Monday, November 30, 2015

जार्ज पंचम, जॉर्ज टाउन, मद्रास और चेन्नई

चेन्नई के एनसी बोस रोड का फूल बाजार। 
चेन्नई के ब्राडवे बस स्टैंड के पास नेताजी सुभाष चंद्र रोड ( एनसी बोस रोड) पर ब्रिटेन के सम्राट रहे जॉर्ज पंचम की विशाल प्रतिमा लगी है। चेन्नई में उनके नाम से जॉर्ज टाउन नामक इलाका भी है। यह चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के पास स्थित चेन्नई का सबसे पुराना नगरीय क्षेत्र है। पर जॉर्ज टाउन का नाम कभी ब्लैकटाउन हुआ करता था।

चेन्नई के एनसी बोस रोड पर जार्ज पंचम की प्रतिमा।
अंग्रेजों ने मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज बनवाया था जिसे ह्वाइट टाउन कहा गया। पर 1911 में जब जॉर्ज पंचम भारत के बादशाह घोषित किए गए तब शहर के ब्लैक टाउन इलाके का नाम बदलकर उनके सम्मान में जार्ज टाउन रखा गया। चेन्नई शहर के बनने का इतिहास फोर्ट सेंट जॉर्ज म्युजियम में देखा जा सकता है। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी पहली फैक्ट्री सूरत में आरंभ की थी। पर दक्षिण भारत में वे पांव पसारने के लिए उचित अवसर तलाश रहे थे। सो 1640 में मद्रासपट्टनम गांव में इसकी शुरुआत हुई। इस तरह से मद्रास शहर बसना आरंभ हुआ।   तकरीबन 14 साल लगे 1653 में फोर्ट सेंट जॉर्ज बनकर तैयार हुआ। फोर्ट सेंट जॉर्ज के उत्तर में एक कालोनी बसी जिसमें खास तौर पर रंगरेज और बुनकर बसाए गए। 


तब इसका नाम दिया गया ब्लैक टाउन जो 1911 में जॉर्ज टाउन कहलाने लगा। यहां शुरू से हर धर्म के लोग थे। यहां बड़ी संख्या में राजस्थान और सौराष्ट्र से लोग आकर बसे थे। एक जमाने से यहां होली और दिवाली उत्साह से मनाई जाती है। उन्नीसवीं सदी में यहां हिंदू मंदिर, मसजिद और जैन मंदिर बन चुके थे। 1772 में इस इलाके में पहली बार वाटर सप्लाई सिस्टम की शुरुआत की गई। 22 अगस्त 2014 को चेन्नई शहर ने अपनी 375वीं वर्षगांठ मनाई।


जॉर्ज पंचम की प्रतिमा -   सन 1938 में चेन्नई के फ्लावर बाजार पुलिस स्टेशन के पास ( एनसी बोस रोड पर) जार्ज पंचम की विशाल प्रतिमा लगाई गई। ये प्रतिमा किंग की ताजपोशी की रजत जयंती के मौके पर लगाई गई। इस प्रतिमा के शिल्पी एम एस नागप्पा थे। जार्ज पंचम ने 6 मई 1910 से 20 जनवरी 1936 तक ब्रिटेन और उसके उपनिवेशों पर शासन किया। जार्ज पंचम का भारत से भी बहुत लगाव था। अपने भारत यात्रा के दौरान उन्होंने कई क्षेत्रों का भ्रमण किया था। 



अब जॉर्ज पंचम की प्रतिमा के पास रोज सुबह बड़ा फूलों का बाजार लगता है। पास में ही ब्राडवे (पैरीज) का बड़ा लोकल बस टर्मिनल भी है।
 वेल्स के व्यापारी थामस पैरी के नाम पैरीज कार्नर यहां मौजूद है। उन्होंने 1787 में यहां अपनी बैंकिंग कंपनी स्थापित की थी। पैरीज को भारत में पहली बार फर्टिलाइजर बनाने का श्रेय भी जाता है। ये देश की सबसे पुरानी कंपनियों में शामिल है जो आज भी संचालन में है। आजकल यह चीनी और बायो प्रोडक्ट का निर्माण करती है। अब यह कंपनी मुरगप्पा समूह के अंतर्गत आती है।


बदला नाम शहर का  जॉर्ज टाउन में चन्न केशव पेरूमाल मंदिर स्थित है। 1996 में मद्रास का नाम बदल कर चेन्नई किया गया। वास्तव में तमिल सरकार विदेशी आवरण से मुक्त होना चाहती थी। इसलिए फोर्ट सेंट जार्ज के आसपास के इलाके चन्नपट्टनम के नाम पर इसका नाम बदलकर चेन्नई किया गया। इसका शाब्दिक अर्थ चेन्नप्पा का शहर है। जबकि मद्रास के बारे में कहा जाता है कि पुर्तगाली शब्द से बना था। 

चन्न केशव पेरूमाल मंदिर- यह भी माना जाता है कि चेन्नई का नाम चन्नकेशव पेरूमाल मंदिर के नाम पर रखा गया। इस मंदिर का निर्माण 1762 में ब्रिटिश सहायता से किया गया था। यह भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर है। चन्न का तमिल में मतलब चेहरा है। यानी भगवान विष्णु का चेहरा। तो ये है चेन्नई।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(CHENNAI, MADRAS, TAMILNADU, GEORGE V, BLACK TOWN, NC BOSE ROAD, FLOWER MARKET )  


Sunday, November 29, 2015

धन, धान्य वैभव की देवी- अष्टलक्ष्मी मंदिर चेन्नई

चेन्नई के आडयार समुद्र तट पर अष्टलक्ष्मी का सुंदर मंदिर स्थित है। यह अष्टलक्ष्मी मंदिर   देवी  लक्ष्मी के आठ रूपों को समर्पित है। इन सभी के बारे में माना जाता है कि यह धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की रूप है। देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु की पत्नी थी। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार,   देवी लक्ष्मी हमारे जीवन में   काफी महत्व है। अष्ट लक्ष्मी हमें धन, विद्या, वैभव, शक्ति और सुख प्रदान करती हैं।



इस मंदिर में लक्ष्मी की कुल आठ अलग अलग मूर्तियां अलग अलग तल पर स्थापित की गई हैं। यहां आदि लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, धैर्य लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी, विजया लक्ष्मी, संतना लक्ष्मी और धन लक्ष्मी के दर्शन होते हैं। सभी देवियों के मंदिर घड़ी की सूई की दिशा में आगे बढ़ते हुए दिखाई देते हैं। सबसे अंत में नवम मंदिर है जो विष्णु और लक्ष्मी का है। इस मंदिर में विष्णु की तुलना में लक्ष्मी को प्राथमिकता दी गई है।

इस मंदिर का निर्माण 1974 में आरंभ किया गया। मुकुर श्रीनिवास वरदचेरियार की अगुवाई बनी समिति ने इस मंदिर का निर्माण कराया। 5 अप्रैल 1976 से इस मंदिर में विधिवत पूजा आरंभ हुई। मंदिर का डिजाइन ओम के आकार का है। नवरात्रि और गोकुलअष्टमी मंदिर के प्रमुख त्योहार हैं। 



मंदिर में आने वाले श्रद्धालु कमल का पुष्प चढ़ाते हैं। हर लक्ष्मी के लिए लोग अलग अलग कमल पुष्प लेकर जाते हैं। मंदिर के ऊपरी हिस्से से समंदर का सुंदर नजारा दिखाई देता है। वहीं समंदर के तट से भी मंदिर काफी सुंदर नजर आता है। मंदिर का निर्माण तीन मंजिलों में हुआ है। मंदिर के चारों तरफ विशाल आंगन है। मंदिर के परिसर में पूजा सामग्री की दुकानें भी है।


पूजा काल   चेन्नई के अष्टलक्ष्मी मंदिर में पूजा रोज सुबह 6.30 बजे आरंभ हो जाती है। वहीं दोपहर 12 बजे मंदिर बंद हो जाता है। शाम को 4 बजे रात्रि 9 बजे तक मंदिर फिर श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है। शुक्रवार से रविवार तक मंदिर दोपहर एक बजे तक खुला रहता है।



कैसे पहुंचे – अष्टलक्ष्मी मंदिर चेन्नई के बेसेंट नगर में स्थित है। यह मंदिर समुद्र तट के किनारे है।  यह शहर के संभ्रात इलाके में गिना जाता है। चेन्नई सेंट्रल या शहर के हर कोने से बेसेंट नगर के लिए बसें उपलब्ध हैं। ब्रॉडवे से 21डी बस सीधे बेसेंट नगर जाती है। बस स्टॉप से भी मंदिर आधा किलोमीटर की दूरी पर है। मंदिर से ठीक पहले एक सुंदर सा चर्च भी है।

http://ashtalakshmitemple.tnhrce.in/

( CHENNAI, ASHTA LAKSHMI TEMPLE ) 




Saturday, November 28, 2015

चेन्नई का कपालेश्वर मंदिर – यहां पार्वती ने किया था तप

आज की शाम हमलोग चल पड़े हैं माइलापुर की ओर। चेन्नई शहर में सबसे पुराना और प्रसिद्ध मंदिर है कपालेश्वर मंदिर। ये महादेव शिव का मंदिर है। साल का कोई भी दिन हो यहां हमेशा श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। कपालेश्वर मंदिर चेन्नई के माइलापुर इलाके में स्थित है। मंदिर के सामने एक विशाल सरोवर है। आसपास में काफी घना बाजार है।


कपालेश्वर मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का उत्कृष्ट नमूना है। ये मंदिर सातवीं सदी में पल्लव राजाओं द्वारा बनवाया हुआ बताया जाता है। मंदिर की वर्तमान संरचना विजय नगर के राजाओं द्वारा सोलहवीं सदी में बनवाई गई है। मंदिर का मुख्य भवन काले पत्थरों का बना है। मंदिर के दो मुख्य द्वार हैं जहां विशाल गोपुरम बने हैं। मंदिर का मुख्य गोपुरम 120 फीट ऊंचा है तो 1906 में बनवाया गया।

मान्यता है कि इसी क्षेत्र में पार्वती ने शिव को पाने के लिए लंबे समय तक आराधना की थी। इसलिए इसे इच्छा पूरी करने वाला शिव का मंदिर माना जाता है। मंदिर के परिसर में पार्वती का भी मंदिर है। तमिल में पार्वती को कारपागांबल कहते हैं। मान्यता के मुताबिक शक्ति ( पार्वती) ने शिव को को पाने के लिए उनकी आराधना मयूर के रूप में की। मयूर को तमिल में माइल कहते हैं। इसी नाम पर इस इलाके का नाम माइलापुर पड़ा।


यहां पार्वती ने की थी  आराधना -  मंदिर परिसर में वह स्थल वृक्ष है जिसके नीचे बैठकर पार्वती ने लंबी आराधना की थी। मंदिर में शिव की पूजा कपालेश्वर के तौर पर होती है। यहां शिव का लिंगम स्थापित है। तमिल के शैव काव्य परंपरा तेवरम में कपालेश्वर मंदिर की चर्चा आती है। तमिल के भक्ति कवि नयनार शिव का स्तुति गान करते हैं।  


 कपालेश्वर    मंदिर के दोनों तरफ विशाल हॉल बने हैं। इनमें 63 नयनारों की स्तुति रत मूर्तियां बनी हैं। मंदिर परिसर में गौशाला भी है। मंदिर परिसर में भगवान का भोग लगाने के लिए फलों की सुंदर रंगोली सजाई जाती है।

फागुन में विशाल मेला – कपालेश्वर मंदिर परिसर में हर साल फागुन ( तमिल में पांगुनी ) महीने ब्रह्मोत्सव मनाया जाता है। यह इस मंदिर का साल का सबसे बड़ा उत्सव होता है। तब यहां आसपास में विशाल मेला लग जाता है। यह कुछ-कुछ वसंतोत्सव जैसा होता है।


खुलने का समय – मंदिर सुबह 6.00 बजे दर्शन के लिए खुलता है। दोपहर 12.30 से शाम 4.00 बजे तक मंदिर बंद रहता है। यहां रात्रि 9.30 बजे तक दर्शन किए जा सकते हैं। मंदिर की व्यवस्था ट्रस्ट देखता है। यहां भी स्पेशल दर्शन के लिए 20 रुपये के टिकट की व्यवस्था है। मंदिर की व्यवस्था तमिलनाडु सरकार के अधीन है।


कैसे पहुंचे-  मंदिर वैसे तो ईस्ट कोस्ट रोड पर आडयार और सैंथोम के पास स्थित है। किसी समय में जब आबादी नहीं थी मंदिर समंदर के किनारे हुआ करता था। अब आधा किलोमीटर घनी आबादी के बाद समंदर तट आता है। आप मैलापुर जाने के लिए चेन्नई प्रमुख बस टर्मिनल ब्राडवे से बस ले सकते हैं। चेन्नई सेंट्रल से मैलापुर की दूरी 8 किलोमीटर है। यह रोयापेट और आडयार के आसपास है।

कपालेश्वर मंदिर में दर्शन के बाद। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य-    vidyutp@gmail.com  -    www.mylaikapaleeswarar.tnhrce.in   ( CHENNAI, MYLAPUR, KAPALESHWAR TEMPLE, LORD SHIVA ) 


Friday, November 27, 2015

तमिलनाडु में हिंदी विरोध की दरकती दीवार


कोवाई एक्सप्रेस ने हमलोगों को रात 11 बजे से पहले चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन  पहुंचा दिया  हैं। इस बार हमने होटल चेन्नई सेंट्रल रेलवे स्टेशन के पास ही बुक किया है।  हम रेलवे स्टेशन से निकलकर पैदल चलकर ही अपने होटल गोल्डन टावर लॉज तक पहुंच गए। यह पांच मंजिला होटल रेलवे  स्टेशन के पास ही पेरियामेट इलाके में है।



वैसे तो होटल का कमरा 1750 रुपये का है। पर हमें स्टेजिला डॉटकॉम से महज 850 रुपये में मिला है। इसकी दरों में सुबह का  नास्ता  भी शामिल है। यह देखकर होटल के मैनेजर को  थोड़ा अचरज होता है कि हमें इतना डिस्काउंट कैसे मिल गया। अगले दिन सुबह होटल के रेस्टोरेंट में  हमें सुस्वादु  दक्षिण भारतीय नास्ता मिला।  मैं देख रहा हूं  सुबह सुबह  होटल  के पोर्च एरिया को केले के पत्तों से सुरुचिपूर्ण तरीके से सजाया गया है।




नास्ते के बाद हमलोग दिन भर चेन्नई घूमने के लिए एक बार फिर निकल पड़े। इस बार रेलवे स्टेशन से ज्यादा दूर के इलाकों में नहीं जाना है। एक दिन बाद शाम को हमें एग्मोर से  हैदराबाद की ट्रेन लेनी है।   इस होटल से एग्मोर भी ज्यादा दूर नहीं है। एग्मोर और चेन्नई सेंट्रल  रेलवे स्टेशन के बीच महज एक किलोमीटर की दूरी है।  


इस बार चेन्नई और आसपास  के शहरों में घूमते हुए कहीं भी हिंदी विरोध का आभास नहीं हुआ। कई दिनों के तमिलनाडु प्रवास के दौरान जगह जगह तमाम तमिल लोगों से संवाद करने का मौका मिला। ज्यादातर लोग हिंदी समझ लेते हैं। हिंदी में जवाब देने की भी कोशिश करते हैं। 

चेन्नई शहर के बस वाले , आटो वाले हिंदी में उत्तर दे देते हैं। दक्षिण में कर्नाटक केरल और तमिलनाडु की भाषाएं द्रविड समूह की होने के कारण हिंदी से थोड़ी ज्यादा दूर हैं। पर कर्नाटक और केरल में त्रिभाषा फार्मूला के तहत हिंदी पढ़ाई  जाती है। पर तमिलनाडु में हिंदी का विरोध आजादी के आंदोलन के समय से ही है। लिहाजा वहां स्कूली पाठ्यक्रम में हिंदी नहीं है। पर नई पीढ़ी के लोग टीवी पर सिनेमा में हिंदी सुन रहे हैं।



इस बार हम चेन्नई के जिन होटलों में ठहरे वहां केबल नेटवर्क में हिंदी के समाचार चैनल दिखाई दे रहे थे। हमने वहां आजतक से लेकर न्यूज 24 तक चैनल देखे। न सिर्फ डीटीएच बल्कि केबल नेटवर्क में भी हिंदी चैनल शामिल हैं। होटल के रिसेप्सशन वाले हिंदी समझ लेते हैं। वालटेक्स रोड और पेरियामेट के होटलों के साइन बोर्ड पर भी कहीं कहीं हिंदी लिखा हुआ दिखाई देता है। वैसे साइन बोर्ड की बात करें तो रेलवे स्टेशनों के नाम में हर जगह तमिलनाडु में हिंदी अंग्रेजी और तमिल एक साथ दिखाई देता है।




रेलवे स्टेशन मतलब रेल निलयम -   बैंक पोस्ट आफिस और भारत सरकार के दूसरे दफ्तरों के साइन बोर्ड हिंदी में दिखाई देते हैं।   चेन्नई के लोकल रेल में आने वाले स्टेशनों की सूचना हिंदी, अंगरेजी और तमिल में दी जा रही है। मुझे लगता है कि अगर हिंदी का प्रबल विरोध होता तो लोग इन साइन बोर्ड और उदघोषणाओं का भी विरोध करते। तमिल में रेलवे स्टेशन को रेल निलयम कहते हैं। यह बड़ा ही कर्णप्रिय लगता है।




चुनाव में हिंदी - इस बार तो चेन्नई में डीएमके के नेता दयानिधि मारन के चुनावी पोस्टर भी हिंदी में छापे गए थे। ऐसा चेन्नई में हिंदी बहुल इलाके के लोगों को लुभाने के लिए किया गया था। वैसे डीएमके और एआईडीएमके दोनों का हिंदी विरोध का इतिहास रहा है। पर अब ये दीवार कमजोर होती दिखाई देती है। भले स्कूलों में हिंदी नहीं पढ़ाई जाती हो पर बड़ी संख्या में तमिल अभिभावक यह महसूस कर रहे हैं कि अच्छी नौकरियां पाने के लिए तमिल, अंग्रेजी के साथ हिंदी जानना भी जरूरी है। लिहाजा वे अपने बच्चों को अलग से हिंदी पढ़ा रहे हैं।


हिंदी सीखने की ललक - लोग दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से हिंदी सीखने का कोर्स करते हैं। सभा की रजिस्ट्रार डॉक्टर निर्मला मौर्य दक्षिण में हिंदी सीखने की ललक को उत्साहजनक मानती हैं। मैं अक्सर स्टेजिला डॉट काम से होटल बुक करता हूं। इसका मुख्यालय चेन्नई में है। कई बार इसके कॉल सेंटर से फोन आता है। इसके एग्जक्यूटिव वैसे तो चेन्नई के रहने वाले हैं। पर वे अच्छी हिंदी में संवाद करते हैं। देश भर के लोगों से वार्ता करने के लिए इस वेबसाइट ने हिंदी जानने वाले कर्मचारी रखे हैं। इसी तरह सिटी बैंक रायल सुंदरम बीमा कंपनी के चेन्नई कॉल सेंटर में हिंदी जानने वाले कर्मचारी हैं।

 चेन्नई से कांचीपुरम के ट्रेन में मिले सुब्रमन्यम और विलूपुरम से वेल्लोर के बीच मिले सरवनन अच्छी हिंदी बोल और समझ रहे थे। इससे पूर्व की यात्रा में मैंने पाया था कि तमिलनाडु के शहर ऊटी, कोयंबटूर, मदुरै, रामेश्वरम और कन्याकुमारी में भी लोग हिंदी समझते हैं। कन्याकुमारी में तो आटोवाले ने मुझे सुनाया था ये कन्याकुमारी है बाबू यहां चाय भी सात रुपये की मिलती है।

 




चेन्नई से हिंदी के अखबार -  चेन्नई से राजस्थान पत्रिका के अलावा निष्पक्ष दक्षिण भारत राष्ट्रमत जैसे हिंदी समाचार पत्र का संस्करण प्रकाशित होता है। निष्पक्ष दक्षिण भारत का दावा है कि उसके अखबार को हिंदी भाषियों के अलावा तमिल लोग भी पढ़ते हैं। उम्मीद है कि आने वाले दिनों में कुछ और समाचार पत्रों के हिंदी संस्करणों का संपादन होगा। 

 फिल्मी सितारे और हिंदी-     हाल में खबर आई है कि बाहुबली के स्टार प्रभाष मुंबई की फिल्मों में काम पाने के लिए हिंदी सीख रहे हैं। कमल हासन और मणिरत्नम तो हिंदी फिल्में बनाते ही हैं। तो ये भाषायी मेल मिलाप और बढ़ना चाहिए। अब हम तमिल भाइयों पर हिंदी थोपने की गलती न करें। इसे स्वाभाविक तौर पर आगे बढ़ने दें। जिस तरह से तमिल भाइयों को उत्तर भारत का खाना पसंद आने लगा है वैसे बोली के स्तर पर भी सामंजस्य बढ़ेगा। भाषाई दीवारें दरकेंगी और एक दिन हिंदी तमिल भाई भाई का नारा लगेगा।




-         --विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 

( TAMILNADU, CHENNAI CENTRAL EGMORE,  HINDI, HOTEL GOLDEN TOWER LODGE, PERIAMET,  FOOD  ) 

Thursday, November 26, 2015

अभेद्य रहा है वेलोर का किला

महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन के बाद हम वापसी को चल पड़े हैं। हमारी ट्रेन काटपाडी जंक्शन से है चेन्नई के लिए   कोवाई एक्सप्रेस ।   श्रीपुरम से काटपाडी जंक्शन कोई 18 किलोमीटर है आटोवाले 180 रुपये मांग रहे हैं। पर हमें सलाह दी गई थी, कि बस से न्यू बस स्टैंड पहुंचे फिर वहां से दूसरी बस लें। हमें मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर से न्यू बस स्टैंड के लिए बस मिल गई। ये बस पूरे वेलोर शहर के चक्कर काटती हुई न्यू बस स्टैंड पहुंचती है। रास्ते में आता है वेलोर का किला यानी वेलोर फोर्ट।

शहर के बीचों बीच स्थित वेलोर का किला दक्षिण भारत में ऐसे किलों शामिल है जो सुरक्षा के लिहाज से शानदार रणनीति के तहत बनाया गया था। किले के चारों तरफ विशाल तालाब है। सबसे अच्छी बात है कि ये तालाब आज भी बेहतर हालात में है। इसका पानी स्वच्छ और निर्मल दिखाई देता है। ये किला कब बना इसको लेकर कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है पर माना जाता है कि ये किला 16वीं सदी का है। इसे विजयनगर के राजाओं ने बनवाया था। 1526 से 1595 के बीच शासन करने वाले वोमी नायक के समय इस किले के निर्माण का उद्धरण मिलता है। 

वेलोर अंग्रेज और फ्रेंच लोगों के बीच लड़े गए कई युद्धों का भी साक्षी शहर रहा है।    आंबुर (1749), आरकोट (1751) और वानडिवासी (1760) के युद्ध वेलोर की धरती पर लड़े गए। ब्रिटिश शासन काल में टीपू सुलतान के परिवार को वेलोर किले में कैदी के तौर पर रखा गया था। यह किला विजयनगर के बाद बीजापुर, मराठा, मुगल और अंत में ब्रिटिश शासन के अधीन रहा। किले के अंदर टीपू महल, हैदर महल, कैन्डी महल देखे जा सकते हैं।

वेलोर शहर की खासियत है कि ये दक्षिण के राज्य कर्नाटक, केरल और आंध्र से सड़क और रेलमार्ग से भली प्रकार जुड़ा हुआ है। यह रेल और सड़क मार्ग का प्रमुख जंक्शन है। यहां से आपको कहीं भी जाने के लिए बस और ट्रेन मिल सकती है।

जलकंडेश्वर मंदिर – वेलोर किले के अंदर जलकंडेश्वर मंदिर स्थित है। यह विजयनगर राजाओं के कला शिल्प और स्थापत्य का प्रतिनिधि मंदिर है। ये महादेव शिव का मंदिर है जो अब भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण के अधीन है। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि चिन्ना बोमी नायक को स्वप्न में शिव ने दर्शन दिए जिसके बाद इस मंदिर का निर्माण कराया गया।

वेलोर सेंट्रल जेल का भी अपना ऐतिहासिक महत्व है। 1830 में बने इस जेल में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राजागोपालचारी, के कामराज, सी अन्नादुर्रै, वी वी गिरी जैसे लोग जेल काट चुके हैं। वेलोर का दूसरा बड़ा आकर्षण है क्रिश्चियन मेडिकल कालेज। इसकी स्थापना सन 1900 में हुआ। धीरे धीरे अस्पताल बड़ा आकार लेता गया। आज यह देश के सबसे सम्मानित और इमानदारी से ऊपचार करने वाले अस्पतालों में गिना जाता है।


हम शहर घूमते हुए न्यू बस स्टैंड से आटो रिक्शा करके काटपाडी जंक्शन पहुंच जाते हैं। काटपाडी जंक्शन से बिहार और यूपी की ओर जाने वाले सभी ट्रेने महीनों पहले से भरी रहती हैं। इन सभी ट्रेनों  सीएमसी वेलोर में उपचार कराने आने वाले मरीज और उनके तिमारदार भरे होते हैं। अपनी ट्रेन का इंतजार करते हुए हमारी ऐसे कई परिवारों से मुलाकात होती है।

लोगों से बातों बातों में हमारी ट्रेन कोवाई एक्सप्रेस का भी समय हो जाता है। खाने का समय  हो गया है इसलिए मैं स्टेशन की कैंटीन से बिरयानी पैकेट खरीद कर अपने कोच की ओर बढ़ता हूं। काटपाडी से चेन्नई  129 किलोमीटर है। ट्रेन रात दस बजे के बाद पहुंचेगी। हमने अपने होटल को देर से पहुंचने की जानकारी फोन करके दे दी है। 
 - vidyutp@gmail.com  
( VELLORE, TAMILNADU, FORT, KATPADI JN KOVAI EXPRESS, 12656, CMC HOSPITAL) 


Wednesday, November 25, 2015

गोल्डेन टेंपल वेलोर (महालक्ष्मी मंदिर) का दर्शन


हमारी ट्रेन वेलोर कैंट रेलवे स्टेशन पर बिल्कुल समय पर पहुंची। ये एक छोटा सा स्टेशन है, वेलोर शहर का। वैसे वेलोर का बड़ा और मुख्य स्टेशन काटपाडी जंक्शन है। पर वेलोर कैंट से महालक्ष्मी मंदिर की दूरी महज 7 किलोमीटर है और काटपाडी जंक्शन से 16 किलोमीटर है। लिहाजा हमारे ट्रेन में सहयात्री सरवनन जी ने बता दिया था कि आप वेलोर ही उतर जाएं। वेलोर कैंट पर ज्यादा चहल पहल नहीं है। बाहर आने पर एक आटो रिक्शा वाले से किराया तय किया 110 रुपये में श्रीपुरम। आटो करीब दो किलोमीटर चलने के बाद शहर से बाहर पतली इकहरी सड़क पर भाग रहा था। थोड़ी देर में हम श्रीपुरम में थे। 

श्रीपुरम यानी शक्तिअम्मा की बसाई हुई दुनिया। यहां है महालक्ष्मी मंदिर। पर    हमें भूख लगी थी लिहाजा सोचा दर्शन से पहले पेट पूजा ही कर ली जाए। बचपन में सुना था, भूखे भजन न होए गोपाला। इसलिए अपना लगेज मंदिर के लगेज रूम में जमा कराने के बाद मंदिर के मुख्यद्वार के बाहर के रेस्टोरेंट में खाने के लिए पहुंच गए। एक पंक्ति में तीन होटल दिखाई देते हैं।   यहां खाने पीने की दरें भी काफी वाजिब हैं। यानी 50 और 60 रुपये में थाली। जो दक्षिण भारत के अन्य शहरों से अभी कम है। खाना भी अच्छा है।  एक और अच्छी बात इन होटलों में मिनरल वाटर लेना हो तो 5 रुपये देकर अपना बोतल भर लिजिए। ये बड़ी अच्छी बात लगी हमें।


वेलोर के होटलों में खाने पीने के नाम पर कोई लूट नहीं। हालांकि यहां मंदिर की ओर से संचालित कोई कैंटीन नहीं है। पर मंदिर के अंदर फास्ट फूड मिलता है। तो पेट पूजा के बाद बाद हमलोग मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लग गए। लाइन में लगने से पहले जूते और बैग आदि जमा कराने पड़े। मंदिर में दर्शन के लिए काफी लंबी परिक्रमा करनी पड़ती है।

 1500 किलोग्राम सोना -  अब थोड़ी सी बात महालक्ष्मी मंदिर वेलोर की कर लें। यह मंदिर गोल्डेन टेंपल के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि मंदिर में बड़ी मात्रा में सोना लगा है। सौ एकड़ में बने मंदिर का उदघाटन 15 अगस्त 2007 को हुआ। मंदिर पर 1500 किलोग्राम सोने की पत्तर चढ़ाई गई है। जबकि श्री हरिमंदिर साहिब (अमृतसर) जिसे स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है उसमें 750 किलोग्राम सोने का इस्तेमाल हुआ है। मंदिर का निर्माण कराने वाले शक्तिअम्मा का जन्म 1976 में हुआ था।

माना जाता है कि मंदिर के निर्माण में 300 करोड़ रुपये का खर्च आया। मंदिर का विस्तार 1.8 किलोमीटर में है। अब मंदिर की ओर से स्कूल और रियायती हास्पीटल का संचालन भी किया जाता है। वैसे वेलोर तमिलनाडु का वह जिला है जो कम बारिश के कारण कृषि में सबसे पिछड़ा हुआ है। पर महालक्ष्मी मंदिर के कारण वेलोर को नई पहचान मिली है। इससे पहले वेलोर सीएमसी हास्पीटल के कारण देश भर में चर्चित है। बड़ी संख्या में देश भर के लोग सीएमसी वेलोर में इलाज के लिए आते हैं।



तिरूपति की तरह दर्शन -   कड़ी सुरक्षा जांच के बाद हमलोग मंदिर के पहले हॉल में पहुंचे। दर्शन के दौरान भीड़ नियंत्रण के लिए तिरूपति बालाजी की तरह यहां भी तीन हाल बने हैं। दो हाल खाली होने के बाद हमारा नंबर आया। हाल में हमारी मुलाकात बिहार के मोतिहारी से आए एक परिवार से हुई। धनबाद में काम करने वाले सिंह साहब वेलोर में अपना इलाज कराने आए हैं। डाक्टर का एप्वाइंटमेंट मिलने में अभी कई दिन लगेंगे। एक दिन पहले आए थे महालक्ष्मी मंदिर का दर्शन करने। मंदिर का वैभव इतना भाया कि आज अपने पूरे परिवार को लेकर आए हैं। खैर हमलोग आगे बढ़े। पतले लंबे घुमावदार गलियारों को पार करते हुए चलने के बाद चौडा विशाल गलियारा आया। 



मंदिर परिसर में चारों तरफ हरियाली विराज रही है और हम चलते जा रहे हैं तेज कदमों से। और हम पहुंच गए सोने पत्तरों से आवृत महालक्ष्मी मंदिर के प्रवेश द्वार पर। वाकई सुनहले मंदिर की भव्यता को देर तक निहारते रहने की इच्छा होती है। पर महालक्ष्मी के दर्शन के बाद आगे बढ़ते जाना है।

तीन घंटे में दर्शन -  महालक्ष्मी मंदिर में दर्शन में आपको समान्य दिनों में तीन घंटे का वक्त लगता है। बाहर निकलने से पहले गुड़ की खीर का प्रसाद सभी श्रद्धालुओं को दिया जाता है। बाहर निकलने से पहले मंदिर की ओर से संचालित बड़ी दुकान है, जहां आप यादगारी के लिए खरीददारी कर सकते हैं।


55,000   वर्ग फीट है मंदिर का दायरा
1.8   किलोमीटर में है महालक्ष्मी मंदिर का विस्तार
1500    किलोग्राम शुद्ध सोना जडा है मंदिर में
300   करोड़ की अनुमानित लागात आई है मंदिर के निर्माण में
2007   में हुआ महालक्ष्मी मंदिर का उदघाटन
500    सुनार और शिल्पियों ने छह साल तक काम करके दिया मंदिर का अदभुत रूप।
मंदिर की वेबसाइट- http://www.sripuram.org/
-विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail. com

( VELLORE,  MAHALAXMI TEMPLE ) 





Tuesday, November 24, 2015

तिरुवनमलै के शिव – अरुणाचलेश्वर महादेव

पुडुचेरी से हमारी हमारी यात्रा  -   पुडुचेरी से हमारा आगे का सफर शुरु हुआ बस से। 
इस बस में  तमिल में बड़ा ही मधुर गीत बज रहा था। पड़ोस वाली सीट पर बैठी लड़की ने पूछने पर बताया कि यह इलैया राजा के गीत हैं। बस में  हमें  जो लड़की मिली जो हिंदी फर्राटे से  बोल रही थी । उसने बताया कि वह हिंदी  फिल्मों को गाने सुनकर हिंदी  सिखती है। 

बस ने एक घंटे में तमिलनाडु के शहर विलुपुरम पहुंचा दिया। पुडुचेरी से विलुपुरम की दूरी 37 किलोमीटर है। विलुपुरम तमिलनाडु का एक जिला है। यह 1993 में कुडलुर से अलग होकर  जिला बना। इसकी सीमाएं पुडुचेरी कुडलुर और तिरुवनमलाई  से लगती हैं। वैसे पुडुचेरी से विलुपुरम के लिए ट्रेन सेवा भी है। पर इस मार्ग पर ट्रेने कम हैं। बस हमेशा चलती रहती है।
 हमलोगों को बस से जाते हुए विलुपुरम रेलवे  स्टेशन दिखाई दे गया तो हम इसके पास ही उतर गए। और टहलते हुए रेलवे स्टेशन पहुंच गए। विलुपुरम से हमारी ट्रेन 11.40 बजे थी खड़गपुर एक्सप्रेस।  यह ट्रेन स्टेशन पर चलने  को तैयार खड़ी थी। 
हमें थोड़ी शंका थी कि ट्रेन में जनरल डिब्बे में जगह मिलेगी या नहीं। पर ये क्या जनरल डिब्बे में हमारे पूरे डिब्बे में महज पांच सात लोग ही थे। ट्रेन ठीक 11.40 में चल पड़ी। यहां से 68 किलोमीटर के सफर के बार आया तिरुवनमलै रेलवे स्टेशन, जहां पर अरुणाचलेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है। ट्रेन में हमारे साथ चल रहे, एम सरवनन मिले जिन्होंने इस शिव मंदिर के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उनका धन्यवाद।


तमिलनाडु के जिले तिरुवनमलै में शिव का अनूठा मंदिर है। अनामलाई पर्वत की चोटी की तराई में इस मंदिर को अनामलार या अरुणाचलेश्वर शिव मंदिर कहा जाता है। शिव के इस मंदिर में हर माह की पूर्णिमा को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। खासतौर कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है। श्रद्धालु यहां अनामलाई पर्वत की 14 किलोमीटर लंबी परिक्रमा करके शिव से कल्याण की मन्नत मांगते हैं। माना जाता है कि शिव का विश्व में सबसे बड़ा मंदिर है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण थेवरम और थिरुवासगम ने करवाया था।


मंदिर की कथा
   -   एक बार ब्रह्मा ने हंस के रूप धारण किया और शिव का ताज को देखने के लिए उड़ान भरी।   ताज को देखने में असमर्थ रहने पर ब्रह्मा ने एक थाजुंबू (केवड़ा,  White Lotus) के पुष्प को जो   शिव का   मुकुट    नीचे   गिर रहा था ताज के बारे में पूछा। फूल   ने कहा    है   कि   वह तो चालीस हजार   साल   के   लिए    गिर    गया    था। ब्रह्मा को लगा कि वे ताज तक नहीं पहुंच पाएंगे तब उन्होंने फूल को एक झूठे   गवाह   के    रूप में   कार्य   करने को राजी किया। 

फूल   ने ऐलान किया   कि ब्रह्मा   ने शिव का ताज   देखा   था।   शिव   इस धोखे पर   गुस्सा   हो गए। और ब्रह्मा को शाप दिया कि आपका कोई मंदिर धरती पर नहीं बनेगा। वहीं केवडा के फूल को शाप दिया कि उसका शिव की पूजा में इस्तेमाल नहीं होगा। भले ही केवड़ा में भीनी भीनी खूशबु होती है, इससे इत्र और अगरबत्तियां बनती हैं पर पूजा में इस्तेमाल नहीं होता। उस जगह पर जहां शिव ने ब्रह्मा को शाप दिया वह स्थल तिरुवनमलै है जहां पर अरुणाचलेश्वर का मंदिर बना है।

पर्वत है मंदिर का प्रतीक - आम तौर पर देवताओं के मंदिर पहाड़ों पर होते हैं। पर यहां मंदिर पहाड की तराई में है। वास्तव में यहां अनामलाई पर्वत ही शिव का प्रतीक है। पर्वत की ऊंचाई 2668 फीट है। यह पर्वत अग्नि का प्रतीक है। तिरुवनमलै शहर में कुल आठ दिशाओं में आठ शिवलिंग स्थापित हैं। इंद्र, अग्नि, यम, निरूथी, वरुण, वायु, कुबेर, इशान लिंगम नामक कुल आठ लिंगम हैं। हर लिंगम के दर्शन के अलग अलग लाभ हैं।

कार्तिक दीपम  कार्तिक पूर्णिमा पर इस मंदिर की शानदार उत्सव होता है। इसे कार्तिक दीपम कहते हैं। पूरे पर्वत पर तब रौनक रहती है। इस मौके पर विशाल दीपदान किया जाता है। हर पूर्णिमा को परिक्रमा करने का विधान है जिसे गिरिवलम कहा जाता है। इस मंदिर में तमिल फिल्मों के सुपर स्टार रजनीकांत की बड़ी आस्था है। उन्होंने 14 किलोमीटर के परिक्रमा पथ पर अपने खर्च से सोडियम लाइटें लगवाई हैं।


खुलने का समय - मंदिर सुबह 5.30 बजे खुलता है और रात्रि 9 बजे तक श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुला रहता है। मंदिर की व्यवस्था तमिलनाडु राज्य प्रशासन देखता है। सभी पूजा के लिए दरें तय है। मंदिर में नियमित अन्नदानम भी चलता है। साल 2002 से चलने वाले अन्नदानम में रोज सैकड़ो लोग भोजन पाते हैं। मंदिर की ओर से श्रद्धालुओं के रहने का भी इंतजाम किया गया है। यहां गेस्ट हाउस में 100 से लेकर 400 रुपये में कमरे उपलब्ध हैं। ( http://www.arunachaleswarartemple.tnhrce.in/) वैसे तिरुवनमलै शहर में रहने के लिए और भी होटल उपलब्ध हैं।


कैसे पहुंचे   चेन्नई से तिरुवनमलाई की दूरी 200 किलोमीटर है। यहां बस से भी पहुंचा जा सकता है। ट्रेन से जाने के लिए चेन्नई से वेल्लोर होकर या फिर चेन्नई से विलूपुरम होकर जाया जा सकता है। आप विलुपुरम या वेल्लोर में रूक कर भी तिरुवनमलै जाकर मंदिर दर्शन करके लौट सकते हैं।


- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( ARUNACHALESHWAR TEMPLE,  TIRUVANNMALA)