Saturday, October 31, 2015

इडली-डोसा-जूस आईसक्रीम- कांचीपुरम और सरवन भवन

दिल्ली में रहते हुए हम कई बार सरवन भवन में दक्षिण का स्वाद लेने जाते हैं तो चेन्नई में जब हम सरवन भवन के ही शहर में थे तो ये मौका कैसे छोड़ देते भला। कांचीपुरम में भी सरवन भवन की शाखा है। सो कांचीपुरम भ्रमण पूरा होने पर हम पहुंच गए उनके रेस्तरां में। कांचीपुरम का सरवन भवन बस स्टैंड के पास मुख्य बाजार में है। दो मंजिला रेस्टोरेंट में नीचे टिफीन सेवाएं हैं तो ऊपर लंच और डिनर सेवाएं।


सरवन भवन के तमिलनाडु में स्थित रेस्टोरेंट्स में खाने पीने की दरें दिल्ली की तुलना में आधी हैं। जैसे यहां मसाला डोसा 60 रुपये का है। टिफीन वाले हिस्से  में सर्विस काफी तेज है। खास बात ये है कि यहां आपको चाय और कॉफी भी मिल जाएगी। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग यहां चाय सुड़कते हुए भी मिल जाते हैं। कोई भी यहां से वापस नहीं लौटे इसलिए सरवन भवन ने ताजे फलों के जूस का काउंटर शुरू कर दिया है। साथ ही अपने ब्रांड की कई तरह की आइसक्रीम बनाना भी आरंभ कर दिया है।


कांचीपुरम के सरवन भवन में दो तरह के डायनिंग हॉल हैं। समान्य की तुलना में वातानुकूलित वाले डायनिंग हॉल में टैक्स के कारण दरें ज्यादा रहती हैं। हमलोग समान्य हॉल में ही बैठ गए। चेन्नई में सरवन भवन के 16 रेस्टोरेंट हैं। पिछले दो दशक में उनके रेस्टोरेंट की संख्या बढ़ी है। चेन्नई में पेरियामेट इलाके में उनके रेस्टोरेंट में दुबारा जाने का मौका मिला।

सरवन भवन के हर रेस्टोरेंट में मीनू एक जैसा ही है। दरें भी एक सी हैं।   कांचीपुरम के सरवन भवन में हम अपनी अपनी पसंद के अलग-अलग व्यंजनों का ऑर्डर देते हैं। बाद में आइसक्रीम का भी लुत्फ उठाते हैं। आईसक्रीम की दरें काफी वाजिब हैं। दक्षिण में घूमते हुए सरवन भवन हमारा फेवरिट बन गया। 


हमें पुडुचेरी के जवाहर लाल नेहरू स्ट्रीट पर भी सरवन भवन देखने को मिला पर उसका मालिकाना हक चेन्नई से अलग समूह का है। चेन्नई के सरवन भवन की खास बात यह है कि इसमें न सिर्फ दक्षिण भारतीय बल्कि अब उत्तर भारतीय व्यंजन भी इसके मीनू में शामिल हो चुके हैं। मतलब की आपको कुछ भी चाहिए आप सरवन भवन से वापस नहीं जा सकते।
पेट पूजा के  बाद हमलोग कांचीपुरम मुख्य रेलवे स्टेशन पर पहुंचे गए । यहां  से फिर तांब्रम के लिए लोकल ट्रेन में सवार हो गए।



- विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com
(SARVANA BHAWAN, KANCHIPURAM, TAMILNADU) 

Friday, October 30, 2015

यहां शिव और पार्वती करते हैं नृत्य - कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम

कांचीपुरम भ्रमण में हमारा आखिरी पड़ाव था कैलाशनाथ मंदिर। हमारे आटो वाले भाई ने कह दिया था कि यहां के बाद आपको बस स्टैंड छोड़ दूंगा। फिर मेरी सेवा समाप्त। सो हम कैलाश नाथ मंदिर को अच्छी तरह निहार लेना चाहते थे।   कांचीपुरम शहर के पश्चिम दिशा में स्थित यह मंदिर सबसे प्राचीन और दक्षिण भारत के सबसे शानदार मंदिरों में एक है।

 लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित स्मारकों की सूची में है। केंद्र सरकार की एजेंसी ने इस मंदिर का रखरखाव बेहतर कर रखा है। मंदिर के बाहर सुंदर हरित परिसर है। कैलाशनाथ मंदिर पल्लव कला का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर के निर्माण में द्रविड़ वास्तुकला की छाप देखने को मिलती है। वास्तु के लिहाज से ये मंदिर महाबलीपुरम के समुद्रतटीय मंदिर से मिलता जुलता है।


कैलाशनाथ मंदिर को आठवीं शताब्दी में पल्लव वंश के राजा राजसिम्हा या नरसिंह वर्मन द्वितीय ( 700 से 728 ई) ने अपनी पत्नी की इच्छा पूर्ति करने के लिए बनवाया था।  मंदिर का निर्माण 658 ई में आरंभ हुआ और 705 ई में जाकर पूरा हो सका। मंदिर के अग्रभाग का निर्माण राजा के पुत्र महेन्द्र वर्मन द्वितीय के करवाया था।

राजा की रूचि संगीत नृत्य और कला में काफी गहरी थी जो इस मंदिर में परिलक्षित होती है। कई लोग ये मानते हैं कि राजसिम्हा शिव का भक्त और संत प्रवृति का था। शिव ने उसके सपने में आकर मंदिर निर्माण की प्रेरणा दी थी। मंदिर में मूल आराध्य देव शिव के चारों ओर सिंहवाहिनी देवी दुर्गा, विष्णु समेत कुल 58 देवी-देवताओं की मूर्तियां है। पल्लव राजाओं की विभिन्न युद्ध-गाथाएं भी यहां ग्रेनाइट पत्थर से बनी वेदी के ऊपर उकेरी गई हैं जिन्हे देखकर लोग आनंदित होते हैं। कैलाशानाथ मंदिर परिसर के नैऋत्य कोण में बना है और परिसर की पूर्व एवं उत्तर दिशा पूरी तरह से खुली होकर निर्माण रहित है। इस प्रकार की स्थिति वास्तु का एक अनुपम उदाहरण है।

शिव पार्वती की नृत्य प्रतियोगिता - मंदिर में देवी पार्वती और शिव की नृत्य प्रतियोगिता को दीवरों पर चित्रों में दर्शाया गया है। यहां पार्वती की हंसती हुई प्रतिमा देख सकते हैं। मूल मंदिर के निकट शिव-पार्वती की नृत्य-प्रतियोगिता के दृश्य भी बहुत मनोरम है। मंदिर में बनी मूर्तियों की नक्काशी की उत्कृष्टता पर निगाहें अटकी रह जाती है।

मंदिर का एकमात्र गोपुरम ( प्रवेश द्वार) पूर्व दिशा में है। मंदिर परिसर में आने के दो द्वार है। एक बड़ा द्वार परिसर के पूर्व आग्नेय में है जो कि, वास्तुनुकुल स्थान पर नहीं होने के कारण आमतौर पर बंद रहता है। जबकि, दूसरा छोटा द्वार परिसर की दक्षिण दिशा में है जहां से श्रद्धालु आते-जाते है। मंदिर के ईशान कोण में बहुत बड़ा तालाब है।

बैकुंठ की गुफा - कैलाशनाथ मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में एक गुफा है। यहां के पुजारी जी बताते हैं कि इस गुफा को अगर पार कर लेते हैं तो आप बार बार जन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और सीधे बैकुंठ की प्राप्ति होगी। पर इस गुफा में प्रवेश के लिए 10 रुपये का टिकट लेने को कहते हैं। मैंने देखा कुछ श्रद्धालु जो गुफा से सफलतापूर्वक बाहर निकले वे बडी मुश्किल से निकल पा रहे थे। हमने कहा, मुझे फिलहाल बैकुंठ की कामना नहीं है।

खुलने का समय – मंदिर सुबह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक खुला रहता है। कैलाशनाथ मंदिर में आपके मार्ग दर्शन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से अधिकृत गाइड उपलब्ध हैं। हालांकि यहां अनाधिकृत गाइड भी चक्कर लगाते रहते हैं।

( KANCHIPURAM, KAILASHNATH TEMPLE,  SHIVA ) 


कांचीपुरम के कैलाश नाथ मंदिर का चौबारा। 



Thursday, October 29, 2015

एकंबरनाथ - शिव का सबसे विशाल और अदभुत मंदिर

वैसे तो देश में शिव के लाखों मंदिर हैं, उनमें 12 ज्योतिर्लिंग की खास प्रसिद्धि है। पर शिव का कांचीपुरम स्थित एकंबरनाथ मंदिर अपनी विशालता और स्थापत्य कला की दृष्टि से सबसे अदभुत और अलग मंदिर है। यह कांचीपुरम शहर के मंदिरों में भी सबसे विशाल है। मंदिर 40 एकड़ में फैला हुआ है। इस मंदिर को पल्लव राजाओं ने सातवीं शताब्दी में बनवाया था। बाद में इसका पुनरुद्धार चोल और विजयनगर के राजाओं ने भी करवाया।
दक्षिण के पंचभूत स्थलों में एक -  कांचीपुरम का एकंबरनाथ मंदिर तमिलनाडु के पंचभूत स्थलम के पांच पवित्र शिव मंदिरों में से एक है। यह धरती तत्व का प्रतिनिधित्व करता है। इस श्रेणी के शेष चार और प्रतिष्ठित शिव मंदिरों में चिदंबरम नटराज (आकाश), थिरूवन्नामलाई अरूणाचलेश्वर (अग्नि), थिरूवनाईकवल जम्बुकेश्वर (जल) और कालहस्ती नाथर (वायु) माने जाते हैं।

विशाल 11 मंजिला मंदिर - कांचीपुरम का एकंबरनाथ का मंदिर कुल 11 मंजिलों का है। यह मंदिर दक्षिण भारत के सबसे ऊंचे मंदिरों में एक है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु इसकी विशालता देखकर मुग्ध हो जाते हैं। मंदिर में बहुत आकर्षक मूर्तियां देखी जा सकती हैं। साथ ही यहां का 1000  स्तंभों वाला का मंडपम भी खासा लोकप्रिय है। 

विशाल गोपुरम - मंदिर में प्रवेश करने के साथ ही इसका विशाल गोपुरम श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। मंदिर में विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय की ओर से बनवाया गया यह राजा गोपुरम या मुख्य प्रवेश द्वार 59 मीटर ऊंचा है।
जब आप मंदिर के मुख्य चौबारे में प्रवेश करते हैं तो विशाल गलियारा आपका स्वागत करता है। इसके दोनों तरफ की नक्काशी देखते ही बनती है। गलियारे के दोनों तरफ देवी देवताओं की आकर्षक मूर्तियां निर्मित की गई हैं। मंदिर परिसर में ऐसे कुल पांच बड़े गलियारे निर्मित किए गए हैं। 

गैर हिंदूओं का प्रवेश निषेध-  मंदिर के गलियारे में एक सीमा के बाद एक बोर्ड मिलता है जिस पर लिखा है कि यहां से आगे गैर हिंदुओं का प्रवेश निषेधित है। मंदिर में अंग्रेजी में लिखा है। खास तौर विदेशी नागरिकों के लिए। यहां लिखा है-  अपनी धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए इस सीमा के बाद गैर हिंदू लोगों के लिए प्रवेश की अनुमति नहीं है। आप यहीं तक मंदिर के वास्तु शिल्प का आनंद लें। 

NOTICE FOREIGNERS OUR  TRADITONAL CUSTOMS AND USAGE DOES NOT PERMIT NON HINDUS TO INTER THE SANCTUM. PLEASE ENJOY THE TEMPLES BEAUTY UPTO THIS LIMIT. DONT FOCUS YOUR CAMERAS TOWARDS THE SANCTUM.   हां, हिंदू लोग पूरे मंदिर का मुआयना कर सकते हैं।


बालू का शिवलिंगम - आगे बढ़ने पर मंदिर के मुख्य मंडप में आप प्रवेश करते हैं। यहां सृष्टि के सृजक और विनाशक शिव विराजमान हैं। यहां पार्वती का कोई मंदिर नहीं हैं। क्योंकि शहर का कामाक्षी मंदिर उनका प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर का शिवलिंग बालू का बना हुआ माना जाता है। यह ढाई फीट लंबा है। इसका जलाभिषेक नहीं होता। इसका तैलाभिषेक करके पूजन किया जाता है। श्रद्धालुओं को शिवलिंगम तक जाने की अनुमति नहीं है। मंदिर में भगवान विष्णु की भी एक छोटी प्रतिमा है जिन्हे यहां वामन मूर्ति कहा जाता है।

आम के वृक्ष से प्रकट हुए थे महादेव - मंदिर परिसर में एक आम का वृक्ष है। इसे 3500 साल पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि इसी वृक्ष के नीचे पार्वती ने शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था। शिव प्रसन्न होने के बाद आम्र वृक्ष में प्रकट हुए इसलिए उनका नाम एकअंब्रेश्वर पड़ा। यानी आम वृक्ष के देवता। तो ये हैं एकंबरनाथ महादेव। 

आम के इस पेड़ के तने को काटकर मंदिर में धरोहर के रूप में रखा गया है। मंदिर परिसर में स्थित आम के वृक्ष को भी श्रद्धालु नमन करते हैं। तमिलनाडु के कांचीपुरम में इस छठी शताब्दी के मंदिर को पंचभूत स्थलम के पांच पवित्र शिव मंदिरों में से एक का दर्जा प्राप्त है और इनमें यह धरती तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।


एक हजार स्तंभ और शिवलिंगम - एकंबरनाथ मंदिर का एक मुख्य आकर्षण अविराम काल मंडपम भी हैजिसमें कुल एक हजार स्तंभ हैं। इसमें भ्रमण करते हुए इसकी भव्यता में श्रद्धालु खो जाते हैं। देश में शायद ही कोई मंदिर इतना विशाल हो। 

मंदिर की भीतरी प्रांगण की दीवारों के साथ साथ 1008 शिवलिंगम भी स्थापित किए गए हैं जो मंदिर की दूसरी प्रमुख भव्यता है। इतने शिवलिंगम एक साथ किसी भी दूसरे मंदिर में नहीं हैं। मंदिर परिसर में एक सुंदर सरोवर भी है। इस सरोवर के बीच में एक गणेश की प्रतिमा है।


कांचीपुरम इडली - इस मंदिर का अदभुत प्रसाद है कांचीपुरम इडली। यह दक्षिण भारत के अन्य इडली से भिन्न है। कांचीपुरम इडली एक परंपरागत रेसिपी है जो कि कांचीपुरमतमिलनाडु में काफी प्रसिद्ध है। यह कांचीपुरम इडली वहां पर म‍ंदिरों में प्रसाद के रूप में बांटी जाती है। इसे आप एकंबरनाथ मंदिर के काउंटर से प्राप्त कर सकते हैं। 

यह कांचीपुरम इडली काफी जगह दूसरे इलाकों में भी खाई जाती है। यह इडली आम इडली की तरह फीकी और सादी नहीं होती। बल्‍कि यह काफी स्‍वाद से भरी होती है। एकबंरनाथ मंदिर के काउंटर पर इडली के अलावा खीर और अन्य प्रसाद भी प्राप्त किए जा सकते हैं। पहले कुछ साथियों से सुना था कांची इडली के बारे में। तो हमने भी मंदिर परिसर में बैठकर कांची इडली का स्वाद लिया। 

एंकबरनाथ मंदिर में भी दूसरे शिव मंदिरों की तरह महादेव के वाहन नंदी की प्रतिमा स्थापित की गई है। पर पत्थरों की बनी इस नंदी प्रतिमा को रंग कर और सुंदर रूप प्रदान कर दिया गया है। नदी के गले में कई किस्म की मालाएं सुशोभित हो रही हैं।


खुलने का समय -  एकंबरनाथ मंदिर में सुबह 6 बजे दर्शन के लिए खुलता है। यह दोपहर 12.30 बजे बंद हो जाता है। दुबारा शाम को 4 बजे खुलता है। रात्रि 8.30 बजे मंदिर बंद कर दिया जाता है। सुखद बात है कि मंदिर के बोर्ड पर खुलने और बंद होने की सूचना तमिल और अंगरेजी के साथ हिंदी में भी लिखी गई है। हर साल मार्च अप्रैल में मनाया जाने वाला फाल्गुनी उथीरम इस मंदिर का बड़ा त्योहार होता है।
-      vidyutp@gmail.com


Wednesday, October 28, 2015

कमनीय नेत्रों वाली मां- कामाक्षी मंदिर

तमिलनाडु के मदुरै में मीनाक्षी मंदिर है तो कांचीपुरम में कामाक्षी देवी का मंदिर। देवी कामाक्षी का मंदिर कांचीपुरम शहर के बीचों बीच स्थित है। हालांकि ये मंदिर कांचीपुरम के बाकी मंदिरों की तरह विशाल परिसर वाला नहीं है। पर यह श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां सबसे ज्यादा श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। डेढ एकड़ में फैला ये मंदिर देवी शक्ति के तीन सबसे पवित्र स्थानों में एक है। मदुरै और वाराणसी अन्य दो पवित्र स्थल हैं। विष्णु कांची और शिवकांची में  बात करें तो ये मंदिर शिवकांची में स्थित है।
इक्यावन शक्ति पीठों में से एक - कामाक्षी देवी मंदिर देश के इक्यावन शक्ति पीठों में से एक है। कहा जाता है कि यहां देवी की अस्थियां या कंकाल गिरा था। जहां पर मां कामाक्षी देवी का भव्य विशाल मंदिर बना है, जिसमें त्रिपुर सुंदरी की प्रतिमूर्ति कामाक्षी देवी की प्रतिमा है। यह दक्षिण भारत का सबसे प्रधान शक्तिपीठ है। मंदिर में भगवती पार्वती का श्रीविग्रह है, जिसको कामाक्षी देवी अथवा कामकोटि कहते हैं।  मंदिर में कामाक्षी देवी की आकर्षक प्रतिमा देखी जा सकती है। 
इष्ट देवी देवी   कामाक्षी   खड़ी मुद्रा में होने के बजाय बैठी मुद्रा में हैं। देवी पद्मासन (योग मुद्रा) में बैठी हैं और उनके आसपास बहुत शांत और स्थिर वातावरण है। वे दक्षिण पूर्व की ओर देख रही हैं।   मंदिर परिसर में गायत्री मंडपम भी है। कभी यहां चंपक का वृक्ष हुआ करता था। भारत के द्वादश प्रधान देवी-विग्रहों में से यह मंदिर एक है। इस मंदिर परिसर के अंदर चारदीवारी के चारों कोनों पर निर्माण कार्य किया गया है। 

एक कोने पर कमरे बने हैं, तो दूसरे पर भोजनशाला, तीसरे पर हाथी स्टैंड और चौथे पर शिक्षण संस्थान बना है। कहा जाता है कि कामाक्षी देवी मंदिर में आदि शंकराचार्य की काफी आस्था थी। उन्होंने ही सबसे पहले मंदिर के महत्व से लोगों को परिचित कराया। परिसर में ही अन्नपूर्णा और शारदा देवी के मंदिर भी हैं।यह भी कहा जाता है कि कांची में कामाक्षीमदुरै में मीनाक्षी और काशी में विशालाक्षी विराजमान हैं। मीनाक्षी और विशालाक्षी विवाहिता देवियां हैं जबकि कामाक्षी अविवाहित देवी।


सरस्वती और लक्ष्मी का युगल-भाव    -   यह भी कहा जाता है कि देवी कामाक्षी के नेत्र इतने कमनीय या सुंदर हैं कि उन्हें कामाक्षी संज्ञा दी गई। वास्तव में  कामाक्षी में मात्र कमनीय या काम्यता ही नहीं, वरन कुछ बीजाक्षरों का यांत्रिक महत्त्व भी है। यहां पर '' कार ब्रह्मा का, '' कार विष्णु का, '' कार महेश्वर का प्रतीक है। इसीलिए कामाक्षी के तीन नेत्र त्रिदेवों के प्रतिरूप हैं। सूर्य-चंद्र उनके प्रधान नेत्र हैं। अग्नि उनके भाल पर चिन्मय ज्योति से प्रज्ज्वलित तृतीय नेत्र है। कामाक्षी में एक और सामंजस्य है 'का' सरस्वती का। 'मां'  महालक्ष्मी का प्रतीक है। इस प्रकार कामाक्षी के नाम में सरस्वती और लक्ष्मी का युगल-भाव समाहित है।

मंदिर का निर्माण - कामाक्षी देवी का ये मंदिर छठी शताब्दी में पल्लव राजाओं ने बनवाया था। हालांकि मन्दिर के कई हिस्सों को पुनः निर्मित कराया गया है क्योंकि मूल संरचनाएं या तो प्राकृतिक आपदा में नष्ट हो गए या फिर इतने समय तक खड़े न रह सके। चौदहवीं सदी में चोल राजाओं ने कामाक्षी मंदिर का पुनर्निर्माण कराया।  हालांकि कांचीपुरम के सभी शासकों ने भरपूर प्रयास किया कि मन्दिर अपने मूल स्वरूप में बना रहे।


मंदिर खुलने का समय - मंदिर सुबह 5.30 बजे खुलता है और दोपहर 12 बजे बंद हो जाता है। दुबारा शाम को 4 बजे खुलता है और रात्रि 9 बजे बंद हो जाता है। ब्रह्मोत्सव और नवरात्रि मंदिर के खास त्योहार हैं।

कांची कामकोटि पीठम -
शंकराचार्य परंपरा में कांची कामकोटि पीठ आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मूल पीठों में शामिल नहीं है किंतु आदि शंकराचार्य का निवास स्थल होने के कारण इसे विशेष सम्मान दिया जाता है।इसके पीठाधीश आचार्य जयेंद्र सरस्वती हैं। कांची मठ पांच पंचभूत स्थलों में से एक माना जाता है। मठ द्वारा देश भर में कई संस्कृत स्कूल और अस्पताल चलाए जाते हैं। 

फरवरी मार्च में उत्सव – मंदिर में माता का स्वर्ण जड़ित रथ है। हर शुक्रवार की शाम को माता की सवारी निकाली जाती है। हर साल फरवरी-मार्च में देवी कामाक्षी पूरे नगर की यात्रा पर निकलती हैं। इसे यहां वार्षिक महोत्सव भी कहा जाता है।


मां कामाक्षी के दर्शन -   दोपहर से पहले    हमलोग मां कामाक्षी मंदिर के प्रांगण में पहुंचे हैं। मंदिर के गोपुरम पर रंगाई पुताई का काम चल रहा है। मंदिर के अंदर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ है। थोड़ी देर पंक्तिबद्ध रहने के बाद दर्शन का सौभाग्य मिल जाता है। हम आगे बढ़ते हैं।
अगले मंदिर के द्वार पर एक सज्जन बैठे हैं। वे अपने गले से गीत के बोल और वाद्य यंत्र की ध्वनि एक साथ निकालकर मुग्ध कर देते हैं। मंदिर के अंदर कांची कामकोटि पीठम शंकराचार्य जी का पोस्टर लगा हुआ दिखाई देता है। हम बाहर निकलते हैं। मंदिर के बाहर यात्रियों के लिए गेस्ट हाउस दिखाई देता है। पर हम चल पड़ते हैं अगले मंदिर के लिए।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( KAMAKSHI  TEMPLE, KANCHIPURAM) 

Tuesday, October 27, 2015

वामन मंदिर कांचीपुरम- विष्णु की अदभुत प्रतिमा

कांचीपुरम शहर के बिल्कुल मध्य में कामाक्षी देवी मंदिर के पास ही वामन मंदिर स्थित है। वैसे तो इस मंदिर का परिसर बहुत बड़ा नहीं पर यह कांचीपुरम के अनूठे मंदिरों में से एक है। यहां भगवान विष्णु की अदभुत प्रतिमा देखने को मिलती है। भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर जिस असुर महाबली को हराया था, उसी की याद में उनका नाम वामन पड़ा था।

वामन भगवान केमंदिर में भगवान वामन ( श्रीविष्णु) की पांच मीटर ऊंची विशाल मूर्ति है। यह मूर्ति काले पत्थरों की बनी है। इसमें भगवान का एक चरण ऊपर के लोकों को नापते हुए ऊपर उठा हुआ है जबकि दूसरा चरण राजा बलि के मस्तक पर है। जब आप इस मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं तो मंदिर के पुजारी एक बांस में बहुत मोटी बत्ती अर्थात मशाल जलाकर भगवान के श्रीमुख का दर्शन कराते हैं। विष्णु की इस तरह की मूर्ति और कहीं देखने को नहीं मिलती। मंदिर में प्रवेश के लिए 2 रुपये का दान का टिकट भी है। इसी मंदिर के समीप ही सुब्रह्मण्य मंदिर भी है, जिसमें स्वामी कार्तिकेय की भव्य मूर्ति प्रतिष्ठित है।

कांचीपुरम - वामन मंदिर के सामने। 
वामन अवतार की कथा- वामन अवतार भगवान विष्णु का पांचवा अवतार है। इसकी कथा श्रीमदभागवत पुराण में आती है। कथा में देवता दैत्यों से युद्ध में पराजित होने लगते हैं। शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या से दैत्यों को लगातार जीवित कर देते हैं। खुद को हारता देख इंद्र विष्णु की शरण में पहुंचते हैं।  देवताओं के आग्रह पर वामन अवतारी श्रीहरि, राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच जाते हैं । ब्राह्मण बने श्रीविष्णु भिक्षा में तीन पग भूमि मांगते हैं । राजा बलि दैत्यगुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी अपने वचन पर अडिग रहते हुए, श्रीविष्णु को तीन पग भूमि दान में देने का वचन कर देते हैं । वामन रुप में भगवान एक पग में स्वर्ग और उर्ध्व लोकों को ओर दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लेते हैं । अब तीसरा पांव रखने को कोई स्थान नहीं रह जाता है।

तीसरा पैर मेरे सिर पर रखें - बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। ऐसे में राजा बलि यदि अपना वचन नहीं निभाए तो अधर्म होगा । इसलिए बलि अपना सिर भगवान के आगे कर देता है और कहता है तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए । वामन भगवान ने ठीक वैसा ही करते हैं और बलि को पाताल लोक में रहने का आदेश करते हैं। वहीं श्रीविष्णु को अपना वचन का पालन करते हुए, पातललोक में राजा बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार करते हैं ।

आधी कांची शिव की आधी विष्णु की-  कांचीपुरम नगरी मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में से एक है। इन सात पुरियों में साढ़े तीन पुरियां विष्णु कीं और इतनी ही शिवजी की हैं। यानी कांची नगरी आधी विष्णु की और आधी शिव की है। यहां सप्त कांची की परिकल्पना है जिसके दो भाग हैं- शिवकांची तथा विष्णुकांची। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com 
( VAMAN TEMPLE, KANCHIPURAM, SHIVA AND VISHNU  ) 

Monday, October 26, 2015

हस्तगिरी पर्वत पर विशाल वरदराज पेरुमाल मंदिर



कांचीपुरम के विशालतम मंदिरों में से एक है वरदराज पेरुमाल मंदिर। चेन्नई से ट्रेन से कांचीपुरम की ओर जाते समय कांचीपुरम शहर आने से पहले ही वरदराज पेरूमाल मंदिर की विशाल गुंबद दिखाई देने लगता है। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में उन्हें देवराजस्वामी के रूप में पूजा जाता है। 

कांचीपुरम शहर से बाहर यह मंदिर हस्तगिरी की पहाड़ियों पर स्थित है। यह मंदिर 11वीं सदी का बना हुआ है। कुल 23 एकड़ मे फैला यह मंदिर विशालता में यह कांचीपुरम के एकंबरनाथ मंदिर के बाद दूसरे स्थान पर आता है।

चोल राजाओं ने बनवाया था - वरदराज पेरुमाल मंदिर को सन 1053 में चोल राजाओं ने बनवाया था। बाद में कुलोत्तुंग चोल प्रथम और उसके बेटे विक्रम चोल ( 1118- 1135) ने इस मंदिर का पुनरुद्धार करवाया था। हालांकि विक्रम चोल शिव के बड़े भक्त थे पर उन्होने वरदराज पेरुमाल मंदिर को विकसित करने में पूरी रूचि दिखाई। मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु की खड़ी प्रतिमा है जो पश्चिम की ओर देख रहे हैं। 40 फीट के करीब ऊंची विशाल विष्णु प्रतिमा अथी ( गूलर) की लकड़ी से बनी हुई है। इन्हें 40 साल बाद लोगों के दर्शन के लिए बाहर लाया जाता है। अब 2017 में उनके बाहर लाए जाने का वर्ष है। मंदिर में कुल पांच चौबारे हैं। पृष्ठ भाग में एक विशाल सरोवर भी है। मंदिर में विष्णु के अलावा पेरुनदेवी (लक्ष्मी), नाद, भृगु, ब्रह्मा समेत कई देवताओं की भी मूर्तियां हैं। मंदिर में कुल 24 सीढ़ियां है जो गायत्री मंत्र का प्रतीक हैं।

सोने और चांदी की छिपकली - इस मंदिर में एक और अनूठी परंपरा है। वह है छिपकली पूजन की। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु सोने और चांदी की बनी छिपकली की पूजा भी करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा से कई तरह के अपशकुन कट जाते हैं और घर में वैभव और ऐश्वर्य आता है। इससे मानसिक शांति और सुरक्षा का भी भाव आता है।

विशाल कल्याण मंडपम - मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर विशाल गोपुरम बना है। बाद में इसे सफेद रंग से रंगा गया है। इस गोपुरम की ऊंचाई 160 फीट है। इसके अंदर प्रवेश करते हुए आपको दिखाई देता है 96 स्तम्भों वाला एक हॉल जिसे कल्याण मंडपम कहा जाता है। इस हॉल को विजयनगर के राजाओं ने बनवाया था। इसका आधार तल दो मीटर ऊंचा है। इस हाल के प्रत्येक स्तंभ पर शानदार नक्काशी की गई है। इस नक्काशी लोग घंटों निहारते रह जाते हैं। इन स्तंभो पर खास तौर पर घोड़े दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर यह प्रतीत होता है कि 11वीं सदी में वास्तुकला कितनी समृद्ध रही होगी और कलाकारों ने अपने शिल्प का कितना उत्कृष्ट देने की कोशिश की होगी। भव्य और विशालकाय वरदराज पेरुमल मंदिर दक्षिण भारतीय कारीगरों की कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मंडप 575 वर्ग मीटर में फैला हुआ है।

सालाना उत्सव हर साल मई-जून में मनाया जाने वाला गरुड़ोत्सव इस मंदिर का प्रमुख त्योहार है। यह काफी रंगीन व आकर्षक तरीके से मनाया जाता है। इस दौरान मंदिर की भव्य सजावट की जाती है। इस समय हज़ारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। यह देश भर से विष्णु भक्तों को बरबस अपनी ओर खींचता है। वहीं दिसंबर जनवरी के मध्य मंदिर में वैकुंठ एकादशी मनाई जाती है। कई वैष्णव संतों ने वरदराज पेरूमाल की स्तुतियां अपने तमिल भजनों में गाई है।

कैसे पहुंचे – कांचीपुरम पूरब रेलवे स्टेशन से वरदराज पेरुमाल मंदिर की दूरी 6 किलोमीटर है। जबकि कांचीपुरम बस स्टैंड से 5 किलोमीटर दूरी है। मंदिर के मार्ग में ऊंची चढ़ाई है। मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार भी है। मंदिर सुबह 6 से 11 बजे तक और शाम को 4 से आठ बजे तक खुला रहता है।

चेन्नई से लोकल ट्रेन में चलते हुए हमारी मुलाकात सामने वाली सीट पर बैठे सुब्रमन्यम जी से हुई थी। वे 40 साल दिल्ली में रह चुके हैं, इसलिए फर्राटे से हिंदी बोलते हैं। उन्होंने कहा था कि सबसे पहले वरदराज पेरुमाल मंदिर ही जाएगा दर्शन के लिए। और हमने उनका कहा माना। तकरीबन एक घंटे से ज्यादा इस मंदिर में बीताने के बाद चल पड़े अगले मंदिर के लिए।
- vidyutp@gmail.com 

Sunday, October 25, 2015

दक्षिण की काशी कांचीपुरम - मंदिरों का शहर

कांची और काशी में कोई समानता है। है ना। तो कांचीपुरम यानी दक्षिण की काशी। जैसे काशी में ढेर सारे मंदिर हैं ठीक उसी तरह कांचीपुरम में भी मंदिर ही मंदिर हैं। चेन्नई सेंट्रल से कांचीपुरम की दूरी 80 किलोमीटर है। यहां से ट्रेन या बस से जाया जा सकता है। पर सुगम तरीका लोकल ट्रेन है। यह सस्ती भी अरामदेह भी है।
चेन्नई के लोकल बस  में सफर। 

चूंकि हम चेन्नई के तांब्रम इलाके में ठहरे थे तो वहां से कांचीपुरम 67 किलोमीटर ही है। तांब्रम रेलवे स्टेशन भी वैसे कांचीपुरम जिले में ही आता है। मानो आधा चेन्नई शहर कांचीपुरम जिले में है। हमलोग लोकल ट्रेन का टाइम टेबल देख चुके थे। उसी के अनुरूप सुबह जल्दी स्टेशन पहुंच गए। तांब्रम रेलवे स्टेशन के आठ नंबर प्लेटफार्म से सुबह 6.40 बजे कांचीपुरम जाने वाली पैसेजेंर ट्रेन मिली। वैसे ये चेन्नई बीच से चल कर आती है। 


कांचीपुरम के रास्ते में चेंगालपट्ट जंक्शन ( CGL) आया जो इस मार्ग पर बड़ा रेलवे स्टेशन है। चेंगालपेट से  पहले रेलवे लाइन के बगल में एक विशाल झील नजर आई।  इस  झील का नाम कोलावाई लेक है।  दूर झील  में कुछ मछुआरे अपनी नाव लेकर  मछली पकड़ते भी नजर आए। यहां एक और झील  भी है।  इन झीलों में सैलानियों के लिए बोटिंग का भी इंतजाम है। 29 नवंबर 2019 को चेंगालपेट्ट को अलग जिला बना दिया गया है। चेंगालपटट् को गेटवे ऑफ चेन्नई भी कहा जाता है। 


चेंगालपट्ट  से ट्रेन वापस उसी तरफ हो ली जिधर से आई थी। चेंगालपट्ट से कांचीपुरम के लिए एकहरी विद्युतीकृत लाइन है। रास्ते में दैनिक चलने वाले सहयात्रियों से बातचीत हुई। एक सज्जन मिले जो कई दशक दिल्ली में रह चुके थे। उन्हें पता चला कि कांचीपुरम घूमने जा रहे हैं तो आप कांचीपुरम ईस्ट में ही उतर जाना। स्टेशन का नाम लिखा था कांचीपुरम पूरब। हम उतर गए।

यहां से लोगों ने बताया कि वरदराज पेरूमाल मंदिर नजदीक है। पर हमें सारे प्रमुख मंदिरों के दर्शन करने थे। सो हमने एक आटो रिक्शा बुक कर लिया। अगले कुछ घंटों के लिए। मोलभाव करके तय हुआ 350 रुपये में। आटो वाले का नाम था पन्नीर। वे हमें काफी इस बात के लिए प्रेरित करने में लगे थे कि हम किसी साड़ी फैक्ट्री में साड़ियां देखने चलें। पर हमारी साड़ियों में रूचि नहीं थी। हम सिर्फ मंदिर देखना चाहते थे। सो हमने वरदराज पेरूमाल मंदिर चलने को कहा। ( पन्नीर आटो वाले-  9894448920 )


वैसे कांचीपुरम भारत के सात सबसे पवित्र शहरों में एक माना जाता है। हिन्दुओं का यह पवित्र तीर्थस्थल हजार मंदिरों के शहर के रूप में चर्चित है। 

आज भी कांचीपुरम और उसके आसपास 126 शानदार मंदिर देखे जा सकते हैं। कांचीपुरम वेगवती नदी के किनार बसा है। यह शहर चैन्नई से दक्षिण पश्चिम कांचीपुरम प्राचीन चोल और पल्लव राजाओं की राजधानी थी।

कांजीवरम साड़ियों का शहर - बात साड़ियों की करें तो कांचीपुरम अपनी रेशमी साडि़यों के लिए भी प्रसिद्ध है। जो कांजीवरम नाम से देश विदेश में मशहूर हैं। ये साडि़यां हाथों से बुनी होती हैं। जाहिर है उच्च कोटि की गुणवत्ता होती है। इसीलिए आमतौर पर सभी तमिल संभ्रांत परिवार की महिलाओं की साडि़यों में एक तो कांजीवरम साड़ी जरूर होती है। 

कांचीपुरम मुख्य रेलवे स्टेशन। 
कांजीवरम साड़ियों की उत्तर भारत में भी खूब मांग रहती है। पर एक कांजीवरम साड़ी आज की तारीख में 10 हजार रुपये या उससे अधिक में आती है। लिहाजा हमारी कांजीवरम साड़ियां खरीदने में कोई रूचि नहीं थी। पर कांचीपुरम के हर इलाके में सिल्क फैक्टरी के बोर्ड नजर आते है। आटो वाले एजेंट आपको इन सिल्क फैक्टरी में ले जाते हैं। अगर आप साड़ी खरीद लेते हैं तो उनका मोटा कमीशन बनता है। वैसे आप कांजीवरम साड़ियां अब कई ऑनलाइन वेबसाइटों के माध्यम से भी खरीद सकते हैं। इसमें ठगी होने की गुंजाइश भी नहीं है।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
( KANCHIPURAM, CHENNAI ) 

Saturday, October 24, 2015

चेन्नई का चिड़ियाघर सफेद बाघ से मुलाकात

अरिगनार अन्ना जूलोजिकल पार्क जिसे चेन्नई में लोग वेंडालूर जू के नाम से भी जानते हैं देश के सबसे पुराने और शानदार चिड़ियाघरों में शुमार है। चेन्नई में इस जू का भ्रमण करने के लिए हमने एक दिन नीयत रखा था।   सो हमलोग तांब्रम रेलवे स्टेशन के बस स्टाप से लोकल बस में बैठने के थोड़ी देर बाद ही जू के प्रवेश द्वार पर थे।


इस चिड़ियाघर में बड़ों का टिकट 30 रुपये बच्चों का 10 रुपये कैमरे का है। अगर कैमरा है तो 30 रुपये अलग से। यहां तक कि मोबाइल कैमरा, आईपैड, टैब आदि के लिए भी टिकट लेना जरूरी है। हैंडीकैम से सूट करना चाहते हैं तो 150 रुपये देने होंगे। यह जू सुबह 9 से 5 बजे तक खुला रहता है। मंगलवार को बंद रहता है। इस जू में हर रोज दर्शकों की अच्छी खासी भीड़ होती है।

जू के प्रवेश द्वार पर शानदार फव्वारा आपका स्वागत करता है। मद्रास जू की स्थापना 1855 में मूर मार्केट में हुई थी। यह देश का पहला चिड़ियाघर था। पहले ही चेन्नई शहर के मध्य में था। पर लगातार बढ़ते प्रदूषण और भीड़ के कारण वहां का वातावरण जानवरों के लिए खराब हो गया। इसलिए 1985 में इसे वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित किया गया। वर्तमान परिसर 602 हेक्टेयर में फैला है। यहां रखरखाव के लिए 257 पूर्णकालिक कर्मचारी तैनात हैं। पार्क में 138 तरह के वनस्पतियां लगाई गई हैं। चेन्नई की गरमी में भी यहां की आबोहवा सुहानी रहती है।

किराये पर साइकिल लें - चिड़ियाघर घूमने का सबसे अच्छा तरीका पैदल चलना होता है। पर यहां बैटरी वाली गाड़ियां संचालित होती हैं उनके लिए जो ज्यादा चलना नहीं चाहते। हम पैदल ही निकले थे, पर देखने में आया कि यहां पर साइकिल रेंट की सुविधा है। 15 रुपये घंटा। फिर क्या था हमने हरक्यूलिस किराये पर ले ली। इस तरह शुरू हुआ साइकिलिंग के साथ चिड़ियाघर की सैर। घूमने के लिए सड़कों पर तीर के निशान बने हैं। सो किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती। 


सबसे पहले हमने पक्षियों का बसेरा देखा। सायरस क्रेन से लेकर कई तरह के दुर्लभ पक्षी हैं यहां। आजकल यहां 12 ऑस्ट्रिच की फौज है। हालांकि ये अफ्रीका में पाए जाते हैं। पर वेंडालूर जू का सबसे बड़ा आकर्षण है सफेद बाघ। यह सफेद बाघ जब गुर्राता है तो उसकी गुर्राहट सुनकर अच्छे अच्छों की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाए। इस विशाल बाघ को देखकर जी खुश हो गया। 



अपने निवास क्षेत्र में वीरा और झांसी नामक शेर और शेरनियां आराम फरमाते मिल गए। पर इस जू का बड़ा आकर्षण लायन सफारी भी है। आप बंद बस में जाकर लायन सफारी में शेरों को अपने आसपास उन्मुक्त विचरण करते हुए देख सकते हैं। यहां चार बाघों का समूह भी आप देख सकते हैं।




क्या आपने  ऐसे हिरण के बारे में सुना है जो  भोंकता भी है।  हां तो ऐसा भी हिरण होता है। हमें  चेन्नई के चिड़ियाघर में बार्किंड डियर भी दिखाई देता है। यह अनूठी प्रजाति है जो बहुत कम ही दिखाई देती है।   वापस लौटते समय प्रवेश द्वार के पास बच्चों के लिए ढेर सारे झूले भी बने हैं। 


चिड़ियाघर के अंदर एक भोजनालय भी है। यहां किफायती दरों पर खाने पीने की सामग्री उपलब्ध है। दिन भर की सैर यादगार रही। बाहर निकलते हुए आप सोवनियर शॉप से यादगारी में खरीददारी भी कर सकते हैं। यहां आजकल जानवरों को गोद लेने की योजना भी चलाई जा रही है। स्कूली बच्चों और शिक्षकों के लिए जू एजुकेशन के पाठ्यक्रम भी चलाए जाते हैं।


कैसे पहुंचे - चेन्नई का जू वेंडलूर रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर है। चेन्नई सेंट्रल से चिड़ियाघर की दूरी 30 किलोमीटर है। आप चेंगालपट्ट की ओर जाने वाली किसी भी लोकल ट्रेन में बैठकर वेंडालूर उतर सकते हैं।    अगर सड़क मार्ग से जाएं तो तांब्रम से चेंगालपटट् जाने वाले हाईवे पर जाने वाली तमाम बसें जू के प्रवेश द्वार वाले स्टाप पर रुकती हैं। जू की वेबसाइट देखें - http://www.aazoopark.in/
- विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
(CHENNAI, ZOO, CYCLE, VENDALOOR, WHITE TIGER)