Friday, February 26, 2016

गोआलपाड़ा से बंगाई गांव वाया नर नारायण सेतु

 



शिलांग से चलकर देर शाम तक गुवाहाटी पहुंच गया हूं। यहां से दिल्ली जाने वाली मेरी ट्रेन अगले दिन सुबह में है।  रेलवे स्टेशन के ठीक बगल में पलटन बाजार के इंदिरा होटल में  मेरा कमरा है। रात्रि भोजन के बाद कमरे में आकर सो गया।  अगले दिन सुबह सुबह तैयार होकर रेलवे स्टेशन पहुंच गया हूं। ठीक सुबह 6.15 बजे 12501 पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति  चल पड़ी है। पर इस बार   बिहार जाने वाली इस रेल मार्ग पिछली बार की अवध असम एक्सप्रेस से अलग है। पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति  कामाख्या जंक्शन से अलग मार्ग पर चल पड़ती है।


नर नारायण सेतु -
  यह ट्रेन सरायघाट में ब्रह्मपुत्र नदी को पार नहीं करती।   यह ग्वालपाड़ा से होकर जाती है। गुवाहाटी से  गोवालपाड़ा की दूरी 130 किलोमीटर है। सुबह  नौ से 10 बजे के बीच हमलोग  ब्रह्मपुत्र नदी के  पुल को पार कर रहे हैं।  ग्वालपाड़ा  ( रेलवे  स्टेशन पर लिखा है-  गोवालपाड़ा वैसे तो होना चाहिए गोआलपाड़ा ) में  ब्रह्मपुत्र नदी पर विशाल पुल आया।   इस ढाई किलोमीटर लंबे पुल का नाम नर नारायण सेतु है। यह  गोवालपाड़ा और जोगीगुफा के बीच बना है। असम  के लोग आम  बोलचाल की भाषा में इसे जोगीगुफा पुल कहते हैं।  यह पुल असम के दो जिलों  गोवालपाड़ा और बोंगाईगांव को  जोड़ती है। 


इस पुल का  उदघाटन 15 अप्रैल 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी  ने किया था।   जोगीगुफा  छोटा सा कस्बा है जो बोंगाइगांव  जिले में पड़ता है।  यह रेल कम रोड ब्रिज है।  इसका निर्माण 1989 में आरंभ हुआ था।   दस साल में इसका निर्माण पूरा हो गया।  इसके निर्माण में  102 करोड़ की लागात आई थी।  इसका निर्माण  ब्रेदवेट बर्न एंड जोसेप कंपनी ने किया। 
इस बार   गुवाहाटी से बिहार में प्रवेश करने तक ज्यादातर सफर दिन में ही होगा।  गुवाहाटी में ट्रेन के स्लिपर क्लास  में मेरी  मुलाकात  एक राजस्थानी मारवाड़ी सज्जन से होती है। वे तीन पीढ़ियों से गुवाहाटी में रह रहे हैं। यहां वे  एक मार्केटिंग कंपनी में नौकरी करते हैं। लगातार घूमने के कारण उन्हें असम के सभी जिलों की  भौगोलिक जानकारी काफी अच्छी  है।  उनसे बातों  में अच्छा वक्त कट रहा था।  
मैंने पूछ डाला , तीन पीढ़ियों से गुवाहाटी में हैं तो अपना मकान तो बना लिया होगा।  बोले, नहीं किराये के घर में रहते हैं। कभी इतना पैसा नहीं हुआ कि मकान बना सकें।   मुझे थोड़ा अचरज हुआ।  क्योंकि मारवाड़ी लोग मितव्ययी होते हैं  फिर भी तीन पीढ़ियों से रहते हुए घर क्यों नहीं बना सके। पर इसका राज आगे धीरे-धीरे खुलने लगा।  इस बीच हम  न्यू बंगाई गांव जंक्शन पहुंच चुके हैं।    हमारे सामने वाले प्लेटफार्म पर  रेलवे की विशेष ट्रेन साइंस  एक्सप्रेस लगी हुई है।  यह चलती फिरती विज्ञान प्रदर्शनी  है।
हां तो मारवाड़ी भाई  आगे बताने लगे मैं रोज तांबूल खाने का शौकीन हूं। दिल्ली जा रहा हूं पांच दिन बेटी के पास।  उधर तो तांबूल मिलेगा नहीं,  इसलिए पांच दिन का तांबूल का स्टॉक रख लिया है।   मैंने पूछा एक दिन में कितने रुपये की तांबूल खा जाते हैं। बताया  30 रुपये का।  यानी 900 रुपये महीने  और साल के करीब 11 हजार रुपये तांबूल के नाम पर कुरबान। कोकराझार रेलवे स्टेशन गुजर चुका है।   हमारी ट्रेन असम को पार करके बंगाल में न्यू कूचबिहार पहुंच गई है। सामने सियालदह  न्यू कूचबिहार  एक्स्प्रेस लगी  हुई है।


थोड़ी देर में मारवाड़ी भाई ने बताया कि रोज रात को सोने से पहले दो पैग जरूर लगाता हूं। कई बार  मन नहीं मानता तो तीसरा पैग भी लगाने चला जाता हूं।  मैंने पूछा इसमें कितना खर्चा है बोले रोज 300 से 400 रुपये। यानी की  हर महीने  12 हजार रुपये तांबूल और  मदिरा के  खाते में चला जाता है।  मैंने कहा , मैंने दिल्ली में जो फ्लैट खरीदा है उसकी 12  हजार  ही मासिक किस्त देता हूं। अगर  आप मदिरा और तांबूल से दूर रहते तो  बीस साल में गुवाहाटी में  एक छोटा सा घर तो बना ही सकते थे।    हम पहुंच गए हैं न्यूमियानगुड़ी । 
-  विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
 PURVOTTAR SAMPARK KRANTI  EXPRESS, GOALPARA, BANGAI GAON, ASSAM , NAR NARAYAN SETU ON BRAHAMPUTRA,  JOGIGUFA  )  


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