Monday, February 29, 2016

साहित्यिक रचनाओं पर रेलगाड़ियों के नाम

देश में चलने वाली तमाम रेलगाड़ियों के नाम बहुत गहरा अर्थ भी रखते हैं। इन नामों में इतिहास, भूगोल, आस्था, साहित्य संस्कृति, का मेल देखने को मिलता है। तो आइए नजर डालते हैं इन नामों पर। 

कई रेलगाड़ियों के नाम तो लेखकों की प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाओं के नाम पर रखे गए हैं। बांग्ला के महान कवि लेखक रविंद्र नाथ टैगोर की नोबेल पुरस्कार से सम्मानित रचना गीतांजलि के नाम पर गीतांजलि एक्सप्रेस ( मुंबई- हावड़ा - 12859 ) दौड़ती है। 

बंगाल में ही सियालदह से सहरसा के बीच एक ट्रेन चलती है हाटे बाजारे एक्सप्रेस (13163)। सहरसा से सियालदह के बीच चलनेवाली हाटे बजारे एक्सप्रेस मानसी होते हुए महेशखूंट, थाना विहपुर, नवगछिया होते हुए कटिहार होकर सियालदह जाती है।


आपको पता है हाटे बाजारे बांग्ला के प्रसिद्ध लेखक बनफूल की कहानी है जो अच्छाई और बुराई के बीच संघर्ष करती है। 1962 में उन्हे इस कृति के लिए रविंद्र पुरस्कार मिला था। वैसे बनफूल साहित्यिक नाम है लेखक का पूरा नाम बलाई चंद मुखोपाध्याय था। हाटे बाजारे नाम से 1967 में बांग्ला में एक सुपरहिट फिल्म भी बनी थी जिसमें अशोक कुमार और वैजयंती माला ने अभिनय किया था। फिल्म का निर्माण मशहूर फिल्मकार तपन सिन्हा ने किया था। 

बांग्ला के एक और प्रसिद्ध कवि सुभाष मुखोपाध्याय की काव्य रचना पर पदातिक के नाम पर पदातिक एक्सप्रेस ( सियालदह से न्यू जलपाई गुड़ी -12377 )  दौड़ती है। वहीं काजी नजरूल इस्लाम की काव्य रचना अग्निवीणा के नाम पर अग्निवीणा एक्सप्रेस ( हावड़ा आसनसोल 12341 )  दौड़ती है। पदातिक और अग्निवीणा जैसे साहित्यिक नामों का चयन ममता बनर्जी के रेल मंत्री के कार्यकाल में हुआ।

अब हिंदी पट्टी उत्तर प्रदेश की ओर बढ़ते हैं। मशहूर कवि मलिक मुहम्मद जायसी की रचना को याद दिलाती हुई पदमावत एक्सप्रेस ( दिल्ली से प्रतापगढ़ - 14208) भी दौड़ती है। जायसी राय बरेली के पास जायस के रहने वाले थे। मशहूर शायर कैफी आजमी की लोकप्रिय कृति कैफियात के नाम पर कैफियात एक्सप्रेस ( दिल्ली से आजमगढ़ - 12225 )  चलती है। कैफी आजमी का मूल घर आजमगढ़ जिले के मिजवां में था। इसलिए उनके सम्मान में आजमगढ़ से चलने वाली इस ट्रेन का नाम कैफियात एक्सप्रेस रखा गया। 

वाराणसी के निवासी महान हिंदी साहित्यकार जय शंकर प्रसाद की काव्य रचना कामायनी के नाम पर कामायनी एक्सप्रेस ( मुंबई-वाराणसी -11071 ) दौड़ती है। वहीं हिंदी के कथा सम्राट प्रेमचंद की मशहूर कृति गोदान के नाम पर गोदान एक्सप्रेस ( गोरखपुर - मुंबई एलटीटी -11055 ) नामक ट्रेन है। 

कविगुरु एक्सप्रेस से महामना एक्सप्रेस तक

महापुरुषों के नाम पर ट्रेनों के नाम रखे जाने की परंपरा कम रही है। पर रविंद्र नाथ टैगोर के नाम पर हमें कविगुरु एक्सप्रेस नाम मिलता है। कविगुरु एक्सप्रेस नाम से तो ट्रेनों सीरीज है। स्वामी विवेकानंद के नाम पर विवेक एक्सप्रेस सीरीज की रेलगाड़ियां दौड़ती है।इलाहाबाद मुंबई के बीच तुलसी एक्सप्रेस भी चलती है। यह महाकवि तुलसी दास के नाम पर है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के नाम पर 22 जनवरी 2016 से वाराणसी और दिल्ली के बीच नई ट्रेन महामना एक्सप्रेस चलाई गई है। अब रेलवे ने महामना नाम से एक नई सीरीज ही शुरू करने का फैसला लिया है। 
संयोग है कि इस ट्रेन का संचालन काशी हिंदू विश्वविद्यालय के 100 साल पूरे होने के मौके पर किया गया । इस विश्वविद्यालय की स्थापना 4 फरवरी 1916 को हुई थी।

देश में ज्यादातर रेलगाडियों के नाम वैसे तो नदियों के नाम पर हैं या फिर जिन राज्यों से ट्रेन गुजरती हैं उनका कनेक्शन नाम में दिखाई देता है। जैसे गंगा कावेरी एक्सप्रेस जो वाराणसी को चेन्नई से जोड़ती है। सरयू यमुना एक्सप्रेस, ब्रह्मपुत्र मेल, कालिंदी एक्स्प्रेस, गोदावरी एक्सप्रेस (हैदराबाद –विशाखापत्तनम), क्षिप्रा एक्सप्रेस, तीस्ता तोरसा एक्सप्रेस,  आदि। राज्यों और क्षेत्रों के नाम देखें- पंजाब मेल, शाने पंजाब एक्सप्रेस, सिक्किम महानंदा एक्सप्रेस, मंगला लक्षदीप  एक्सप्रेस, महाकौशल एक्सप्रेस इस्टकोस्ट एक्सप्रेस ।


ऐतिहासिक घटनाओं को याद दिलाती हुई भी ट्रेनों के तमाम नाम हैं – प्रथम स्वतंत्रता संग्राम एक्सप्रेस, सत्याग्रह एक्सप्रेस, जलियांवाला बाग एक्सप्रेस, नवजीवन एक्सप्रेस, सेवाग्राम एक्सप्रेस, आश्रम एक्सप्रेस, दीक्षाभूमि एक्सप्रेस, संपूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, आजाद हिंद एक्सप्रेस, अगस्त क्रांति राजधानी एक्सप्रेस। संपूर्ण क्रांति और सत्याग्रह जैसे नाम नीतीश कुमार के रेलमंत्री रहने के कार्यकाल में सुझाए गए थे।

धार्मिक आस्था से जुड़े नाम -  बहुत सी रेलगाड़ियों के नाम धार्मिक आस्था से जुड़े हैं। इनकी बानगी भी देखिए - गरीब नवाज एक्सप्रेस, काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस, शिवगंगा एक्सप्रेस, गोल्डेन टेंपल मेल, गोरखधाम एक्सप्रेस, प्रयागराज एक्सप्रेस, सचखंड एक्सप्रेस, महाबोधि एक्सप्रेस, सारनाथ एक्सप्रेस । इनमें हिंदू, मुस्लिम, सिख आस्था की झलक दिखाई दे जाती है। अलग अलग रेलगाड़ियों के नामों पर गौर करें तो इसमें हमारी राष्ट्रीय एकता, संस्कृति की झलक बखूबी मिलती है।
-vidyutp@gmail.com

( RAIL, MAHAMANA, BHU, VARANASI, COLORS OF BANARAS, UTTRAR PRADESH)


Saturday, February 27, 2016

न्यू जलापाईगुड़ी रेलवे स्टेशन पर मीटरगेज का स्टीम लोकोमोटिव

गुवाहाटी से चलकर पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति एक्सप्रेस दोपहर एक बजे  न्यू जलपाईगुड़ी पहुंच गई है।  हमने यहां  रेलवे स्टेशन से  दिन का भोजन लिया।  थोड़ी बात और न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन के बारे में । 

 लोगों को रेलवे के इतिहास से रूबरू कराने के लिए कई रेलवे स्टेशनों के बाहर पुराने लोकोमोटिव को सजा संवार कर प्रदर्शित किया गया है। न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन के बाहर निकलने पर दाहिनी तरफ एक विशाल लोकोमोटिव आराम फरमाता हुआ दिखाई देता है। यह एक मीटर गेज नेटवर्क पर चलने वाला इंजन है। इंजन का नाम एमएडब्यूडी 1798 ( MAWD 1798)  है। साल 1944 में निर्मित ये लोकोमोटिव अमेरिकी युद्ध के दौरान डिस्पोज किया गया स्टीम लोकोमोटिव है। इसका निर्माण ब्लाडविन लोकोमोटिव वर्क्स में किया गया था।

अमेरिका के फिलाडेल्फिया स्थित ब्लाडविन कंपनी की स्थापना 1825 में हुई थी। ब्लाडविन मूल रूप से स्टीम लोकोमोटिव बनाने वाली कंपनी थी। जब स्टीम का दौर खत्म होकर डीजल का दौर आया तो ये कंपनी बाजार में मजबूती से कायम नहीं रह सकी।

 करीब 70 हजार स्टीम लोकोमोटिव का निर्माण करने वाली कंपनी ब्लाडविन एक दिन दीवालिया हो गई। बहरहाल हम बात कर रहे हैं एनजेपी स्टेशन के बाहर खडे एमडब्लूडी 1798 लोको की। तो इसकी क्षमता 8.12 टन कोयला ग्रहण करने की है। जबकि इसका वाटर टैंक 10 हजार गैलन का है। लोकोमोटिव का बायलर 24 टन का है। लोकोमोटिव का कुल वजन 41 टन है।

1993 में आखिरी बार दौड़ा - इस लोकोमोटिव को मैकआर्थर नाम से बुलाया जाता था। वे दूसरे विश्व युद्ध के लोकप्रिय अमेरिकी जनरल थे। यह लोकोमोटिव 2-8-2 कनफिगरेशन का है। आमतौर पर यह शंटिंग संबंधी कार्यों के लिए काफी मुफीद था। इसे बहुत तेज गति के ट्रेनों के खीचने की अनुमति नहीं दी जाती थी क्योंकि इससे डिब्बो के पटरी से उतर जाने का खतरा था। अपनी स्टोव जैसी चिमनी, बार फ्रेम और सेंट्रल हैंडलैंप के कारण यह एक पारंपरिक अमेरिकी लोकोमोटिव जैसा दिखाई देता है। 


भारत में यह लोकोमोटिव 1948 में सेवा में आया। 1993 में इसने आखिरी बार अलीपुर दुआर और गीतालदह के बीच अपनी सेवाएं दी थी। इन क्षेत्र से स्टीम इंजन की विदाई के बाद यह लोकोमोटिव कई सालों तक गुवाहाटी के पास न्यू गुवाहाटी लोको शेड में आराम फरमाता रहा। बाद में रेलवे की रेल पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना तहत इसे रिस्टोर किया गया। बाद में इसे न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन के बाहर लाकर खड़ा कर दिया गया।  

साल 2001 में दुबारा लगाई दौड़ - साल 2001 में इस स्टीम लोकोमोटिव को रिस्टोर करने की योजना बनी। कुछ पुराने रेल कर्मियों के  23 दिन के प्रयास के बाद 20 फरवरी को इस स्टीम लोकोमोटिव ने एक बार फिर पटरियों पर दौड़ लगाई। यह स्टीम इंजन गुवाहाटी से पांडु के बीच दौड़ा। तमाम जगह सड़कों पर इस स्टीम लोकोमोटिव की चलते देखने के लिए लोग रूक गए।


 रेलवे ने इस स्टीम लोकोमोटिव को रिस्टोर करने में डेढ़ लाख रुपये खर्च किए। बाद में इस लोकोमोटिव को न्यू जलपाईगुड़ी  लाने का फैसला किया गया जो पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है। अब आते जाते हजारों लोग रोज रूक रूक कर इस लोकोमोटिव को देखते हैं। हालांकि लोकोमोटिव के आसपास इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी गई है।


इस ट्रेन में मेरा आरक्षण दो टुकड़ों में है।  गुवाहाटी से  एनजेपी तक किसी और कोच में तो  एनजेपी से दिल्ली तक किसी ओर कोच में।  तो एनजेपी में मैंने अपना कोच बदल लिया है। शाम ढलने से पहले ट्रेन बिहार में प्रवेश कर चुकी है। किशनगंज शहर  गुजर रहा है। इसके बाद कटिहार  आया। अब अंधेरा होने लगा है। तो रात्रि भोजन के बाद सोने की तैयारी  में जुट गया हूं। 

इस सफर में बिहार के  ज्यादातर रेलवे स्टेशन  रात में गुजर  गए।   सुबह  होने पर पता चला कि ट्रेन काफी  लेट हो गई है। दोपहर एक बजे ट्रेन  कानपुर जंक्शन पर पहुंची। पूरे छह घंटे लेट। यहां  पर मैंने दोपहर का भोजन लिया।  सोचा था आज शाम को ही दफ्तर चला जाउंगा, पर ऐसा नहीं हो  सकेगा। इसके बाद टूंडला जंक्शन आया।    दिल्ली पहुंचते-पहुंचे  शाम ढल चुकी है।
-  विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( NJP, STEAM LOCOMOTIVE, NEW JALPAIGUDI , MAWD 1798, BLADWIN  , USA , PURVOTTAR SAMPARK KRANTI  EXPRESS )  



Friday, February 26, 2016

गोआलपाड़ा से बंगाई गांव वाया नर नारायण सेतु

 



शिलांग से चलकर देर शाम तक गुवाहाटी पहुंच गया हूं। यहां से दिल्ली जाने वाली मेरी ट्रेन अगले दिन सुबह में है।  रेलवे स्टेशन के ठीक बगल में पलटन बाजार के इंदिरा होटल में  मेरा कमरा है। रात्रि भोजन के बाद कमरे में आकर सो गया।  अगले दिन सुबह सुबह तैयार होकर रेलवे स्टेशन पहुंच गया हूं। ठीक सुबह 6.15 बजे 12501 पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति  चल पड़ी है। पर इस बार   बिहार जाने वाली इस रेल मार्ग पिछली बार की अवध असम एक्सप्रेस से अलग है। पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति  कामाख्या जंक्शन से अलग मार्ग पर चल पड़ती है।


नर नारायण सेतु -
  यह ट्रेन सरायघाट में ब्रह्मपुत्र नदी को पार नहीं करती।   यह ग्वालपाड़ा से होकर जाती है। गुवाहाटी से  गोवालपाड़ा की दूरी 130 किलोमीटर है। सुबह  नौ से 10 बजे के बीच हमलोग  ब्रह्मपुत्र नदी के  पुल को पार कर रहे हैं।  ग्वालपाड़ा  ( रेलवे  स्टेशन पर लिखा है-  गोवालपाड़ा वैसे तो होना चाहिए गोआलपाड़ा ) में  ब्रह्मपुत्र नदी पर विशाल पुल आया।   इस ढाई किलोमीटर लंबे पुल का नाम नर नारायण सेतु है। यह  गोवालपाड़ा और जोगीगुफा के बीच बना है। असम  के लोग आम  बोलचाल की भाषा में इसे जोगीगुफा पुल कहते हैं।  यह पुल असम के दो जिलों  गोवालपाड़ा और बोंगाईगांव को  जोड़ती है। 


इस पुल का  उदघाटन 15 अप्रैल 1998 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी  ने किया था।   जोगीगुफा  छोटा सा कस्बा है जो बोंगाइगांव  जिले में पड़ता है।  यह रेल कम रोड ब्रिज है।  इसका निर्माण 1989 में आरंभ हुआ था।   दस साल में इसका निर्माण पूरा हो गया।  इसके निर्माण में  102 करोड़ की लागात आई थी।  इसका निर्माण  ब्रेदवेट बर्न एंड जोसेप कंपनी ने किया। 
इस बार   गुवाहाटी से बिहार में प्रवेश करने तक ज्यादातर सफर दिन में ही होगा।  गुवाहाटी में ट्रेन के स्लिपर क्लास  में मेरी  मुलाकात  एक राजस्थानी मारवाड़ी सज्जन से होती है। वे तीन पीढ़ियों से गुवाहाटी में रह रहे हैं। यहां वे  एक मार्केटिंग कंपनी में नौकरी करते हैं। लगातार घूमने के कारण उन्हें असम के सभी जिलों की  भौगोलिक जानकारी काफी अच्छी  है।  उनसे बातों  में अच्छा वक्त कट रहा था।  
मैंने पूछ डाला , तीन पीढ़ियों से गुवाहाटी में हैं तो अपना मकान तो बना लिया होगा।  बोले, नहीं किराये के घर में रहते हैं। कभी इतना पैसा नहीं हुआ कि मकान बना सकें।   मुझे थोड़ा अचरज हुआ।  क्योंकि मारवाड़ी लोग मितव्ययी होते हैं  फिर भी तीन पीढ़ियों से रहते हुए घर क्यों नहीं बना सके। पर इसका राज आगे धीरे-धीरे खुलने लगा।  इस बीच हम  न्यू बंगाई गांव जंक्शन पहुंच चुके हैं।    हमारे सामने वाले प्लेटफार्म पर  रेलवे की विशेष ट्रेन साइंस  एक्सप्रेस लगी हुई है।  यह चलती फिरती विज्ञान प्रदर्शनी  है।
हां तो मारवाड़ी भाई  आगे बताने लगे मैं रोज तांबूल खाने का शौकीन हूं। दिल्ली जा रहा हूं पांच दिन बेटी के पास।  उधर तो तांबूल मिलेगा नहीं,  इसलिए पांच दिन का तांबूल का स्टॉक रख लिया है।   मैंने पूछा एक दिन में कितने रुपये की तांबूल खा जाते हैं। बताया  30 रुपये का।  यानी 900 रुपये महीने  और साल के करीब 11 हजार रुपये तांबूल के नाम पर कुरबान। कोकराझार रेलवे स्टेशन गुजर चुका है।   हमारी ट्रेन असम को पार करके बंगाल में न्यू कूचबिहार पहुंच गई है। सामने सियालदह  न्यू कूचबिहार  एक्स्प्रेस लगी  हुई है।


थोड़ी देर में मारवाड़ी भाई ने बताया कि रोज रात को सोने से पहले दो पैग जरूर लगाता हूं। कई बार  मन नहीं मानता तो तीसरा पैग भी लगाने चला जाता हूं।  मैंने पूछा इसमें कितना खर्चा है बोले रोज 300 से 400 रुपये। यानी की  हर महीने  12 हजार रुपये तांबूल और  मदिरा के  खाते में चला जाता है।  मैंने कहा , मैंने दिल्ली में जो फ्लैट खरीदा है उसकी 12  हजार  ही मासिक किस्त देता हूं। अगर  आप मदिरा और तांबूल से दूर रहते तो  बीस साल में गुवाहाटी में  एक छोटा सा घर तो बना ही सकते थे।    हम पहुंच गए हैं न्यूमियानगुड़ी । 
-  विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
 PURVOTTAR SAMPARK KRANTI  EXPRESS, GOALPARA, BANGAI GAON, ASSAM , NAR NARAYAN SETU ON BRAHAMPUTRA,  JOGIGUFA  )  


Thursday, February 25, 2016

गुवाहाटी शहर की सीमा को छूता है मेघालय


दो राज्यों के बीच बंटा जोराबात -
  शिलांग से वापसी की राह पर हूं। अगर आप गुवाहाटी से शिलांग की ओर चलते हैं तो गुवाहाटी शहर के बाहरी इलाके से मेघालय राज्य शुरू हो जाता है। एनएच 37 से एनएच 40 के जंक्शन यानी तिनाली जंक्शन के बीच खानपारा, बरिदुआ और जोराबात मेघालय में पड़ते हैं। तिनाली जंक्शन पर एक भद्रकालेश्वरी मंदिर भी है। वास्तव में एनएच 37 एक तरफ असम पड़ता है दूसरी तरफ मेघालय।


यह आप जोराबात से गुजरते हुए खूब देख सकते हैं। एक तरफ के दुकानों की साइन बोर्ड पर मेघालय लिखा नजर आता है तो दूसरी तरफ असम। जोराबात रीभोई जिले में पड़ता है जबकि उसका एनएच के इस पार वाला हिस्सा असम के कामरूप जिले में।

मेघालय के जोराबात का पिन कोड है 793101  जबकि असम इलाके के जोराबात का पिन कोड 781026 है। जोराबात में नेपाली और बिहारी लोगों की बड़ी संख्या है। यह बड़ा व्यापारिक इलाका है। भले ही मेघालय की भौगोलिक सीमा गुवाहाटी के काफी करीब तक पहुंचती हो पर राजधानी शिलांग तक रेल की सिटी बजने मे अभी काफी वक्त लगेगा।


कब बजेगी शिलांग में रेल की सिटी - वह साल 2014 में 29 नवंबर का दिन था जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेघालय के लिए पहली ट्रेन को झंडी दिखाकर रवाना किया। इसके साथ ही आजादी के छह दशक से अधिक समय बाद मेघालय देश के रेल नक्शे पर आ गया।   मेंदी पथार-गुवाहाटी के बीच पहली पैसेंजर ट्रेन के संचालन की शुरुआत हुई। पर राजधानी शिलांग को ट्रेन से जोड़ने की योजना अभी दूर की कौड़ी है।

मेंदी पथार (MNDP)  तक रेल दूधनोई से पहुंचाई गई है। दूधनोई गुवाहाटी कामाख्या गोलपाड़ा न्यू बंगाई गांव लाइन पर रेलवे स्टेशन है। गुवाहाटी की ओर से चलने पर दूधनोई गोलपारा टाउन से 20 किलोमीटर पहले आता है। इस तरह से दूधनोई (DDNI) अब जंक्शन बन गया है। पर दूधनोई से मेंदी पथार की दूरी महज 20 किलोमीटर है।


मेघालय के राज्य बनने के बीस साल बाद राज्य में रेल प्रवेश जरूर कर गई है पर महज कुछ किलोमीटर तक। इससे बहुत छोटी आबादी को लाभ हो रहा है। कुल 9.36 किलोमीटर रेलवे ट्रैक अभी मेघालय में है। 916 मीटर की ऊंचाई पर मेंदीपथार नार्थ गारो हिल्स जिले में पड़ता है। सिर्फ दो रेलवे स्टेशन अभी मेघालय राज्य में बने हैं। पहला स्टेशन नोलबाड़ी 10वें किलोमीटर पर है। आखिरी स्टेशन मेंदी पथार 19वें किलोमीटर पर।
दूधनोई  जंक्शन की  सुबह में उगता सूर्य। 

मेघालय को दूसरा रेल लिंक दिया जा रहा है तेतेलिया से जो राज्य की राजधानी शिलांग को जोड़ेगा। तेतेलिया ( TTLA) गुवाहाटी से लमडिंग के बीच 39वें किलोमीटर पर एक छोटा सा स्टेशन है। यह स्टेशन जागी रोड से 19 किलोमीटर पहले है। यहां से बिरनी हाट तक 21.5 किलोमीटर रेलवे लाइन बनाए जाने पर काम चल रहा है। वास्तव में यही लाइन राजधानी शिलांग तक जाएगी। पर इसमें अभी कई साल लगेंगे। इस लाइन के लिए साल 2015 तक लोकेशन सर्वे पूरा हुआ है। 

बिरनी हाट तक पहुंचने वाली लाइन में केवल 2.5 किलोमीटर का ट्रैक मेघालय में पड़ेगा। एक मुश्किल और भी है। मेघालय के कई एनजीओ रेलवे लिंक का विरोध कर रहे हैं जिससे प्रोजेक्ट में देरी हो रही है। हालांकि ये एक नेशनल प्रोजेक्ट है। बिरनी हाट गुवाहाटी शिलांग नेशनल हाईवे नंबर 40 पर नोंगपो से पहले पड़ता है। बिरनी हाट में औद्योगिक क्षेत्र भी है। इसके बाद शिलांग तक जाने वाली लाइन एनएच 40 के आसपास से गुजरेगी।



ब्रिटिश काल में 1880 में चेरापूंजी तक रेल पहुंचाने की योजना बनी थी पर वह परवान नहीं चढ़ सकी। इसका एक खंड तो पूरा हो गया था पर बाकी दो खंड पर काम नहीं हो सका। कुछ तकनीकी बाधाओं के कारण ब्रिटिश काल में चेरापूंजी तक रेल ले जाने की योजना परवान नहीं चढ़ सकी। उसके बाद से 100 साल से ज्यादा गुजर गए यह सुंदर इलाका रेलवे की सिटी सुनने के लिए तरस रहा है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SHILLONG, MEGHALYA, RAIL, JORABAT, RIBHOI , ASSAM  )

Wednesday, February 24, 2016

मेघालय का महान क्रांतिवीर शहीद कियांग नांगबा

शिलांग से गुवाहाटी के लिए वापस चल पड़ा हूं। टैक्सी की तलाश करते हुए एक चौराहे पर पहुंता हूं, वहां मेघालय के एक वीर सपूत की प्रतिमा स्थापित की गई है। सहज ही उस वीर सपूत के बारे में जानने की इच्छा होती है।

देश की आजादी की लड़ाई शुरुआती योद्धाओं में कई ऐसे वीर सपूत हैं जिन्हें इतिहास के पन्नों में कम जगह मिली है, लेकिन उनकी बहादुरी की दास्तां नमन करने योग्य है। ऐसा ही एक नाम कियांग नांगबा का है। मेघालय में जनजातीय वीर नांगबा का नाम बड़े सम्मान से लिया जाता है।

युवा अवस्था में ही  कियांग को अंग्रेजों ने 1862 में फांसी पर लटका दिया था।   30 दिसंबर को गिरफ्तारी की कुछ घंटे बाद ही सार्वजनिक स्थल पर उन्हें फांसी दे दी गई। नांगबा का नाम भी उन लोगों में शामिल है जो आजादी की लड़ाई के शुरुआती दिनों में शहीद हो गए।   नांगबा की सही जन्म तिथि का पता नहीं है लेकिन ये कहा जाता है कि फांसी के समय उनकी उम्र 30 साल से ज्यादा नहीं थी। 


नांगबा ने खासी जनजाति के प्रमुख उत्सव बेडिनख्लाम पर अंग्रेजों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाई थी। इसके साथ ही 1860 में ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए हाउस टैक्स का पुरजोर विरोध किया था। नांगबा और उनके साथियों ने ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह कर दिया।


खासी जनजाति के प्रमुख उत्सव बेडिनख्लाम पर अंग्रेजों द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाने के कारण नांगबा को ब्रितानिया जुल्म का शिकार होना पड़ा था। यह उत्सव उत्तर भारत की जगन्नाथ रथ यात्रा के समय बिल्कुल उसी अंदाज में मनाया जाता है। नांगबा की प्रतिष्ठा मेघालय में आजादी की लड़ाई के हीरो के साथ ही एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व के तौर पर भी है। वह संगीत से भी काफी लगाव रखते थे। वे बांसुरी बजाने में सिद्धहस्त थे।

फांसी पर लटकाए जाने से पहले कियांग का लोगों को संबोधित किया हुआ आखिरी संदेश अदभुत था। उसने कहा था कि फांसी पर लटकने के बाद यदि उनकी गर्दन पूरब की ओर झुकेगी तो देश सौ साल में आजाद हो जाएगा। अगर पश्चिम की तरफ झुकेगी तो देश को लंबे समय तक गुलामी झेलनी पड़ेगी। फांसी के बाद कियांग का सिर पूरब की ओर ही झुका और उनके कहे अनुसार देश सौ साल के अंदर आजाद हुआ।


वीर सपूत नांगबा के शहादत के 152वें साल मे 30 दिसंबर 2014 को शिलांग के मुख्य चौराहे पर नांगबा की विशाल प्रतिमा खासी स्टूडेंट यूनियन द्वारा स्थापित की गई। इस प्रतिमा में वह तीर कमान और ढाल लिए हुए ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आंदोलन करते हुए दिखाई दे रहे हैं। उनकी शहादत दिवस पर हर साल शिलांग में आयोजन होता है और लोग उनकी प्रतिमा के चरणों में श्रद्धा के फूल चढ़ाते हैं। भारत सरकार ने साल 2001 में मेघालय के इस वीर सपूत के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था।  



शहादत को सलाम 

1860 में ब्रिटिश सरकार के हाउस टैक्स लगाने का विरोध किया।

1862 में 30 दिसंबर को नांगबा को फांसी दी गई

2014 में शिलांग मे नांगबा की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई


1967 में नांगबा की याद में मेघालय के जोवाई में एक सरकारी कॉलेज खोला गया। 


मेघालय के इस महान शहीद के नाम पर राज्य के वेस्ट जयंतिया हिल्स जिले में एक सरकारी कालेज भी है। वास्तव में 1967 में खुले कालेज का नाम 1983 में कियांग नांगबा के नाम पर रख कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

मेघालय के महान शहीद नांगबा वास्तव में मणिपुर के पाओना ब्रजबासी, असम की किशोर वीरांगना कनकलता, कर्नाटक के क्रांतिवीर संगोली रायणा, बिहार के खुदीरामबोस की श्रेणी में आकर खड़े होते हैं। जिनके मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ शुरुआती दिनों से विरोध की ज्वाला थी। इन वीरों ने उग्र विरोध करते हुए युवा अवस्था में ही विदेशी शासन के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकते हुए अपने प्राणों की आहूति दे दी। 

- vidyutp@gmail.com
( MEGHALYA, KIANG NANGBAH, FREEDOM FIGHTER  , JOWAI GOVT COLLEGE, WEST JAINTIA HILLS, SHILLONG ) 


Tuesday, February 23, 2016

आदिवासी संस्कृति की झलक देखें डॉन बास्को म्युजियम में

मेघालय की राजधानी शिलांग में देखी जाने वाली जगहों में प्रमुख है डॉन बास्को म्युजियम। इस संग्रहालय में आप मानव विकास की झलक के साथ पूर्वोत्तर की आदिवासी संस्कृति को समझने की कोशिश कर सकते है। पूरे पूर्वोत्तर राज्यों में वहां की संस्कृति को समझने के लिए ये सबसे बेहतरीन संग्रहालय है। साल 1994 में संग्रहालय के निर्माण की नींव रखी गई। उसके बाद लगातार इसमें विस्तार हो रहा है। वैसे संग्रहालय का औपचारिक उदघाटन 5 मार्च 2010 को कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी ने किया था। इस संग्रहालय का प्रबंधन काफी बेहतरीन है। यह एक सरकारी संग्रहालय है जिसका प्रबंधन कला और संस्कृति मंत्रालय करता है।

स्काई वाक से शिलांग का नजारा -   डॉन बास्को म्युजियम का भवन भी काफी कलात्मक बना हुआ है। यह कुल सात मंजिलों का है। इस भवन के पास एक लंबा स्काई वाक बना है। इस स्काई वाक से पूरे शिलांग शहर का बेहतरीन नजारा देख सकते हैं। 


इस संग्रहालय में कुल 17 दीर्घाएं हैं। इनमें आप पूर्वोत्तर के अलग अलग जनजातियों की रहन सहन की झांकियां देख सकते हैं।  मेघालय की गारो, खासी और जयंतिया जनजातियों के बारे में यहां जाना ही जा सकता है साथ ही पूरे पूर्वोत्तर के बारे में जानने और समझने के लिए ये एक बेहतरीन संग्रहालय है। 
कृषि गैलरी में पूर्वोत्तर की खेतीबाड़ी के बारे में जाना जा सकता है। इसके अलावा आर्ट, खानपान, बास्केटरी, एलकोव्स, वस्त्र और आभूषण, मछली पकड़ना और शिकार, मकान बनाने की शैली, पूर्वोत्तर की भाषाओं के बारे में भी आप अलग अलग गैलरियों में जाकर जान सकते हैं।

संग्रहालय का भवन भी विशाल है। डॉन बॉस्को म्यूजियम का अपना शोध और प्रकाशन का विभाग भी है। संग्रहालय के साथ ही राज्य का सेंट्रल लाइब्रेरी का परिसर भी है। यह म्युजिम लोगों से सहयोग की अपेक्षा रखता है। आप संग्रहालय को धन और संरक्षण योग्य सामग्री दान में दे सकते हैं। 
शिलांग शहर के मावलाई में स्थित इस संग्रहालय में आप एक छत के नीचे पूरे पूर्वोत्तर को बेहतर तरीके से देख समझ और महसूस कर सकते हैं। संग्रहालय को अच्छी तरह देखने के लिए कुछ घंटे का समय निकाल कर रखें। अगर आप कला संस्कृति से ज्यादा लगाव रखते हैं तो यहां सारा दिन दे सकते हैं। 

खुलने का समय - संग्रहालय सोमवार से शनिवार को सुबह 9 बजे से शाम 5.30 बजे तक खुला रहता है। रविवार को संग्रहालय बंद रहता है। प्रवेश टिकट  भारतीय नागरिकों के लिए 100 रुपये का है। विदेशी नागरिकों के लिए यह टिकट 200 रुपये का है। छात्रों को टिकट में 50 फीसदी की रियायत दी जाती है। इसके लिए परिचय पत्र होना आवश्यक है।

इंटर्नशिप का भी मौका -  संग्रहालय के बारे में  ज्यादा जानकारी के लिए संग्रहालय की वेबसाइट (http://www.dbcic.org ) पर भी जा सकते हैं। संग्रहालय कला में रुचि रखने वाले युवाओं कुछ समय के लिए अपने यहां इंटर्नशिप करने का भी मौका प्रदान करता है। इसके लिए संग्रहालय प्रशासन से संपर्क किया जा सकता है। 

- vidyutp@gmail.com
( MEGHALAYA, SHILLONG, DON BOSCO MUSEUM, TRIBAL CULTURE OF NORTH EAST ) 

Monday, February 22, 2016

मिनी इंडिया है, शिलांग के बाजार

मेघालय की राजधानी शिलांग है तो शिलांग शहर की धड़कन है पुलिस बाजार। अब भला इसका नाम पुलिस बाजार क्यों पड़ा ये खोज का विषय हो सकता है। पर पुलिस बाजार शिलांग शहर का केंद्र है। कई बड़े आवासीय होटल, खाने पीने के रेस्टोरेंट, शापिंग के लिए बाजार यहां हैं। साथ ही मेघालय राज्य का सरकारी बस स्टैंड और राज्य की विधान सभा भी पुलिस बाजार में ही है।   पुलिस बाजार के चौराहा काफी विस्तारित है। यहां से आपको कहीं भी जाने के लिए टैक्सियां मिल सकती हैं। 


अब पुलिस बाजार में नन्हें शापिंग मॉल भी बन गए हैं। केएफसी भी शिलांग के पुलिस बाजार में पहुंच गया है। पहाड़ी शहरों में बडे मॉल तो बनाए भी नहीं जा सकते हैं ना। किसी जमाने में यहां पुलिस मुख्यालय होने के कारण लोग इसे पुलिस बाजार कहने लगे होंगे ऐसा प्रतीत होता है। शिलांग शहर के हर कोने में रहने वाले लोग शापिंग और खाने पीने के लिए पुलिस बाजार आते हैं। पुलिस बाजार में स्ट्रीट शापिंग का भी आनंद लिया जा सकता है। फुटपाथ पर बड़ी संख्या में दुकाने हैं। आसपास की कई गलियों में भी अच्छा खासा बाजार है।

तांबुल और भोजपुरी - पुलिस बाजार में सुबह से ही फुटपाथ पर तांबूल की दुकानें सजी नजर आती हैं। तांबूल बेचने वाली ज्यादातर महिलाएं हैं। कुछ खासी हैं तो कई भोजपुरी बोलने वाली। ये भोजपुरी बोलने वाली महिलाएं पूरी तरह से शिलांग की संस्कृति में भले रच बस गई हों पर जुबान पर वही भोजपुरी है। तांबुल बेच रही हैं और आपस में पटर पटर संवाद कर रही हैं। वैसे तांबुल मेघालय की संस्कृति का खास हिस्सा है। हरा पान और कच्ची सुपारी तांबुल का खास हिस्सा है। दस रुपये का एक तांबुल बिकता है। 
आप मेघालय में किसी के घर जाएं तो भी वे सम्मान मे तांबुल पेश करते हैं। महिलाएं और पुरुष सभी जमकर तांबुल खातें हैं और उनके दांत धीरे धीरे सड़ने लगते हैं।   पुलिस बाजार से आगे चलते हैं अब।  सही मायने में शिलांग का सबसे बड़ा बाजार है उसका नाम ही बड़ा बाजार है। यह पूरी तरह से स्थानीय बाजार है। पुलिस बाजार से इसकी दूरी ज्यादा नहीं है। पर इस बाजार में स्थानीय दुकानें हैं और सस्ती चीजें मिलती हैं। बड़ा बाजार में हर तरह की दुकाने हैं। अनाज, चावल दाल सब्जियां से लेकर सब कुछ। बड़ा बाजार में स्थानीय खासी लोगों की दुकानें ज्यादा हैं।

कई पीढ़ी से सिख रहते हैं पंजाबी कालोनी में -   बड़ा बाजार से लगी हुई पंजाबी बस्ती है। यहां हजारों की संख्या में पंजाबी लोग रहते हैं। यहां पर इनका गुरुद्वारा भी है। पंजाबी समुदाय के लोग यहां कई सौ साल पहले आकर बस गए थे। पंजाब के सिख लोगों की जीने की इच्छा यानी जीजिविषा प्रेरणा लेने लायक होती है। ये लोग विपरीत परिस्थितियों व्यापार करना और जीना जानते हैं। हजारों पंजाबियों के लिए शिलांग अब घर बन चुका है।


पुलिस बाजार की गलियों में घूमते हुए मुझे राणी सती मंदिर नजर आता है। इसके ये अंदाज लगाया जा सकता है कि यहां राजस्थानी लोग भी बड़ी संख्या में हैं। यहां मारवाड़ी बासा होटल की मौजूदगी भी यही बताती है। बाजार में बाबा रामदेव (राजस्थान वाले) का मंदिर भी नजर आता है। यानी यहां पर राजस्थान के बाबारामदेव के भक्त भी बड़ी संख्या में है। अगर आपको मेघालय के हस्तशिल्प की खरीददारी करनी है तो पूरबाश्री के शोरुम में पहुंच सकते हैं। चींजें थोड़ी महंगी हैं पर हाथ से बनी चीजें भला सस्ती भी कैसे हो सकती हैं।

आईआईएम शिलांग- भारतीय प्रबंधन संस्थान की शिलांग शाखा है। आपको याद होगा पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम साहब का यहीं पर व्याख्यान देने के दौरान निधन हो गया था। अब देश में कुल 19 आईआईएम हो गए हैं, पर शिलांग का आईआईएम पुराना है। यह सातवें नंबर पर आता है। इसकी स्थापना 2004 में हुई। संस्थान का संचालन चीड़ के हरे भरे पेड़ों से आच्छादित मयूरभंज कांप्लेक्स में हो रहा है। यह मयूरभंज के राजघराने का निवास हुआ करता था।


नार्थ ईस्ट हिल यूनीवर्सिटी शिलांग – यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना 1973 में हुई। इसका मुख्य परिसर शिलांग में है तो दूसरा तुर्रा में। शिलांग में इसका कैंपस शहर से थोड़ा किनारे माउकिनरो में है। परिसर 1025 एकड़ में विस्तारित है। विश्वविद्यालय से संबंद्ध पूर्वोत्तर के 53 कालेज हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( SHILLONG, MEGHALYA, PUNJABI BASTI, BHOJPURI, NEHU, IIM )