Thursday, January 7, 2016

प्राचीन गौड मालदा शहर - कभी था 'लक्ष्मणावती'

बारा सोना मसजिद 
इतिहास कांग्रेस से थोड़ा समय निकालकर हमलोग गौड़ मालदा के ऐतिहासिक महत्व के स्मारक देखने के लिए चल पड़े  हैं।  बंगाल का पुराना शहर गौड़ कभी बंगाल की राजधानी रहा है। गौड़ प्राचीन काल में  'लक्ष्मणावती' मध्यकाल में  'लखनौती' के नाम से जाना जाता था। किसी समय यह संस्कृत भाषा और हिंदू राजसत्ता का बड़ा केंद्र था। गौड़ का सबंध गीत गोविंद के रचयिता जयदेव के अलावा व्याकारणाचार्य हलयुद्ध से रहा है। सेन वंश के राजा लक्ष्मणसेन के नाम से इस शहर का नाम लक्ष्मणावती रखा गया था। आठवीं से 10 वीं सदी तक यहां पाल राजाओं का शासन था। जबकि 11वीं और 12वीं सदी में सेन वंश का शासन रहा। सेन वंश के शासन में यहां कई हिंदू मंदिरों का निर्माण हुआ पर अब उनका अवशेष नहीं है। 1573 मे अकबर के सूबेदार गौड़ से इसे अपना केंद्र बनाया तब इसका नाम गौड़ पड़ गया। अब गौड़ मालदा मे कई मसजिदें हैं जिनके निर्माण में हिंदू मंदिरों के भग्नावशेषों का इस्तेमाल प्रतीत होता है।
बारा सोना मसजिद। 


आप पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मालदा टाउन शहर से 12 किलोमीटर दक्षिण में पुराने गौड़ शहर के ऐतिहासिक अवशेष देख सकते हैं। मालदा शहर महानंदा नदी के किनारे बसा है। 1771 में एक इंगलिश फैक्ट्री के कारण इसे इंगलिश बाजार के नाम से भी जाना जाता था। 18 वीं सदी मैंगो सिटी (आमों का शहर) मालदा अपनी सिल्क इंडस्ट्री के लिए भी जाना जाता था।

बारा सोना मसजिद – यह गौड़ का सबसे बड़ा स्मारक है। मालदा की ओर से आने पर सबसे पहले यही स्मारक नजर आता है। नाम के मुताबिक इसमें 12 दरवाजे होने चाहिए। हालांकि दिखाई 11 देते हैं। इसका निर्माण अल्लाउद्दीन हुसैन शाह ने 1526 में करवाया। ठीक उसी साल जब पानीपत की पहली लड़ाई इब्राहिम लोदी की पराजय हुई थी। इस मसजिद में इंडो अरब स्थापत्य का मेल दिखाई देता है।  इसके मेहराब और गुंबद देखने लायक हैं। गुंबद मुगलकालीन अमरूदी गुंबद की तरह न होकर गोलाकार है। अब यह मसजिद कई इलाकों में टूटी फूटी नजर आती है। पुरातत्व विभाग की ओर से इसका संरक्षण किया गया है।
फिरोज मीनार के आगे।

फिरोज मीनार – कुछ कुछ कुतुबमीनार से मिलती जुलती फिरोजमीनार की ऊंचाई 26 मीटर है। यह पांच मंजिला है। मीनार से सामने एक बड़ा तालाब है। इसका निर्माण 1485-89 के बीच सुल्तान सैफुद्दीन फिरोज ने करवाया था। इसके आधार का वृत 19 मीटर का है। शुरुआत की तीन मंजिलों 12 कोणीय हैं जबकि ऊपर की दो मंजिलें गोलाकार सरंचना में हैं। ऊपर तक पहुंचने के लिए 84 सीढियां बनी है। हालांकि आप इसे सिर्फ बाहर से देख सकते हैं। अंदर जाने की अनुमति अब नहीं है।

सलामी दरवाजा - फिरोज मीनार से एक किलोमीटर पहले दक्षिण दरवाजा आता है। इसे सलामी दरवाजा भी कहते हैं। इसका निर्माण 1925 में लाल पत्थरों से कराया गया था। यह दरवाजा 21 मीटर ऊंचा और 34 मीटर चौड़ा है। कभी यह गौड़ के किले का मुख्य द्वार हुआ करता था।



फिरोज मीनार से आधा किलोमीटर आगे बढ़ने पर एक साथ पांच स्मारकों को समूह नजर आता है। यहां पर सबसे पहले कदम रसूल मसजिद उसके बाद, फतेह खान की मजार, चीका मसजिद, गुमटी गेट, लुकाचोरी गेट देख सकते हैं। यहां पर कुछ दुकानें भी हैं। स्थानीय लोगों के लिए ये एक पिकनिक स्पाट की तरह है। आसपास में आम के बागीचे नजर आते हैं। अभी और भी कई सुंदर स्मारक बाकी हैं,  इनकी चर्चा अगली कड़ी में। 

: विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com  (BARA SONA MASJID, GAUR MALDA, BENGAL, LAKSHMNAWATI )

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