Monday, November 30, 2015

महाबलीपुरम - यहां पत्थर बोलते हैं…

महाबलीपुरम शहर में आप जहां भी घूमें हर गली और नुक्कड़ पर मूर्तियों की दुकानें नजर आती है। नन्ही मूर्तियों से लेकर विशालकाय मूर्तियां तक। ये मूर्तियां यहीं के मूर्तिकार बनाते हैं। कई दुकानों पर तो मूर्तिकार आपको काम करते हुए दिखाई दे जाते हैं। अहले सुबह सूरज उगने के साथ काम शुरू होता है, देर रात तक छेनी हथौड़ी पर काम चलता रहता है।

महाबलीपुरम के मूर्तिकारों द्वारा बनाई गई गौतम बुद्ध की एक दर्जन से ज्यादा भाव भंगिमाओं में मूर्तियां देखने को मिलती हैं। बुद्ध के सिर्फ चेहरे वाली कई किस्म की मूर्तियां दिखाई देती हैं। तो बैठे हुए बुद्ध की भी मूर्तियां यहां के कलाकार सृजित करते हैं। कई जगह पर कलाकारों ने लेटे हुए बुद्ध की विशाल प्रतिमा बनाई है। बुद्ध मूर्तियों की देश भर में मांग तो रहती है। साथ ही उनकी मूर्तियां की मांग विदेश में भी है। यहां कलाकार 5 हजार से लेकर 30 लाख रुपये तक की बुद्ध मूर्तियां बनाते हैं।

सिर्फ बुद्ध ही क्यों महाबलीपुरम के कलाकारों ने माखनचोर कृष्णा और गणेश की अनगिनत भाव भंगिमाओं में मूर्तियां बनाई हैं। लंबोदर गणेश उनका प्रिय विषय है। इसके बाद शिव विष्णु और लक्ष्मी की भी प्रतिमाएं आपको तैयार अवस्था में यहां मिल जाएंगी।
 इससे आगे स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानियों में गांधी सबसे लोकप्रिय चेहरा है। गांधी के बाद नेहरू, शास्त्री और बाबा साहेब अंबेडकर की भी मूर्तियां यहां दिखाई देती हैं। आप वैसे चाहें तो महाबलीपुरम के कलाकारों से किसी भी मूर्ति आर्डर देकर तैयार करा सकते हैं।



हमने कुछ छोटी मूर्तियों के दाम पूछे पांच हजार से लेकर 30 हजार तक की मूर्तियां थीं। जब उनसे ले जाने के तरीके के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि आप अपना पता दे दीजिए मूर्तियां ट्रांसपोर्ट से सुरक्षित आपके घर तक पहुंच जाएंगी। हां ट्रांसपोर्ट का खर्च आपको स्वंय वहन करना पड़ेगा। कलाकारों के पास मूर्तियों को दुनिया भर में कहीं भी भेजवाने का इंतजाम है।


महाबलीपुरम के ये कलाकार किसी कला या शिल्प महाविद्यालय से पढ़ाई करके नहीं आए हैं। बल्कि ये इनका खानदारी पेशा है। संभवतः पल्लव काल से ही कलाकार यहां मूर्तियां बनाते आ रहे हैं। 1957 में यहां गवर्नमेंट कालेज ऑफ आर्किटेक्टर एंड स्कल्पचर की स्थापना की गई। यहां चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम (बीएफए) चलाया जाता है। 2001 में यहां परंपरागत कला में बीटेक पाठ्यक्रम भी आरंभ किया गया। इस कालेज से नए जमाने के कलाकार निकल रहे हैं। पर कला तो महाबलीपुरम के लोगों के रग रग में सदियों से बसा हुआ है।


-vidyutp@gmail.com






Sunday, November 29, 2015

महाबलीपुरम का मुकुंद नयनार मंदिर

हमें महाबलीपुरम के बाईपास पर मुकुंद नयनार मंदिर नजर आता है। यह भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित स्मारक की श्रेणी में आने वाला मंदिर है। मंदिर पंचरथ मंदिर के धर्मराज रथ की तरह देखने में नजर आता है। लंबे समय तक यह मंदिर 12 फीट नीचे दबा हुआ था। यह पल्लव राजा राजसिम्हा के समय का माना जाता है। हालांकि मुकुंद नयनार मंदिर को देखने कम ही सैलानी पहुंचते हैं।
63 नयनार हैं तमिल भक्ति आंदोलन में 
तमिल भक्ति आंदोलन में 63 नयनारों की संकल्पना है। ये नयनार शिव के भक्त हुआ करते थे। आमतौर पर ये दलित जाति से आते थे। नयनारों का उद्भव मध्यकाल में मुख्यतः दक्षिण भारत के तमिलनाडु में ही माना जाता है।
कुल 63 नयनारों ने शैव सिद्धान्तो के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी प्रकार विष्णु के भक्त सन्तों को आलवार कहते हैं। सभी नायनारों की गिनती मुक्तात्मा में होती है। इनकी मूर्तियां तमिलनाडु के कई मंदिरों मे स्थापित की गई है और इनकी पूजा भगवान के समान ही की जाती है। हमने इससे पहले चेन्नई के कपालेश्वर मंदिर में 63 नयनारों की प्रतिमा देखी थी।

42 मीटर ऊंचा लाइट हाउस - 
मामलापुरम बस स्टैंड से पंच रथ के रास्ते में महाबलीपुरम का लाइट हाउस भी पड़ता है। आप इस पर चढाई भी कर सकते हैं। इस 42 मीटर ऊंचे लाइट हाउस के लिए प्रवेश टिकट है। लाइट हाउस समुद्र में चलने वाले नाव और जहाज को रास्ता दिखाने के मकसद से बनाया जाता है। साल 2011 में इस सैलानियों के लिए खोला गया। 

साल 2001 में इसे लिट्टे की धमकी के बाद बंद कर दिया गया था। इसका निर्माण 1887 में हुआ था
, 1904 से यह लोगों को रास्ता दिखा रहा है। इसके बगल में ही 640 ई. में पल्लव राजा महेंद्र वर्मन द्वारा बनवाया गया लाइट हाउस देखा जा सकता है। सातवीं सदी में महाबलीपुरम व्यापार का बड़ा केंद्र और अति व्यस्त बंदरगाह हुआ करता था। तब इस लाइट हाउस की काफी अहमियत थी।

लाइट हाउस के उपर से पूरे महाबलीपुरम शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। हालांकि आप यहां ज्यादा देर तक नहीं रूक सकते। लाइट हाउस पर चढाई के लिए 10 रुपये का टिकट लेना पड़ता है।



टाइगर गुफाएं  यह महाबलीपुरम से 5 किलोमीटर दूर चेन्नई मार्ग पर स्थित है। पत्थरों को काटकर यहां बाघ की मुखाकृति बनाई गई है। इसका निर्माण भी आठवीं सदी में पल्लव राजाओं के काल में हुआ है। यहां पर एक विशाल मुक्ताकाश मंच (ओपन एयर थियेटर) बना हुआ है। यहां पर पल्लवकाल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। यहां जाने के लिए अलग से वाहन का इंतजाम आपको करना पडेगा।



समुद्र तटीय मंदिर देखने के बाद अनादि और माधवी थक गए थे वे चाहते थे आगे की स्थलों को देखने के लिए हम आटो रिक्शा बुक करें। पर मैं चाहता था कि हम पैदल ही सारे स्थलों का भ्रमण करें। बात आईसक्रीम और नारियल पानी के साथ बनी। दिन चढ़ने के साथ थोड़ी गर्मी बढ़ती जा रही थी। पर जब हम पैदल चलते हैं आसपास के स्थलों पर निगाह डालना बेहतर तरीके से होता है। इस दौरान हम कई ऐसी चीजें भी देख पाते हैं जो वाहन से चलते समय संभव नहीं है।  हर साल दिसंबर में तमिलनाडु टूरिज्म महाबलीपुरम डांस फेस्टिवल का आयोजन करता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के कलाकार प्रस्तुति देते हैं। बड़ी संख्या में तब सैलानी यहां पहुंचते हैं। इसके साथ ही वे नया साल भी यहीं मनाते हैं।
vidyutp@gmail.com
( LIGHT HOUSE, MAMALLAPURM) 

Saturday, November 28, 2015

हां, इतना बड़ा माखन कान्हा ने खाया...KRISHNA BUTTER BALL

अजूबा है कृष्णा बटर बॉल - अगर आप महाबलीपुरम में हैं तो कृष्णा बटर बॉल देखना न भूलें। वह दूर से ही देखकर एक अचरज जैसा लगता है। इसका रिश्ता जोड़ा जाता है नटवर नागर कान्हा से। कन्हैया ने कहा था... मैया मोरी मैंने ही माखन खायो। बार बार जसोदा के पूछने पर आखिर कान्हा को मानना ही पड़ा था कि माखन उन्होंने ही खाया। लेकिन आखिर कान्हा का माखन कितना बड़ा था। इसका जवाब मिलता है महाबलीपुरम में आकर। महाबलीपुरम के बस स्टैंड के पीछे की तरफ पहाड़ियों पर एक गोल सा पत्थर दिखाई देता है।

ये तकरीबन गोल दिखाई देने वाला पत्थर पहाड पर कैसे टिका हुआ है उसे देखकर कर अचरज होता है। दूर से देखकर तो ऐसा ही लगता है कि यह कभी भी लुढक जाएगा। पर यह अपनी जगह पर मजबूती से टिका हुआ है। इसे नाम दिया गया है कृष्णा बटर बॉल। यानी कान्हा का माखन।
इसे देख मेरे बेटे अनादि पूछ बैठते हैं क्या कान्हा जी इतना बड़ा माखन खाते थे। मैं कहता हूं वे भगवान थे उनकी हर लीला निराली है। हो सकता है वे इतने बड़े बड़े माखन खाते ही हों। उसका एक नमूना छोड़ गए हैं। पर ये भी कम अचरज की बात नहीं है कि यहां ढलान वाले पहाड़ पर ये गोल पत्थर कैसे टिका हुआ है।

बड़ी कोशिशें हुई, कोई इसे हिला नहीं सका -  कहा जाता है कि इतिहास में कई बार कृष्णा बटर बाल का राज जानने की कोशिश की गई। इसके लिए कुछ लोगों ने अलग अलग जुगत लगाकर इसे हिलाने की कोशिश की। एक बार तो 1908 में तत्कालीन गवर्नर आर्थर हैवलॉक ने सात हाथियों को लाकर  भी इस कृष्णा बटर बॉल को हिलाने की पूरी कोशिश करवाई। पर सात हाथी मिलकर भी इसे अपनी जगह से एक इंच भी इधर से उधर नहीं कर सके। कोशिश तो इससे पहले भी बहुत की गई थी। पल्लव राजा नरसिंह वर्मन ने भी अपने स्थान से इधर उधर करने की पूरी कोशिश करवाई थी।


तो ये है वंडर ऑफ इंडिया में से एक। महाबलीपुरम की तरफ आएं तो इसे जरूर देखें। हां आप चाहें तो एक कोशिश आप भी कर सकते हैं। इसे हिलाकर भी देख सकते हैं। पर आपको सफलता नहीं मिलेगी।

कुछ ऐसा है बटर बॉल - इस ग्रेनाइट पत्थर की ऊंचाई 6 मीटर और चौड़ाई 5 मीटर है। अनुमान लगाया जाता है कि इसका वजन 250 टन के आसपास होगा। पर यह महज 4 फीट के आधार पर टिका हुआ है। वह भी जहां यह टिका है वहां समतल पहाड़ नहीं है बल्कि ढालुआं है। यह 45 डिग्री के ढलान पर तना हुआ खड़ा है। तो है ना अचरज वाली बात।
दूर से देखने में यह भले ही गोल नजर आता है पर थोड़ा नजदीक जाएं तो अंडाकार नजर आता है। पर और करीब जाकर देखें तो यह कटे हुए नारियल सा भी नजर आता है। मतलब जिधर से भी देखिए कुछ अलग नजर आता है।

कैसे पहुंचे  बहुत आसान है जी, महाबलीपुरम बस स्टैंड से कृष्णा बटर बाल की दूरी आधा किलोमीटर है। स्थानीय लोगों से रास्ता पूछकर पैदल पैदल ही पहुंचा जा सकता है। आप चाहें तो पूरे महाबलीपुरम घूमने का पैकेज तय कर किसी आटो रिक्शा से भी यहां पहुंच सकते हैं।
-       विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KRISHNA BUTTER BALL, MAHABALIPURAM, TAMILNADU ) 



Friday, November 27, 2015

अदभुत हैं अर्जुन तप की गुफाएं और मूर्तियां

समुद्र तटीय मंदिर के बाद हमारा अगला पड़ाव है अर्जुन तप स्थली। महाबलीपुरम भ्रमण के दौरान अर्जुन तप स्थली की गुफाएं और उनमें बने भित्ति चित्र और मूर्तियां देखना न भूलें। यह महाबलीपुरम का बड़ा आकर्षण है। मामल्लापुरम के बस स्टैंड के ठीक पीछे की गुफाओं को अर्जुन तप के नाम से जाना जाता है। यहां पर चट्टानों से बनी अर्जुन की तपस्या करती हुई मूर्ति है। कहा जाता है अर्जुन ने दिव्य अस्त्र प्राप्त करने के लिए घनघोर तप किया था।

गंगा अवतरण का सुंदर नजारा - यहां पर पत्थरों पर उकेरी गई नक्काशी के जरिए भगवान शिव से जुड़ी गंगा के अवतरण की घटना को भी दर्शया गया है।  लेकिन इन सब के बीच सबसे सुंदर है गाय का दूध निकालती हुई मूर्ति। पास में उसका बछड़ा भी खड़ा दिखाई देता है।  





इन मूर्तियों को आप घंटों निहारते रह सकते हैं लेकिन आपका मन नहीं भरता। यहां कुल 100 से ज्यादा मूर्तियां गुफाओं को तराश कर बनी हैं। मूर्तियों की ज्यादातर कथाएं महाभारत काल की हैं। राजा भागीरथ के गंगा अवतरण का दृश्य भी यहां पत्थरों पर उकेरा गया है।

अनूठा है पंचरथ  महाबलीपुरम आने वाले सैलानी पंच रथ को जरूर देखने जाते हैं। यह बस स्टैंड से तकरीबन एक किलोमीटर की दूरी पर है। ये रथ पहाड़ी की चट्टानों को काट कर बनाया गए हैं। शिल्पियों ने चट्टान को भीतर और बाहर से काट कर पहाड़ से अलग कर दिया है। 

ये प्रसिद्ध रथ शहर के दक्षिणी सिरे पर है। पंच पांडवों के नाम पर इन रथों को पांडव रथ कहा जाता है। इन पांच रथों में से चार रथों को एकल चट्टान पर उकेरा गया है, जबकि द्रौपदी और अर्जुन रथ चौकोर है। इन सबके बीच धर्मराज युधिष्ठिर का रथ सबसे ऊंचा है।

महिषासुर मर्दिनी गुफाएं  अर्जुन तप से एक किलोमीटर की दूरी पर पंच रथ स्थित है। लेकिन इसके रास्ते में महिषासुर मर्दिनी गुफाएं पड़ती हैं। इन गुफाओं में दुर्गा की महिषासुर को वध करते हुए प्रतिमा बनी है। इसके अलावा यहां गुफाओं में कई और प्रतिमाएं हैं। इन गुफाओं की ओर जाते हुए हुए आप गर्मी में छाछ पीने और फल खाने का आनंद ले सकते हैं।

महाबलीपुरम - महिषासुर मर्दिनी गुफाओं की कलाकृतियां। 
सी सेल म्युजियम - आजकल पंच रथ के पास ही सी सेल म्जुयिम बन गया है। लोग इसे भी देखने जाते हैं। इसका टिकट 100 रुपये प्रति व्यक्ति है। यहां जलीय जीवन की अच्छी जानकारी मिलती है। यह एक निजी संग्रहालय है, पर देखने योग्य है। यहां आप मोतियों के विकास की वैज्ञानिक कहानी जान सकते हैं। यहां सबसे छोटा और सबसे बड़ा सेल देखा जा सकता है।


महाबलीपुरम - महिषासुर मर्दिनी गुफाओं की कलाकृतियां। 

Thursday, November 26, 2015

देश के सात अजूबों में एक समुद्र तटीय मंदिर

समुद्र तटीय मंदिर तमिलनाडु के महाबलीपुरम  का सबसे खास आकर्षण है। इसे देश के सात अजूबों में गिना जाता है। साथ ही यूनेस्को द्वारा विश्वदाय स्मारकों की सूची में भी 1984 से ही शामिल है। समुद्र तटीय मंदिर को दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। यह आठवीं शताब्दी में निर्मित है और वास्तुकला की दृष्टि से भी अद्भुत है। वास्तव में ये स्थान पल्लव नरेशों की शिल्प साधना का अमर स्मारक है। यहां समुद्र तट पर द्रविड़ वास्तुकला के आधार पर यहां तीन मंदिर बनाए गए हैं। केंद्र में भगवान विष्णु का मंदिर हैजबकि उसके दोनों ओर शिव मंदिर हैं।

दो सौ साल पहले तक समुद्र तटीय मंदिर अनजाना था। पिछली शताब्‍दी में लगातार रेत हटने से समुद्र तटीय मंदिर के आस –पास की जमीन में दबी अनेक संरचनाएं सामने आईं। इन सब में आरंभिक पल्‍लव काल की सीढ़ीदार संरचना सबसे अनूठी है जो लगभग 200  मीटर लंबी है। इस विशाल इमारत का ठीक –ठीक प्रयोजन क्‍या थायह अभी पता नहीं है। इसकी सीढि़यां ग्रेनाइट स्‍लैबों से निर्मित है।


महाबलीपुरम - विशाल शिवलिंगम। 
साल 1990 में अकस्‍मात खोजी गई भूवराह मूर्ति , लघु मंदिर और कुआं पल्‍लव नरेश नरसिंह वर्मन ( 638 से 660  ई.) के शासन काल के हैं। ये राजसिम्हा ( 700 से 728 ई.) के शासन काल में निर्मित एक बड़े गोलाकार अहाते से घिरे हैं। इनको अनगढ़ आधार शैल पर तराशा गया है। यहां विष्‍णु जी लेटी हुई मुद्रा में विराजमान  हैं। शिव को समर्पित लघु मंदिर पत्थरों से तराश कर बनाया गया है। इसका शिल्‍प अनूठा है। मंदिर में विशाल शिवलिंग देखा जा सकता है।

मंदिर के आधार पर पल्‍लव शासक राजसिम्हा का नाम खुदा है। चारों तरफ दीवार का निर्माण संभवत: इसलिए किया गया था कि अंदर रेत न आ पाए। पश्चिमी मंदिर में एक बाह्य दीवार है और एक साधारण गोपुरम है। बीच में विश्राम मुद्रा में लेटे विष्‍णु का एक आरंभिक मंदिर है। इन सभी मंदिरों के नाम राजसिम्‍हा के विभिन्‍न उपनामों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं।


प्रवेश शुल्क :  समुद्र तटीय मंदिर और पंच रथ मंदिर के लिए भारतीय नागरिक और सार्क और बिमस्टेक देशों के पर्यटक- 10 रूपये प्रति व्यक्ति  है। अन्य देशों के लिए 250- रूपये प्रति व्यक्ति शुल्क है।  15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश शुल्क नहीं है। एक स्‍मारक पर खरीदा गया टिकट अन्‍य स्‍मारकों पर भी वैध है। छोटी पहाड़ी पर स्थित शेष स्‍मारकों तथा अन्‍य स्‍थानों पर प्रवेश शुल्‍क नहीं है। स्टिल फोटोग्राफी के लिए कोई शुल्‍क नहीं है। यहां सुबह 6 बजे से शाम 5.30 बजे तक जाया जा सकता है।

कैसे पहुंचे - महाबलीपुरम बस स्टैंड से समुद्र तटीय मंदिर की दूरी आधा किलोमीटर है। मंदिर के बगल में बालु के मैदान पर चौपाटी नुमा बाजार लगा रहता है। यहां आप घुड़सवारी का आनंद ले सकते हैं। समुद्री चीजों की खरीददारी कर सकते हैं। यहां समुद्र तट पर तमिल संत तिरूवल्लुर की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। यहां काफी लोग समुद्र तट पर स्नान करते दिखाई देती है। समुद्र तट काफी सुंदर है, पर स्नान करना खतरनाक है।


( Remember-  It is a UNESCO World Heritage Site )

http://whc.unesco.org/en/list/249/video
समुद्र तटीय मंदिर का विंहगम नजारा  ( विश्व धरोहर 1984 से ) 

( MAHABALIPURAM, SEA SHORE TEMPLA, CHOLA KING ) 

Wednesday, November 25, 2015

मनमोहक महाबलीपुरम की ओर

दिन भर गोल्डेन बीच पर मस्ती करके हम थक चुके थे। बाहर निकल कर क्लाक रूम से अपना सामान रीलिज कराया और बस स्टाप पर आकर बैठ गए। ईस्ट कोस्ट रोड पर गोल्डेन बीच के प्रवेश द्वार के पास ही बस स्टैंड है। हमारे साथ कुछ विदेशी सैलानी भी महाबलीपुरम के लिए बस का इंतजार कर रहे थे। लोगों ने बताया कि 599 नंबर की बस आएगी वह महाबलीपुरम तक जाएगी।

थोड़े इंतजार के बाद 599 नंबर की बस आ गई। हमें बस में जगह भी मिल गई। कोई 35 किलोमीटर यानी एक घंटे का रास्ता था। शाम गहराने लगी थी। बस ईस्ट कोस्ट रोड पर कुलांचे भर रही थी। हमें पता चला कि चेन्नई के हर इलाके से सिटी बसें महाबलीपुरम तक जाती हैं। अंधेरा होने के कारण ईस्ट कोस्ट रोड का सौंदर्य ज्यादा दिखाई नहीं दे पा रहा था।
मामल्लापुरम बस स्टैंड के पास विशाल रथ।

रास्ते में क्विलोन नामक एक छोटा सा शहर आया। छोटे से इस शहर में बस मुख्य सड़क से अंदर बस स्टैंड तक गई। फिर बाहर आई और ईस्ट कोस्ट रोड पर दौड़ने लगी। थोड़ी देर में बस महाबलीपुरम शहर में प्रवेश कर गई। ईस्ट कोस्ट रोड के बाईपास से तकरीबन तीन किलोमीटर चलने के बाद बस स्टैंड पहुंच गई। बस से उतरने के बाद हमने अपने होटल का रास्ता पूछा। विनोधरा गेस्ट हाउस के लिए हमें वापस उसी रास्ते पर पैदल लौटना पड़ा जिधर से बस आई थी। ये होटल हमने www.goibibo.com से बुक किया था। मध्यमवर्गीय गेस्ट हाउस में विदेशी सैलानी भी खूब ठहरते हैं। फ्री वाईफाई की सुविधा है। नीचे एक रेस्टोरेंट भी है, पर थोड़ा महंगा है। बाजार में चहल पहल थी। महाबलीपुरम में सालों भर विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में दिखाई दे जाते हैं।

महबलीपुरम दूसरी बार पहुंचा हूं। इससे पहले 1992 के जनवरी में आना हुआ था। तब दोस्त साथ थे। महाबलीपुरम पहुंच कर पुरानी यादें ताजा हो गई हैं। 
राजस्थान के पुष्कर की तरह दक्षिण का ये शहर विदेशी सैलानियों की खास पसंद है। चेन्नई की तुलना में यहां का वातावरण खुशनुमा रहता है। इसलिए महाबलीपुरम के होटल सालों भर भरे रहते हैं। यहां तमाम रेस्टोरेंट ऐसे हैं जो विदेशी सैलानियों की पसंद के मुताबिक खाना परोसते हैं। शहर की चहल पहल देखते हुए हम अपने होटल के सामने थे।

चेक इन की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अपने कमरे में पहुंच गए। अब पेट पूजा करने की इच्छा हुई। बाहर निकले। हमारे होटल में भी रेस्टोरेंट था पर वह विदेशी सैलानियों से गुलजार था। हमें वहां का मीनू कुछ खास पसंद नहीं आया। सो हम आगे निकल पड़े। पास में एक तमिल मंदिर था। मंदिर खूब सजा हुआ था। वहां पूजा पाठ जारी था। आसपास के सैकड़ो लोग सपरिवार जुटे थे। मंदिर में मत्था टेककर हम आगे बढ़ गए।

 रात घिर आने के महाबलीपुरम का कोई स्थल भ्रमण नहीं किया जा सकता था। इसके लिए सुबह का समय ही मुफीद है। लेकिन शहर की दुकानें रात को 10 बजे तक खुली रहती हैं। 

कभी इस शहर को मामल्लापुरम कहा जाता था। अब फिर इसे उसी पुराने नाम से जाना जाए ऐसा सरकार का प्रयास है। इसका एक अन्य प्राचीन नाम बाणपुर भी है। तमिलनाडु का यह प्राचीन शहर अपने भव्य मंदिरोंस्थापत्य और सागर-तटों के लिए जाना जाता है। चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर महाबलीपुरम शहर कांचीपुरम जिले का हिस्सा है।

पुराना बंदरगाह शहर था : महाबलीपुरम में चीनफारस (ईरान) और रोम के प्राचीन सिक्कों मिले थे। जिससे ये पता चलता है कि यहां पर पहले बंदरगाह रहा होगा। यह छठी सातवीं सदी में गुलजार शहर था। यहां प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग भी आया था। आजकल महाबलीपुरम दो वर्ग मील के घेरे में फैला हुआ है।

- vidyutp@gmail.com ( 17oct 2015)  ( MAMALLAPURAM, TN ) 


Tuesday, November 24, 2015

गोल्डेन बीच पर मस्ती भरी दुपहरिया

इस बार के चेन्नई प्रवास में हमने अपना एक दिन गोल्डेन बीच के नाम कर रखा था। ट्रेन से कांचीपुरम जाते समय मोबाइल से ही टिकट न्यू डाट काम से गोल्डेन  बीच तीन टिकटें गोल्डेन क्राउन श्रेणी की बुक कर डाली। 17 अक्तूबर की दोपहर हम गोल्डेन बीच के प्रवेश द्वार पर थे। ईटिकट का स्क्रीन शाट दिखाकर पीआरओ काउंटर से अपना टिकट प्राप्त किया। गोल्डेन बीच के प्रवेश द्वार पर लगेज काउंटर है जहां 15 रुपये प्रति बैगेज के हिसाब से आप अपना लगेज जमा कर सकते हैं। यहां चेंजिंग रूम भी मौजूद है। हमारे हाथों पर गोल्डेन क्राउन की वाटर प्रूफ पट्टियां लगा दी गई हैं। यहां दो तरह के टिकट हैं सिल्वर क्राउन में वाटर किंगडम शामिल नहीं है। 420 रुपये के गोल्डेन क्राउन टिकट में सारे खेल तमाशे और वाटर किंगडम भी शामिल है।

प्रवेश द्वार से अंदर जाते ही आपकी मुलाकात स्टैच्यू मैन से होती है। एक आदमी जो घंटो मूर्ति बनकर खड़ा रहता है। जब मैं 1992 में जनवरी में यहां पहुंचा था तब भी ये स्टैच्यू मैन मौजूद था। आगे बढ़ने पर 34 से ज्यादा तरह के बड़ों और बच्चों के झूले, रोलर कोस्टर, बिजली चलने वाली कारें, 3डी शो और ढेर सारे तमाशे। आप थक जाएंगे पर तमाशे खत्म होने का नाम नहीं लेंगे।

पर हमने सलाह के मुताबिक पहले वाटर किंगडम का रुख किया। 30 रुपया ड्रेस का किराया, 30 रुपये लॉकर का किराया, 30 रुपये टावेल का किराया देने के बाद हम सब गोल्डेन बीच वेश भूषा में आ गए। उसके बाद कूद पड़े विशाल स्विमिंग पुल में। इसमें समय समय पर वाटर वेव भी दिया जाता है जो समंदर सा एहसास कराता है। घंटो नहाते रहे। फिर भी जी नहीं भरा। पार्श्व में पंजाबी और हिंदी फिल्मों के गाने बज रहे थे। पुल में सैकड़ो महिलाएं, बच्चे,जवान मौज मस्ती में डूबे थे। इसके बाद लेजी रिवर जहां काफी ऊंचाई से रबर ट्यूब में फिसलते हुए फिर स्विमिंग पुल में। बच्चों के लिए और वाटर गेम्स मौजूद हैं। एक वाटर गेम में ट्यूब के साथ तेजी से आकर पुल में गिरने के बाद मेरी ट्यूब उलट गई और मैं डूबने लगा। पर सुरक्षा गार्ड ने बचा लिया।

 इन सबके बाद रंग बिरंगे झरने के नीचे स्नान। अब बाहर निकलना है तो सावर भी मौजूद है। मौज मस्ती के लिए कोई समय सीमा नहीं है।  गोल्डेन बीच 11 बजे सुबह से रात्रि 8 बजे तक खुला रहता है। वाटर किंगडम से निकल कर कई तरह के झूले और राइड का आनंद लिया। आनादि तो यहां से निकलना ही नहीं चाह रहे थे। पर भूख लग रही थी। गोल्डेन बीच के परिसर में कई रेस्टोरेंट हैं। खाने पीने की दरें काफी वाजिब हैं। समझो बाजार से भी कम हैं। चेन्नई का ये एम्युजमेंट पार्क समंदर के किनारे स्थित है। सारी मौज मस्ती के बाद आप समंदर की लहरों का भी लुत्फ उठा सकते हैं।

कैसे पहुंचे – गोल्डेन बीच चेन्नई से महाबलीपुरम के मार्ग पर चेन्नई सेंट्रल इलाके से कोई 25 किलोमीटर आगे ईस्ट कोस्ट रोड पर ही स्थित है। चेन्नई के हर कोने से गोल्डेन बीच के लिए बसें जाती हैं। ब्राडवे स्टाप से आपको नियमित तौर पर 109 नंबर की बस मिल जाएगी।

हजारों फिल्मों की शूटिंग - गोल्डेन बीच का निर्माण वी जी पनीर दास ने कई दशक पहले कराया था। तमिलनाडु के तिरुनवेली जिले के एक गरीब परिवार से आने वाले पनीर दास ने 1955 में चेन्नई में घड़ियों की दुकान से अपना कैरियर शुरू किया। बाद में किस्तों पर घरेलू सामान बेचने का कारोबार शुरू किया। अब वे रिजार्ट, एम्युजमेंट पार्क, रियल एस्टेट के कारोबार से जुड़े हैं। गोल्डेन बीच के अंदर उनके नाम पर पनीर फोर्ट बना है। अब गोल्डेन बीच में एक नन्हा सा जू भी है।

गोल्डेन बीच, हिंदी, तमिल, तेलुगु और कन्नड की हजारों फिल्मों की शूटिंग हो चुकी हैं। यहां अमिताभ बच्चन, जीतेंद्र, गोविंदा, रजनीकांत, कमल हासन,नागार्जुन जैसे तमाम अभिनेता शूटिंग कर चुके हैं।कई फिल्मी गीतों के पार्श्व में आप गोल्डेन बीच को देख सकते हैं। पनीरदास का फलसफा रहा आम आदमी को सस्ते में मनोरंजन देना।1997 में गोल्डेन बीच ने संपूर्ण एम्युजमेंट पार्क का रूप लिया पर इसकी टिकट दरें ऐसी रखी गई हैं ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आकर आनंदित हो सकें। अब गोल्डेन बीच के बगल में रिजार्ट भी बन गया है जहां आप लग्जरी आवास भी बुक कर सकते हैं।


Monday, November 23, 2015

गोल्डेन बीच चेन्नई की तिलिस्मी दुनिया

चेन्नई शहर के बाहरी इलाके में स्थित है गोल्डेन बीच की तिलिस्मी दुनिया। यह चेन्नई घूमने वालों की खास पसंद है। गोल्डेन बीच को आप तमाम हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों में देख चुके होंगे। क्योंकि यहां सैकड़ो फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है।

यह निजी तौर पर विकसित किया गया समुद्र तट है जहां पर कई घंटे परिवार के साथ घूमने का आनंद लिया जा सकता है। यहां पर स्विमिंग पुल, गो कार्टिंग, वाटर गेम्स लाइव कल्चरल प्रोग्राम का आनंद आप ले सकते हैं। 
आजकल एक्वेरियम और जुरासिक पार्क जैसी चीजें भी गोल्डेन बीच में जोड दी गई हैं। चेन्नई के ईस्ट कोस्ट रोड पर स्थित है गोल्डेन बीच। बच्चों को गोल्डेन बीच बेइन्तहा पसंद आता है। बच्चे यहां आकर मस्ती में खो जाते हैं।


उड़ने दो परिंदों को शोख हवा में...
फिर लौटकर बचपन के दिन नहीं आते...

गोल्डेन बीच मुख्य शहर से कोई 30 किलोमीटर बाहर है। यहां जाने के लिए बसें और आटो रिक्सा आदि शहर के हर कोने से उपलब्ध रहते हैं। यह चेन्नई के सबसे सुरक्षित और साफ सुथरे समुद्र तट में गिना जाता है। यहां आप अपने परिवार के साथ यादगार पल बिता सकते हैं। बच्चे हों या फिर बड़े सबको यहां पर खूब आनंद आता है। मिलेनियम टावर, पनीर फोर्ट और आदमी की मूर्ति यहां के मुख्य आकर्षण है। एक आदमी है जो मूर्ति बना खड़ा रहता है। आप उसके कई मिनट तक देखते रहिए पर उसका पोस्चर नहीं बदलता। आंखों की पलकें भी नहीं झपकती। बड़ा अभ्यास है उसका। गोल्डेन बीच में आने वाले लोग इस आदमी को कौतूहल से देखत रहते हैं।


गोल्डेन बीच में पांच हजार से ज्यादा फिल्मों और टीवी सीरियलों की शूटिंग हो चुकी है। बॉलीवुड की कई फिल्मों की यहां शूटिंग हुई है। कई फिल्मकार तो गोल्डन बीच के दृश्य अपनी फिल्म में डालना बाक्स आफिस पर सफलता की गारंटी मानते हैं। खासतौर पर फिल्मकार यहां पर गाने की शूटिंग करते हैं। यहां अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, गोविंदा, कमल हासन, रजनी कांत, नागार्जुन जैसे नामचीन सितारे शूटिंग करने आ चुके हैं। जब आप गोल्डन बीच का नजारा कर रहे होते हैं तो कई दृश्यों को देखकर आपको याद आता है कि आप इसे किसी फिल्म में देख चुके हैं। गोल्डन बीच में समुद्र के किनारे खड़ा एक नकली जहाज का विशाल माडल भी देखा जा सकता है।

गोल्डेन बीच  में डोसा - 1992 के जनवरी में सुनील सेवक और राजीव सिंह के साथ 
गोल्डेन बीच के प्रवेश द्वार पर दर्शकों के लिए क्लाक रूम का भी इंतजाम है जहां आप अपनी अतिरिक्त वस्तुएं रख सकते हैं। वास्तव में यह के बड़ा समुद्र तटीय रिजार्ट है। यहां पर खाने पीने के लिए रेस्टोरेंट भी है। पर खाना बाजार से थोड़ा महंगा है। मैं चेन्नई 1992 जनवरी में गया था तब अपने साथी सुनील सेवक और राजीव कुमार सिंह के साथ गोल्डेन बीच घूमने पहुंचा था।

खुलने का समय – गोल्डेन बीच सुबह 11 बजे से शाम 7.30 बजे तक सातों दिन खुला रहता है। यहां प्रवेश के लिए टिकट 295 रुपये प्रति व्यक्ति से आरंभ होता है। बच्चों का टिकट थोड़ा सा ही कम है। बच्चों का टिकट 245 रुपये से आरंभ होता है। आप इसके लिए टिकटें आनलाइन भी बुक करा सकते हैं। यहां आप अक्तूबर से फरवरी के बीच जाएं तो बेहतर है तब चेन्नई का मौसम अच्छा रहता है।
यहां करें ऑनलाइन टिकट बुकिंग - http://www.ticketnew.com/OnlineTheatre/online-movie-ticket-booking/Events/VGP-Universal-Kingdom.html
-vidyutp@gmail.com
( GOLDEN BEACH,  CHENNAI) 


Sunday, November 22, 2015

इडली-डोसा-जूस आईसक्रीम- कांचीपुरम और सरवन भवन

दिल्ली में रहते हुए हम कई बार सरवन भवन में दक्षिण का स्वाद लेने जाते हैं तो चेन्नई में जब हम सरवन भवन के शहर में थे तो ये मौका कैसे छोड़ देते भला। कांचीपुरम में भी सरवन भवन की शाखा है। सो कांचीपुरम भ्रमण पूरा होने पर हम पहुंच गए सरवन भवन। कांचीपुरम का सरवन भवन बस स्टैंड के पास मुख्य बाजार में है। दो मंजिला रेस्टोरेंट में नीचे टिफीन सेवाएं हैं तो ऊपर लंच और डिनर सेवाएं।

सरवन भवन के तमिलनाडु में स्थित रेस्टोरेंट्स में खाने पीने की दरें दिल्ली की तुलना में आधी हैं। जैसे यहां मसाला डोसा 60 रुपये का है। टिफीन वाले हिस्से की सर्विस काफी तेज है। खास बात ये है कि यहां आपको चाय और काफी मिल जाएगी। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग यहां चाय सुड़कते हुए भी मिल जाते हैं। कोई भी यहां से वापस नहीं लौटे इसलिए सरवन भवन ने ताजे फलों के जूस का काउंटर शुरू कर दिया है। साथ ही अपने ब्रांड की कई तरह की आइसक्रीम बनाना भी आरंभ कर दिया है।


कांचीपुरम के सरवन भवन में दो तरह के डायनिंग हाल हैं। समान्य की तुलना में वातानुकूलित वाले डायनिंग हाल में टैक्स के कारण दरें ज्यादा रहती हैं। हमलोग समान्य हाल में ही बैठ गए। चेन्नई में सरवन भवन के 16 रेस्टोरेंट हैं। पिछले दो दशक में उनके रेस्टोरेंट की संख्या बढ़ी है। चेन्नई में पेरियामेट इलाके में उनके रेस्टोरेंट में दुबारा जाने का मौका मिला। सरवन भवन के हर रेस्टोरेंट में मीनू एक जैसा ही है। दरें भी एक सी हैं।कांचीपुरम के सरवन भवन में हम अपनी अपनी पसंद के अलग अलग व्यंजनों का आर्डर देते हैं। बाद में आइसक्रीम का भी लुत्फ उठाते हैं। आईसक्रीम की दरें काफी वाजिब हैं। दक्षिण में घूमते हुए सरवन भवन हमारा फेवरिट बन गया। हालांकि पुडुचेरी के जवाहर लाल नेहरू स्ट्रीट पर भी सरवन भवन देखने को मिला पर उसका मालिकाना हक चेन्नई से अलग समूह का है। चेन्नई के सरवन भवन की खास बात यह है कि इसमें न सिर्फ दक्षिण भारतीय बल्कि अब उत्तर भारतीय व्यंजन भी इसके मीनू में शामिल हो चुके हैं। मतलब की आपको कुछ भी चाहिए आप सरवन भवन से वापस नहीं जा सकते।



- विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com
(SARVANA BHAWAN, KANCHIPURAM, TAMILNADU) 

Saturday, November 21, 2015

यहां शिव और पार्वती करते हैं नृत्य - कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम

कांचीपुरम भ्रमण में हमारा आखिरी पड़ाव था कैलाशनाथ मंदिर। हमारे आटो वाले भाई ने कह दिया था कि यहां के बाद आपको बस स्टैंड छोड़ दूंगा। फिर मेरी सेवा समाप्त। सो हम कैलाश नाथ मंदिर को अच्छी तरह निहार लेना चाहते थे।

कांचीपुरम शहर के पश्चिम दिशा में स्थित यह मंदिर सबसे प्राचीन और दक्षिण भारत के सबसे शानदार मंदिरों में एक है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित स्मारकों की सूची में है। केंद्र सरकार की एजेंसी ने इस मंदिर का रखरखाव बेहतर कर रखा है। मंदिर के बाहर सुंदर हरित परिसर है। कैलाशनाथ मंदिर पल्लव कला का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर के निर्माण में द्रविड़ वास्तुकला की छाप देखने को मिलती है। वास्तु के लिहाज से ये मंदिर महाबलीपुरम के समुद्रतटीय मंदिर से मिलता जुलता है।

कैलाशनाथ मंदिर को आठवीं शताब्दी में पल्लव वंश के राजा राजसिम्हा या नरसिंह वर्मन द्वितीय ( 700 से 728 ई) ने अपनी पत्नी की इच्छा पूर्ति करने के लिए बनवाया था।  मंदिर का निर्माण 658 ई में आरंभ हुआ और 705 ई में जाकर पूरा हो सका। मंदिर के अग्रभाग का निर्माण राजा के पुत्र महेन्द्र वर्मन द्वितीय के करवाया था।

राजा की रूचि संगीत नृत्य और कला में काफी गहरी थी जो इस मंदिर में परिलक्षित होती है। कई लोग ये मानते हैं कि राजसिम्हा शिव का भक्त और संत प्रवृति का था। शिव ने उसके सपने में आकर मंदिर निर्माण की प्रेरणा दी थी। मंदिर में मूल आराध्य देव शिव के चारों ओर सिंहवाहिनी देवी दुर्गा, विष्णु समेत कुल 58 देवी-देवताओं की मूर्तियां है। पल्लव राजाओं की विभिन्न युद्ध-गाथाएं भी यहां ग्रेनाइट पत्थर से बनी वेदी के ऊपर उकेरी गई हैं जिन्हे देखकर लोग आनंदित होते हैं। कैलाशानाथ मंदिर परिसर के नैऋत्य कोण में बना है और परिसर की पूर्व एवं उत्तर दिशा पूरी तरह से खुली होकर निर्माण रहित है। इस प्रकार की स्थिति वास्तु का एक अनुपम उदाहरण है।

शिव पार्वती की नृत्य प्रतियोगिता - मंदिर में देवी पार्वती और शिव की नृत्य प्रतियोगिता को दीवरों पर चित्रों में दर्शाया गया है। यहां पार्वती की हंसती हुई प्रतिमा देख सकते हैं। मूल मंदिर के निकट शिव-पार्वती की नृत्य-प्रतियोगिता के दृश्य भी बहुत मनोरम है। मंदिर में बनी मूर्तियों की नक्काशी की उत्कृष्टता पर निगाहें अटकी रह जाती है।

मंदिर का एकमात्र गोपुरम ( प्रवेश द्वार) पूर्व दिशा में है। मंदिर परिसर में आने के दो द्वार है। एक बड़ा द्वार परिसर के पूर्व आग्नेय में है जो कि, वास्तुनुकुल स्थान पर नहीं होने के कारण आमतौर पर बंद रहता है। जबकि, दूसरा छोटा द्वार परिसर की दक्षिण दिशा में है जहां से श्रद्धालु आते-जाते है। मंदिर के ईशान कोण में बहुत बड़ा तालाब है।

बैकुंठ की गुफा - कैलाशनाथ मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में एक गुफा है। यहां के पुजारी जी बताते हैं कि इस गुफा को अगर पार कर लेते हैं तो आप बार बार जन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और सीधे बैकुंठ की प्राप्ति होगी। पर इस गुफा में प्रवेश के लिए 10 रुपये का टिकट लेने को कहते हैं। मैंने देखा कुछ श्रद्धालु जो गुफा से सफलतापूर्वक बाहर निकले वे बडी मुश्किल से निकल पा रहे थे। हमने कहा, मुझे फिलहाल बैकुंठ की कामना नहीं है।

खुलने का समय – मंदिर सुबह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक खुला रहता है। कैलाशनाथ मंदिर में आपके मार्ग दर्शन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से अधिकृत गाइड उपलब्ध हैं। हालांकि यहां अनाधिकृत गाइड भी चक्कर लगाते रहते हैं।
- vidyutp@gmail.com


कांचीपुरम के कैलाश नाथ मंदिर का चौबारा। 







Friday, November 20, 2015

एकंबरनाथ - शिव का सबसे विशाल और अदभुत मंदिर

वैसे तो देश में शिव के लाखों मंदिर हैं, उनमें 12 ज्योतिर्लिंग की खास प्रसिद्धि है। पर शिव का कांचीपुरम स्थित एकंबरनाथ मंदिर अपनी विशालता और स्थापत्य कला की दृष्टि से सबसे अदभुत और अलग मंदिर है। यह कांचीपुरम शहर के मंदिरों में भी सबसे विशाल है। मंदिर 40 एकड़ में फैला हुआ है। इस मंदिर को पल्लव राजाओं ने सातवीं शताब्दी में बनवाया था। बाद में इसका पुनरुद्धार चोल और विजयनगर के राजाओं ने भी करवाया।
दक्षिण के पंचभूत स्थलों में एक -  कांचीपुरम का एकंबरनाथ मंदिर तमिलनाडु के पंचभूत स्थलम के पांच पवित्र शिव मंदिरों में से एक है। यह धरती तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। इस श्रेणी के शेष चार और प्रतिष्ठित शिव मंदिरों में चिदंबरम नटराज (आकाश), थिरूवन्नामलाई अरूणाचलेश्वर (अग्नि), थिरूवनाईकवल जम्बुकेश्वर (जल) और कालहस्ती नाथर (वायु) माने जाते हैं।

विशाल 11 मंजिला मंदिर - कांचीपुरम का एकंबरनाथ का मंदिर कुल 11 मंजिलों का है। यह मंदिर दक्षिण भारत के सबसे ऊंचे मंदिरों में एक है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इसकी विशालता देखकर मुग्ध हो जाते हैं। मंदिर में बहुत आकर्षक मूर्तियां देखी जा सकती हैं। साथ ही यहां का 1000  स्तंभों वाला का मंडपम भी खासा लोकप्रिय है। 

विशाल गोपुरम - मंदिर में प्रवेश करने के साथ ही इसका विशाल गोपुरम श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। मंदिर में विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय की ओर से बनवाया गया यह राजा गोपुरम या मुख्य प्रवेश द्वार 59 मीटर ऊंचा है।
जब आप मंदिर के मुख्य चौबारे में प्रवेश करते हैं तो विशाल गलियारा आपका स्वागत करता है। इसके दोनों तरफ की नक्काशी देखते ही बनती है। गलियारे के दोनों तरफ देवी देवताओं की आकर्षक मूर्तियां निर्मित की गई हैं। मंदिर परिसर में ऐसे कुल पांच बड़े गलियारे निर्मित किए गए हैं। 

गैर हिंदूओं का प्रवेश निषेध-  मंदिर के गलियारे में एक सीमा के बाद एक बोर्ड मिलता है जिस पर लिखा है कि यहां से आगे गैर हिंदुओं का प्रवेश निषेधित है। मंदिर में अंग्रेजी में लिखा है। खास तौर विदेशी नागरिकों के लिए। यहां लिखा है-  अपनी धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए इस सीमा के बाद गैर हिंदू लोगों के लिए प्रवेश की अनुमति नहीं है। आप यहीं तक मंदिर के वास्तु शिल्प का आनंद लें। 

NOTICE FOREIGNERS OUR  TRADITONAL CUSTOMS AND USAGE DOES NOT PERMIT NON HINDUS TO INTER THE SANCTUM. PLEASE ENJOY THE TEMPLES BEAUTY UPTO THIS LIMIT. DONT FOCUS YOUR CAMERAS TOWARDS THE SANCTUM.   हां, हिंदू लोग पूरे मंदिर का मुआयना कर सकते हैं।


बालू का शिवलिंगम - आगे बढ़ने पर मंदिर के मुख्य मंडप में आप प्रवेश करते हैं। यहां सृष्टि के सृजक और विनाशक शिव विराजमान हैं। यहां पार्वती का कोई मंदिर नहीं हैं। क्योंकि शहर का कामाक्षी मंदिर उनका प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर का शिवलिंग बालू का बना हुआ माना जाता है। यह ढाई फीट लंबा है। इसका जलाभिषेक नहीं होता। इसका तैलाभिषेक करके पूजन किया जाता है। श्रद्धालुओं को शिवलिंगम तक जाने की अनुमति नहीं है। मंदिर में भगवान विष्णु की भी एक छोटी प्रतिमा है जिन्हे यहां वामन मूर्ति कहा जाता है।

आम के वृक्ष से प्रकट हुए थे महादेव - मंदिर परिसर में एक आम का वृक्ष है। इसे 3500 साल पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि इसी वृक्ष के नीचे पार्वती ने शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था। शिव प्रसन्न होने के बाद आम्र वृक्ष में प्रकट हुए इसलिए उनका नाम एकअंब्रेश्वर पड़ा। यानी आम वृक्ष के देवता। तो ये हैं एकंबरनाथ महादेव। 

आम के इस पेड़ के तने को काटकर मंदिर में धरोहर के रूप में रखा गया है। मंदिर परिसर में स्थित आम के वृक्ष को भी श्रद्धालु नमन करते हैं। तमिलनाडु के कांचीपुरम में इस छठी शताब्दी के मंदिर को पंचभूत स्थलम के पांच पवित्र शिव मंदिरों में से एक का दर्जा प्राप्त है और इनमें यह धरती तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।


एक हजार स्तंभ और शिवलिंगम - एकंबरनाथ मंदिर का एक मुख्य आकर्षण अविराम काल मंडपम भी हैजिसमें कुल एक हजार स्तंभ हैं। इसमें भ्रमण करते हुए इसकी भव्यता में श्रद्धालु खो जाते हैं। देश में शायद ही कोई मंदिर इतना विशाल हो। 

मंदिर की भीतरी प्रांगण की दीवारों के साथ साथ 1008 शिवलिंगम भी स्थापित किए गए हैं जो मंदिर की दूसरी प्रमुख भव्यता है। इतने शिवलिंगम एक साथ किसी भी दूसरे मंदिर में नहीं हैं। मंदिर परिसर में एक सुंदर सरोवर भी है। इस सरोवर के बीच में एक गणेश की प्रतिमा है।


कांचीपुरम इडली - इस मंदिर का अदभुत प्रसाद है कांचीपुरम इडली। यह दक्षिण भारत के अन्य इडली से भिन्न है। कांचीपुरम इडली एक परंपरागत रेसिपी है जो कि कांचीपुरमतमिलनाडु में काफी प्रसिद्ध है। यह कांचीपुरम इडली वहां पर म‍ंदिरों में प्रसाद के रूप में बांटी जाती है। इसे आप एकंबरनाथ मंदिर के काउंटर से प्राप्त कर सकते हैं। 

यह कांचीपुरम इडली काफी जगह दूसरे इलाकों में भी खाई जाती है। यह इडली आम इडली की तरह फीकी और सादी नहीं होती। बल्‍कि यह काफी स्‍वाद से भरी होती है। एकबंरनाथ मंदिर के काउंटर पर इडली के अलावा खीर और अन्य प्रसाद भी प्राप्त किए जा सकते हैं। पहले कुछ साथियों से सुना था कांची इडली के बारे में। तो हमने भी मंदिर परिसर में बैठकर कांची इडली का स्वाद लिया। 

एंकबरनाथ मंदिर में भी दूसरे शिव मंदिरों की तरह महादेव के वाहन नंदी की प्रतिमा स्थापित की गई है। पर पत्थरों की बनी इस नंदी प्रतिमा को रंग कर और सुंदर रूप प्रदान कर दिया गया है। नदी के गले में कई किस्म की मालाएं सुशोभित हो रही हैं।


खुलने का समय -  एकंबरनाथ मंदिर में सुबह 6 बजे दर्शन के लिए खुलता है। यह दोपहर 12.30 बजे बंद हो जाता है। दुबारा शाम को 4 बजे खुलता है। रात्रि 8.30 बजे मंदिर बंद कर दिया जाता है। सुखद बात है कि मंदिर के बोर्ड पर खुलने और बंद होने की सूचना तमिल और अंगरेजी के साथ हिंदी में भी लिखी गई है। हर साल मार्च अप्रैल में मनाया जाने वाला फाल्गुनी उथीरम इस मंदिर का बड़ा त्योहार होता है।
-      vidyutp@gmail.com