Friday, December 25, 2015

सालों भर लुभाता है पश्चिमी घाट का सौंदर्य

Western Ghats - MATHERAN
पश्चिमी घाट यानी दिलकश नजारे। यह कोई एक जगह नहीं। इसका विस्तार कई राज्यों में हैं। सौंदर्य ऐसा है चप्पे चप्पे में कि इसे साल 2012 में में विश्व विरासत साइट का दर्जा मिला। इसके तहत कोई 1600 किलोमीटर लंबी पर्वत श्रंखला आती है।

 माना जाता है कि ये पर्वत हिमालय से भी ज्यादा पुराने हैं। अपने पारिस्थित विभिन्नता के कारण इसे अलग पहचान मिली है। इसका विस्तार गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु जैसे पांच राज्यों में है।

Western Ghats- MAHABALESWAR
इसकी सीमा में देश के कई बड़े हिल स्टेशन और नदियां और पहाड़ आते हैं। पश्चिम घाट में कुल 1 लाख 40 हजार वर्ग किलोमीटर के पहाड़ आते हैं। केरल में पालघाट के 30 किलोमीटर के दायरे को छोड़ दें तो ये पहाड़ कहीं न कहीं आपस में जुडे हुए हैं।

 इसलिए पश्चिमी घाट की एक वैश्विक पहचान है। इन घाटों का भारत के मानसून के गति से भी जुड़ाव है। बारिश के दिनों में इनका सौंदर्य और बढ़ जाता है। ये विश्व के सर्वाधिक हरे भरे इलाकों में गिने जाते हैं। इस क्षेत्र में पौधे के 650 के आसपास प्रजातियों की पहचान की गई है। वहीं 31 तरह के स्तनपायी जानवर इस क्षेत्र में हैं।

सबसे पहले महाराष्ट्र के सहयाद्रि रेंज की बात करें तो इसमें माथेरन, लोनावाला, खंडाला, महाबलेश्वर, पंचगनी जैसे इलाके आते हैं। बारिश के दिनों में माथेरन की यात्रा बंद करनी पड़ती है तो महाबलेश्वर में भी कुछ ऐसा ही होता है। पर महाबलेश्वर में तो बादलों का ऐसा डेरा होता है कि यहां बादलों पर शोध के लिए संस्थान खोला गया है। मुंबई से पुणे जाते समय आप लोनावाला और खंडाला का सौंदर्य देख सकते हैं। यह मुंबई के लोगों को खूब लुभाता है।
TABLE LAND OF PANCHGANI

कोंकण रेलवे से होकर गुजरते समय पश्चिमी घाट का सौंदर्य नजर आता है जो गोवा से गुजरते हुए भी दिखाई देता है। गोवा में दूध सागर के पास तो इसका अदभुत नजारा दिखाई देता है। 

इसके बाद आप कर्नाटक में प्रवेश कर जाते हैं। केरल का मुन्नार जैसा हिस्सा भी इसके तहत आता है। आप चलते जाइए इसका सौंदर्य खत्म होने का नाम नहीं लेता।

वहीं तमिलनाडु के नीलगिरी रेंज में ऊटी, कोटागिरी, कोडाइकनाल जैसे इलाके आते हैं। ऊटी सालों भर सैलानियों को मोहित करता है तो कोडइकनाल विदेशियों को भी हमेशा से लुभाता रहा है। पश्चिम भारत से लेकर दक्षिण भारत तक पश्चिमी घाट का विस्तार है।

NILGIRI HILLS- OOTY (TN) 
 हालांकि पांच राज्यों में विस्तारित क्षेत्र होने के कारण इनकी देखभाल दुष्कर कार्य है। केंद्र सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय के तहत नेचुरल हेरिटेज मैनेजमेंट कमिटी का गठन किया गया  है। यह समिति सात अलग अलग कलस्टर में फैले इस क्षेत्र की देखभाल के लिए उत्तरदायी है।

बालीवुड के फिल्मकारों को भी इसका सौंदर्य खूब भाता है इसलिए तमाम फिल्मों में पश्चिमी घाट के पहाड़ों के नजारे आप देख सकते हैं। हिंदी फिल्मों में लोनावाला, खंडाला, वाई, पंचगनी, महाबलेश्वर, दूध सागर से लेकर ऊटी तक के नजारे खूब फिल्माए गए हैं। तो कभी वक्त मिले तो चलिए पश्चिमी घाट की ओर...
( WESTERN GHATS, NILGIRI, SAHYADRI, DOODH SAGAR) 


Thursday, December 24, 2015

बिना लहसुन प्याज वाली दिल्ली 6 की सुस्वादु थाली...

प्याज बहुत महंगा हो रहा है तो हाय तौबा क्यों मचा रहे हैं। क्या आपको पता नहीं है कि यूपी के पंडितों के परिवारों में सदियों से बिना लहसुन और प्याज के खाने का चलन है। मारवाड़ी भोजन की थाली भी बिना लहसुन प्याज के तैयार होती है। खाने की थाली में परोसे गए व्यंजन इतने स्वादिष्ट होते हैं कि आपको खाते वक्त एहसास नहीं होता कि आप बिना लहसुन और प्याज के खा रहे हैं। आप घर में भी बिना लहसुन प्याज के भोजन बना सकते हैं। दिल्ली में आपको ऐसे भोजन की थाली का स्वाद लेना है तो चांदनी चौक इलाके में आदर्श वेजिटेरियन पहुंचे। 


अगर आप दिल्ली में शाकाहारी थाली का स्वाद लेना चाहते हैं तो दिल्ली 6 यानी पुरानी दिल्ली का रूख कर सकते हैं। हाल में दिल्ली की सड़कों पर घूमते हुए हमलोग आदर्श वेजिटेरियन पहुंचे। यहां है 150 रुपये में शाकाहारी थाली। पर ये थाली है भरपेट थाली। यानी काफी कुछ दक्षिण भारतीय थाली की तरह। पर इस थाली का मीनू है शुद्ध राजस्थानी। खाने से हिंग की भीनी खुशबू।



क्या है थाली में  तीन तरह की सब्जियां, कोफ्ता, आलू शिमला मिर्च, बड़ियां और मटर, हिंग वाली दाल, चपाती घी लगी हुई, इसके साथ पराठे, पराठे भी अपनी पसंद के चुन सकते हैं- आलू पराठा,  मूली पराठा, पनीर पराठा और मिस्सी रोटी।
थाली में बासमती चावल भी होता है। साथ में सलाद, चटनी और इन सबके साथ पापड़ और मिठाई के तौर पर सुस्वादु खीर। इतना सब कुछ खाना वह भी उतना खाएं जितनी की आपकी पेट की क्षमता हो। तो भला इससे बढ़िया बात क्या हो सकती है।

स्वाद पुरानी दिल्ली का - आदर्श वेजीटेरियन में सुबह 10 बजे से रात 11 बजे तक लगातार भोजन उपलब्ध होता है। दिन में कभी छुट्टी नहीं। अगर आप चांदनी चौक इलाके में शापिंग के लिए पहुंचे हैं तो यहां के खाने का स्वाद ले सकते हैं।


पुरानी परंपरा - ये भोजनालय 1989 से चल रहा है। इसके संचालक रामबाबू शर्मा हैं , जो समय समय पर खुद ग्राहकों की भोजन पर प्रतिक्रिया लेते रहते हैं। उनका लक्ष्य भोजनालय में आने वालों को घर जैसा स्वाद और ऐसा खाना उपलब्ध कराने की है जिसे खाकर आपकी सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़े। तो अगली बार आप पुरानी दिल्ली पहुंचे तो एक बार यहां खाने का स्वाद लेने की योजना बना सकते हैं।


कैसे पहुंचे- आदर्श वेजीटेरियन फव्वारा चौक से फतेहपुरी मस्जिद की तरफ जाते समय बल्लीमारान से थोड़ा आगे बायीं तरफ गली में है। नीचे भोजनालय और ऊपर आदर्श अतिथि निवास ( http://hoteladarshniwas.com/) भी है। यह पुरानी दिल्ली में रहने के लिए वाजिब दरों पर सुंदर व्यवस्था उपलब्ध कराता है। आदर्श वेजिटेरियन का वातानुकूलित डायनिंग हाल है। पीने का पानी तांबे के जग में परोसा जाता है। रसोई घर में साफ सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है। चांदनी चौक इलाके में ये रेस्टोरेंट होम डिलेवरी भी प्रदान करते हैं।
-  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

Hotel Adarsh Niwas
483, Ist Floor, Haider Kuli Corner, Chandni Chowk, Delhi-110006
Telephone: +91(11) 23987576, 23929139, 23961667 +91 9013002160


Tuesday, December 22, 2015

दिल्ली में लें चेन्नई का सच्चा स्वाद

अगर आप दिल्ली में रहकर सच्चे दक्षिण भारतीय व्यंजनों का स्वाद लेना चाहतें और खासकर चेन्नई का तो पहुंचे सरवणभवन। सरवण भवन दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में स्थित है। चेन्नई शहर में सरवण भवन के 20 के करीब ब्रांच हैं। पर अब चेन्नई का ये प्रसिद्ध रेस्टुरेंट न सिर्फ दिल्ली बल्कि दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुका है।

दिल्ली में सरवण भवन में सुबह नास्ता, दोपहर का खाना या रात के डिनर के समय जा सकते हैं। मसाला डोसा  के अलावा आप यहां पर मिनी टिफिन का स्वाद लें। 125 रुपये की थाली में एक मिनी डोसा, चार मिनी इडली, उपमा और रवा केसरी ( यानी सूजी हलवा)। साथ में सांभर, चटनी तो होगी ही। ये एक टिकट में कई तमाशा जैसा डिश है। इसके अलावा यहां आप पारंपरिक तमिल थाली का भी आनंद ले सकते हैं जो 195 रुपये की है। मसाला डोसा 120 रुपये का है। डोसा का स्वाद बिल्कुल चेन्नई जैसा है। हालांकि दिल्ली में इसकी दरें चेन्नई से महंगी हैं। लेकिन उसी तरह प्लेट में परंपरागत केले के पत्ते पर व्यंजन परोसे जाते हैं। सभी दरों पर वैट और टैक्स अलग से लगता है। आप यहां पेमेंट क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं। सरवण भवन ने टेक अवे और होम डिलेवरी का भी यहां पर इंतजाम किया हुआ है। आमतौर पर दिल्ली के सरवण भवन में शाम को हमेशा भीड़ रहती है। खास तौर पर परिवार के साथ खाने वाले यहां खूब पहुंचते हैं। सरवण भवन के सांबर बनाने का अपना स्टाइल है जो उनके नाम से ही प्रसिद्ध है। यह ज्यादा तीखा नहीं होता,  इसलिए बच्चे भी आराम से खा लेते हैं।

दक्षिण भारत में सरवण भवन की 31 रेस्टोरेंट खुल चुके हैं जबकि उत्तर भारत में दो। दिल्ली में कनाट प्लेस में जनपथ और शिवाजी स्टेडियम के पास इनकी मौजूदगी है। वे साल 2003 से दिल्ली में हैं। तमिलनाडु में चेन्नई के अलावा कांचीपुरम, तूतीकोरीन में भी उनकी मौजूदगी है। विदेशों में दुबई, ओमान, मस्कट, हांगकांग समेत 12 देशों में 46 से ज्यादा आउटलेट फ्रेंचाइजी स्तर पर काम कर रहे हैं।
सरवण भवन का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। इसकी शुरुआत 1981 में एक रेस्टोरेट के तौर पर हुई थी। इसकी शुरुआत तमिलनाडु के तूतीकोरीन के रहने वाले पी राजगोपाल ने की थी। अब उनकी दूसरी पीढ़ी रेस्टोरेंट का कारोबार देखती है। राजगोपाल के पिता किसान थे और प्याज का कारोबार करते थे। 1973 में चेन्नई आकर उन्होंने केके नगर में  एक जनरल स्टोर खोला। बाद में 1981 में इसी इलाके में पहला सरवण भवन नामक रेस्टोरेंट खोला जो आज दुनिया का बड़ा ब्रांड बन चुका है। लोकप्रियता का ये आलाम है कि कई शहरों  सरवण भवन नाम से रेस्टोरेंट खुल गए हैं जो मूल सरवण भवन के हिस्सा नहीं हैं।  ( http://www.saravanabhavan.com/)



Sunday, December 20, 2015

रेलवे की विरासत- मुजफ्फरपुर पहुंचा डेहरी-रोहतास का लोकोमोटिव

कभी डेहरी रोहतास लाइट रेलवे की मातृ कंपनी रोहतास इंडस्ट्रीज लिमिटेड को अपनी सेवाएं देने वाला लोकोमोटिव अब मुजफ्फरपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन के बाहर शान से विराजमान है। ये लोकोमोटिव आते जाते लोगों को स्टीम इंजन ( भाप से चलने वाले) दौर की याद दिलाता है। जो लोग सन 2000 के बाद पैदा हुए हैं उन्होंने भारतीय रेलवे में स्टीम इंजन नहीं देखा होगा। क्योंकि आजकल ट्रैक पर डीजल या बिजली से संचालित इंजन ही दौड़ते हैं। वे इसे देखकर स्टीम इंजन के दौर को जान सकते हैं। कभी सिटी बजाता धुआं उड़ाया ये लोकोमोटिव अब शांत खड़ा है। पर मौन रहकर आपको इतिहास में ले जाता है।

पांच दिसंबर 2015 को पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक एके मित्तल ने इसका लोकार्पण किया, जिससे आमजन को रेलवे के बारे में जानकारी मिल सके। पर यह 2005 से 2009 के मध्य रेलमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव की संकल्पना थी जिन्होंने बंद पड़े रोहतास इंडस्ट्रीज का डालमियानगर से सारा कबाड़ खरीदने का फैसला किया। इस कबाड़ में कई लोकोमोटिव शामिल थे जिनमें से एक आरआईएल 06 भी था। अब इसे रंग रोगन करके रेलवे स्टेशन के बाहर लगा दिया गया है, जिसे आते जाते लोग कौतूहल से देखते हैं। हालांकि ऐसे लोकोमोटिव आप देश के कई बड़े शहरों के रेलवे स्टेशनों के बाहर देख सकते हैं, जो अपने क्षेत्र के रेलवे इतिहास की कहानी सुनाते हैं।



वाल्कन फाउंड्री का निर्मित लोकोमोटिव -  आरआईएल 06 नामक ये लोकोमोटिव ब्राडगेज ट्रैक ( 5 फीट 6 ईंच) का है जो रोहतास उद्योग समूह को 1967 से 1984 तक अपनी सेवाएं देता रहा। जब 1984 में रोहतास इंडस्ट्रीज पूरी तरह बंद हो गई तब से ये डालमियानगर के बीजी शेड में कबाड़ की तरह ही पड़ा था। लेकिन इसके पहले यह 1967 से 1983 तक रोहतास इंडस्ट्रीज को अपनी सेवाएं देता रहा।

इस लोकोमोटिव का निर्माण ब्रिटेन के लंकाशायर की कंपनी वालकन फाउंड्री ने 1908 में किया था। वालकन से ईस्ट इंडियन रेलवे ने कुल 10 लोकोमोटिव एक साथ खरीदे थे। यह पहियों के लिहाज से 0-6-4 टैंक मॉडल का स्टीम लोकोमोटिव है। इसने छह दशक तक ईस्ट इंडियन रेलवे को अपनी शानदार सेवाएं दीं।
(सभी फोटो - संतोष कुमार सारंग ) 

रोहतास इंडस्ट्रीज ने खरीदा -  कहते हैं लोहा कभी पुराना नहीं होता, अगर आप उसकी देखभाल करते रहें। इसलिए 60 साल पुराने लोकोमोटिव को रोहतास इंडस्ट्रीज ने अपने औद्योगिक इस्तेमाल के लिए खरीद लिया था। भले रोहतास इंडस्ट्रीज का कारोबार डालमियानगर में बंद हो गया और डेहरी रोहतास रेलवे भी बंद हो गया,  पर ये लोकोमोटिव अभी चालू हालत में थे। पर कई दशक तक शेड में पड़े पड़े ये कबाड़ में तब्दील होने लगे थे। बाद में ये सारा स्क्रैप रेलवे ने खरीद लिया। तो तकरीबन दो कंपनियों में आठ दशक तक धुआं उड़ाते हुए सफर करने वाला लोकोमोटिव अब मुजफ्फरपुर जंक्शन के बाहर लोगों के बीच कौतूहल बन कर खड़ा है।


( MUZAFFARPUR, VULCAN FOUNDRY LOCOMOTIVE, DEHRI ROHTAS LIGHT RAILWAY) 

Saturday, December 19, 2015

यादों में रचा बसा सोनपुर मेला

जब भी नवंबर महीना आता है देश के किसी भी कोने में रहूं, सोनपुर मेला जरूर याद आता है। कार्तिक गंगा स्नान के साथ ही सोनपुर मेले के तंबू गड़ जाते हैं। गंगा स्नान के लिए नारायणी (गंडक) और गंगा के संगम पर लाखों लोगों की भीड़ उमड़ती है। पश्चिम की तरफ सोनपुर और पूरब की तरफ हाजीपुर में नदी तट  पर कई किलोमीटर तक श्रद्धालुओं की स्नान का पुण्यलाभ पाने के लिए भीड़ उमड़ती है। इधर कई सालों से वैशाली और सारण जिला प्रशासन की ओर से स्नानार्थियों के लिए बेहतर इंतजाम भी किए जा रहे हैं। गंगा स्नान के साथ ही सोनपुर मेला शुरू हो जाता है जो अब एक महीने तक चलता है। पहले आधिकारिक तौर पर मेला सिर्फ 15 दिनों का होता था। लेकिन यह आगे भी 20 से 30 दिनों तक चलता रहता था। 

सोनपुर मेला उसी पौराणिक जगह पर लगता है जहां कभी गज और ग्राह में भयंकर युद्ध हुआ था। गज (हाथी) विष्णु का भक्त था, ऐसी मान्यता है कि उसे बचाने के लिए विष्णु स्वयं यहां आए थे। इसलिए ये हरिहर क्षेत्र है। इलाके में लोग उसे हरिहर क्षेत्र का मेला कहते हैं। तो वज्जिका के अपभ्रंश में गांव गांव के लोग छतर मेला कहते हैं।

वह साल 1978 था, जब मैं दूसरी कक्षा का छात्र था। पिता जी के साथ पहली बार सोनपुर मेले में गया था। वहां से मेरे लिए एक स्वेटर खरीदा गया था। 40 रुपये में। इसी मेले में पहली बार मैंने मसाला डोसा खाया था। पूर्वोत्तर रेलवे महिला समिति के स्टाल पर।

हाथी बाजार - तो जनाब सोनपुर मेले में जब हाजीपुर की ओर से पुराने लोहे पुल से गुजरते हैं तो सबसे पहले आता है हाथी बाजार। मेले में बिकने आए हाथियों को महावत गंडक नदी में नहलाने के बाद उन्हें रंग रोगन से सजाते हैं। उनकी पीठ पर रंगीन चंदोबे लगाए जाते हैं। हर साल ये खबर बनती है कि अमुक हाथी इतना महंगा बिका। हालांकि अब हाथी पालने शौक कम होता जा रहा है पर मेले में अभी हर साल सैकड़ो हाथी बिकने आते हैं। हाथी ही क्यों बैल, गाय भैंस, ऊंट सब कुछ बिकता है। चिड़ियों के लिए तो अलग से चिड़िया बाजार है यहां। भले मेला खत्म हो जाए चिड़िया बाजार सालों भर चिड़िया बाजार ही कहलाता है।

मीना बाजार - मेले का खास आकर्षण मीना बाजार होता है। इसमें कास्मेटिक के सामान बिकते हैं। लखनऊ का मीना बाजार, मुंबई का मीना बाजार तो दिल्ली का मीना बाजार घूमते जाइए। बिहार में एक शहर है लखीसराय। यह शहर सुहाग की निशानी सिंदूर बनाने के लिए जाना जाता है। 

सोनपुर मेले में कई सिंदूर कंपनियों को स्टाल आते हैं। इन स्टालों में पर अक्सर सिंदूर का पैकेट खरीदने पर कैलेंडर मुफ्त में मिलता था। ये सिंदूर कंपनियां ज्यादातर बिहार के लखीसराय की होती हैं। मेले में आने वाले लोग ठाकुर प्रसाद वाराणसी के स्टाल से भी पांचांग कैलेंडर ले जाना नहीं भूलते। मेले का प्रमुख आकर्षण होता है कश्मीर से आने वाली कश्मीरी शॉल की दुकानें। कश्मीरी शाल के कद्रदान यहां जरूर पहुंचते हैं। इसके साथ ही अलग अलग जिलों के खादी भंडार से स्टाल मेले में आते हैं।

थियेटर और कैबरे - एक समय तक सोनपुर मेले में थियेटर और कैबरे खास आकर्षण होते थे। कानपुर का गुलाब थियेटर, शोभा थियेटयर की खूब धूम रहती थी। पर बाद में अश्लीलता का आरोप लगने पर इनकी आवक बंद हो गई। बिहार सरकार का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग और पर्यटन विभाग मेले के लिए खास इंतजाम करता है। सूचना जनसंपर्क विभाग के स्थायी पंडाल में रोज सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। इसमें लोकगीतों की खूशबु महसूस की जा सकती है। अब मेला सरकारी तौर पर एक महीने का होता है। तो आप रोज मेले में संगीत का आनंद ले सकते हैं।

पर मेला इतना ही नहीं है। यहां लकड़ी के फर्नीचरों का भी बाजार होता है। मेला खत्म होने तक फर्नीचर सस्ते होने लगते हैं। कई लोग इंतजार करते हैं सस्ती खरीदारी का। पुरानी पीढ़ी के लोग बताते हैं कि कभी मेले में सब कुछ बिकता था। यहां तक की गुलाम भी बिकते थे। बदलते वक्त के साथ मेला बदल रहा है। मेले में आने वाले तमाम उत्पाद अब बाजार में भी मिलने लगे हैं। पर सोनपुर मेले का आकर्षण कम नहीं हुआ है। 

 साल 1978 के बाद अनगिनत साल मेले में लगातार जाने का मुझे मौका मिला और मेले की बदलती फिजां को महसूस भी किया। पर इन बदलाव के बीच मेले का का आकर्षण कम नहीं हुआ। सोनपुर से बहुत दूर रहता हूं। पर दिल के किसी कोने में तो सोनपुर मेले की खुशबू रची बसी रहती है।

 ( SONEPUR FAIR, HAJIPUR, BIHAR TOURISM, ELEPHANT, MEENA BAJAR, HARIHAR NATH TEMPLE, GANGA GANDAK RIVER) 

कुछ और खरीददारी हो जाए घर और परिवार के लिए....सोनपुर मेला आज भी गांव से आने वाले लोगों के लिए साथ ही शहरी लोगों के लिए बड़ा आकर्षण रखता है।
सिंदूर. चंदन और भी बहुत कुछ मिलता है मेले में...
चलो झूला झूलें....सोनपुर मेले में



Friday, December 18, 2015

चांदनी चौक की गलियों का स्वाद – जयतारा स्वीट्स

वैसे तो पुरानी दिल्ली की जिस गली से आप गुजरें उसकी कुछ खास बात जरूर है। पर हम जा पहुंचे सोने चांदी के गहने बेचने वाले पुराने दरीबा बाजार के पास गली पीपल में। मुहल्ले का नाम है धर्मपुरा। इस मुहल्ले में एक छोटी सी दुकान दिखाई देती है जयतारा स्वीट्स। वैसे तो दुकान देखने में छोटी है पर है कई दशकों पुरानी। महज कुछ चीजें रोज यहां बनती हैं। पर इसके स्वाद के दीवाने देश के बाहर तक हैं। विदेशी सैलानियों पुरानी दिल्ली की गलियां दिखाने वाले टूरिस्ट गाइड जब यहां पहुंचते हैं तो इस मिठाई और नमकीन की दुकान के स्वाद के बारे में बताते हैं। ये दुकान एक जैन परिवार द्वारा संचालित है। इसलिए खान पान की शुद्धता में जैन परंपराओं का काफी ख्याल रखा जाता है। इस दुकान को 1944 में ताराचंद जैन (सोनीपत वाले) ने अपने पिता बद्री प्रसाद जैन के साथ आरंभ किया था।


इस दुकान से जुड़े तीसरी पीढ़ी के सख्श सतीश भारती बताते हैं कि जैन धर्म के अनुसार छने हुए जल का अपना महत्व होता है तो जयतारा स्वीट्स में केवल छने हुए जल का ही इस्तेमाल किया जाता है। आपको दुकान के नल पर हमेशा जल को छानने के लिए छन्नी लगी दिखाई देगी। व्यवहार में शुद्धता का निर्वाह करना बहुत मुश्किल  काम है। पर ऊंचे धार्मिक मूल्यों के कारण जयतारा स्वीट्स में इन नियमों का पालन सात दशकों से करता आ रहा है।

मटर समोसा और घेवर - जयतारा स्वीट्स का मटर समोसा फेनी और घेवर काफी लोकप्रिय है। मौसम के बदलते मिजाज और त्योहारों की रंगत को ध्यान में रखते हुए यहां पर खास किस्मों की मिठाइयां बनाई जाती हैं। यहां की मसालेदार खस्ता कचौड़ी और मटर के समोसे मशहूर हैं, जिनके साथ आलू की सब्जी की बजाय खास तौर पर बनी मेथी की चटनी परोसी जाती है। इसके अलावा यहां आप लजीज कचौड़ी और नमकीन का भी स्वाद ले सकते हैं।

आलू जिमीकंद नहीं - जैन सिद्धांतों के मुताबिक जमीन के अंदर उगने वाले खाद्य पदार्थ जैसे आलू, गाजर मूली आदि खाने को वर्जित बताया गया है। इसलिए यहां समोसे में आलू नहीं डाला जाता। वे खास तौर पर मटर समोसा बनाते हैं। साल के उन दिनों भी जब मटर महंगा होता है यहां मटर समोसा ही बनता है। त्योहारों के मौसम में यहां घेवर की मांग खूब बढ़ जाती है। जो एक बार जयतारा की मिठाई खा लेता है उनके स्वाद का मुरीद हो जाता है। यहां बनी मिठाइयों में चांदी के वर्क का इस्तेमाल नहीं किया जाता। 2015 में ताराचंद जैन नहीं रहे पर उनके द्वारा खोली गई ये दुकान अपने स्वाद का जादू बिखेर रही है।

कैसे पहुंचे – पता है - 2283 धर्मपुरा, दरीबा, चांदनी चौक। जयतारा स्वीट्स तक पहुंचने के लिए आप लालकिला से फतेहपुरी मसजिद की तरफ चलते समय बायीं तरफ स्थित दरीबा कला बाजार में पहुंचकर गली पीपल पूछिए। संकरी गलियों से होते हुए आप यहां पहुंच जाएंगे। (फोन -9811008716,9811025210)

( CHANDNI CHAUK, JAITARA SWEETS, MATAR SAMOSA, GHEWAR, FENI, OLD DELHI, GALI PIPAL)

Wednesday, December 16, 2015

आगरा का लालकिला- कभी था बादलगढ़

दिल्ली का लालकिला तो देश भर में प्रसिद्ध है पर एक लाल किला आगरा में भी है। लाल किला क्यों.. क्योंकि यह लाल पत्थरों से बना है। अगर आकार की बात करें तो आगरा का लालकिला दिल्ली से भी विशाल है। यह 1983 से ही यूनेस्को की विश्वदाय स्मारकों की सूची में शामिल है। पर ताजमहल देखने आने वाले सैलानी कम ही आगरा के किले में पहुंचते हैं। इसे किला ए अकबरी के नाम से भी जानते हैं।

कहा जाता है कि यह किला मूल रूप से 11वीं सदी का है। कभी इसका नाम बादलगढ़ हुआ करता था। क्योंकि इसका पुनर्निर्माण सिकरवार राजपूत राजा बादल सिंह बनवाया था। इस किले में दिल्ली के शासक सिकंदर लोदी ( 1488-1517) के रहने का भी प्रमाण मिलता है। सिंदकर लोदी के काल में आगरा को देश की दूसरी राजधानी बनने का गौरव प्राप्त हुआ। पानीपत की लड़ाई में पराजित होने तक उसका बेटे इब्राहिम लोदी के कब्जे में ये किला रहा। इसके बाद ये किला बाबर के कब्जे में आ गया।1530 में इसी किले में हिमायूं का राज्याभिषेक हुआ। 

1540 में हुमायूं के शेरशाह से पराजित होने के बाद यह किला सूरी वंश के कब्जे में आ गया। 1555 में हुमायूं इस किले पर दुबारा कब्जा कर सका। 1556 के पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमचंद्र विक्रमादित्य को पराजित करने के बाद अकबर इस किले में 1558 में आया। अकबर का समकालीन इतिहासकार अबुल फजल भी इस किले को बादलगढ कहता है। हालांकि तब यह बदहाल था, अकबर ने राजस्थान से लाल पत्थर मंगाकर इस किले को भव्य रूप में बनवाया। तकरीबन 4000 शिल्पी ने लगातार काम करके 8 साल में इस किले को नया रूप प्रदान किया। 1573 से यह किला अब इस रूप में दिखाई दे रहा है। बाद में यह किला मराठों के अधिकार में भी लंबे समय तक रहा। पर 1803 में यह किला ब्रिटानिया हुकुमत के अधीन आ गया।

आगरा का यह किला 94 एकड़ में विस्तारित है। यह अर्धवृताकार संरचना में है। इसमें कुल चार प्रवेश द्वार हैं जो चार तरफ खुलते हैं। खिजरी गेट यमुना नदी की तरफ खुलता है। पर इसमें दिल्ली गेट और लाहौर गेट प्रमुख हैं। चार दरवाजों में दिल्ली गेट सबसे विशाल है। इसके निर्माण में संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है। इस गेट के अंदर जाने पर आपको हाथी गेट दिखाई देता है। यहां दो विशाल हाथी स्वागत द्वार पर बनाए गए हैं। हालांकि आगरा का किला देखने आने वाले सैलानी इसमें लाहौर गेट ( या अमर सिंह गेट) से प्रवेश करते हैं। दिल्ली गेट का इलाका सेना के कब्जे में है। इसलिए आप किले का पूरा हिस्सा नहीं घूम सकते हैं।

किले के अंदर देखी जाने वाली इमारतों में दीवान-ए-आम प्रसिद्ध है। यहां से राजा आम जनता को दर्शन देते थे और उनकी समस्याएं सुनते थे। इसके अलावा किला में दीवाने खास है जो राजा का आवास हुआ करता था। किले के जहांगीर महल है जिसका निर्माण अकबर के बेटे जहांगीर ने करवाया था। किले के अंदर शीश महल, खास महल, अंगूरी बाग, मीना मस्जिद, नगीना मस्जिद और मीना बाजार भी है। किले के अंदर मुसम्मन बुर्ज है जहां से ताजमहल का नजारा दिखाई देता है। पर यह बुर्ज सैलानियों के लिए बंद है। कहा जाता है औरगंजेब ने अपने पिता शाहजहां को इसी बुर्ज में कैद रखा था।

कैसे पहुंचे – आगरा का किला ताजमहल से ढाई किलोमीटर उत्तर पश्चिम की तरफ स्थित है। आप बस स्टैंड और आगरा के प्रसिद्ध घी मंडी से भी आगरा का किला आसानी से पहुंच सकते हैं।
प्रवेश -  किले में प्रवेश लाहौर गेट की ओर से होता है। आगरा का किला भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित इमारत है। किले में प्रवेश के लिए 20 रुपये का टिकट लेना पड़ता है। यह किला सैलानियों के लिए सातों दिन खुला रहता है।
vidyutp@gmail.com  
( REMEMBER IT IS A WORLD HERTAGE SITE, AGRA, RED FORT, BADALGARH, TAJ MAHAL, HUMAUN) 


Monday, December 14, 2015

तेलंगाना के जंगलों से होकर दूरंतो से दिल्ली...

हैदराबाद से दिल्ली का सफर न जाने कितनी बार किया है। पर खास तौर पर हैदराबाद शहर से ट्रेन के बाहर निकलने के बाद महाराष्ट्र में प्रवेश करने तक के कुछ घंटे निहायत सुहाने लगते हैं। क्योंकि इस दौरान ट्रेन तेलंगाना राज्य के कई जिलों से होकर गुजरती है। आबादी कम नजर आती हैं। मस्ती में बातें करते जंगल ज्यादा नजर आते हैं।
हैदाराबाद से काजीपेट तक का रास्ता मैदान और पहाड़ का मिलाजुला रूप नजर आता है। पर इसके बाद वन क्षेत्र की शुरुआत हो जाती है। कभी ये सारा इलाका आंध्र प्रदेश का हिस्सा था पर अब सब कुछ वैसा ही है पर राज्य के एपी की जगह तेलंगाना हो गया है। काजीपेट वारंगल शहर का बाहरी हिस्सा है। यहां से हैदराबाद के लिए रेलवे लाइन अलग हो जाती है। अगर आप दिल्ली की तरफ से हैदराबाद के लिए जा रहे हैं तो रेल वारंगल शहर से पहले काजीपेट जंक्शन से मार्ग बदल कर आगे बढ़ जाती है।
रामागुंडम - एनटीपीसी का सुपर थर्मल पावर स्टेशन  ( सौ- एनटीपीसी) 

ट्रेन आगे बढ़ती है और आता है रामागुंडम रेलवे स्टेशन। यह तेलंगाना के करीमनगर जिले में आता है। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म का उदघोषणा हो रही है, रामागुंडम रेलवे स्टेशन वेलकम्स यू... यह तेलंगाना राज्य आबादी में पांचवा बड़ा शहर है। गोदावरी नदी के तट पर बसे इस शहर में एनटीपीसी का थर्मल पावर स्टेशन भी है। इसकी उत्पादन क्षमता 2600 मेगावाट है। यह एक सुपर थर्मल पावर स्टेशन है, जहां कोयला, हाइड्रो, गैस और नवीकरणीय ऊर्जा यानी चार तरीके से बिजली बनाई जाती है।

रामागुंडम से 14 किलोमीटर आगे आता है मंचरियाल। यह आदिलाबाद जिले में पड़ता है। यह भी गोदावरी नदी के तट पर दूसरी तरफ है। मंचरियाल से कोई 20  किलोमीटर आगे आता है बेलामपल्ली। बेलामपल्ली में कोयले की खाने हैं। इसके बाद 40 किलोमीटर बाद आता है सिरपुर कागजनगर। सिरपुर आदिलाबाद जिला में पड़ता है। कागज नगर नाम इसलिए हैं क्योंकि यहां पेपर मिल है। सिरपुर पेपर मिल्स को 1942 हैदराबाद के निजाम ने शुरू किया था। इससे साबित होता है कि निजाम राजकाज के साथ व्यापार में हाथ आजमा रहे थे। सिरपुर के बाद ट्रेन तेलंगाना के घने जंगलों के बीच दौड़ती है।

वर्धा नदी के पुल से हैदराबाद में घुसी थी भारतीय सेना
छोटे से स्टेशन मकुदी से महाराष्ट्र राज्य आरंभ हो जाता है। इन्ही घने जंगलों के बीच विरूर रेलवे स्टेशन आता है। विरूर महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में पड़ता है। इसके बाद आता है विहिरगांव। यहां भी दोनों तरफ घने जंगल दिखाई देते हैं। इसके बाद आता है मानिकगढ़। चंद्रपुर जिले में स्थित मानिकगढ़ में सीमेंट और कपड़े के उद्योग हैं।

मानिकगढ़ के पास वर्धा नदी पर पुल आता है और ट्रेन महाराष्ट्र में प्रवेश कर जाती है। इसी वर्धा नदी के पुल से होकर भारतीय सेना ने आंध्र प्रदेश में 13 और 14 सितंबर के मध्य 1948 में प्रवेश किया था और निजाम की फौज से लोहा लिया था। इस पुल को पार कर सेना आदिलाबाद जिले में पहुंची जो तब हैदराबाद का हिस्सा था। पुराना रेल पुल एकमात्र जरिया था हैदराबाद प्रांत में प्रवेश करने का। हालांकि तब निजाम की ओर से इस पुल के नीचे विस्फोटक लगाए गए थे, जैसे ही भारतीय सेना पुल पर पहुंचे पुल को उड़ा दिया जाए। पर जिस इंजीनियर की पुल उडाने के लिए ड्यूटी लगी थी उसे कोई आदेश नहीं मिला निजाम की ओर से। यह संचार में असफलता थी और सेना सफलतापूर्वक हैदराबाद प्रांत में घुस गई। एक तरह से हम मानें तो वर्धा नदी का यह पुल केंद्रीय भारत और दक्षिण भारत की सीमा रेखा है।
इसके बाद आता है बड़ा स्टेशन बल्लारशाह। बल्लारशाह महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में पड़ता है। मिनी इंडिया कहलाता है। पेपर मिल है। बल्लारपुर इंडस्ट्रीज लिमिटेड। सबसे बडा राइटिंग और प्रिंटिंग पेपर बनाने वाला मिल। थापर समूह का मिल है ये । ये वर्धा नदी के किनारे है। पहले सिरपुर राजधानी थी बल्लारदेव की। बल्लार ने राजधानी परिवर्तन कर  बल्लारशाह नगर बसाया। वैसे बल्लारशाह में कुल 9 कोलफील्ड की ईकाइयां हैं।
-vidyutp@gmail.com
(KAZIPET, WARANGAL, WARDHA RIVER, BALLARSHAH, RAMAGUNDAM, CHANDRAPUR, ADILABAD, SIRPUR KAGAZ NAGAR, PAPER MILL) 


Sunday, December 13, 2015

कराची बेकरी – अंडा रहित बिस्कुट का स्वाद

हैदराबाद के एबिड्स चौराहे पर आते जाते कराची बेकरी का विशाल बोर्ड नजर आता है। यह शहर की बहुत ही पुरानी और प्रसिद्ध बेकरी है। पुरानी विरासत के साथ अब यह बेकरी अपना विस्तार कर रही है। अब कंपनी ने दिलसुख नगर रोड पर अपना ब्रांच खोला है। यही नहीं कराची बेकरी ने बनजारा हिल्स, चिकडपल्ली, नामपल्ली, हाईटेक सिटी, खारखाना (सिकंदराबाद) आदि में भी अपनी शाखाएं खोल ली हैं।

आमतौर पर आप जो भी बिस्कुट खाते हैं उसमें इस बात की गारंटी नहीं होती कि वह अंडा रहित है। पर कुछ कंपनियां हैंडमेड और एगलेस बिस्कुट बनाती हैं। दिल्ली में इस तरह की फ्रंटियर बिस्कुट कंपनी प्रसिद्ध है। हैदराबाद की कराची बेकरी भी इसी तरह की कंपनी है जो अंडा रहित बिस्कुट का निर्माण करती है। कराची बेकरी में अब दर्जनों तरह के स्वाद वाले बिस्कुट आपको विकल्प के तौर पर मिल सकते हैं। ये मिठाई की डिब्बों की तरह पैकिंग में होते हैं। इन्हे आप किसी के घर जाते वक्त उपहार में भी ले जाकर दे सकते हैं। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ जब हमारी ट्रेन सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन से खुलने वाली थी तो स्टेशन पर कराची बेकरी के बिस्कुट के पैकैट बेचते हुए वेंडर मिले। हमारे सहयात्रियों उनसे पैकेट खरीदे भी। अगर आप  कराची बेकरी के पास से गुजरें तो उनका चोको नट्स बिस्कुट का स्वाद जरूर लें।

कराची बेकरी की शुरुआत 1953 में हुई थी। इसका नाम कराची शहर पर क्यों रखा गया। दरअसल इसके संस्थापक कराची से आए थे। खानचंद रामनानी सिंध से आए थे। लिहाजा अपनी पुरानी यादों को इस नाम के साथ जोडा। अब कराची बेकरी न सिर्फ हैदराबाद का बल्कि उसके बाहर भी सम्मानित नाम बन चुका है। इनकी सिंधी नानखटाई और उस्मानिया बिस्कुट के दीवाने हैदराबाद में बड़ी संख्या में हैं। 

दिलखुश फ्रूट बिस्कुट- कराची बेकरी खास तौर पर अपने दिलखुश फ्रूट बेकरी और प्लम केक के लिए जाना जाता है। यही नहीं आप कराची बेकरी से अपनी पसंद का एगलेस बर्थडे केक भी बनवा सकते हैं। कंपनी बेकरी के अलावा स्नैक्स, पेस्ट्रीज और चाकलेट्स, मिठाई और रस्क भी भी बनाने लगी है। खासतौर पर उनका लहसुन के स्वाद वाला गारलिक रस्क लोगों में लोकप्रिय है। कंपनी का फलसफा का है कि गुणवत्ता के कारण कोई समझौता नहीं करना। इसलिए कराची बेकरी हैदराबाद के कई पीढ़ियों के बीच पसंदीदा नाम है।


( http://www.karachibakery.com/)
(KARACHI, BAKERY, BISCUIT, EGGLESS SINDHI, HYDRABAD )


Saturday, December 12, 2015

यदाद्रि के बाला जी – श्रीलक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी

आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद 2014 में तेलंगाना नया राज्य बना। पर देश का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध तिरूपति बाला जी का मंदिर अब आंध्र प्रदेश में रह गया। तब तेलंगाना सरकार ने हैदराबाद से 62 किलोमीटर दूरी पर स्थित यदाद्रि के विष्णु मंदिर को भव्य रूप प्रदान करने का संकल्प लिया है। मंदिर का नाम श्री लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी वारी देवस्थानम है। मंदिर का पुराना नाम यादगिरी गट्टा था पर अब इसे छोटे नाम यदाद्रि के नाम से जाना जाता है। यहां विष्णु का मंदिर पहाड़ियों पर स्थित है। खास तौर पर रात में मंदिर क्षेत्र की खूबसूरती देखते ही बनती है। 

पंच नरसिम्हा क्षेत्रम-  कहा जाता है कि यदाद्रि में विष्णु पांच रुपों में अवतरित हुए हैं। ज्वाला नरसिम्हा, योगानंदा नरसिम्हा, गंधर्वनंदा नरसिम्हा, उग्र नरसिम्हा और लक्ष्मीनरसिम्हा उनके रूप हैं। इसलिए यदाद्रि को पंच नरसिम्हा क्षेत्रम भी कहा जाता है। इस मंदिर की कथा स्कंद पुराण में आती है। । कहा जाता है कि यादगिरी की पहाड़ियां कभी ऋषियों की तपस्थली रही है। आज भी यहां जिस तरह की शांति और सौंदर्य दिखाई देता है उसे देखकर लगता है कि ये स्थल तपस्वियों के लिए पसंदीदा रहा होगा। यदाद्रि मंदिर का गोपुरम विशाल है। मुख्य मंदिर गुफा में है। मंदिर में विष्णु का सुदर्शन चक्र सोने का बना है।  


रोग दुख होते हैं दूर - कहा जाता है कि कभी विष्णु ने यहां वैद्य नरसिम्हा का रूप लिया और तमाम श्रद्धालुओं को रोग दुख को दूर किया। आज भी आस्था है कि इनके दर्शन मात्र से रोग-दुख दूर होते हैं। यहां सारा उपचार फूल, फल और तुलसी तीर्थम से होता है। आज भी श्रद्धालु अपने रोग दूर करने के लिए मंडल ( 40 दिनों की प्रदक्षिणा) करते हैं। मंदिर की भव्यता 6 किलोमीटर दूर से ही दिखाई देती है। साल 2015 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी में यदाद्रि मंदिर में दर्शन के लिए आए थे।

मंदिर में हर साल 11 दिनों का ब्रह्मोत्सवम मनाया जाता है जो मंदिर का मुख्य त्योहार है। रविवार और छुट्टियों के दिन मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है। तेलंगाना  के मुख्य मंत्री के चंद्रशेखर राव ने मंदिर को भव्य रूप प्रदान करने के लिए इसके बाहरी ले आउट में बड़ा बदलाव लाने की योजना बनाई है जिसे कार्यरूप दिया जा रहा है। यदाद्रि मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर पुराना नरसिंहमा स्वामी मंदिर भी स्थित है।

दर्शन समय - मंदिर में पूजा सुबह 4 बजे से ही आरंभ हो जाती है। आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन सुबह 7.15 बजे से आरंभ होता है। दोपहर में 3 से 4 बजे तक मंदिर के द्वार बंद रहते हैं। शाम 4 से 5 बजे विशिष्ट दर्शन का समय है। दोपहर के बाद शाम 5 बजे से आम लोगों के लिए दर्शन आरंभ होता है। यहां आप रात्रि 9.45 बजे तक दर्शन कर सकते हैं। अतिशीघ्र दर्शन के लिए 100 रुपये का टिकट है जिसमें आपको दो लड्डू प्रसादम भी प्राप्त होता है।

कैसे पहुंचे - यदाद्रि मंदिर हैदराबाद से काजीपेट रेल मार्ग पर हैदराबाद से 62 किलोमीटर की दूरी है। यह नलगोंडा जिले में पड़ता है। आप हैदराबाद से लोकल ट्रेन से आकर रायगीर ( RAG) या भुवनगिरी (BG)  रेलवे स्टेशन उतर सकते हैं। रायगीर से मंदिर की दूरी 6 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से स्थानीय वाहन उपलब्ध रहते हैं। सिकंदराबाद जंक्शन से 10.05 पर चलने वाली वारंगल मेमू 11.15 बजे रायगीर पहुंचती है। वैसे हैदराबाद से सीधे बस से भी यदाद्रि मंदिर पहुंचा जा सकता है। अगर आप वारंगल काजीपेट की तरफ से जा रहे हैं तो मंदिर पहुंचने के लिए भुवनगिरी या रायगीर रेलवे स्टेशन पर उतरें।


Friday, December 11, 2015

हैदराबाद का बिरला मंदिर

हैदराबाद शहर के बीचों बीच स्थित है संगमरमर से बना विशाल वेंकटेश्वर मंदिर जिसे लोग बिरला मंदिर के नाम से भी जानते हैं। हैदराबाद के स्थानीय लोगों के बीच ये मंदिर आस्था का केंद्र है। देश भर में कई प्रमुख शहरों में बिरला परिवार द्वारा बनवाए गए मंदिर हैं जिन्हें लोग बिरला मंदिर के नाम से जानते हैं।

 हैदराबाद का ये बिरला मंदिर 1976 में बनकर तैयार हुआ। यह हैदराबाद शहर के बीच 280 फीट ऊंचे नौबत पहाड़ पर बना हुआ है। मंदिर 13 एकड़ में विस्तारित है। इसके निर्माण में दस साल लगे। रामकृष्ण मिशन के स्वामी रंगनाथ नंद की इस मंदिर के निर्माण में बड़ी भूमिका थी। पहाड़ पर बना ये मंदिर अपन सौंदर्य में अद्भुत नजर आता है। खास तौर पर रात में इसका सौंदर्य और भी बढ़ जाता है। एक बार मंदिर में पहुंच जाने के बाद तो यहां से यानी इसके परिसर से बाहर  निकलने की इच्छा ही नहीं होती। मंदिर के चारों तरफ बने गलियारे से हैदराबाद शहर का बड़ा ही सुंदर नजारा दिखाई देता है। ऐसा लगता है इसे घंटों निहारते रहें। 

मंदिर के निर्माण में द्रविड़, उत्कल और राजस्थानी शैली का मिल जुला रूप देखने को मिलता है। इसके निर्माण में तकरीबन 2000 टन सफेद संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है। इसलिए मंदिर दूर से भी काफी भव्य दिखाई देता है।  मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर की 11 फीट ऊंची प्रतिमा है। प्रतिमा के ऊपर एक सुंदर सी छतरी है। परंपरागत मंदिरों की तरह यहां घंटियां नहीं लगाई हैं।
इस  मंदिर के निर्माण में लगे स्वामी रंगनाथ आनंद चाहते थे कि यह जगह बिल्कुल शांत हो जहां बैठकर लोग ध्यान कर सकें। मंदिर परिसर में विष्णु की पत्नी पद्मावती का भी मंदिर है। इसके अलावा मंदिर परिसर में शिव, शक्ति, गणेश, सरस्वती, ब्रह्मा, लक्ष्मी आदि की भी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। मंदिर की दीवारों पर गुरबाणी का पाठ भी लिखा गया है। ये मंदिर जाति भेद से ऊपर सबके लिए खुला है।


बिरला मंदिर सुबह 7 बजे दर्शन के लिए खुलता है। यह दोपहर 12 बजे बंद हो जाता है। फिर यह दोपहर दो बजे खुलता है और रात्रि नौ बजे तक खुला रहता है। मंदिर में तिरूपति बालाजी की तर्ज पर प्रसाद में लड्डू मिलता है। इसे आप क्रय कर सकते हैं।

मंदिर परिसर से आप हैदराबाद शहर का नजारा कर सकते हैं। खास तौर पर यहां से हुसैन सागर झील का सुंदर नजारा दिखाई देता है। मंदिर के पास बीएम बिरला प्लेटेनोरियम, बीएम बिरला साइंस म्युजियम, जीपी बिरला आब्जरवेटरी और निर्मला बिरला गैलरी आफ मार्डन आर्ट भी स्थित है। इन सबके लिए अलग अलग टिकट है। 

परिसर को बडे ही सुंदरता से सजाया गया है। हैदराबाद शहर के छुट्टियों के दिन घूमने आते हैं। आध्यात्मिक सुख के साथ यहां ज्ञान वर्धन और मनोरंजन भी हो जाता है। 2003 में शुरू हुए मार्डन आर्ट गैलरी में देश के जाने माने कलाकारों जैसे जेमिनी राय और तैयब मेहता की कृतियां देखी जा सकती हैं।

कैसे पहुंचे – लोकल ट्रेन के रेलवे स्टेशन लकड़ी का पुल से मंदिर काफी नजदीक है। नेकलेस रोड की ओर जाने वाली सड़क पर रिजर्व बैंक के बगल वाली गली से आप बिरला मंदिर पहुंच सकतेहैं। मंदिर के पास निजी वाहनों की पार्किंग का इंतजाम है। 


Thursday, December 10, 2015

हैदराबाद का लकड़ी का पुल

लकड़ी का पुल हैदराबाद। नाम सुन कर कुछ रोमांच होता है। पर यहां कहीं लकड़ी का पुल दिखाई नहीं देता। रहा जरूर होगा।तभी तो नाम है। अब इस नाम का एक लोकल रेलवे स्टेशन भी है। लकड़ी का पुल ( स्टेशन कोड -LKPL)। हैदराबाद से सिकंदराबाद रेल मार्ग पर 1.30 किलोमीटर की दूरी पर लकड़ी का पुल रेलवे स्टेशन आता है।  तो इसके अंग्रेजी अनुवाद पर वुडब्रिज ग्रैंड नामक होटल भी है। पर जनाब लकडी का पुल हैदराबाद का दिल है। इसके आसपास हैदराबाद की प्रमुख बाजार हैं। हैदराबाद का मुख्य स्टेशन हैदराबाद जंक्शन यानी नामपल्ली भी इसके पास ही है।
 अब तेलंगाना राज्य का विधानसभा भवन भी लकड़ी के पुल के पास है। इस इलाके में कभी हैदराबाद का ब्रांड समझा जाने वाला कामत होटल भी है। किसी जमाने में लुधियाना रेलवे स्टेशन के पास भी एक लकड़ी का पुल हुआ करता था। वास्तव में यह रेलवे लाइन को पैदल पार करने के लिए फुट ओवर ब्रिज था जो लकड़ी का बना था। कुछ ऐसी ही कहानी हैदराबाद के लकड़ी के पुल के साथ भी हो सकती है। अब लकड़ी का पुल इलाके में कई प्रमुख होटल हैं। हैदराबाद जंक्शन और विधान सभा समेत तमाम सरकारी दफ्तरों से निकट होने के कारण लकड़ी का पुल बाहर से आने वालों के लिओ लोकप्रिय आवासीय स्थल है।

निजामी शान का नमूना है मोजम जाही मार्केट
मोजम जाही मार्केट हैदराबाद के नवाबों की याद दिलाता है।  बाजार की इमारत को देखकर राजसी ठाठ का एहसास होता है। एबिड्स के पास स्थित मोजमजाही मार्केट हैदराबाद के अति प्राचीन बाजारों में से है। इस बाजार का निर्माण आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान के समय हुआ था। 1935 में बने इस बाजार की दुकानें पत्थरों की हैं। दूर से देखने में ये बाजार किसी महल सा ही लगता है। बाजार का नाम निजाम के दूसरे बेटे मोजम जाह के नाम पर पड़ा। जाम बाग फूल बाजार इस बाजार का हिस्सा है। 
वैसे मोजमजाही मार्केट मूल रूप से फलों का बाजार है। किसी समय में यहां बड़ा फलों का बाजार हुआ करता था। बाद में 1980 में फ्रूट मार्केट को कोतापेट में शिफ्ट कर दिया गया लेकिन अभी भी मोजमजाही मार्केट में फलों की दुकानें हैं। 

मार्केट के बीचों बीच एक टावर बना है जिसमे घड़ियां लगी हैं। दूर से यह कुछ घंटाघर जैसा दिखाई देता है। नामपल्ली जाने वाली तमाम बसें मोजमजाही मार्केट से होकर गुजरती हैं। इसके पास ही हैदराबाद का मुख्य पोस्ट आफिस है जिसके बाहर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की कबूतर उड़ाती हुई प्रतिमा लगी है।   


पांच रुपये में चावल दाल –

तमिलनाडु सरकार से प्रेरणा लेकर तेलंगाना सरकार ने गरीबों के लिए पांच रुपये में चावल सांभर का स्टाल आरंभ किया है। इस स्टाल पर कागज की प्लेट में महज पांच रुपये में चावल सांभर और उसके साथ मिर्च दिया जाता है। पर खाना वितरण का समय तय है। दोपहर 12 बजे से 1 बजे के बीच। ऐसे खाने का स्टाल मुझे हैदराबाद में ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसपल काउंसिल के दफ्तर के पास चौराहे पर दिखाई देता है। तो इसी तरह का स्टाल सिकंदराबाद में भी देखने को मिलता है। 
vidyutp@gmail.com 

(HYDRABAD, LAKDI KA PUL, MOJAMJAHI MARKET, NAMPALLI STN)