Saturday, October 31, 2015

इरूंबाई गांव के महाकालेश्वर - शिव मंदिर

पुडुचेरी के पास इरुंबाई गांव में शांत वातावरण में महादेव शिव का अदभुत मंदिर है। इसे तमिल लोग महाकालेश्वर के नाम से जानते हैं। इस शिव मंदिर को 2000 साल से ज्यादा पुराना माना जाता है। 
मंदिर की कथा कई तमिल कवियों और संतों से जुड़ी हुई है। तमिल के कई पुराने संत अपने गीतों में इरूंबाई के महाकाल की अर्चना करते पाए गए हैं। तमिल के महान कवि थेवरम के गीतों में महाकाल और देवी की अर्चना के बोल मिलते हैं। महाकाल की पूजा तमिल के जाने माने संत त्रिगुणा सामंधऱ किया करते थे। उनका काल 1200 से 1400 साल पहले का माना जाता है।

इरुंबाई के मंदिर में जो शिवलिंगम है वह कई टुकड़ों में हैं इसे तांबे के तारों से अच्छी तरह निबद्ध करके रखा गया है। किसी समय में मंदिर के पास सुंदर तालाब था जिसमें कमल के फूल खिले होते थे। आज जहां इरूंबाई गांव है कभी घना जंगल हुआ करता था। बदलते समय के साथ चोल और पांड्य राजाओं ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया है। राजाओं ने इस मंदिर सात दीवारों का निर्माण कराया। हालांकि अब मंदिर की कई दीवारें अस्तित्व में नहीं है। कोई पांच सौ साल पहले एक और तमिल संत कडुवेली सिद्ध इस क्षेत्र में हुए उन्होंने भी महाकाल की स्तुति गाई। उनके गीत गुस्से पर काबू पाने के लिए तमिल आवाम के बीच प्रसिद्ध हैं। वे प्रेम और स्नेह के गीत गाने वाले योगी थे।


इस मंदिर की व्यवस्था स्थानीय मंदिर ट्रस्ट देखता है। मंदिर सुबह 8 बजे से शाम 8 बजे तक दर्शन के लिए खुला रहता है। महाशिवरात्रि से इस मंदिर का प्रमुख उत्सव है। मंदिर में प्रसाद के तौर पर भभूत प्राप्त होता है। दर्शन के लिए कोई स्पेशल पंक्ति की आवश्वयकता नहीं है।

कैसे पहुंचे  पुडुचेरी से टिंडिवनम नेशनल हाईवे नंबर 66 से चलते जाए। टोल नाका के बाद ऑरविल क्रास से दो किलोमीटर चलने पर दाहिनी तरफ इरुंबाई गांव आता है। सड़क पर गांव का रास्ता  बताने वाला बोर्ड लगा हुआ है। इरुंबाई गांव वास्तव में ऑरविल इंटनेशनल टाउनशिप के पीछे स्थित है। आप पंचवटी हनुमान मंदिर को देखने के साथ ही इरुंबाई मंदिर जाने का कार्यक्रम बना सकते हैं।- vidyutp@gmail.com

 http://irumbaimaakaaleswarar.com/


( PUDUCHERRY, TAMILNADU, IRUMBAI, MAHAKALESHWAR TEMPLE ) 

Friday, October 30, 2015

पांच मुख वाले बजरंगबली - पंचवटी आंजनेय मंदिर

देश में हनुमान जी के कई अदभुत मंदिरों में से एक है पंचवटी हनुमान मंदिर। यह मंदिर पुडुचेरी से नौ किलोमीटर दूर पंजवडी गांव में स्थित है। इस मंदिर में हनुमान जी की खड़ी प्रतिमा है जिसके पांच मुख हैं। इसलिए इसे पंच मुखी हनुमान मंदिर या आंजनेय मंदिर भी कहते हैं।
देश में इस तरह की विलक्षण हनुमान प्रतिमा कहीं और देखने को नहीं मिलती। काले पत्थर से बनी हनुमान जी की प्रतिमा 36 फीट ऊंची और 8 फीच चौड़ी है। दावा है कि पूरे विश्व ऐसी कोई हनुमान प्रतिमा नहीं है।


मंदिर की मुख्य प्रतिमा में हनुमान के पांच रूप है। मुख्य रूप हनुमान का है। इसके अलावा नरसिम्हा, वराह, गरुड़ और अग्रीव के रूप में यहां हनुमान के दर्शन होते हैं। प्रतिमा में मुख्य मुख के दाएं और बाएं दो मुख हैं। एक मुख नीचे है जबकि  एक मुख पीछे है। जिसका दर्शन मंदिर के पृष्ठ भाग में जाने से संभव है। मुख्य मंदिर के दाहिने तरफ गणपति का मंदिर है जबकि बाईं तरफ रामदरबार सुशोभित है।
मंदिर में भक्तों को प्रसाद के रूप में दही चावल ( कर्ड राइस) मिलता है। मंदिर का प्रबंधन पंचमुखी श्री जयमूर्ति सेवा ट्रस्ट देखता है। मंदिर के निर्माण के लिए सनातन आयंगर ने जमीन दान में दी थी। मंदिर डेढ़ एकड़ भूमि में बना है। मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा 11 जून 2003 को की गई।

मंदिर में शनिवार को श्रद्धालुओं की ज्यादा भीड़ होती है। कई लोग अपनी मन्नत पूरी करने के लिए पांच शनिवार लगातार मंदिर में साधना करने आते हैं।

कैसे पहुंचे  पंचवटी हनुमान मंदिर पांडिचेरी शहर से 12 किलोमीटर आगे टिंडिवनम रोड पर स्थित है। मंदिर विलुपरम जिले में पड़ता है। पांडिचेरी से नेशनल हाईवे नंबर 66 पर कुछ दूर आगे बढ़ने पर टोल नाका आता है। टोल पार करने के बाद बायीं तरफ मुड़ने वाली सड़क पर कुछ किलोमीटर चलने के बाद पंजावड़ी गांव आता है। यहां दाहिनी तरफ वाली सड़क ऑरविल इंटरनेशनल सिटी के लिए चली जाती है। आप अपने पुडुचेरी प्रवास के दौरान इस मंदिर में दर्शन के लिए आ सकते हैं। इसके अलावा कुडुलूर, टिंडिवनम और चिदंबरम से पंचवटी मंदिर पहुंचा जा सकता है।  



कहां ठहरें - पंचवटी में रहने को कोई इंतजाम नहीं है। आप पुडुचेरी में ठहर कर मंदिर घूमने आ सकते हैं। मंदिर के रास्ते में आपको पुडुचेरी और तमिलनाडु के ग्रामीण परिवेश के दर्शन होंगे।हनुमान जी के मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार है।   
http://www.panchavatee.org/

( PUDUCHERRY, HANUMAN TEMPLE, PANCHVATI ) 



गणपति का अदभुत मंदिर - पुडुचेरी का मनाकुला विनायगर मंदिर

गणपति का अति प्रचीन मंदिर है पुडुचेरी का मनाकुल विनायगर मंदिर। इस मंदिर को लेकर न सिर्फ पुडुचेरी में बल्कि देश भर के लोगों की श्रद्धा है। इस मंदिर का इतिहास पुडुचेरी में फ्रेंच लोगों के आने के साल 1666 से भी पहले का है। शास्त्रों में गणेश के कुल 16 रूपों की चर्चा की गई है। इनमें पुडुचेरी के गणपति जिनका मुख सागर की तरफ है उन्हें भुवनेश्वर गणपति कहा गया है। इन्हें अब मनाकुल कहा जाता है। तमिल में मनल का मतलब बालू और कुलन का मतलब सरोवर से है। किसी जमाने में यहां गणेश मूर्ति के आसपास बालू ही बालू था। इसलिए लोग इन्हें मनकुला विनयागर पुकारने लगे।

पुडुचेरी में फ्रांसिसी शासन आने के बाद फ्रेंच लोगों ने कई बार इस मंदिर पर हमले की कोशिश की पर वे इसमें सफल नहीं हो सके। कहा जाता है कि फ्रेंच लोगों ने कई बार गणपति प्रतिमा को समंदर में डूबो दिया पर हर बार प्रतिमा अपने स्थान पर वापस आ जाती थी। कई बार इस मंदिर के पूजा में व्यावधान डालने की कोशिश की गई। खास तौर पर शुक्रवार को होने वाली विशेष पूजा रोकी गई।  




मंदिर तकरीबन 8000 वर्ग फीट इलाके में बना है। मंदिर की आंतरिक सज्जा स्वर्ण जड़ित है। मंदिर का गर्भ गृह अत्यंत सुंदर प्रतीत होता है। रात की रोशनी में मंदिर को देखने का आनंद कई गुना बढ़ जाता है। मंदिर के अंदर मुख्य गणेश प्रतिमा के अलावा 58 तरह की गणेश मूर्तियां स्थापित की गई हैं। मंदिर के आंतरिक दीवारों पर प्रसिद्ध चित्रकारों ने गणेश जी के जीवन से जुड़े दृश्य उकेरे हैं। इनमें गणेश जी का जन्म, सुद्धि, बुद्धि से उनका विवाह आदि के दृश्य हैं।

मंदिर में गणेश जी का 10 फीट ऊंचा भव्य रथ है। इसके निर्माण में साढ़े सात किलोग्राम सोना का इस्तेमाल हुआ है। हर साल विजयादशी के दिन गणेश जी इस रथ पर सवार होकर विहार करते हैं। अरविंदो आश्रम की मां ( मदर मीरा) की विनायक मंदिर अटूट आस्था थी। अगस्त सितंबर महीने में हर साल मनाया जाने वाला ब्रह्मोत्सव मंदिर का मुख्य त्योहार है जो 24 दिनों तक चलता है।

जो दे पैसा उसको गजराज देंगे आशीर्वाद-  मंदिर के बाहर प्रवेश द्वार पर आपको एक हाथी खड़ा मिलेगा। अगर आपके सूंड में कोई सिक्का डालेंगे तो वह आपके सिर पर आशीर्वाद की वर्षा करेगा। साथ ही अपने सूंड प्राप्त सिक्के को बगल में बैठे अपने महावत को दे देता है। 




कैसे पहुंचे – पुडुचेरी के नए बस स्टैंड से मंदिर की दूरी 4 किलोमीटर के करीब है। मंदिर बंगाल की खाड़ी सागर तट से 400 मीटर की दूरी पर है। शहर के एनसी बोस रोड और जवाहरलाल नेहरू स्ट्रीट मिलाप स्थल के पास मंदिर स्थित है। अरविंदो आश्रम भी मंदिर के बिल्कुल पास है। शहर के हर कोने से शेयरिंग आटो और स्थानीय बसें मंदिर के लिए उपलब्ध हैं।

खुलने का समय मंदिर सुबह 5.45 बजे खुलता है और दोपहर 12.30 बजे बंद हो जाता है। शाम को फिर 4 बजे दर्शन के लिए खुलता है और रात्रि 9.30 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में समान्य दर्शन की कोई फीस नहीं है। पर अर्चना टिकट 2 रुपये है जबकि स्पेशल दर्शन 20 रुपये का है। मंदिर में तीन बार प्रतिदिन अन्नदानम प्रसाद वितरित किया जाता है। मंदिर में दर्शन के लिए देश की जानी मानी हस्तियां समय समय पर पधार चुकी हैं।


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( PUDUCHERRY, GANESH TEMPLE, VINYAK )


Wednesday, October 28, 2015

थोड़ा थोड़ा जन्नत सा एहसास - पाराडाइज बीच


पुडुचेरी का यह बीच शहर से 8 किलोमीटर दूर कुड्डलोर मुख्य मार्ग पर स्थित है। इस समुद्र तट के एक ओर छोटी खाड़ी है। यहां आमतौर पर नाव द्वारा ही जाया जा सकता है। नाव पर जाते समय नीले समंदर के पानी में डॉल्फिन के करतब देखना एक सुखद अनुभव हो सकता है। यहां का वातावरण देखकर इसके नाम की सार्थकता का अहसास होता है कि वास्तव में यह स्वर्ग के समान है। हम दोपहर में पुडुचेरी पहुंचे थे।

 4 बजे शाम को अपने होटल श्री साईराम के मैनेजर से पूछा कि हम पैराडाइज बीच जाना चाहते हैं। उन्होंने कहा तुरंत जाइए नहीं तो बीच बंद हो जाएगा। होटल के चौराहे से कुडुलुर रोड  पर जाने वाली बस लें। बस से बोट हाउस पर उतर जाएं। हमने ऐसा ही किया। निजी बस का किराया था 5 रुपये प्रति सवारी। बोट हाउस पर पहले प्रवेश का टिकट था 5 रुपये बच्चे का 10 रुपये बड़ों का। यहां कार बाइक पार्किंग के लिए पैसे लगते हैं हालांकि पूरे पुडुचेरी  में पार्किंग फ्री है।  



इसके बाद शुरू होता है स्टीमर का मनभावन सफर। इसका किराया 200 रुपये आने और जाने का है। बच्चे के लिए 100 रुपये। दो तरह को मोटराइज्ड स्टीमर चलते हैं पैराडाइज बीच तक जाने के लिए। एक छोटी मोटराइज्ड नाव जिसमें 20 लोगों के बैठने की जगह होती है। दूसरी बड़ी दोमंजिला नाव जिसमें 60 लोग तक सफर कर सकते हैं। सेवा का संचालन पुडुचेरी टूरिज्म की ओर से किया जाता है। इसके अलावा आप यहां स्पीड बोट से भी सफर का आनंद उठा सकते हैं। उसके लिए थोड़ी ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ेगी।

 बोट पर सवार होने से पहले सबके लिए लाइफ जैकेट पहनाना काफी जरूरी है। इसका मतलब की समंदर के इस रोमांचक सफर में थोड़ा खतरा भी है। लहरें उछाल मारती रहती हैं इसलिए बोट संचालक सबको अपनी सीट पर बैठे रहने को कहते हैं। पर लोग हैं कि वे हर पल के सफर को कैमरे में कैद कर लेना चाहते हैं। नीले समुद्र की बलखाती लहरें तटों पर हरियाली का आवरण। देखकर दिल खुश हो जाता है। जैसे सचमुच आप स्वर्ग का आनंद लेने जा रहे हों। पर पाराडाइज बीच का आकार ज्यादा बड़ा नहीं है।



पैराडाइज बीच पर खाने पीने की कुछ सीमित दुकाने हैं। विकल्प भी सीमित हैं। मछलियों की कुछ वेराइटी। सी फूड और समोसा चाइनीज स्टफिंग के साथ। हमने 50 रुपये में चार नन्हें समोसे का आर्डर दिया। इसके बाद समंदर के साथ थोड़ी सी अटखेलियां। यहां घुड़सवारी का भी आनंद लिया जा सकता है। पैराडाइज  बीच पर आप समंदर में नहा भी सकते हैं। हालांकि यहां तट पर सुरक्षा गार्ड तैनात रहते हैं जो आपको सावधान करते रहते हैं।

 पैराडाइज बीच पर पहुंच कर पता चला कि यहां आने का स्थल से होकर भी रास्ता है। आप मेनलैंड से तीन किलोमीटर पैदल चलकर भी यहां पहुंच सकते हैं। बीच पर शाम को 6 बजे के बाद रहने की इजाजत नहीं है। लिहाजा साढ़े पांच बजे के बाद ही वार्निंग की घंटी  बजने लगती है। वापसी में हमें दो मंजिला स्टीमर मिला। इसकी छत से नजारे देखने का भी अपना ही मजा रहा। पैराडाइज बीच पर रविवार और छुट्टियों के दिन भीड़ बढ़ जाती है। हम जिस दिन पहुंचे 18 अक्तूबर संयोग से रविवार था, इसलिए तट पर रौनक थी। छुट्टी वाले दिन बोट सेवा तेजी से चलती है। बाकी के दिन वे सवारी भरने का इंतजार करते हैं। - - vidyutp@gmail.com


PUDUCHERRY- PARADISE BEACH
-                                      ( PUDUCHERRY- PARADISE BEACH, SEA FOOD  ) 







Tuesday, October 27, 2015

क्यों 16 अगस्त है पुडुचेरी का स्वतंत्रता दिवस

भारत देश को आजादी 15 अगस्त 1947 को मिली, पर देश कई हिस्से हैं जो बाद में भारतीय गणराज्य का अंग बने। इसमें पुडुचेरी, गोवा, दादरा नगर हवेली, सिक्किम खास तौर पर शामिल हैं। बाद पुडचेरी की करें तो यह कई सौ सालों से फ्रांसिसी उपनिवेश हुआ करता था। तमिलनाडु से लगा हुआ छोटा सा खूबसूरत समुद्रतटीय राज्य औपचारिक रुप से 16 अगस्त 1962 को भारतीय गणराज्य का हिस्सा बना। इसलिए पुडुचेरी अपना स्वतंत्रता दिवस 16 अगस्त को मनाता है।
स्वतंत्रता के बाद  प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु फ्रेंच उपनिवेश वाले हिस्सों को भारत में मिलाने की कोशिश में लगे थे। इसी सिलसिले में पुडुचेरी को भारतीय गणराज्य में शामिल करने की कोशिश 1948 में आरंभ हो गई थी। जून 1948 में फ्रांस के साथ भारत का एक समझौता हुआ जिसमें पुडुचेरी के लोग कहां रहना चाहते हैं इसके लिए एक जनमत संग्रह कराने का प्रस्ताव रखा गया। बाद में वी सुब्बैया के नेतृत्व में पुडुचेरी में एक स्वतंत्रता आंदोलन शुरू हुआ। सुब्बैया पहले फ्रांस समर्थक थे लेकिन बाद में उन्होंने भारत में मिलने की इच्छा जताई।

पुडुचेरी की ज्यादातर आबादी भारत में मिलने की इच्छा रखती थी। 1954 में काफी लोगों ने आवाज उठाई और बिना किसी जनमत संग्रह के ही भारत में मिलने का प्रस्ताव रखा। एक नवंबर 1954 को एक जनमत संग्रह कराया गया जिसमें पुडुचेरी, कराईकल, माहे और येनम के कुल 181 पार्षदों में से 174 ने अपना मत भारत में शामिल होने के पक्ष में दिया। सात पार्षदों ने इस रायशुमारी में हिस्सा नहीं लिया था। व्यवहारिक रुप से इस तारीख से ही पुडुचेरी भारतीय गणराज्य का हिस्सा बन गया। मई 1956 में भारत और फ्रांस के बीच पुडुचेरी को लेकर एक समझौता हुआ। पर फ्रांस की संसद में मई 1962 में पुडुचेरी की सत्ता भारत को औपचारिक रुप से स्थानांतरित करने का प्रस्ताव पास किया गया। 16 अगस्त 1962 भारत और फ्रांस के बीच पुडुचेरी का औपचारिक सत्ता हस्तांतरण कार्य संपन्न हुआ। इसलिए हर साल पुडुचेरी में 16 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस का सरकारी तौर पर औपचारिक आयोजन किया जाता है।

ऋषि अगस्त्य की भूमि है पुडुचेरी 
तमिलनाडु के पास नन्हा सा राज्य पुडुचेरी या पांडिचेरी महान ऋषि अगस्त्य की भूमि मानी जाती है। वही अगस्त्य मुनि जो समुद्र को पी गए थे। जिन्होंने संसार की श्रेष्ठ भाषा तमिल का आविष्कार किया। हालांकि पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश है पर यहां विधान सभा चुनाव कराए जाते हैं दिल्ली की तरह। पुडुचेरी का विस्तार कुल 479 वर्ग किलोमीटर में है। साल 2011 की जनगणना में पुडुचेरी की आबादी 12.48 लाख थी।


चार क्षेत्र में बंटा -  पुडुचेरी का संघ राज्‍य क्षेत्र चार क्षेत्रों - पुडुचेरीकराईकालमाहे और यनम से मिलकर बना है। पुडुचेरी और कराईकाल तमिलनाडु के पूर्वी तट पर हैं जबकि यनम आंध्र प्रदेश ( ईस्ट गोदावरी जिला) और माहे केरल में पश्चिम तट पर कोचीन के पास है। पुडुचेरी 1 नवंबर 1954 को आजाद हुआ, यानी देश की आजादी के सात साल बाद। तकनीकी तौर पर सत्ता का हस्तांतरण 16 अगस्त 1962 को हुआ। इसी दिन पुडुचेरी का स्वतंत्रता दिवस होता है। पुडुचेरी में आज भी बड़ी संख्या में तमिल हैं जिनके पास फ्रेंच पासपोर्ट होता है। 

पुडुचेरी की आध्यात्मिक शक्ति तब बढ़ी जब यहां अरविदों आश्रम की स्थापना हुई। हर साल दुनिया भर से हजारों लोग सुकून की तलाश में यहां आते हैं। पुडुचेरी आकर लोगों को अनोखी आध्‍यात्मिक अनुभूति होती है। यहां के निवासियों की कहानियां शुरुआती दिनों के इतिहास बताती हैं। यहां पोंडी नाम का अर्थ यहां के अपनेपन की भावना को समाहित करता है जो घर आने जैसा है।


PUDUCHERY - RAILWAY STATION

बड़े शहर की भागदौड़ से दूर पुडुचेरी दक्षिणी तट पर एक छोटा शांत कस्‍बा है। यहां के फ्रांसीसी संबंधपेड़ों की कतार से भरे हुए किनारेउपनिवेश काल कि विरासत कहे जाने वाले भवनआध्‍यात्मिक पवित्रताअछूते सुंदर तटों के अं‍तहीन किनारेबैक वॉटरकई प्रकार के स्वाद परोसने वाले रेस्‍तरांयहां आने वाले सैलानियों का मन मोह लेते हैं।  यह आपके लिए एक आदर्श स्‍थान है यदि आप अपने व्यस्त जीवन से अलग हटकर आनंद के कुछ पल गुजारना चाहते हैं। 

फ्रेंच आधिकारिक भाषा -  तमिलतेलुगुमलयालम और फ्रेंच यहां की आधिकारिक भाषाएं है। यहां की मुख्‍य भाषा तमिलतेलुगु और मलयालम हैं। अंग्रेजी और फ्रेंच अन्‍य भाषाएं हैं जो काफी संख्‍या में लोग बोलते हैं। यहां अधिकांश लोग हिन्‍दू हैं। यहां ईसाई और मुस्लिम समुदाय की अच्‍छी संख्‍या हैजबकि जैनसिक्‍ख और बौद्ध लोग भी थोड़ी संख्या में हैं।




भारत का यह क्षेत्र लगभग 300 वर्षों तक फ्रांसीसी अधिकार में रहा है और आज भी यहां फ्रांसीसी वास्तुशिल्प और संस्कृति देखने को मिल जाती है। पुडुचेरी 1670 से 1954 तक एक प्रमुख फ्रांसीसी उपनिवेश था। फ्रांसीसियों ने पांडिचेरी में लगभग तीन शताब्दियों तक निर्बाध शासन किया और शहर में सबसे अच्छी संस्कृति और वास्तुकला के रूप में एक महान विरासत छोड़ गए। पुडुचेरी एक फ्रांसीसी उपनिवेश था जिसमे 4 जिलों का समावेश था। पुदुच्चेरी का नाम पॉन्डिचरी इसके सबसे बड़े जिले पुदुच्चेरी के नाम पर पड़ा था। 

सितम्बर 2006 मे पॉन्डिचरी का नाम आधिकारिक रूप से बदलकर पुदुच्चेरी कर दिया गया जिसका कि स्थानीय तमिल मे अर्थ नया गांव होता है।

पुराने समय में यह फ्रांस के साथ होने वाले व्यापार का मुख्य केंद्र था। आज अनेक पर्यटक इसके सुंदर समुद्र तटों और तत्कालीन सभ्यता की झलक पाने के लिए यहां आते हैं। केवल पर्यटन की दृष्टि से ही नहीं बल्कि आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। इस कारण प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में पर्यटक यहां आते हैं।

कैसे पहुंचे - पुडुचेरी शहर तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से 162 किलोमीटर की दूरी पर है। चेन्नई से बस से पुडुचेरी जा सकते हैं। वैसे सीधी रेलगाड़ी भी यहां आती हैं जो तिरूपति वेल्लोर, विलुपुरम होकर यहां तक पहुंचती हैं। सिंगल लाइन विद्युतीकृत रेल ट्रैक है पुडुचेरी तक। दिल्ली से पुडुचेरी के लिए सीधी ट्रेन भी उपलब्ध है।



 होटल श्री साईराम, लाल बहादुर शास्त्री स्ट्रीट, बॉटनिकल गार्डन के पास -  हमारा पहले दिन का पुडुचेरी में ठिकाना बना होटल श्री साईराम। बस स्टैंड से 400 मीटर की दूरी पर है होटल। कमरे काफी बड़े और हवादार। बुकिंग क्लियर ट्रिप से कराई थी। स्टाफ का व्यवहार अति सौम्य रहा। हमने एक दिन बार की बुकिंग दूसरे होटल में करा ली थी वरना ये रहने के लिए अच्छी जगह थी। http://www.cleartrip.com/hotels/details/377741?c=051115|061115&r=2,0&compId=&fr=32&ur=7&urt=Price#



होटल सुबुया इन, लाल बहादुर शास्त्री स्ट्रीट ( http://www.hotelsubuya.com/ ) हमारा दूसरा दिन होटल सुबुया में गुजरा। ये होटल लाल बहादुर शास्त्री स्ट्रीट पर महात्मा गांधी स्ट्रीट  क्रास से ठीक पहले है। यहां से रेलवे स्टेशन आधा किलोमीटर है। होटल में बेहतर रेस्टोरेंट है। रूम रेंट में सुबह का नास्ता शामिल रहता है। फ्री वाईफाई भी है। सभी कमरे वातानुकूलित हैं। पर कमरे आकार में छोटे हैं। होटल में पार्किंग मीटिंग हाल आदि भी सुविधा है।


-         vidyutp@gmail.com

-          ( AGASTYA MUNI , PUDUCHERRY, CHENNAI ) 



Monday, October 26, 2015

महाबलीपुरम से पुडुचेरी- ईस्ट कोस्ट रोड पर सुहाना सफर


तमिलनाडु का स्टेट हाइवे नंबर 49 ईस्ट कोस्ट रोड के नाम से मशहूर है। वैसे तो लोग इसे ईसीआर के नाम से बुलाते हैं। इसीआर पर सफर करना ऐसा आनंदित करता है मानो ये सफर कभी खत्म न हो।

 एक तरफ लहलहाते खेत दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी - समंदर से आती ठंडी हवाएं। सफर का आनंद कई गुना बढ़ जाता है। जिधर नजर डालिए प्रकृति अपनी अप्रतिम सुषमा बिखेरती नजर आती है। पर नजर है कि ठहरती नहीं। दृष्टि में कोई नया वितान आ जाता है। सफर चलता रहता है। ईसीआर तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई को वाया पुडुचेरी कुडुलुर से जोडता है।



अब ईसीआर विस्तार थुतुकुडी तक हो गया है और कुल लंबाई है 690 किलोमीटर। आगे इसे कन्याकुमारी तक जोड़ने पर काम चल रहा है। इस सड़क का निर्माण 1998 में तमाम ग्रामीण सड़कों को बेहतर रूप देते हुए किया गया। चेन्नई से पुडुचेरी के बीच करीब 160 किलोमीटर के मार्ग में इस रोड पर कई बीच हाउस और बोट हाउस बने हुए हैं जहां सैलानी आराम फरमाते हैं। ईसीआर की शुरुआत चेन्नई शहर के थिरुवन्नमयूर से मानी जाती है।

 गोल्डेन बीच और महाबलीपुरम जैसे शहर इस रोड पर आते हैं। 80 फीट चौड़े से सडक पर दिन रात वाहन फर्राटा भरते नजर आते हैं। भले ही ये नेशनल हाईवे नहीं है पर राज्य सरकार द्वारा प्रबंधित की जाने वाली यह सड़क किसी भी एनएच से कहीं से भी कम नहीं है। हालांकि अब इस सड़क को केंद्र सरकार भारत माला परियोजना के तहत विकसित करने को तैयार है।

ईसीआर पर आडयार से 23 किलोमीटर आगे मुटुकुडु बोट हाउस पड़ता है जो सैलानियो की प्रिय जगह है। वहीं महाबलीपुरम से 5 किलोमीटर पहले ईसीआर पर टाइगर गुफा भी पड़ती है। पहले दिन गोल्डेन बीच से महाबलीपुरम तक हमने ईसीआर पर सफर किया। महाबलीपुरम तक चेन्नई की लोकल बसें भी आती हैं। हमारा ईसीआर पर दूसरे दिन का सफर शुरू हुआ महाबलीपुरम से। महाबलीपुरम बाइपास से पुडेचेरी की बसें मिलती हैं। हर 10 मिनट पर एक बस आ जाती है। जगह नहीं होने पर हमने तमिलनाडु रोडवेज की बस छोड़ दी। तुरंत पीछे से पीआरटीसी ( पुडुचेरी रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन की बस आई। हमें आगे जगह मिल गई।



 महाबलीपुरम से पुडुचेरी का 100 किलोमीटर का किराया 60 रुपये। वहीं सांबर राइस, कर्ड राइस 30 रुपये में। यह कई राज्यों की बसों की तुलना में कम है। बस सरपट ईसीआर पर भागने लगी। एक से बढ़कर एक नजारे। सड़क के दोनों तरफ हरियाली और झूमते खेत। अक्तूबर के महीने में भी धान की खेती हो रही थी। तमाम सैलानी बाइक किराये पर लेकर ईसीआर पर फर्राटे भरना पसंद करते हैं। जहां मरजी हो रूक जाओ फिर चलते बनो। 

दो घंटे में 100 किलोमीटर का सफर करके पुडुचेरी में प्रवेश कर गई। रास्ते में एक ढाबे पर रूकी। वहां खाने की दरें काफी वाजिब थीं। फुल मील ( तमिल भोज) 60 रुपये का। कोई ड्राईवर कमिशन का चक्कर नहीं। चटख दुपहरिया में हमारी बस पुडुचेरी के न्यू बस स्टैंड में प्रवेश कर गई। पूछने पर पता चला कि हमारा होटल 5 मिनट के पैदल चलने की दूरी पर है। तो हम चले पड़े अपने ठिकाने की ओर।

- vidyutp@gmail.com


( EAST COAST ROAD, PUDUCHERRY, CHENNAI ) 
 
नन्हें से राज्य पुडुचेरी का प्रवेश द्वार। 



Sunday, October 25, 2015

चेन्नई का चिड़ियाघर सफेद बाघ से मुलाकात

अरिगनार अन्ना जूलोजिकल पार्क जिसे चेन्नई में लोग वेंडालूर जू के नाम से भी जानते हैं देश के सबसे पुराने और शानदार चिड़ियाघरों में शुमार है। चेन्नई में इस जू का भ्रमण करने के लिए हमने एक दिन नीयत रखा था। 

सो हमलोग तांब्रम रेलवे स्टेशन के बस स्टाप से लोकल बस में बैठने के थोड़ी देर बाद ही जू के प्रवेश द्वार पर थे। बड़ों का टिकट 30 रुपये बच्चों का 10 रुपये कैमरे का 30 रुपये अलग से। मोबाइल कैमरा, आईपैड, टैब आदि के लिए भी टिकट लेना जरूरी है। हैंडीकैम से सूट करना चाहते हैं तो 150 रुपये। जू सुबह 9 से 5 बजे तक खुला रहता है। मंगलवार को बंद। इस जू में हर रोज दर्शकों की अच्छी खासी भीड़ होती है।

जू के प्रवेश द्वार पर शानदार फव्वारा आपका स्वागत करता है। मद्रास जू की स्थापना 1855 में मूर मार्केट में हुई थी। यह देश का पहला चिड़ियाघर था। पहले ही चेन्नई शहर के मध्य में था। पर लगातार बढ़ते प्रदूषण और भीड़ के कारण वहां का वातावरण जानवरों के लिए खराब हो गया। इसलिए 1985 में इसे वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित किया गया। वर्तमान परिसर 602 हेक्टेयर में फैला है। यहां रखरखाव के लिए 257 पूर्णकालिक कर्मचारी तैनात हैं। पार्क में 138 तरह के वनस्पतियां लगाई गई हैं। चेन्नई की गरमी में भी यहां की आबोहवा सुहानी रहती है।

चिड़ियाघर घूमने का सबसे अच्छा तरीका पैदल चलना होता है। पर यहां बैटरी वाली गाड़ियां संचालित होती हैं उनके लिए जो ज्यादा चलना नहीं चाहते। हम पैदल ही निकले थे, पर देखने में आया कि यहां पर साइकिल रेंट की सुविधा है। 15 रुपये घंटा। फिर क्या था हमने हरक्यूलिस किराये पर ले ली। इस तरह शुरू हुआ साइकिलिंग के साथ चिड़ियाघर की सैर। घूमने के लिए सड़कों पर तीर के निशान बने हैं। सो किसी से पूछने की जरूरत नहीं पड़ती। सबसे पहले हमने पक्षियों का बसेरा देखा। सायरस क्रेन से लेकर कई तरह के दुर्लभ पक्षी हैं यहां। आजकल यहां 12 ऑस्ट्रिच की फौज है। हालांकि ये अफ्रीका में पाए जाते हैं। पर वेंडालूर जू का सबसे बड़ा आकर्षण है सफेद बाघ। यह सफेद बाघ जब गुर्राता है तो उसकी गुर्राहट सुनकर अच्छे अच्छों की सिट्टी पिट्टी गुम हो जाए। इस विशाल बाघ को देखकर जी खुश हो गया। 

अपने निवास क्षेत्र में वीरा और झांसी नामक शेर और शेरनियां आराम फरमाते मिल गए। पर इस जू का बड़ा आकर्षण लायन सफारी भी है। आप बंद बस में जाकर लायन सफारी में शेरों को अपने आसपास उन्मुक्त विचरण करते हुए देख सकते हैं। यहां चार बाघों का समूह भी आप देख सकते हैं। इसके अलावा बार्किंड डियर दिखाई देता है। 

वापस लौटते समय प्रवेश द्वार के पास बच्चों के लिए ढेर सारे झूले भी बने हैं। चिड़ियाघर के अंदर एक भोजनालय भी है। यहां किफायती दरों पर खाने पीने की सामग्री उपलब्ध है। दिन भर की सैर यादगार रही। बाहर निकलते हुए आप सोवनियर शॉप से यादगारी में खरीददारी भी कर सकते हैं। यहां आजकल जानवरों को गोद लेने की योजना भी चलाई जा रही है। स्कूली बच्चों और शिक्षकों के लिए जू एजुकेशन के पाठ्यक्रम भी चलाए जाते हैं।

कैसे पहुंचे - चेन्नई का जू वेंडलूर रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर है। चेन्नई सेंट्रल से चिड़ियाघर की दूरी 30 किलोमीटर है। आप चेंगालपट्ट की ओर जाने वाली किसी भी लोकल ट्रेन में बैठकर वेंडालूर उतर सकते हैं।

 अगर सड़क मार्ग से जाएं तो तांब्रम से चेंगालपटट् जाने वाले हाईवे पर जाने वाली तमाम बसें जू के प्रवेश द्वार वाले स्टाप पर रुकती हैं। जू की वेबसाइट देखें - http://www.aazoopark.in/

- vidyutp@gmail.com

(CHENNAI, ZOO, CYCLE, VENDALOOR) 

Saturday, October 24, 2015

तमिलनाडु की ओर - वणक्कम चेन्नई

चेन्नई का आसमान। 
अगर आपको देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से की लंबी यात्रा करनी हो तो रेल से बेहतर कुछ नहीं। एक के बाद दूसरे राज्य में प्रवेश करती रेल. बदलता खानपान और बोली। यह रेल में ही दिखाई दे सकता है। पर दिल्ली से चेन्नई और हैदराबाद का सफर मैं कई बार रेल से कर चुका था। सो इस बार तीस घंटे रेल में गुजारने के बजाए तीन घंटे फ्लाइट में गुजारने का तय किया। इससे हमारे दो दिन की बचत भी होने वाली थी। 

हमने कई महीने पहले चेन्नई के लिए जेट एयरवेज की फ्लाइट बुक कर ली थी। जेट ऐसी एयरलाइन है जो इकोनोमी क्लास में भी यात्रियों को कंप्लिमेंट्री लंच देती है। इसलिए हम खाने को लेकर निश्चिंत थे। सुबह 8 बजे की फ्लाइट थी। 


आईजीआई- टी 3 पर...
हमें सुबह 6 बजे इंदिरा गांधी इंटनेशनल एयरपोर्ट के टी3 टर्मिनल पर पहुंच गए थे। उबर की कैब सेवा ने पूरी समयबद्धता से साथ दिया। इससे पहले की हमने फ्लाइटें 1डी से ली थीं। टी-3 पहुंचने का पहला मौका था। वाकई टी-3 इतना भव्य बना है कि हम दुनिया के तमाम देशों के बीच गर्व करते हैं। सबसे बड़ी बात टर्मिनल तक पहुंचने के लिए चलते हुए रैंप बनाए गए हैं जिसमें आपके पांव को आधा किलोमीटर से ज्यादा दूरी तय करने में तकलीफ नहीं होती। हमारे विमान में डेढ़ घंटे का वक्त था। 49 नंबर एयरब्रिज के पास पहुंच कर हम निढाल होकर लेट गए। उड़ान से आधे घंटे हम विमान में पहुंचे। आगे की तीन लाइन लग्जरी क्लास की थीं। हमें बीच में जगह मिली। एक साथ। अनादि ने खिड़की वाली सीट कब्जा कर ली। हमारा विमान बोइंग 737 है। इसमें कुल 258 सीटें हैं। 18 प्रिमियम दर्जे की हैं जबकि 240 इकोनोमी।

विमान ने दिल्ली के आसमान को अलविदा कहा और पहुंच गया बादलों के ऊपर। व्योमबालाओं ने जलपान पेश करना शुरू किया। खाने में दक्षिण भारतीय स्वाद था। पहले नन्हीं पानी की बोतलें। फिर थाली में एक छोटा मसाला डोसा, सांभर, चटनी, उपमा, फ्रूट सलाद, बंद, बटर,  चाय या फिर कॉफी का विकल्प। खाने की प्लेट इस तरह तैयार की गई थी जिसमें आपको पूरी कैलोरी मिल सके। थोड़ी देर में विमान समंदर के ऊपर उड़ान भर रहा था। हम चेन्नई के आसमान पर थे।

 नीयत समय पर शहर दिखाई देने लगा। विमान नीचे उतर रहा था। यहां भी एयर ब्रिज से बाहर आया। हमारा लगेज बेल्ट पर तुरंत पहुंच गया। चेन्नई का एयरपोर्ट शहर की सीमा में है। यह लोकल ट्रेन के रेलवे स्टेशन त्रिशूलम के ठीक सामने है। आप सामान लेकर टहलते हुए लोकल स्टेशन जा सकते हैं। अब एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन के बीच से मेट्रो रेल भी गुजर रही है। बाहर आकर उबर को टैक्सी के लिए कॉल की। टैक्सी वाले भी पांच मिनट में आ गए। हालांकि टैक्सी एयरपोर्ट के अंदर लाने पर 100 रुपये सुविधा शुल्क देना पड़ जाता है। हम थोड़ी देर में अपने होटल में थे। वेस्ट तांब्रम इलाके में मुदीचूर रोड पर सेंथुर मुरगन रीजेंसी।

 वैसे तांब्रम चेन्नई का बाहरी इलाका है। यह कांचीपुरम जिले में आता है। पर व्यस्त रेलवे स्टेशन है। 8 प्लेटफार्म हैं तांब्रम रेलवे स्टेशन पर। तांब्रम सेनेटोरियम रेलवे स्टेशन के पास से गुजरते हुए हमें में राष्ट्रीय सिद्ध संस्थान (एनआईएस) का बोर्ड दिखाई देता है। सिद्ध चिकित्सा पद्धति के जनक महर्षि अगस्त्य माने जाते हैं। एनआईएस की स्थापना 2005 में पीएमके नेता अंबुमणि रामदौस के प्रयासों से हुई थी, इसके परिसर में एक बड़ा सिद्ध पद्धति का चिकित्सालय भी है। (http://nischennai.org/)
और पहुंच गए हम चेन्नई....

होटल सेंथुर मुरुगन हमने स्टेजिला डॉट काम से बुक किया था। हमें वेंडलूर जू और कांचीपुरम घूमना है अगले दिनों इसलिए हमने तांब्रम का इलाका रहने के लिए चुना है। यहां से ये दोनों स्थल निकट हैं। जबकि चेन्नई सेंट्रल 25 किलोमीटर दूर है। होटल एक मार्केट के दूसरी मंजिल पर है। तांब्रम रेलवे स्टेशन से होटल दो किलोमीटर है। पर इस सड़क पर हमेशा शेयरिंग आटोरिक्शा चलते हैं। होटल के ठीक नीचे खाने पीने के लिए उत्तर भारतीय रेस्टोरेंट भी उपलब्ध हैं। पास में मेडिकल स्टोर और जनरल स्टोर भी है। खाना पीना विमान में ही हो चुका था इसलिए होटल में सामान रखने के तुरंत बाद हमलोग चिड़ियाघर की सैर के लिए निकल पड़े।
 -vidyutp@gmail.com

Hotel Senthur Murugan Residency,  No: 54/470, Mudichur Road, Tambaram West, Chennai – 600045 (Near By Pattamal Gas Agency)
(91)-9840203888

( CHENNAI, JET AIR, TRISHULAM RAILWAY STATION ) 

Friday, October 23, 2015

गली कासिम जान- गालिब की हवेली

पुरानी दिल्ली में चांदनी चौक से फतेहपुर मसजिद की ओर बढ़ते हुए गुरुद्वारा शीशगंज और नई सड़क के बाद बायीं तरफ आता है बल्लीमारान। वैसे तो बल्लीमारान आज की तारीख में चश्मे और जूते चप्पलों को बड़ा बाजार है। पर इन्ही बल्लीमारान की गलियों में थोड़ी दूर चलने पर आपको गली कासिम जान का बोर्ड नजर आता है। इस बोर्ड को देखकर कुछ याद आने लगता है। 

गली काफी लंबी है जो लालकुआं की तरफ चली जाती है। पर गली कासिम जान में बस थोड़ा सा आगे बढ़ने पर एक देश के एक महान शायर का घर आता है। ये महान शायर हैं मिर्जा गालिब। उर्दू और फारसी के जाने माने शायर मिर्जा असदुल्ला खां गालिब अपने आखिरी दिनों में दो दशक से ज्यादा इसी हवेली में रहे। वे साल 1860 से 1869 में इस हवेली में आए थे। फिर यहां के होकर रह गए। कौन जाए अब दिल्ली की गलियां छोड़ कर। 15 फरवरी 1869 को उन्होंने आखिरी सांस ली। उनकी मजार हजरत निजामुद्दीन की दरगाह के पास है।


गालिब की हवेली की सरंचना शानदार है। ईंटो से बना ये अर्धवृताकार भवन किसी हवेली सा लगता है। हालांकि भारत विभाजन के बाद ये हवेली बुरे हाल में थी। गालिब के प्रेमी लोगों ने इस हवेली के संरक्षण में बड़ी भूमिका निभाई। अब ये हवेली गालिब के संग्रहालय के तौर पर विकसित हो गई। पर सोमवार को मत जाइएगा। इस दिन हवेली बंद रहती है। बाकी दिन ये हवेली 11 बजे से शाम 6 बजे तक खुली रहती है। गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था। आगरा में गालिब की स्मृति में कुछ नहीं है पर ताज के शहर में अब गालिब की स्मृतियों के नाम पर केवले दो मोहल्ले छोटा गालिबपुरा और बड़ा गालिबपुरा शेष हैं। गालिब जब गली कासिम जान में रहने आए तब वे साठ को पार कर चुके थे। देश 1857 की क्रांति से आगे निकल चुका था। एक शायर के तौर पर गालिब का काफी नाम हो चुका था।

तो गौर फरमाइए- 
पूछते हैं वो के गालिब कौन है... कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या?
गालिब की इस हवेली का नया जीवन देने में मशहूर फिल्मकार गुलजार की भी बड़ी भूमिका है। गालिब की हवेली के बाहर विख्यात विद्वान राल्फ रसेल की उक्ति लिखी हुई है- गालिब अगर अंगरेजी भाषा के कवि होते तो उनकी गिनती विश्व इतिहास के महानतम कवियों में होती। गालिब की इस हवेली को देखकर उनका ये शेर सबसे पहले याद आता है-

वो आएं घर में हमारेखुदा की कुदरत है।
कभी हम उनकोकभी अपने घर को देखते हैं।
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आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
कौन जीता  है तेरी जुल्फ के सर होने तक।
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उनके देखे से आ जाती है चेहरे पर रौनक
वे समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है।

और गालिब का सबसे लोकप्रिय शेर

न कुछ था तो खुदा था, न कुछ होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता तो मैं क्या होता।
-         
और अंत में...

हमने माना के तगाफुल न करोगे लेकिन,
खाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक।

तो कभी आइए ना गली कासिम जान में....




शायर का संग्रहालय - गालिब की हवेली को फिल्मकार गुलजार के प्रयास से नया रूप दिया गया है। हवेली के दो कमरों में मशहूर शायर की यादें समेटने की कोशिश की गई है। यहां गालिब के दो दीवान देखे जा सकते हैं। इसके अलावा गालिब के पसंदीदा खेल चौसर और शतरंज की बिसात भी देख सकते हैं। गालिब जैसे बरतनों का इस्तेमाल करते थे, वैसे कुछ बरतन यहां संकलित किए गए हैं।

दीवारों पर उनकी प्रसिद्ध शायरी का संकलन किया गया है। गालिब साहब की दो मूर्तियां और और एक विशालकाय पेंटिंग भी यहां पर है। 26 दिसंबर 2010 को गालिब की एक मूर्ति यहां स्थापित की गई है।

उग रहा है दरो दीवार पर सब्जा गालिब
 हम बयाबां में हैं, और घर में बहार आई है।


घुम्मकड़ गालिब आगरा में पैदा हुए मिर्जा गालिब का ज्यादातर वक्त दिल्ली में गुजरा, पर वे बड़े घुम्मकड़ किस्म के इंसान थे। उन्होंने कई शहरों का पानी पीया। उन्होंने रामपुर, फिरोजपुर झिरकाभरतपुर, बांदा, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, मुर्शिदाबाद और कोलकाता में भी अपना वक्त गुजारा। पर अंत में दिल्ली पहुंचे। अंतिम दिनों में वे दो बार रामपुर के दरबार में भी गए। उनके देश भर में करीब 200 शागिर्द थे। जिसमें बादशाह बहादुर शाह जफर, अल्ताफ हसन हाली ( पानीपत), दाग देहलवी और मुंशी हरगोपाल प्रमुख थे।

गालिब की पत्नी उमराव बेगम- गालिब की पत्नी उमराव बेगम गली कासिम जान के रहने वाले नवाब लोहारू इलाही बक्श मारूफ की बेटी थीं। उनका जो घर था उसमें आजकल राबिया गर्ल्स स्कूल संचालित होता है। गालिब 13 के थे और उमराव 12 तब दोनों का निकाह हुआ। दोनों की शादी खूब निभी।


 उमराव बेगम बड़ी वफादार पत्नी थीं। हालांकि गालिब को शिकायत रहती थी कि वे उनकी शायरी की तारीफ नहीं करतीं। वास्तव में उमराव बेगम को शायरी पसंद नहीं थी, पर उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। गालिब को कुल सात बच्चे हुए पर सभी कच्ची उम्र में ही अल्लाह को प्यार हो गए।
- vidyutp@gmail.com
( MIRJA GALIB, GALI KASIM JAN, OLD DELHI,  NIJAMUDDIN, DELHI )
  



Wednesday, October 21, 2015

मुगल बादशाह के स्वागत में बना था जहांगीर महल

अत्यंत भव्य जहांगीर महल ओरछा के राजा महल का प्रमुख हिस्सा है। इस महल का एह हिस्सा शीशमहल होटल में तब्दील कर दिया गया है। जहांगीर महल के बारे कहा जाता है कि  इस भव्य महल को ओरछा के राजा वीर सिंह देव प्रथम (1505 से 1527) ने शहंशाह जहांगीर के स्वागत में बनवाया था। महल वीर सिंह और जहांगीर की मित्रता का प्रतीक है। यह महल 1518 में बनकर तैयार हो गया था। हालांकि यहां जहांगीर सिर्फ एक दिन ही रूक सके थे।

महल में नक्काशी अदभुत है। इसके झरोखों से आसपास के नजारे दिखाई देते हैं। तीन मंजिल के महल में उतरने चढ़ने के लिए कई सीढ़ियां बनी हैं। ये काफी हद तक भूल भूलैया जैसा है।  जहांगीर महला वर्गाकार विन्यास का है। इसके चारों कोनों पर चार बुर्ज बने हुए हैं। इस किले का मुख्य प्रवेश द्वार बेतवा नदी की मुख्य धारा की ओर से खुलता है। इस महल में जालियों का सुंदर काम है और दरवारों पर अलंकृत पक्षियों और हाथियों को देखा जा सकता है। महल में कई छोटे छोटे गुंबद और विशाल गुंबद बने हैं।




जहांगीर महल में कुल 136 कमरे बनाए गए हैं। तब इन सभी कमरों में चित्रकारी की गई थी पर अब ये सभी कमरों में नहीं दिखाई देती है। जहांगीर महल के प्रवेश द्वार पर दो झुके हुए हाथी बने हुए हैं जो अपने आप में वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। ये हाथी अतिथि का स्वागत करते प्रतीत होते हैं।  जहांगीर महल वास्तव में मध्यकालीन वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसलिए ये विदेशी सैलानियों के साथ फिल्मकारों को अपनी ओर खींचता है।

मैं 28 सितंबर को जहांगीर महल में पहुंचा तो यहां सोनी टीवी पर प्रसारित हो रहे धारावाहिक सूर्य पुत्र कर्ण की शूटिंग जारी थी। महल के मुख्य आंगन में विशाल सेट लगा हुआ था। इस शूटिंग में सैकड़ो जूनियर आर्टिस्ट हिस्सा ले रहे थे जो ओरछा के स्थानीय निवासी हैं। इससे पहले भी ओरछा के लोगों को कई शूटिंग में हिस्सा लेने का मौका मिल चुका है।



ओरछा का किला और फिल्में -  ओरछा के राज महल और जहांगीर महल में अनगिनत फिल्मों की शूटिंग हुई है। पर यहां पर पुरातत्व विभाग में काम करने वाले एक कर्मचारी बताते हैं कि मैंने यहां अमिताभ बच्चन को छोड़कर हर बड़े कलाकार को शूटिंग करते देखा है।
यहां शाहरुख खान, सलमान खान, कमल हासन, जीतेंद्र, धर्मेंद्र सभी आ चुके हैं शूटिंग करने। पर ओरछा शूटिंग की गई एक भी फिल्म हिट नहीं हो सकी। वे कहते हैं कि सभी फिल्में फ्लाप हुई हैं। यानी उनपर राजा राम की कृपा नहीं हुई। फिर भी हाल में कमल हासन एक फिल्म की शूटिंग करने यहां आए।


हाल में हालीवुड की एक फिल्म की शूटिंग यहां हुई। 2014 में प्रदर्शित फिल्म सिंगुलरटी के बड़े हिस्से की यहां शूटिंग की गई। फिल्म की कहानी एंग्लो मराठा युद्ध पर आधारित थी। इसलिए इसकी शूटिंग ग्वालियर, चंबल और ओरछा के हिस्सों में की गई। मणिरत्नम के फिल्म रावण का गीत काटा काटा....को याद करें। ये पूरा गीत जिसमें रवि किशन, एश्वर्या राय आदि दिखाई देते हैं, यहीं ओरछा के किले की पृष्ठ भूमि में शूट किया गया।
अब जरा उस विज्ञापन को याद किजिए। शीतल पेय मैंगो स्लाइस का वो रोमांटिक विज्ञापन जिसमें कैटरीना कैफ खास अंदाज में आम खाती और स्लाइस पीती नजर आती हैं। ये विज्ञापन भी ओरछा में शूट किया गया है।
vidyutp@gmail.com
( ORCHA, MP, FOREST, FORT, JHANGEER MAHAL  )