Tuesday, January 26, 2016

...और इस तरह बन गई छांगू झील

गंगटोक से 35 किलोमीटर की दूरी पर आता है छांगू लेक (TOSONGMO LAKE ) इसके पानी की गहराई 50 फीट तक है। झील का पानी आधा जमा हुआ दिखाई देता है।    झील के   दोनों तरफ पहाड़ की चोटियां हैं। झील के किनारे ढेर सारे रंग बिरंगे याक हैं जिसके साथ लोग तस्वीरें खिंचवाते नजर आते हैं। ये सभी लोग रंग-बिरंगी नेपाली और भूटिया ड्रेस पहनकर फोटो खिंचवाते हैं।



आज भी झील के आसपास खूब रौनक है। यह झील तकरीबन एक किलोमीटर लंबी और अंडाकार आकार की है। सिक्किम के लोगों में इस झील के प्रति काफी सम्मान है। वे इसे काफी पवित्र झील मानते हैं। झील के किनारे एक मंदिर भी बना हुआ है। साथ ही बोर्ड लगा है जिस पर झील को साफ सुथरा रखने की अपील सैलानियों से की गई है।  मौसम खराब  होने पर सैलानी नाथूला  तक नहीं जा पाते तो इसी  झील के पास से लौटना पड़ता है। 


लोक कथाओं के मुताबिक जहां आज झील है कभी मवेशियों का आश्रय स्थल हुआ करता था। जहां लोक याकों को रखते थे। एक दिन एक बूढ़ी महिला को सपना आया कि जल्दी से जानवरों को हटा लें यह जगह पानी से भरने वाली है। हालांकि गांव वालों ने उसका भरोसा नहीं किया। वह महिला वहां से चली गई, पर ये जगह सचमुच पानी से भरकर झील में तब्दील हो गई। उसके बाद लोग इसे ईश्वर का चमत्कार मानकर झील की पूजा करने लगे। खास तौर पर गुरु पूर्णिमा के दिन यहां विशेष पूजा की जाती है।


छांगू झील देश भर  से आने  वाले सैलानियों को भी खूब पसंद आती है।  साल कुछ महीने इस झील का पानी जम भी जाता है।  आज भी मौसम अच्छा है तो यहां खूब सैलानी जुटे हैं।  बच्चे भी रंग-बिरंगे कपड़ों  में याक के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं। हमने बचपन में याक के बारे में सुना था। यह बैल से मिलती जुलती प्रजाति है जो ठंडे प्रदेशों में पाए जाते हैं। 



अंजू लेक और मंजू लेक – नाम से ही ऐसा लगता है कि दो सगी बहने हों। नाम रखने वालों ने भी कुछ ऐसा ही सोचा होगा। छांगू लेक से आगे बढ़ने पर सड़क के किनारे ये दो झीलें नजर आती हैं। हमें चालक महोदय इसका नाम अंजू  और मंजू बताते हैं। सुनकर कौतूहल होता है। हालांकि ये दोनो बहने आसपास होने के बावजूद कभी आपस में मिल नहीं पातीं। पर इसके थोड़ा आगे जाने पर आता है एलीफैंट लेक। जब इसे समग्र तौर पर देखा जाए तो इसका आकार हाथी जैसा नजर आता है।

इस पूरे दुर्गम रास्ते का इंतजाम बीआरओ  यानी बार्डर रोड ऑर्गनाइजेशन ( सीमा सड़क संगठन ) के  हवाले है। थोड़ा चलने के बाद हमलोग कायोंगसला पहुंचे हैं। यहां पर ठंड बढ़ गई है।  यहां पर बीआरओ  की ओर से एक कैफे भी बनाया गया है।   यहां पर छोटा सा बाजार भी दिखाई दे रहा है।  इस बाजार का भी  प्रबंधन बीआरओ करता है। हमारे  ड्राईवर बड़े सिद्धहस्त हैं वे बड़े आराम से गाड़ी चला रहे हैं। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( GANGTOK TO NATHULA, CHANGU LAKE, ANJU LAKE, MANJU LAKE ) 


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