं।


सुबह सूर्य की किरणें हर की पौड़ी पर पड़ती हैं तो गंगा का जो सौंदर्य दिखाई देता है वह हमेशा के लिए मन में रच बस जाता है। हर की पौड़ी की शाम भी उतनी ही सुहानी होती है। शाम ढलने के साथ गंगा की आरती का नजारा भव्य होता है। पौड़ी मतलब सीढियां। हर मतलब शिव। यानी शिव तक पहुंचने का रास्ता। और यह रास्ता भला गंगा जी से बेहतर क्या हो सकता है।   



गंगा की मूल धारा नहीं है हर की पौड़ी - हम जिस हर की पौड़ी पर गंगा में स्नान करते हैं वह वास्तव में गंगा जी मूल धारा नहीं है। गंगा पर भीमगोडा बैराज से गंग नहर निकाली गई है। भीमगोड़ा से गंगा की मूल धारा आगे बढ़ जाती है, जो गंगा से नहर निकाली गई है वह जल धारा हर की पौड़ी होते हुए आगे बढ़ती है। यह जलधारा आगे नहर का रूप ले ले लेती है। इसीहर की पौड़ी पर हर 12साल पर कुंभ और छठे साल पर अर्ध कुंभ लगता है।


1840  में ब्रिटिश काल में निर्माण -  कहा जाता है कि हर की पौड़ी इलाके का पहली बार निर्माण राजा विक्रमादित्य ने पहली शताब्दी में कराया था। पर ऐतिहासिक संदर्भों के साथ देखें तो हर की पौड़ी का निर्माण 1840 में ब्रिटिश काल में हुआ। ब्रिटिश सरकार ने 1840 में भीमगोडा बैराज का निर्माण कराया। यहां से अपर गंगा कैनाल निकाला गया जिससे बड़े क्षेत्र की सिंचाई होने लगी। वर्तमान में जो हर की पौड़ी है उन घाटों का निर्माण 1800 में कराया गया। बाद में समय समय पर इसका विस्तार किया गया। आर पार जाने के लिए कई पुल बनाए गए हैं। इनमें एक सिग्नेचर ब्रिज साल 2015 में तैयार हुआ है।  


गंगा की मूल धारा नहीं - साल 2016 में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की सरकार ने हरकी पैड़ी पर प्रवाहित हो रही गंगा का नाम बदलकर स्कैप चैनल करने का एक शासनादेश कर दिया था। हालांकि इसके खिलाफ अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा ने अपने अधिवेशन में इस शासनादेश को निरस्त करने का प्रस्ताव वर्ष 2016 में पारित किया था।

गुरु गुरुनानक देव जी आए थे -   कहा जाता है कि सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देव जी (1469-1539) हरिद्वार आए थे तब उन्होंने कुशावर्त घाट पर स्नान किया था। इस स्थल पर उनकी याद में एक गुरुद्वारा बना है।

उद्योग और शिक्षा का केंद्र - 1886 में हरिद्वार पहली बार लश्कर होकर रेल नेटवर्क से जुड़ा। हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी फार्मेसी विश्वविद्यालय पुराना शिक्षा का केंद्र है। यहां ऋषिकुल आयुर्वेदिक महाविद्यालय भी स्थित है। अब हरिद्वार बड़ा औद्योगिक शहर भी बन चुका है। बीएचईएल के बाद सिडकुल में सैकड़ों उद्योग धंधे हैं।


पवित्र शहर – हरिद्वार को प्रशासन द्वारा पवित्र शहर घोषित किया गया है। यहां धार्मिक सीमा के अंदर मांस और मदिरा की दुकानें नहीं है। इनका सेवन भी इस इलाके में प्रतिबंधित है। इसलिए मांसाहार करने वाले हरिद्वार की सीमा से बाहर ज्वालापुर या उससे आगे जाते हैं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 

( HARIDWAR, HOLY CITY, UTTRAKHAND )
  

Sunday, May 29, 2016

कोटद्वार शहर- उत्तराखंड गढ़वाल का प्रवेश द्वार



कोटद्वार उत्तराखंड राज्य का शहर है। पौड़ी गढ़वाल जिले की तहसील है। पर यह एक प्लेन यानी समतल शहर है। नाम कोटद्वार है तो यह उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र का प्रवेश द्वार है। यह एक रेलवे स्टेशन भी है। आखिरी रेलवे स्टेशन। हालांकि यहां एक्सप्रेस रेलगाड़ियां दो ही आती हैं।   
 पर अमूमन हर जगह के लिए कोटद्वार से आपको बसें और टैक्सियां मिल जाती है।
 

पर आपको कोटद्वार से दिल्ली आना हो तो शाम को 4 बजे के बाद कोई बस नहीं मिलती। अगर आप कोटद्वार में अटक गए तो आपको रात को यहीं रुकना पड़ सकता है। पर रुकने के लिहाज से कोटद्वार में होटल सस्ते हैं। आप 100, 150 से 200 रुपये के होटलों में भी ठहर सकते हैं। मध्यमवर्गीय होटलों में अंबे होटल लोकप्रिय है।  रेलवे स्टेशन के पास गढ़वाल मोटर यूनियन के आसपास भी कई होटल हैं। मिठाइयां खानी हो तो सिद्धबली स्वीट्स पहुंचे। आपको हर तरह की बेहतरीन मिठाइयां खाने को मिल सकती हैं।  

मैं सुबह सुबह दिल्ली की बस से कोटद्वार पहुंचता हूं। नास्ता करने की इच्छा है। स्टेशन पर होटल पारामाउंट के नीचे पराठे की दुकान पर एक पराठा खाता हूं। 25 रुपये का बड़ा पंजाबी पराठा। नास्ते के लिए इतना काफी है।  कोटद्वार शहर मैं पहले कभी नहीं आया पर इस शहर से एक पुराना रिश्ता है। स्कूल के दिनों में 1985-86 के दौरान यहां से प्रकाशित एक छोटे से अखबार में मेरी कविताएं छपती थीं। हमारे एक पत्र मित्र कमल सिंह बिष्ट पंकज के सौजन्य से। वे पौड़ी गढ़वाल जिले के यमकेश्वर ब्लाक में रामजीवाला गांव के रहने वाले थे।


कोटद्वार से पौड़ी शहर की दूरी 101 किलोमीटर है। यहां से हरिद्वार 70 किलोमीटर है। तो नजीबाबाद जंक्शन 30 किलोमीटर की दूरी पर है। मुझे लैंसडाउन से लौटते हुए 4 बजे गए थे। यहां से दिल्ली के लिए अब बसें उपलबंध नहीं थी। लिहाजा हरिद्वार जाने का फैसला लिया। हरिद्वार के लिए मिनी बसें जाती हैं किराया 85 रुपये और समय दो घंटे से ज्यादा लगते हैं। लिहाजा हमने टैक्सी का विकल्प चुना। टैक्सी में 90 रुपये किराया और एक घंटे में टैक्सी ने हरिद्वार के चंडीघाट पर उतार दिया।  

थोड़ी और बातें कोटद्वार की। यह समुद्र तल से 395 मीटर की ऊंचाई पर बसा शहर है। कोटद्वार का मौसम सदाबहार है गर्मियों में भी तापमान 36 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं जाता।

ऋषि कण्व का आश्रम   -   कोटद्वार से 14 किलोमीटर की दूरी पर कण्व ऋषि का आश्रम। कहा जाता है इस आश्रम का संबंध राजा भरत से है जिनके नाम पर अपने देश का नाम भारत पड़ा। कहा जाता है यहीं पर मेनका ने विश्वामित्र का तप भंग किया था। मेनका ने शकुंतला को जन्म दिया। शकुंतला का पालन पोषण ऋषि कण्व ने इसी आश्रम में किया। 


एक दिन यहीं शकुंतला की मुलाकात दुष्यंत से हुई और उन दोनों के संसर्ग से भरत का जन्म हुआ। भरत की प्रारंभिक शिक्षा कण्व ऋषि के ही आश्रम में हुई। बाद में प्रतापी राजा बने जिनके नाम पर अपने देश का नाम भारत वर्ष पड़ा। पर कण्व ऋषि का आश्रम बहुत अच्छे हाल में नहीं है। कोटद्वार में सिद्धबली मंदिर, दुर्गा देवी मंदिर और कोटेश्वर मंदिर भी दर्शनीय हैं।
-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( KOTDWAR, KANVA RISHI ASHRAM, UTTRAKHAND) 




Saturday, May 28, 2016

परमपावन धाम श्री सिद्धबली हनुमान मंदिर – कोटद्वार



कोटद्वार शहर के बाहर पहाड़ की तलहटी में खोह नदी के किनारे स्थित है सिद्धबली हनुमान मंदिर। यह स्थान तीन तरफ से वनों से ढका हुआ बड़ा रमणीक है। सड़क से मंदिर तक पहुंचने के लिए खोह नदी पर पुल बना हुआ है। गढ़वाल के प्रवेश द्वार   कोटद्वार   कस्बे से   कोटद्वार-पौड़ी राजमार्ग पर लगभग तीन किलोमीटर आगे लगभग 40 मीटर ऊंचे टीले पर स्थित है गढ़वाल प्रसिद्ध देवस्थल सिद्धबली मन्दिर। यह हनुमान जी का एक पौराणिक मन्दिर है। इस मंदिर में आने वाले साधकों को अप्रतिम शांति की अनुभूति होती है।


इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां साधना करने के बाद एक  बाबा को हनुमान की सिद्धि प्राप्त हुई थी। तब सिद्ध बाबा ने यहां बजरंगबली की एक विशाल पाषाण प्रतिमा का निर्माण किया। जिससे इसका नाम सिद्धबली हो गया। कहा जाता है कि ब्रिटिश शासनकाल में एक मुसलिम सुपरिटेंडैण्ट घोड़े से कहीं जा रहे थे, जैसे ही वह सिद्धबली के पास पहुंचे बेहोश हो गए। 


इस दौरान उनको स्वप्न आया कि सिद्धबली कि समाधि पर मंदिर का निर्माण कराया  जाए। जब उन्हें होश आया तो उन्होने यह बात आस-पास के लोगों को बताई और वहां तभी से यह विशाल मंदिर अस्तित्व में आया। पहले यह एक छोटा सा मंदिर था। पर पौराणिकता और शक्ति की महत्ता के कारण श्रद्धालुओं ने अब इसे भव्य रूप प्रदान कर दिया है।

भंडारा के लिए  कई साल  की अग्रिम बुकिंग -  यह मन्दिर न केवल हिन्दू-सिक्ख धर्मावलंबियों का है अपितु मुसलिम लोग भी यहां मनौतियां मांगने आते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु लोग दक्षिणा तो देते हैं ही यहां भंडारा भी आयोजित करते हैं। यहां हर मंगलवार और शनिवार को भंडारा होता है। पर भंडारा कराने के लिए अगले आठ नौ सालों के लिए भक्त बुकिंग करा चुके होते हैं। 


इस स्थान पर कई अन्य ऋषि मुनियों का आगमन भी हुआ है। इन संतो में सीताराम बाबा, ब्रह्मलीन बाल ब्रह्मचारी नारायण बाबा एवं फलाहारी बाबा प्रमुख हैं।
यह मन्दिर का अदभुत चमत्कार ही है कि खोह नदी में कई बार बाढ़ आया किन्तु मन्दिर ध्वस्त होने से बचा हुआ है। यद्यपि नीचे की जमीन खिसक गई है किन्तु मन्दिर का बाल बांका नहीं हुआ।

मंदिर के बाहर निःशुल्क जूता घर बना है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए शीतल जल का इंतजाम है। मंदिर के ऊपर से आसपास का सुंदर नजारा दिखाई देता है। इस मंदिर को दान देने वाले में देश के बड़े-बड़े उद्योगपति शामिल हैं। मंदिर का प्रसाद गुड़ की भेली दिखाई देती है। कदाचित बिजनौर नजीबाबाद में गन्ने की खेती अधिक होने के कारण इधर लोग गुड़ प्रसाद में चढ़ाते हैं। 

SIDHBALI HANUMAN MANDIR AT KOTDWAR LANSDOWNE ROAD  - Photo- Vidyut

कैसे पहुंचे - श्री   सिद्धबली    बाबा    मंदिर   दिल्ली से लगभग    230   किलोमीटर दूर एवं हरिद्वार से 7किलोमीटर दूर और नजीबाबाद जंक्शन से    30   किलोमीटर की दूरी पर उत्तराखंड प्रदेश के   कोटद्वार   शहर में स्थित है। यहां कोटद्वार रेलवे स्टेशन से शेयरिंग आटो रिक्शा से 7 से 10 रुपये में पहुंचा जा सकता है।


लैंसडाउन से वापस लौटते समय  कोटद्वार शहर के ठीक पहले सिद्धबली हनुमान जी का मंदिर  बायीं तरफ दिखाई देता है।   इस मंदिर को देखते ही मैं टैक्सी से उतर गया। इच्छा हुई कि दर्शन के बाद  ही आगे का सफर करूं।  टैक्सी में मौजूद सहयात्रियों ने भी इस मंदिर के  महात्म्य के बारे में  जानकारी दी। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SIDHBALI HANUMAN MANDIR, KOTDWAR) 


Friday, May 27, 2016

पांच हजार साल पुराना है लैंसडाउन का कालेश्वर मंदिर

लैंसडाउन की सुरम्य वादियों में स्थित है शिव का अदभुत कालेश्वर मंदिर। यह लैंसडाउन का सबसे पुराना मंदिर है। कभी इस मंदिर के आसपास घने जंगल हुआ करते थे। इस मंदिर के बारे में बताया जाता है कि कोई पांच हजार    साल पहले यहां कालुन नामक ऋषि तपस्या करते थे। उन्ही के नाम पर इस मंदिर का नाम कालेश्वर मंदिर पड़ा। 


पांच  मई 1887 को यहां गढ़वाल रेजिमेंट की स्थापना होने से पहले यह बिल्कुल वीरान जगह हुआ करता था। 4 नवंबर 1887 को जब रेजिमेंट की पहली बटालियन यहां पहुंची तो यहां घने जंगल थे। पर यहां गुफा में एक शिवलिंग स्थापित थी जिसे कालेश्वर के नाम से जाना जाता था। उन्हें आसपास के गांव के लोग ग्राम देवता के तौर पर पूजा करते थे। ये आपरूपि प्रकट हुए शिव हैं यानी इनकी स्थापना नहीं की गई है। गांव वालों का मानना था कि गांव की गायें इधर चरने आती थीं तो शिवलिंग के पास गुजरने पर वे स्वतः दूध देने लगती थीं।




लोग श्रद्धा और भक्ति से मन्नत मांगने आते थे उनकी मन्नत भी अवश्य पूरी हो जाती थी। यानी बाबा कालेश्वर गांव वालों की अखंड आस्था के केंद्र थे।   साल 1901 में पहले गढ़वाल रेजिमेंट ने यहां एक छोटा सा मंदिर को धर्मशाला का निर्माण कराया। साल 1926 में लोगों के सहयोग से यहां विशाल मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर में पूजा अर्चना साधु महात्मा करते थे। मंदिर का इंतजाम गढ़वाल रेजिमेंट देखता था।


साल 1995 में मंदिर का पुनर्निमाण गढ़वाल रेजिमेंट ने करवाया। इसमें भी स्थनीय लोगों का सहयोग मिला। बाबा कालेश्वर का मंदिर सुरम्य घाटी के बीच स्थित है। मंदिर परिसर में हरे भरे पेड़ हैं। मंदिर में अखंड धूनी भी जलती रहती है। परिसर में एक छोटी सी कैंटीन भी है, जहां से आप खाने पीने की वस्तुएं खरीद सकते हैं।


कैसे पहुंचे - लैंसडाउन के मुख्य बाजार से मंदिर तक पहुंचने के लिए सदर बाजार होकर रास्ता है। मंदिर में पहुंचने के लिए तकरीबन 100 सीढियां उतरनी पड़ती है। लैंसडाउन कोटद्वार शहर से 41 किलोमीटर की दूरी पर है। कोटद्वार से यहां टैक्सी से पहुंचा जा सकता है।

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( LANSDOWNE, UTTRAKHAND, GARHWAL REGIMENT, KALESHWAR TEMPLE, SHIVA, MAHADEV ) 
लैंसडाउन का डाकघर। 






Thursday, May 26, 2016

भारतीय फौज की वीरगाथा सुनाता गढ़वाल संग्रहालय

उत्तराखंड में लैंसडाउन 5800 फीट तकरीबन 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक सुंदर हिल स्टेशन है। पर यह जाना जाता है हमारी सेना के गढ़वाल राइफल्स के कारण। यह गढ़वाल रेजिमेंट का मुख्यालय है।   लैंसडाउन पहुंचे हैं तो सेना का गढ़वाल संग्रहलाय जरूर देखें। 


यह भारतीय फौज की वीरगाथा की दास्तां सुनाता है। इस संग्रहालय का नाम दरवान सिंह नेगी गढ़वाल म्यूजियम है। गढ़वाल रेजिमेंट के बहादुर सैनिक के नाम पर संग्रहालय का नाम रखा गया है।  यह गढ़वाल रेजिमेंट के फौजियों की युद्ध में वीरता की दास्तां सुनाता वार मेमोरियल और अनूठा संग्रहालय है।

नायक दरवान सिंह नेगी ने 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध में फ्रांस में बहादुरी से लड़ते हुए अपना जीवन ब्रिटिश भारत के लिए उत्सर्ग किया था। उन्हें विक्टोरिया क्रास से नवाजा गया था। वे पहले भारतीय फौजी थे जिन्हे विक्टोरिया क्रास से नवाजा गया।   संग्रहालय के अंदर गढ़वाल राइफल्स की स्थापना से लेकर इसके बहादुर फौजियों का इतिहास देखा जा सकता है। 


फौजियों की वर्दियों का भी अच्छा संग्रह है। फौज में इस्तेमाल की गई बंदूकें, 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के फौजियों से जब्त किए गए हथियार, पाकिस्तान के नोट, मनीआर्डर फार्म और खत आदि भी देखे जा सकते हैं। इसके अलावा कुछ वाद्य यंत्र का भी संग्रह है। यह संग्रहालय भारतीय सेना का इतिहास समझने के लिए बेहतरीन जगह में से है।   गढ़वाल राइफल्स की स्थापना 5 मई 1887 में बंगाल आर्मी के एक एनफेंट्री के तौर पर हुई थी। साल 1987 में इस रेजिमेंट ने अपना शताब्दी वर्ष मनाया। 


तकरीबन 25 हजार फौजी गढ़वाल राइफल्स के हिस्सा हैं। पहले विश्वयुद्ध के बाद दूसरे विश्वयुद्ध और फिर 1962 के भारत चीन युद्ध और 1965 और 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध फिर 1999 के कारगिल युद्ध में गढ़वाल राइफल्स ने बड़ी बहादुरी दिखाई थी। दूसरे विश्वयुद्ध में गढ़वाल राइफल्स ने बर्मा ( अब म्यांनमार) और मलाया में अपनी बहादुरी दिखाई थी। 



शांतिकाल में भी बड़ी भूमिका -
शांति काल में भी उत्तर काशी में 1991 में आए भूकंप और फिर 2013 में उत्तराखंड में बादल फटने के बाद चार धाम यात्रा में हुए हादसे में गढ़वाल राइफल्स ने लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई। गढ़वाल राइफल्स का नारा है – बदरी विशाल लाल की जय।

शौर्य द्वार के ऊपर लिखी पंक्तियां जो वीर युद्ध में मारा जाता है उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि वीर पुरुष युद्ध में वीर गति  प्राप्त कर स्वर्ग में सम्मान पाता है।


प्रवेश टिकट- संग्रहालय का प्रवेश टिकट 60 रुपये का है। संग्रहालय के अंदर फोटोग्राफी करने की मनाही है। संग्रहालय हर बुधवार को बंद रहता है। बाकी दिन सुबह 8 बजे से एक बजे और फिर 3 बजे से 5 बजे तक खुला रहता है। सर्दियों में 9.00 से 12.00 और शाम को 3.30 से 5.30 तक खुला रहता है। संग्राहलय लैंसडाउन कैंटोनमेंट एरिया में शौर्य स्थल सैनिकों के परेड ग्राउंड के पास बना हुआ है। आसपास के इलाके की सफाई व्यवस्था शानदार है।


पॉलीथीन मुक्त है शहर - लैंसडाउन कैंटोनमेंट बोर्ड ने शहर को पॉलीथीन मुक्त घोषित कर रखा है।  लोगों को प्रेरित करने  के लिए जगह जगह बोर्ड भी लगाए गए हैं। गढ़वाल राइफल्स को वृक्षारोपण और पर्यावरण बचाने के लिए लगातार किए जा रहे प्रयासों के लिए कई बार सम्मान मिल चुका है। लैंसडाउन की सड़कों पर हरियाली और फूलों की क्यारियां देखकर दिल खुश हो जाता है।

लैंसडाउन - गढ़वाल वार म्युजियम के लॉन में खिले गुलाब।

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( LANSDOWNE, UTTRAKHAND, WAR MUSEUM, GARHWAL REGIMENT, RIFLES) 



Wednesday, May 25, 2016

लुभाता है लैंसडाउन का भूला ताल

अगर लैंसडाउन में सबसे खूबसूरत जगह की बात करें तो वह भूला ताल झील। यह एक छोटी सी झील है लेकिन है प्यारी सी। लैंसडाउन के गांधी चौक से पैदल चलते जाएं। कैंटोनमेंट बोर्ड का दफ्तर उसके आगे आर्मी पब्लिक स्कूल और थोड़ा आगे करीब दो किलोमीटर के पैदल ट्रैक के बाद आ जाता है भूला ताल लेक। रास्ते में जगह जगह पथ प्रदर्शक लगे हैं इसलिए आपको रास्ता पूछना नहीं पड़ेगा। 


छोटे से लेक को सुंदर रूप प्रदान करने में गढ़वाल राइफल्स की अहम भूमिका है। भूला ताल लेक गढ़वाल राइफल्स के वीर गढ़वाली फौजियों को समर्पित है। वास्तव में भूला ताल लेक एक चेक डैम है। गढ़वाली में भूला का मतलब है छोटा भाई। गढ़वाली में प्यार से लोगों को भूला कहने का रिवाज है। इसी नाम पर इस झील का नाम भूला ताल रखा गया। 


जल संरक्षण का सुंदर नमूना -  सेना ने भूला ताल झील को नया रूप प्रदान किया है। इस झील का नया रूप देने के लिए साल 2003 में एक प्रोजेक्ट के तौर पर काम शुरू किया  गया। इस  झील की कुल लंबाई 35 मीटर है और इसमें 32 लाख गैलन पानी रखने की क्षमता है।  लैंसडाउन के लोगों के लिे यह झील बहुत काम की है। बरसात के दिनों में इस झील का सौंदर्य और बढ़ जाता है।

झील में करें बोटिंग - झील में बोटिंग का भी इंतजाम है। इसके लिए 80 रुपये का टिकट लेना पडता है। लिहाजा यह बच्चों का काफी पसंद आता है। झील के चारों तरफ हरे भरे पार्क बनाए गए हैं। इन पार्कों में सुंदर हट बनाए गए हैं। यहां नन्हें खरगोश चहलकदमी करते नजर आते हैं। 


पार्क के अंदर एक कैंटीन भी है। लोगों के लिए टायलेट का भी इंतजाम है।अगर आप लैंसडाउन से कुछ प्रतीक चिन्हों की खरीदारी करना चाहते हैं तो झील के परिसर में स्थानीय उत्पादों का स्टाल भी है। यहां पर आप मग पर अपनी फोटो भी प्रिंट करा सकते हैं। टाइम पास  के लिए भूला ताल अच्छी जगह है। बैठने के लिए कई बेंच बनी हुई हैं।

खुलने का समयः     झील सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। वहीं सर्दियो के दिन में सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। बुधवार को झील को रखरखाव के लिए बंद रखा जाता है। झील में प्रवेश के लिए 20 रुपये का टिकट है।  


- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( LANSDOWNE, UTTRAKHAND, BHULA TAL LAKE, WATER, GARHWAL  RIFELS )