Saturday, January 30, 2016

वो भूटिया लड़की याद आती है...

गंगटोक शहर- रात में कुछ यूं दिखाई देता है....
ixगंगटोक के एमजी रोड पर लाल पीले फूलों के बीच हरी हरी बेंच पर बैठ कर शाम को टाइम पास कर रहा हूं। तभी मेरे बगल में आकर दो लड़कियां बैठ जाती हैं। पहले आपस में बातचीत और चुहलबाजी शुरू करती हैं। फिर एक मुझसे पूछती है आप कहां से आए हैं। बातचीत शुरू होती है। पता चलता है मेरे बगल में बैठी शोख लड़की भूटिया समुदाय की है। यहां एक होटल में काम करती है। होटल रिकासा शहर से थोड़ा बाहर है। वह अपने होटल के एक टूरिस्ट परिवार को एमजी रोड पर घुमाने लाई है। नीले रंग की लंबी स्कर्ट और सुर्ख टॉप में बैठी भूटिया बाला के बाल रेशम जैसे थे। वह हिंदी बहुत अच्छी बोल रही थी। जब मैंने उसकी हिंदी की तारीफ की थी तो उसने गर्व से कहा, सबको आनी चाहिए आखिर हमारी नेशनल लैंगवेज जो है हिंदी।

भूटिया नाम से कुछ याद आता है। बाइचुंग भूटिया (Baichung Bhutia) और डैनी (Danny Denzongpa) दो ऐसे लोकप्रिय नाम हैं जो भूटिया समुदाय से आते हैं। बाइचुंग बड़े फुटबालर बने। बाद में तृणमूल कांग्रेस से लोकसभा चुनाव भी लड़ा हालांकि राजनीति में सफलता नहीं मिली। पर डैनी फिल्म इंडस्ट्री के सफल नाम हैं। वे कभी सिक्किम से मुंबई पहुंचे। फिल्म स्टार होने के साथ वे सफल कारोबारी भी हैं। मुझे सुबह गंगटोक की सड़क पर एक भूटिया कुली मिले। वे बताते हैं कि आजकल भूटिया समाज के कई लोग बॉक्सिंग में भी बड़ा नाम कर रहे हैं। वे एक बाक्सर को दिखाते हुए कहते हैं कि इसका एक पंच कोई बरदास्त नहीं कर सकता। दुनिया के मानचित्र पर भूटिया लोगों की कुल आबादी 70 हजार के आसपास है। भूटिया भारत, नेपाल और भूटान में फैले हैं। इनमे से बड़ी संख्या में लोग सिक्किम में रहते हैं। सिक्किम में भी वे ज्यादातर उत्तरी सिक्किम में हैं। वे यहां पर आरक्षित ट्राईब (जनजाति, बीएल) श्रेणी में आते हैं।
गंगटोक की सड़क पर मिले एक और भूटिया

भूटिया लड़की बता रही है...वह पढाई के साथ नौकरी कर रही है। पत्राचार पाठ्यक्रम में बीए में एडमिशन ले रखा है। आगे वह कुछ और भी पढ़ाई करना चाहती है। भूटिया लड़की के बगल में उसकी एक तिब्बती दोस्त भी बैठी है, जो किसी से ऊंची आवाज में फोन पर बातें कर रही है। बीच बीच में ठठाकर हंस पड़ती है।

भूटिया लड़की बता रही है उसका गांव यहां से 80 किलोमीटर दूर है। छुट्टियों में वह गांव जाती है। अभी नवंबर में अपना नया साल लूसांग त्योहार मनाकर लौटी है। इसमे खूब मस्ती होती है। बांसुरी जैसे वाद्य यंत्र की धुन पर भूटिया लड़कियां अपने पारंपरिक पहनावे में जमकर नाचती हैं। यह त्योहार तिब्बती कैलेंडर में दसवें महीने में आता है। त्योहार 15 दिनों तक मनाया जाता है। वह बता रही है गांव में कुछ नहीं बदला। परंपराएं पुरानी है। शादी के नाम पर कहती है, भूटिया लड़कियां कई बार बाहर के समुदाय में शादी कर लेती हैं। पर गांव में इसकी इजाजत नहीं है। गांव के लोग कठोर होते हैं। वे भूटिया समाज की लड़कियां बाहर शादी करें तो जल्दी स्वीकार नहीं करते। हालांकि महिलाओं की भूटिया समाज में खूब सुनी जाती है। वे पुरुषों से बराबरी करती हैं। पर सोना पहनने का उन्हें खूब शौक है। वह 24 कैरेट गोल्ड हो तो अच्छा। वह बता रही है। फरवरी में उसका गांव में लोसार का त्योहार होगा, तब फिर वह गांव जाएगी। उसकी इच्छा तो सरकारी नौकरी में जाने की है। पर भूटिया समाज को बीएल में आरक्षण के बावजूद सरकारी नौकरी आसान नहीं है।
गंगटोक के एमजी रोड पर ...यूं ही अकेले...

मुझे याद आता है भूटिया समाज का समृद्ध इतिहास। कभी सिक्किम में जब राजतंत्र था तब यहां भूटिया समुदाय के नामग्याल वंश के राजाओं का ही शासन था। ज्यादातर भूटिया बौद्ध मत को मानने वाले होते हैं, इसलिए भूटिया समाज में काफी शाकाहारी भी हैं। भूटिया लोग बौद्ध में वज्रयान संप्रदाय को मानने वाले हैं। भूटिया लड़की बताती है वह भी शाकाहारी है।

बातों बातों में कितना वक्त गुजर गया पता नहीं चला। अच्छा तो अब मैं चलती हूं। हमारा टूरिस्ट इंतजार कर रहा होगा। पर आगे बढ़ने के बाद वह पीछे मुड़कर देखती है.. मुझे बाय..बाय कहने के साथ ही नए साल की ढेर सारी शुभकामनाएं देती है...आज 30 दिसबंर है...नया साल एक दिन बाद ही तो आने वाला है। मैं उसकी शुभकामनाएं स्वीकार करता हूं। पर दिल में उस शोख भूटिया लड़की की स्मृतियां बसी रह जाती हैं....
- vidyutp@gmail.com  
( SIKKIM, GAMGTOK, BHUTIA GIRL ) 

Friday, January 29, 2016

नाथुला मार्ग पर बाबा हरभजन सिंह का नया मंदिर


  पुराना बाबा मंदिर से लौटते हुए हमलोग नए बाबा मंदिर के पास भी रूकते हैं।   आपको यह भी पता होना चाहिए कि नाथुला  क्षेत्र में बाबा हरभजन  सिंह के दो समाधि मंदिर हैं।  नाथुला मार्ग पर  जहां से बाबा मंदिर के लिए रास्ता बदलता है वहां पर एक नया  बाबा मंदिर बना दिया गया है। यहां पर भी सैलानियों की थोडी चहल पहल बनी रहती है। 


यहां के सुंदर  सा प्रवेश द्वार बना है। एक विशाल बोर्ड पर फौजियों के लिए शपथ के वाक्य लिखे गए हैं।   बाबा हर भजन सिंह की नई समाधि बाद में बनी है।  आखिर क्यों बना  बाबा जी का एक और समाधि मंदिर। तो इसका जवाब है कि  अक्सर खराब मौसम के कारण पुरानी  और मूल समाधि तक वाहन नहीं जा पाते तो लोग नई समाधि से  ही बाबा के दर्शन करके लौट आते हैं।  पर ये मूल समाधि स्थल नहीं है।


 सिक्किम की तरफ सेना के जिन  वरिष्ठ अफसरों की पोस्टिंग होती है, वे बाबा मंंदिर में  अपनी श्रद्धा ज्ञापित करने जरूर पहुंचते हैं। इधर भारतीय सेना की ब्लैक कैट बटालियन की तैनाती रहती है।   नए बाबा मंदिर के पास   एक    सोवनियर का स्टाल भी बना हुआ है, जहां से आप अपनी सिक्किम यात्रा की यादगारी से जुड़ी कई चीजें खरीद कर ले जा सकते हैं। 


   वक्त गुजरने के साथ थोड़ी भूख भी लग गई है। तो नए बाबा मंदिर के सामने एक सुंदर सा कैफे बना हुआ है। यह कैफे 13 हजार फीट की ऊंचाई पर है। यहां पर खाने में मोमोज के अलावा कुछ और चीजें मिलती हैं।   अब इतनी ऊंचाई पर आए हैं तो खाने की हसरत क्यों न पूरी करें।

नया बाबा मंदिर - 13 हजार फीट की ऊंचाई पर कैफे में मोमोज का स्वाद 
तो मैंने भी कूपन लिया 30 रुपये में शाकाहारी मोमोज की प्लेट का और रेस्टोरेंट में बैठकर मोमोज का स्वाद लिया। हालांकि मैं आप तौर पर मोमोज खाना बिल्कुल पसंद नहीं करता। यह पूरी तरह मैदा से बनता है।  जहां तक मेरा मानना है इसे खाना  सेहत के लिए  हानिकारक हो सकता है।  पर इतनी ऊंचाई पर यादगारी के लिए  थोड़ा सा स्वाद। 
नए  बाबा मंदिर के पास इनसे भी मुलाकात हुई। 

समय तेजी से भागता जा रहा है। घड़ी की सूई डेढ़ बजा रही है। और अब हमारा नाथुला की वादियों से वापस लौटने का समय हो गया है। हमें हमारे चालक महोदय बार बार इसकी इत्तिला दे रहे हैं। सेना की ओर से सभी सैलानियों को वाहनों को  दोपहर के बाद यहां से वापस लौट जाने के निर्देश हैं। ऐसा यहां लगे साइन बोर्ड पर लिखा हुआ है। 


 बाबा हरभजन सिंह के मंदिर की इस यात्रा के दौरान हमारी टैक्सी में गंगटोक के रहने वाले राजेंद्र क्षेत्री साथ रहे। उन्होंने सिक्किम के बारे में कई जानकारियां दीं। वे यहां दूरदर्शन में कैमरामैन हैं। मौसम ने हमारा साथ  दिया और शाम ढलने से पहले हमलोग  गंगटोक पहुंच गए। ( सफर के सहयोगी - मीठू सिंह – 9749888509 होटल के मैनेजर, प्रमोद – 9475009042 ( ट्रेवेल एजेंट) प्रकाश क्षेत्री ( ड्राईवर) - 9564765076 ) 

- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com  
( NATHU-LA, SIKKIM, BABA HARBHAJAN SINGH SAMADHI MANDIR, KAPURTHALA PUNJAB ) 

Thursday, January 28, 2016

बाबा हरभजन सिंह रिटायर हो गए...अब छुट्टी नहीं जाते

बाबा मंदिर के नाम से मशहूर है यह जगह, तकरीबन 13 हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर। भारतीय फौज में इंडियन आर्मी की गहरी आस्था है बाबा में। कहते हैं बाबा की आत्मा भारत चीन सीमा पर फौजियो का मार्ग दर्शन करती है। तो चीन के फौजी भी बाबा की शक्ति से कहीं न कहीं डरते हैं।  हम बातकर रहे हैं बाबा हरभजन सिंह की। जिनके बारे में माना जाता  है कि वे अभी भी जीवित हैं।



गंगटोक से नाथुला के मार्ग पर सरथंग से बाबा हरभजन सिंह के मंदिर के लिए रास्ता बदलता है। वहां से नाथुला 4 किलोमीटर है जबकि पुराना बाबा मंदिर दाहिनी तरफ तकरीबन 9 किलोमीटर आगे है। हालांकि आजकल नया बाबा मंदिर बना दिया गया है, तो बड़ी संख्या में सैलानी नए बाबा मंदिर को ही देखकर वापस लौट आते हैं।

साल 2008 में रिटायर हुए - बाबा हरभजन सिंह की कहानी मैंने पहली बार सन 2000 में सुनी थी जब मैं जालंधर में अमर उजाला में कार्यरत था। हमारे साथी अरविंद श्रीवास्तव ने एक खबर लिखी की बाबा जी छुट्टी पर घर आ रहे हैं। उनके लिए ट्रेन में तीन बर्थ बुक हैं। वे दो महीने गांव में छुट्टी काटेगें फिर वापस सिक्किम में नाथुला सीमा पर जाएंगे। दरअसल बाबाजी तो इस दुनिया में रहे नहीं पर अनूठा आस्था है भारतीय थल सेना उन्हें वेतन भी देती थी और छुट्टी पर घर भी भेजती थी। पर साल 2008 में बाबा जी रिटायर हो गए तो अब उनकी पेंशन लग गई है। अब उनके छुट्टी पर घर जाने का सिलसिला रूक गया है।

कपूरथला जिले में जन्म हुआ था -   बाबाजी पंजाब के कपूरथला जिले के बारंदोल गांव पैदा हुए थे। वे 1966 में पंजाब रेजिमेट में बतौर सिपाही भर्ती हुए। 4 अक्तूबर 1968 को सिक्किम मे नाथुला इलाके में तैनाती के दौरान भयानक प्राकृतिक आपदा आई। भारी बारिश और चट्टान खिसकने से काफी लोगों की जान चली गई। इस समय सिपाही हरभजन सिंह अपने खच्चर कारवां को लेकर जा रहे थे। यह कारवां टुकला से डेंगचुला जा रहा था। इस दौरान हरभजन सिंह एक तेज बहती जलधारा मे बह गए। पांच दिनों तक उनका कुछ पता नहीं चला।


बाद में वे साथी प्रीतम सिंह के सपनों में आए। अपने बारे में बताया कि वे कहां दबे हुए हैं। बाद में तलाशी ली गई तो  उनका शव वहीं मिला। उन्होंने अपनी समाधि बनाने की इच्छा भी जताई थी। बाद में उनके साथियों ने उनकी इच्छा के मुताबिक चोकियाको में उनकी समाधि बनवाई। तब से बाबा सीमा पर खतरनाक गतिविधियों के बारे में फौजियों को सपने में आकर बताते हैं। उनपर चीनी सैनिक भी विश्वास करते हैं। पूरे सीमा क्षेत्र में एक छाया पेट्रोलिंग करती नजर आती है। अब बाबा को फौज ने मानद कप्तान पद से सम्मानित किया है।
पुराने बाबा मंदिर में बाबा जी की समाधि, बाबा जी का बंकर बना है। बंकर में उनका बिस्तर लगा है। उनके कपड़े, जूते आदि भी यहां रखे गए हैं। देश भर से आने वाले लोग श्रद्धा से शीश नवाते हैं। हर शुक्रवार को यहां पर लंगर भी लगाया जाता है।   जो सैलानी यहां शुक्रवार को पहुंचते हैं उन्हें लंगर  छकने का मौका मिलता है। 



जालंधर के बस्ती मिठू के फौजी गुरप्रीत सिंह 
बाबा जी की समाधि पर प्रसाद बांटते मुझे जालंधर के बस्ती मिठू के फौजी गुरप्रीत सिंह मिले। ये जानकर बड़े खुश हुए कि मैं जालंधर में लंबे समय तक रह चुका हूं। 14 हजार फीट पर जिंदगी कितनी मुश्किल होगी मैं इसका अनुमान लगाता हूं। दोपहर के बाद बर्फीली हवाएं चलने लगती हैं पर इस माहौल में भी हमारे  फौजी भाई मस्त हैं। देश की सेवा भी और   आस्था भी। 


ऑक्सीजन की कमी -   बाबा मंदिर पहुंचने पर   मैं टैक्सी से उतरने के बाद उनके  आवास   में  स्मृतियों को देखने के लिए पूरे उत्साह से लगभग दौड़ते हुए सीढ़ियां चढ़ने लगा। आधी सीढ़ियां चढ़ने  पर मेरी सांस फूलने  लगी। तब मुझे याद आया कि मैं 13 हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर हूं। यहां ऑक्सीजन कम होती  है। फिर मैं रुक गया और आहिस्ता-आहिस्ता सीढ़ियां चढनी शुरू की।  कुछ देर बाबा मंदिर क्षेत्र  में  गुजारने  के बाद हमलोग वापस लौट चले । वैसे भी आप यहां दोपहर 1.30 बजे के बाद नहीं रह सकते। 

यहां पर हमें सेना के अलग अलग बटालियन द्वारा स्थापित किए  गए बोर्ड नजर आते हैं। इन बोर्ड पर बाबाजी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की गई है। साथ ही बाबा जी से उनका आशीर्वाद मांगा गया है।  तो ये है सेना की बाबाजी के प्रति आस्था और विश्वास।
- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
( NATHU-LA, SIKKIM, BABA HARBHAJAN SINGH SAMADHI MANDIR, KAPURTHALA PUNJAB ) 
( बाबा हरभजन सिंह पर बातें जारी हैं  पढ़िए अगली कड़ी  - बाबा हर भजन सिंह का नया मंदिर



Wednesday, January 27, 2016

थेवू ट्रेड सेंटर - यहां भारत-चीन के बीच होती है तिजारत

 
नाथुला की ओर जाते हुए   
शेरथांग  में नजर आता है थेवू ट्रेड सेंटर। इस सेंटर पर भारत चीन के बीच व्यापार होता है। पर यह सब कुछ साल के छह महीने में ही होता है। क्योकि बाकी के छह महीने बर्फ पड जाती है तो रास्ते बंद हो जाते हैं। व्यापार के लिए नाथुला के रास्ते से ट्रक चीन को जाते और आते हैं। चीन से यहां सस्ते कपड़े, जैकेट, टोपियां, दस्ताने आदि आते हैं। हालांकि उनकी क्वालिटी अच्छी नहीं होती। जबकि भारत से वनस्पति तेल और दूसरी खाने पीने की चीजें भेजी जाती हैं। हमारी आंखो के समाने व्यापार केंद्र वीरान था। क्योंकि आजकल  तिजारत बंद है।   



रास्ते में एक मील का पत्थर नजर आता है। लुंगथू 13 किलोमीटर। लुंगथू  पूर्वी सिक्किम जिले में गंगटोक 62 किलोमीटर दूर एक सीमांत कस्बा है। ये सड़क उसी ओर  जा रही है। कुछ सैलानी वहां भी जाते हैं। वहां  पर रहने के लिए होम स्टे भी उपलब्ध हैं। 

 वैसे 1962 के युद्ध के बाद भी नाथुला मार्ग को बंद कर दिया गया था। इस मार्ग से चीन साथ व्यापार को रिश्तों में नरमी आने पर 5 जुलाई 2006 में दुबारा खोला गया।  इस बीच चार दशक तक ये व्यापारिक मार्ग बंद रहा।  इस दौरान इधर सैलानियों की आवाजाही भी नहीं होती थी। अब तो गंगटोक  से हर रोज कई सौ  टैक्सियां नाथुला के लिए चलती हैं।  अब नाथुला दर्रे से होकल कैलाश मानसरोवर यात्रा  का नया मार्ग भी खोला गया है। यह पारंपरिक लिपुलेख मार्ग की तुलना में आसान है।

दुनिया का सबसे ऊंचा गोल्फ कोर्स – कोई सवाल पूछे की दुनिया का सबसे ऊचा गोल्फ कोर्स कहा हैं तो जवाब होगा पूर्व सिक्किम जिले के कुपुप में। पुराने बाबा मंदिर के रास्ते में नजर आता है दुनिया का सबसे ऊंचा गोल्फ कोर्स। कुपुप में यह गोल्फ कोर्स 13, 025 फीट की ऊंचाई पर है। इसे याक गोल्फ कोर्स नाम दिया गया है। गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में इसे दुनिया का सबसे ऊंचा गोल्फ कोर्स का दर्जा दिया गया है।

सन 1972 में निर्माण -  इस गोल्फ कोर्स का निर्माण 1972 में किया गया। पूर्वी सिक्किम में स्थित ये 18 होल का गोल्फ कोर्स  है। इसका प्रबंधन इंडियन आर्मी और इंडियन गोल्फर यूनियन देखती है। यहां पर इसका प्रमाण पत्र भी प्रकाशित किया गया है। 
गोल्फ कोर्स के साथ गुजरते मार्ग  से 1903-04 में ब्रिटिश आर्मी के कैप्टन यंगहसबेंड के नेतृत्व में अपनी  प्रसिद्ध   तिब्बत  के  अभियान पर गए थे।    तिब्बत पर ब्रिटिश अभियान, जिसे तिब्बत पर ब्रिटिश आक्रमण के नाम से भी जाना जाता है या तिब्बत में यंग हसबेंड अभियान दिसंबर 1903 में शुरू हुआ और सितंबर 1904 तक चला।

 ट्रांजिट कैंप में रहने का इंतजाम -  रास्ते मे मुझे टैक्सी ड्राईवर एक ट्रांजिट कैंप दिखाते हैं। बताते हैं कि ये सैलानियों के लिए आवास का इंतजाम है। अगर कभी बर्फबारी में सैलानी फंस गए तो सेना उनके आवास और भोजन का इंतजाम यहां करती है। यहां एक साथ करीब 500 सैलानियों के रहने का इंतजाम किया गया है। 



रास्ते में टैक्सी ड्राईवर हमें टूकला ( TUKLA)  दिखाते हैं। बताते हैं कि 1958 में इस हिस्से पर चीन ने कब्जा कर लिया था। इस क्षेत्र में बड़ी लड़ाई हुई थी। टुकला घाटी 12500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। बाद में इस क्षेत्र को 1962 में ही भारत की सीमा में वापस लिया जा सका। कहानी सुनकर सीना चौड़ा हो जाता है कि हमने ये इलाका चीन से छीन लिया था। 



सडक के किनारे  बर्फ की चादर -  आजकल इस इलाके में सड़क के दोनों तरफ खूब बर्फ पड़ी है। सिर्फ सड़क साफ दिखाई देती है बाकी दोनों तरफ बर्फ ही बर्फ। ड्राईवर साहब गाड़ी रोक देते हैं बर्फ के संग अटखेलियां करने के लिए। हम भी बर्फ के संग कुछ देर के लिए मस्त हो जाते हैं। सफेद बर्फ यूं लगते हैं मानों पहाड़ो पर बिस्तर बिछा हो और हम उसपर यूं लेट जाएं।  हां, मेेरे लिए पहाड़ों पर बर्फ देखने का ये पहला मौका है। 


इतनी ऊंचाई पर  बर्फीली वादियों में  हरियाली के बारे में सोचना ठीक नहीं है। पर  इन उंचाई पर रोडेंड्रम के पौधे दिखाई दे जाते हैं। इन्हें नेपाली में गुरांस  कहते हैं तो उत्तराखंड में इसका नाम बुरांश है। यह हाई एल्टीट्यूड पर होने वाला पौधा  है। इसमें लाल रंग के फूल खिलते हैं। बुरांश का जूस दिल के लिए काफी अच्छा होता है। पर इन दिनों बुरांश मं फूल नहीं आए हैं।  सिर्फ टहनियां दिखाई दे रही हैं।   इनमें फलियां भी आ गई हैं। 


कुछ नहीं बस ....मुट्ठी बर बर्फ। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( GANGTOK TO NATHULA, CHANGU LAKE, ANJU LAKE, MANJU LAKE ) 

Tuesday, January 26, 2016

...और इस तरह बन गई छांगू झील

गंगटोक से 35 किलोमीटर की दूरी पर आता है छांगू लेक (TOSONGMO LAKE ) इसके पानी की गहराई 50 फीट तक है। झील का पानी आधा जमा हुआ दिखाई देता है।    झील के   दोनों तरफ पहाड़ की चोटियां हैं। झील के किनारे ढेर सारे रंग बिरंगे याक हैं जिसके साथ लोग तस्वीरें खिंचवाते नजर आते हैं। ये सभी लोग रंग-बिरंगी नेपाली और भूटिया ड्रेस पहनकर फोटो खिंचवाते हैं।



आज भी झील के आसपास खूब रौनक है। यह झील तकरीबन एक किलोमीटर लंबी और अंडाकार आकार की है। सिक्किम के लोगों में इस झील के प्रति काफी सम्मान है। वे इसे काफी पवित्र झील मानते हैं। झील के किनारे एक मंदिर भी बना हुआ है। साथ ही बोर्ड लगा है जिस पर झील को साफ सुथरा रखने की अपील सैलानियों से की गई है।  मौसम खराब  होने पर सैलानी नाथूला  तक नहीं जा पाते तो इसी  झील के पास से लौटना पड़ता है। 


लोक कथाओं के मुताबिक जहां आज झील है कभी मवेशियों का आश्रय स्थल हुआ करता था। जहां लोक याकों को रखते थे। एक दिन एक बूढ़ी महिला को सपना आया कि जल्दी से जानवरों को हटा लें यह जगह पानी से भरने वाली है। हालांकि गांव वालों ने उसका भरोसा नहीं किया। वह महिला वहां से चली गई, पर ये जगह सचमुच पानी से भरकर झील में तब्दील हो गई। उसके बाद लोग इसे ईश्वर का चमत्कार मानकर झील की पूजा करने लगे। खास तौर पर गुरु पूर्णिमा के दिन यहां विशेष पूजा की जाती है।


छांगू झील देश भर  से आने  वाले सैलानियों को भी खूब पसंद आती है।  साल कुछ महीने इस झील का पानी जम भी जाता है।  आज भी मौसम अच्छा है तो यहां खूब सैलानी जुटे हैं।  बच्चे भी रंग-बिरंगे कपड़ों  में याक के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं। हमने बचपन में याक के बारे में सुना था। यह बैल से मिलती जुलती प्रजाति है जो ठंडे प्रदेशों में पाए जाते हैं। 



अंजू लेक और मंजू लेक – नाम से ही ऐसा लगता है कि दो सगी बहने हों। नाम रखने वालों ने भी कुछ ऐसा ही सोचा होगा। छांगू लेक से आगे बढ़ने पर सड़क के किनारे ये दो झीलें नजर आती हैं। हमें चालक महोदय इसका नाम अंजू  और मंजू बताते हैं। सुनकर कौतूहल होता है। हालांकि ये दोनो बहने आसपास होने के बावजूद कभी आपस में मिल नहीं पातीं। पर इसके थोड़ा आगे जाने पर आता है एलीफैंट लेक। जब इसे समग्र तौर पर देखा जाए तो इसका आकार हाथी जैसा नजर आता है।

इस पूरे दुर्गम रास्ते का इंतजाम बीआरओ  यानी बार्डर रोड ऑर्गनाइजेशन ( सीमा सड़क संगठन ) के  हवाले है। थोड़ा चलने के बाद हमलोग कायोंगसला पहुंचे हैं। यहां पर ठंड बढ़ गई है।  यहां पर बीआरओ  की ओर से एक कैफे भी बनाया गया है।   यहां पर छोटा सा बाजार भी दिखाई दे रहा है।  इस बाजार का भी  प्रबंधन बीआरओ करता है। हमारे  ड्राईवर बड़े सिद्धहस्त हैं वे बड़े आराम से गाड़ी चला रहे हैं। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
( GANGTOK TO NATHULA, CHANGU LAKE, ANJU LAKE, MANJU LAKE ) 


Sunday, January 24, 2016

नाथुला यानी पुराने सिल्क रूट (रेशम मार्ग ) की ओर...

सुबह का सूरज अभी निकला है और मैं तिब्बत रोड पर टहल रहा हूं। गंगटोक का तिब्बत मार्ग एमजी रोड से ऊपर की ओर जाता है। यह चीन की सीमा यानी नाथुला की ओर जा रहे रास्ते से जा मिलता है। ईसा पूर्व दूसरी सदी से चीन से हमारा कारोबार चलता था। यह रास्ता रेशम मार्ग (SILK ROUTE) कहलाता था। भारत का सिल्क रूट से संपर्क सिक्किम और तिब्बत से होकर था। कई सौ सालों तक चीन के साथ न सिर्फ रेशम बल्कि अन्य सामग्रियों की भी तिजारत इसी सड़क मार्ग से चलती रही। पर कारोबार का मुख्य हिस्सा रेशम था इसलिए इस मार्ग का नाम रेशम माल्ग या सिल्क रूट पड़ गया। गंगटोक में एक सड़क का नाम तिब्बत रोड है। हालांकि इसका नया नाम सोनम ग्यात्से मार्ग दिया गया है पर ज्यादातर लोग इसे तिब्बत मार्ग नाम से ही बुलाते हैं।


हमारी तैयारी नाथुला सीमा की ओर और बाबा हरभजन सिंह मंदिर जाने की है। गंगटोक से नाथुला की दूरी 56 किलोमीटर है। पर रास्ता मनोरम और थोड़ा मुश्किल भरा भी है। नाथुला की ओर जाने वाली टैक्सियां वज्र स्टैंड से मिलती हैं। आप अपनी निजी कार से उधर नहीं जा सकते। आपको सिक्किम की ही टैक्सियां किराए पर लेनी पड़ती हैं।

करनी पड़ती है कागजी कार्रवाई – नाथुला मार्ग पर जाने के लिए कागजी कार्रवाई भी पूरी करनी पड़ती है। इसके लिए परमिट एक दिन पहले ही बनवाना पड़ता है। हालांकि इसकी कागजी कार्रवाई आपका टूर आपरेटर ही पूरा कर देता है। पर आपको अपनी चार फोटो, दो आईडी प्रूफ जमा करना पड़ता है। परमिट पुलिस विभाग और वन विभाग जारी करता है। 


गंगटोक शहर से बाहर निकलते ही परमिट की चेकिंग होती है। यहां पर हर यात्री को एक दस रुपये का स्वच्छता डोनेशन कूपन भी लेना पड़ता है। वहीं विदेशी नागरिकों को इस प्रतिबंधित क्षेत्र में जाने के लिए एफआरओ बनवाना पड़ता है।   एक दिन पहले ही हमने अपनी नाथुला यात्रा के लिए अपने होटल के मैनेजर बिट्टू  से बुकिंग करवा ली थी।   आपको भी जब भी नाथुला जाना हो एक दिन पहले ही गंगटोक  में किसी ट्रैवेल एजेंट से बुकिंग करानी पड़ेगी। 


टैक्सी धीरे धीरे आगे बढ़ती जा रही है। धूप पर मौसम में सर्द होता जा रहा है। घुमावदार रास्तों के साथ ऊंचाई बढ़ती जा रही है। हम बादलों के करीब होते जा रहे हैं। कोई 20 किलोमीटर से ज्यादा चलने पर आता है, 15 मील यानी क्यांगोसला। टैक्सी वाले यहां पर कुछ हल्का फुल्का खाने के लिए रोकते हैं। यहां पर कैफै है जो सिक्किम टूरिज्म द्वारा संचालित है। यह कैफे 10 हजार 400 फीट की ऊंचाई पर है। क्यांगोसला यानी 15 मील पर एक रेडीमेड कपड़ो जिसमें खास तौर पर टोपियां, दस्ताने और जैकेट बिकते हैं इसकी दुकान है। दुकान में चाय, कॉफी और मोमोज भी मिलते हैं।


नन्ही रेजिना से मुलाकात-  इसके काउंटर पर बैठी मिली 12 साल की नन्हीं रेजिना। रेजिना सातवीं क्लास में पढ़ती है। पूछने पर बताती है कि गंगटोक के स्कूल में पढ़ती हं। इन दिनों स्कूल बंद हैं इसलिए छुट्टियों में मां के साथ दुकान पर उनकी मदद कर रही हूं। वह उनी कपड़ों का काउंटर संभाल रही है। यहां चाय 10 रुपये में मिल रही है। यानी कीमत को लेकर कोई लूटपाट नहीं।



यहां पर मैगी 50 रुपये की है। उबले अंडे भी मिल रहे हैं। मैं आम तौर पर चाय नहीं पीता। पर ठंड बढ़ती जा रही है तो चाय की चुस्की लेना भला लगता है। लौटती यात्रा में ही हम यहां पर रूकते हैं तब यहां बादल सड़कों पर टहलते हुए नजर आते हैं। हम इन बादलों के संग थोड़ी देर तक मस्ती करते हैं और फिर रवाना  हो जाते है आगे के लिए।
विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
 ( GANGTOK, SILK ROUTE, TIBET ROAD ) 


Friday, January 22, 2016

मोमोज, रोल, समोसा, पूड़ी सब कुछ खाए गंगटोक में

जब आप दार्जिंलिंग जाते है और अगर आप शाकाहारी हैं तो खाने पीने के कम विकल्प नजर आते हैं। पर सिक्किम की राजधानी गंगटोक में ऐसा नहीं है। यहां पर हर सड़क पर शाकाहारी भोजन का विकल्प मौजूद है। कई जगह तो यूपी बिहार की तरह आपको पूड़ी सब्जी और समोसा खाने के मिल जाएगा। स्वाद भी बिल्कुल बिहार और यूपी जैसा। न सिर्फ एमजी रोड पर बल्कि देवराली बाजार तक आपको अपनी पसंद का खानापानी मिल सकता है। चाहे आप मोमोज के शौकीन हों या फिर अलग अलग तरह के रोल्स के या फिर शाकाहारी थाली के, आप निराश नहीं होंगे।

सबसे पहले बात शाकाहारी थाली की। वैसे तो एमजी रोड पर परिवार यहां का सबसे लोकप्रिय शाकाहारी फूड ज्वाएंट है। पर ये थोड़ा महंगा है। हालांकि वहां सैलानियों की भीड़ उमड़ती है। लेकिन यहां पर कई मारवाडी बासा भी हैं। परिवार के ठीक उल्टी तरफ दूसरी मंजिल पर लक्ष्मी मारवाड़ी बासा में पहुंचे। सौ रूपये की अनलिमेटेड थाली का आनंद लें। घी लगी चपाती, चावल, दाल, तीन तरह की सब्जियां और पापड़ छक कर खाएं। सुबह और शाम के मीनू में थोड़ा अंतर रहता है। इसी तरह का दूसरा स्थान भी है परिवार के बगल में सीढ़ियां उतरिए। शर्मा भोजनालय। यहां भी 100 रुपये थाली खा सकते हैं अनलिमिटेड। चाहें तो अलग अलग व्यंजनों का भी आर्डर कर सकते हैं। सभी जगह गर्म ताजा खाना और पीने के लिए गर्म पानी मिल जाता है। डेकोरेशन बहुत शानदार नहीं पर खाने से निराश नहीं होंगे। सिक्किम टूरिज्म की ओर से संचालित रसोई वेजटेरियन एमजी रोड पर स्थित है। इसका इंटिरियर शानदार है। पर दरें थोड़ी ऊंची हैं। सिक्किम के ज्यादातर होटलों में भी रेस्टोरेंट हैं। हमारे होटल निर्वाण रीजेंसी में रेस्टोरेंट था। हालांकि मैंने यहां कभी नहीं खाया।


एमजी रोड पर कंचन फास्ट फूड – एमजी रोड पर चलते हुए एक दुकान नजर आती है  कंचन फास्ट फूड। समोसा दस रुपये में। सुबह के नास्ते में पूड़ी सब्जी मिलती है तो लोगों के मांग के अनुरूप मोमोज भी बनाते हैं। कंचन फास्ट फूड वाले दुर्गा प्रसाद शाह बिहार के आरा के रहने वाले हैं। 1992 से इधर दुकान चला रहे हैं। वे किसिम किसिम के रोल, ब्रेड पकौड़ा आदि भी बनाते हैं। कहते हैं सिक्किम में आकर मोमोज नहीं खाया तो क्या खाया।
डेज स्वीट्स – एमजी रोड पर ही डेज स्वीट्स बेहतरीन दुकानों में से हैं। यहां आप सुबह नास्ते में पूड़ी सब्जी खा सकते हैं। 35 रुपये में बेहतरीन नास्ता। इसके अलावा आप कई तरह की मिठाइयां खरीद सकते हैं। उनका स्वाद लाजवाब है। ये शाकाहारी दुकान है।

नारायण स्वीट्स की विरासत – मिठाइयों के लिए नारायण स्वीट्स पहुंचे। गंगटोक के एमजी रोड में ये दुकान 1965 से है। हालांकि दार्जिलिंग में नारायण स्वीट्स तो 1877 से ही है। यहां भी आप मिठाइयों के अलावा सुबह के नास्ते में कई वेराइटी का आनंद ले सकते हैं।
गंगटोक में एक नेपाली भोजनालय - मतलब भंसा घर। 


रोल हाउस –  एमजी रोड पर रोल हाउस में भी खूब भीड़ उमडती है। रोल हाउस परिवार के उल्टी तरफ है। गंगटोक में लोगों को अलग अलग तरह के रोल खाना खूब पसंद है। इसमें वेज रोल, एग रोल, चिकेन रोल से लेकर कई किस्म के रोल हो सकते हैं। रोल के आगे सरदी के बीच पेस्ट्री और आईस्क्रीम के दीवाने भी कम नहीं दिखाई देते।

झालमूड़ी वाले – लाल मार्केट के बाहर चौराहे पर कई झालमूडी वाले दिखाई देते हैं। पटना की तरह चनाजोर गरम खाइए, दस रुपये में। पर चनाजोर गरम खाने के लिए आपको चम्मच भी देते हैं ताकि हाथ गंदे न हों। वहीं कंचनजंगा शापिंग कांपलेक्स में सब्जी बाजार के बीच में कुछ बिहारी दुकानदार हैं जो गोलगप्पे भी शानदार बनाते हैं।

-vidyutp@gmail.com ( GANGTOK,  FOOD,  SAMOSA,  MOMOS,  PURI,  GOLGAPPA) 
( अगली कड़ी में चलिए नाथुला की ओर..... )