Friday, January 8, 2016

कदम रसूल मसजिद : यहां पर हैं मुहम्मद साहब के पांव के निशान

कदम रसूल मसजिद।



गौर मालदा के अत्यंत महत्वपूर्ण स्मारकों में एक है कदम रसूल मसजिद के बारे में कहा जाता है कि यहां पर मुहम्मद साहब के पांव के निशान है। इस मसजिद का निर्माण 1531 में हुआ था। यह एक गुंबद वाली संरचना है। इसका गुंबद ऐसा लगता है मानो कमल के फूल को उल्टा करके रख दिया गया हो। इसकी आंतरिक संरचना कलात्मक है। इसे सुल्तान नुसरत शाह ने बनवाया था। यहां पत्थरों पर मुहम्मद साहब के पांव के निशान है। इसका संरक्षण माहिदपुर गांव के खादिम करते हैं। इस गांव में खादिम के परिवार के 50 घर हैं। खादिम की 60वीं पीढ़ी से हमारी यहां मुलाकात होती है। उनका नाम है मुहम्मद जमील हसन मुल्ला। लोगों में इस इस मसजिद को लेकर बड़ी आस्था है। लोग यहां मन्नते मांगने आते हैं। इसके पास ही तांतीपारा मसजिद है, यहां भी सुंदर नक्काशी देखी जा सकती है।
फतेह खां की मजार। 

फतेह खां की मजार – फतेह खां औरंगजेब का जनरल दिलावर खां का बेटा था। 1658 में जन्मे फतेहखान की मौत 1707 में हुई। यहां उसकी मजार बनी है जिसकी दीवारें कलात्मक हैं। बताया जाता है कि फतेह खां को एक मुस्लिम संत की हत्या के लिए भेजा गया था पर वह अपनी मंजिल का नहीं पहुंच सका और खून की उल्टियां करके मर गया।


चीका मसजिद – सुल्तान युसुफ शाह ने 1475 में चीका मसजिद का निर्माण कराया। वास्तव में यह कभी चीका यानी चमगादड़ों की शरण स्थली हुआ करता था। यह भी एक गुंबद वाली संरचना है। 
चीका मसजिद। 

अब इसका अवशेष ही बचा है। इसकी दीवारों पर शानदार नक्काशी दिखाई देती है। दीवारों पर हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। यह एक ऐसी मसजिद है जिसकी वास्तुकला हिंदू मंदिर की है। इससे प्रतीत होता है कि यह कभी हिंदू मंदिर रहा होगा।

गुमटी गेट – गुमटी गेट की इमारत दूर से ही अदभुत नजर आती है। यह चीका मसजिद के ठीक सामने है। 1512 में इसका निर्माण अलाउद्दीन हुसैन शाह ने करवाया। इसका आकार छोटा है पर देखने में सुंदर है। इसके निर्माण में ईंट और मिट्टी का इस्तेमाल हुआ है। पर इसके रंग अदभुत हैं और दरवाजे पर शानदार नक्काशी है। हालांकि आजकल इसके संरक्षण के लिए इसे बंद कर दिया गया है। गुमटी गेट और चीका मसजिद के बीच खाली मैदान में एक मंदिर का अवशेष दिखाई देता है। इसका अब सिर्फ आधार तल ही रह गया है। इसे देखकर लगता है कि कभी यहां मंदिरों का समूह रहा होगा।

गुमटी गेट के आगे। 


लुका चोरी गेट – लोकाचुरी गेट का निर्माण 1655 का  है। इस गेट के अंदर से आजकल सड़क सरपट गुजरती है। इसके नाम के पीछे रोचकता है। अंगरेजी के खेल हाइड एंड सीक यानी लुकाछिपी के खेल के नाम पर इस गेट का बांगला नाम है लुका चोरी। कहा जाता है यहां सुलतान अपनी बेगमों के साथ लुका छिपी का खेल खेला करता था। दो मंजिला यह दरवाजा महल में प्रवेश के मुख्य दवारा के तौर पर काम करता था।

चामकाटी मसजिद। 
चामकाटी मसजिद – मेहदीपुर बार्डर के रास्ते में यह नन्ही सी मसजिद है जिसका नाम चामकाटी मसजिद लिखा गया है। इस मसजिद का भी निर्माण सुलतान शमशुद्दीन युसुफ शाह ने 1475 में कराया। माना जाता है कि इसका संबंध मुसलिम समाज के चामकाटी समुदाय से है। गौड़ मालदा से बांग्लादेश के मेहदीपुर बार्डर की दूरी महज दो किलोमीटर है। यहां से अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। हमें रास्ते में ट्रकों की लंबी लाइनें लगी देखीं। यहां से ज्यादातर सामग्री बांग्लादेश जाती है। पर दूसरी तरफ से माल कम ही आता है। 

कैसे पहुंचे – मालदा टाउन के रथबारी चौक से गौड़ की दूरी 12 किलोमीटर है। आप आटोरिक्शा या टैक्सी किराये पर लें। सार्वजनिक वाहन से नहीं जा सकते क्योंकि सारे ऐतिहासिक स्थल एक ही जगह पर नहीं हैं। इसलिए आरक्षित वाहन ही सुविधाजनक है। इतिहास के शोधार्थी मो अनवारुल हक के साथ हमारी यात्रा शुरू हुई। हमने रथबारी चौक  से आटो रिक्शा किराये पर लिया। आटो चालक बोबाई सिंह ( 98511-40223) ने हमें सारे स्मारक बड़े दिल से घुमाया उनका धन्यवाद।
और ये रहा गौर मालदा का लोकाचुरी  ( Hide and Seek ) गेट। 

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