Wednesday, September 30, 2015

जौरा - जहां 186 बागियों ने डाले थे हथियार

जौरा का महात्मा गांधी सेवा आश्रम वह स्थल है जहां 1972 में माधो सिंह मोहर सिंह जैसे बगियों ने हथियार डाले थे। 25-27 सितंबर 2015 के मध्य जौरा पहुंचे युवाओं की इच्छा उस स्थल को देखने की थी। जौरा रेलवे स्टेशन से कोई 4 किलोमीटर दूर मानपुर गांव में के खुले मैदान में 14 और 16 अप्रैल 1972 को चंबल के बागियों ने हथियार डाले थे। एस एन सुब्बराव जी कहते हैं तब इस समर्पण को देखने के लिए कोई 60 से 70 हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। जब बागी हथियार डालने लगे तो बंदूकों की काफी ऊंची ढेर जमा हो गई। ये बंदूकें दुनिया के अलग अलग देशों की बनी हुई थीं। सामने गांधी जी की बड़ी तस्वीर थी और बागी आकर अपनी बंदूके रखे जा रहे थे। वह नजारा अदभुत था, ऐतिहासिक था। आजाद भारत के इतिहास में ऐसा बड़ा डाकूओं का सरेंडर कभी नहीं हुआ।

 लोकनायक जय प्रकाश नारायण की मौजूदगी थी, तब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी थे। 14 अप्रैल को जिन बागियों ने सरेंडर किया उनमें माधो सिंह और मोहर सिंह शामिल थे। इन बागियों ने बाद में चंबल के डाकू नामक फिल्म बनाई थी। 1972 में कुल 186 बागियों ने हथियार डाले थे। सरेंडर के बाद सबको बसों में बिठाकर ग्वालियर सेंट्रल जेल ले जाया जा रहा था। पर बागियों ने पुलिस वालों के साथ बैठने से इनकार कर दिया। पुलिस से अदावत पुरानी थी। पुलिस पर भरोसा नहीं था। लिहाजा बस में पुलिस वाले बागी के बीच गांधी आश्रम के कार्यकर्ता बिठाए गए तब बस चल सकी। ये सभी बसें मध्य प्रदेश रोडवेज की थीं।
दो बागी अजमेर सिंह और नेत्रपाल सिंह के साथ। 

1972 में ही सरेंडर करने वाले मोहर सिंह गैंग के बागी अजमेर सिंह बताते हैं- मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी का हेलीकाप्टर आसमान में दिखाई दिया। हम खुशी के मारे फायरिंग करने लगे। पर फायरिंग देखकर हेलीकाप्टर लौट गया। बाद में हमें फायरिंग से मना किया गया तब जाकर हेलीकाप्टर उतर सका। माधो सिंह मोहर जैसे बागियों को सरकार पर भरोसा नहीं था लिहाजा माधो सिंह खुद वेश बदलकर जय प्रकाश नारायण से मिलने गए थे। उनके आश्वासन के बाद सरेंडर को तैयार हुए। कई हत्याएं और पकड़ (अपहरण) करने वाले अजमेर सिंह बताते हैं सरेंडर के बाद हमें सात साल ग्वालियर जेल में रखा गया। पर  जेल में हर तरह की सुविधाएं थी। जिसे तंबाकू चाहिए मिलता था। जिसे सिगरेट, बीडी चाहिए मिल जाता था। पर जेल से बाहर आने के बाद राज्य सरकार ने जो वादे किए थे वे चार दशक बाद भी पूरे नहीं हुए। अजमेर सिंह को सरकार ने जहां जहां जमीन आवंटित की थी उस पर उन्हें आज तक कब्जा नहीं मिला। लिहाजा बच्चे गाड़ियां चलाने पर मजबूर हैं।

चंबल की बंदूके गांधी के चरणों में - चंबल घाटी में वर्ष 1960 से 1976 तक यहां 654 दस्युओं ने आत्मसमर्पण किया था। 1960 में बागियों ने बिनोबा भावे की मौजूदगी में हथियार डाले थे। 1972 के  सरेंडर की घटना पर एक रिपोतार्ज पुस्तक लिखी गई है। चंबल की बंदूके गांधी के चरणों में ( प्रकाशक - गांधी शांति प्रतिष्ठान, लेखक – श्रवण कुमार गर्ग, प्रभाष जोशी और अनुपम मिश्र)  इन तीनों पत्रकारों ने 1972 में चंबल के बीहड़ो की खाक छानी और इस शानदार रिपोतार्ज का सृजन किया।
जौरा के पास मानपुर गांव में वह जगह जहां 186 बागियों ने हथियार डाले। 

समर्पण स्थल पर कोई स्मारक नहीं – जौरा के जिस मानपुर गांव के खुले मैदान में सरेंडर हुआ था वहां पर अब डिग्री कालेज बन गया है। इसी आश्रम के मैदान में एक मंच बना है, जो 1972 के सरेंडर की महान घटना की याद दिलाता है। पर यहां कोई यादगारी शिलापट्ट नहीं है। पुराना गांधी आश्रम की दीवारें बदहाल हैं। उसके चारों तरफ बडी बड़ी घास उग आई है। काफी कोशिश के बाद भी यहां कोई स्मारक नहीं बनाया जा सका है। जौरा के बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन या मुरैना के रेलवे स्टेशन पर इस ऐतिहासिक घटना की जानकारी देने वाला कोई बोर्ड नहीं लगाया गया है। देश भर से आए युवाओं ने इस मुद्दे पर बड़ी निराशा जताई और मध्य प्रदेश शासन को लिखने का तय किया। कई राज्यों से आए लोगों का विचार था कि यहां इस तरह का स्मारक बनना चाहिए जिससे इस महान अहिंसक क्रांति से आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिल सके।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com

( JOURA, MAHATMA GANDHI SEVA ASHRAM, SN SUBBARAO, BAGI SURRENDER, MADHO SINGH, MOHAR SINGH ) 

Monday, September 28, 2015

उम्मीद - बदलाव लाने की कोशिशें

जौरा में हरि विश्वास, सुब्बराव जी और के सुकुमारन जी। 
जब अंधेरा घना छाने लगा तो प्रकाश की चिंता सताने लगी। तब एक छोटे से दीए ने आगे बढ़ कर कहा, मैं करूंगा प्रकाश। 

किसी ने खूब कहा है अंधकार को क्यों धिक्कारें, अच्छा हो एक दीप जलाएं। राष्ट्रीय युवा योजना से जुड़े देश भर के युवा सामाजिक कार्यकर्ताओं का एक समागम राष्ट्रीय रचनात्मक कार्यकर्ता सम्मेलन महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा में 25 से 27 सितंबर 2015 को हुआ। इसमें कई युवाओं ने अपने अनुभव साझा किए।

जानवरों का अनूठा अनाथालय
वर्धा के आशीष 15 एकड़ में एक आश्रम चलाते हैं जो जानवरों का अनाथालय है। वैसी गायें जो दूध नहीं देती, उन्हें आश्रम में शरण दी जाती है। इन गायों से मिलने वालो गोबर से उपले बनाए जाते हैं। इन उपलों को बेचा जाता है। साथ ही गाय के गोबर से अगरबत्तियां बनाई जाती हैं। काम ज्यादा बढ़ गया तो अगरबत्ती बनाने वाली मशीन ले ली है। इस आश्रम में 20 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। आशीष बताते हैं कि अब वे हर महीने 40 हजार रुपये के गोबर के उपले बेच डालते हैं। उनके आश्रम में 150 गाय के अलावा घोड़े, बत्तख और मोर भी हैं। आशीष पहली बार सातवीं क्लास में पढ़ाई के दौरान बाबा आम्टे के शिविर में गए। वहां से उन्हें समाजसेवा की प्रेरणा मिली। बड़े हुए तो सांपों को पकड़ने का जुनून सवार हो गया। लोग उन्हें सांप वाला आशीष कहते थे। जानवरों से लगाव ने उन्हें पीपुल्स फॉर एनीमल्स की संस्थापक मेनका गांधी को खत लिखने की प्रेरणा दी। मेनका ने उनके काम की सराहना की है। आशीष बताते हैं कि आप एनीमल वेलफेयर बोर्ड आफ इंडिया के साथ जुड़कर जानवरों के लिए कई कल्याणकारी योजनाओं में शामिल हो सकते हैं। जानवर एंबुलेंस, कुत्तों का बंध्याकरण जैसी योजनाओं में हिस्सा ले सकते हैं। 
आशीष के आश्रम का नाम करुणाश्रम है। यहां पीड़ित जानवरों का उपचार भी किया जाता है। आश्रम घायल  पशु पक्षियों का भी सहारा है। उनका समूह कई बार सर्कस से जानवरों को भी आजाद करा चुका है।( आशीष – 9422141262- ashish_pfa@yahoo.com)

महाराष्ट्र के संदीप कुशलकर ने अहमदनगर जैसे संवेदनशील शहर काम शुरू किया। शहर में दंगो के बाद उन्होंने माहौल ठीक करने को लिए शांति समिति बनाई। बाद में शहर के राममणि जैसे स्लम इलाके में समाजसेवा का काम शुरू किया। अनाथ आश्रम में रहने वाले बच्चों को 18 साल बाद बाहर कर दिया जाता है। संदीप ने उन युवाओं को रोजगार देने की कोशिश की। ऐसे 42 अनाथ आश्रम से निकाले गए बच्चे अब पढ़ाई करके जीवन संवारने में लगे हैं। संदीप ने स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम की शुरुआत की है। इसमें वर्लपुल जैसी कंपनी से मदद ली। प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया। प्रशिक्षित युवाओं को वर्लपुल में रोजगार मिल गया। अब वे बजाज समूह की मदद से प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं। ऐसे 50 प्रशिक्षित युवाओं को बजाज समूह में काम मिल रहा है। अहमदनगर में उन्होंने एसएन सुब्बाराव स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोला है। आगे बढ़कर अब उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं की निशुल्क तैयारी के लिए केंद्र शुरू किया है जिसमें अलग अलग क्षेत्र के प्रोफेशनल उनकी मदद कर रहे हैं। आप संदीप के प्रोजेक्ट में मददगार हो सकते हैं। उन्होंने इसके लिए सहायता स्कीम निकाल रखी है। ( संदीप कुशलकर संपर्क – 9011118787 Email – sandip@yuvaan.org )
पंकज जाला ( गुजरात) 

गुजरात के पंकज जाला ने जात पात के बंधन तोड़ो भारत जोड़ो भारत जोड़ो के नारे को साकार करते हुए अंतरजातीय विवाह किया। आजकल वे अपने शहर में फ्री कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र चला रहे हैं। उनके पास 10 कंप्यूटर हैं। काम करने में प्रशासनिक दिक्कतें आईं पर वे उससे हार नहीं माने। ( पंकज- 9825581315)

केरल में स्वदेशी साबुन -  केरल के के सुकुमारन राष्ट्रीय युवा योजना से लंबे समय से जुड़े हैं उन्होंने आजकल साबुन निर्माण का काम शुरू कराया है। लोगों को फ्री में साबुन बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। हैंडमेड शोप में नहाने का साबुन, लिक्विड शोप बनाए जा रहे हैं। आप अपने घर के लिए साबुन सस्ते में बना ही लेते हैं। साथ ही आसपास में बेच भी सकते हैं। केरल के जिन शहरों में साबुन प्रोजेक्ट चल रहा है वहां बड़ी साबुन कंपनियों की बिक्री गिर गई है। सुकुमारन बताते हैं कि हम जिन महंगे साबुन का इस्तेमाल करते हैं उनमें खतरनाक केमिकल होते हैं जिनसे हमारा बचाव हैंडमेड साबुन के इस्तेमाल से हो जाता है। आप देश के किसी कोने से साबुन निर्माण सीखना चाहते हैं तो सुकुमार जी से संपर्क कर सकते हैं।( के सुकुमारन फोन - 9447482816  ) 

जयपुर के पास नायला गांव के रहने वाले हनुमान शर्मा बताते हैं कि हमारे गांव और आसपास के गांव में राजस्थानी साड़ियों पर प्रिटिंग काम जोरों पर है। यहां हजारों लोगों को रोजगार मिला हुआ है। कोई भी एक दिन में छपाई का काम सीख जाने के बाद 200 रुपये रोज आराम से कमा सकता है। लोग अपने घरों में इस तरह का काम कर रहे हैं। कोई हमारे पास आए तो हम उसे ये रोजगार दिलाने में मदद कर सकते हैं।

बिहार की राजधानी पटना के युवा नीरज कुमार पिछले कई सालों से शाहगंज इलाके में कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र, ब्यूटी पार्लर ट्रेनिंग सेंटर करीब करीब निःशुल्क चला रहे हैं। नीरज पहली बार कुछ साल पहले एनवाईपी के जहानाबाद शिविर में पहुंचे थे। उसके बाद उन्होंने कुछ नया और कुछ अलग करने का तय कर लिया। गरीब युवाओं से मामूली सी रजिस्ट्रेशन राशि पर ये कोर्स सीखाए जाते हैं।
कई लोगों को प्रशिक्षण पाकर रोजगार मिल चुका है। उनके सभी प्रोजेक्ट बिना किसी सरकारी सहायता के चल रहे हैं। नीरज ने आपस में एक दूसरे की मदद के लिए अपना बैंक शुरू किया है। अपने समूह के लोगों को रोजगार शुरू करने के लिए सस्ते कर्ज देने के लिए फंड भी शुरू किया है। साथ ही किसी बीमारी में आपात सहायता के लिए भी फंड की शुरूआत की है। हाल में अचार पापड़ और झूमर आदि का निर्माण शुरू कराया है। उत्पादित वस्तुओं की मार्केटिंग के लिए एक दुकान भी शुरू की है। काम बढ़ रहा है तो लोग मदद के लिए भी आ रहे हैं। अब उन्होंने युवा रक्तदाताओं का समूह भी तैयार किया है।

जन्मदिन पर दान की स्कीम नीरज ने युवाओं को समाज सेवा से जोड़ने के लिए अनूठी स्कीम शुरू की है। उनके संगठन से जुड़े युवा अपने जन्मदिन पर संस्था को दान देकर अपने जन्मदिन को यादगार बनाते हैं। इतना ही नहीं जो दान राशि अपने जन्मदिन पर देते हैं उसे आजीवन दान देते रहने का संकल्प लेते हैं।
 ( संपर्क नीरज, पटना - 9334724789 )    

बुंदेलखंड के शहर झांसी के युवा कमलेश राय ने बबीना कैंट और ललितपुर जिले में नबार्ड की मदद से कई तरह के प्रोजेक्ट शुरू किए हैं जो महिलाओं के लिए काफी मददगार साबित हो रहे हैं। कमलेश बताते हैं कि पहले मैं समाजसेवा के प्रति गंभीर नहीं था। पर बनारस राष्ट्रीय युवा योजना की एक बैठक में मुझे कुछ जिम्मेवारियां दी गईं उसके बाद जिंदगी बदल गई।


वे बताते हैं कि 2010 में अरुणाचल प्रदेश गया और वहां हरि विश्वास द्वारा चला जा रहे समाजसेव प्रोजेक्ट से प्रशिक्षण लेकर झांसी में काम शुरू किया। अब एनवाईपी झांसी कुल 11 प्रशिक्षण केंद्र चला रहा है। इसमें महिलाओं को सिलाई का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण पूरा होने पर उन्हें सिलाई मशीनें भी दिलाई जाती हैं। इसके अलावा कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र और नशामुक्ति केंद्र भी चलाया जा रहा है। ( कमलेश राय - 9616024007 )

-         विद्युत प्रकाश मौर्य

Saturday, September 26, 2015

कभी मंदिरों का समूह था कुतुबमीनार कांप्लेक्स

कुतुबमीनार के आसपास मंडराते परिंदे। 
एक दिन बेटे अनादि ने कहा पापा कुतुबमीनार देखने चलते हैं। वह जो तीन साल के थे तब सरदियों की एक मीठी धूप में कुतुबमीनार गए थे। पर उसकी उन्हें याद नहीं। लिहाजा एक बार फिर कुतुबमीनार की सैर पर निकले अगस्त 2015 में श्रीकृष्णजन्माष्टमी के दिन। पहले इस्कान टेंपल फिर लोटस टेंपल फिर कुतुब कांप्लेक्स। तो आईए चलते हैं कुतुबमीनार की सैर पर....

 दिल्ली का कुतुबमीनार दिल्ली की पहचान है। पर इसके परिसर में सिर्फ कुतुबमीनार ही नहीं बल्कि कई ऐतिहासिक स्मारक हैं। पर वास्तव में यह कभी मंदिरों का समूह था।यहां मौजूद महरौली का लौह स्तंभ तो लोगों में काफी लोकप्रिय है। इसे कई फिल्मों में भी देखा जा चुका है। आपने इसे अमिताभ बच्चन तब्बू की फिल्म चीनी कम में देखा होगा।

कुतुबमीनार ईंट से बनी दुनिया की सबसे ऊंची मीनार है। इसे 1193 में कुतुबदीन एबक ने बनवाया था।  कहा जाता है कि इस परिसर में बने 27 मंदिरों को गिरा कर उनके मलबे से मीनार बनवाई । हालांकि एबक कुतुबमीनार को पूरा नहीं करवा सका था। इसकी तीन मंजिलें उसके दामाद इल्तुतमीश ने पूरी करवाईं। मीनार के बीच बीच में कुराने की आयतें लिखी गई हैं। निर्माण में लाल बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इसकी ऊंचाई 72.5 मीटर (237.86 फीट) और व्यास 14.3 मीटर है, जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर (9.02 फीट) हो जाता है।

सीढ़ियां चढ़ने की इजाजत नहीं - कुतुबमीनार के अंदर 379 सीढियां हैं। पर अब सीढियों से किसी को चढ़ने की इजाजत नहीं है। 1981 से पहले मीनार के ऊपर आम लोगों को जाने दिया जाता था लेकिन 4 दिसंबर 1981 में हुए एक हादसे के कारण मीनार के अंदर की सीढ़ियों पर चढ़ना बंद करा दिया गया। इस हादसे में 45 लोगों की मौत हो गई थी। इसमें बड़ी संख्या में स्कूली छात्र थे। यह कुतुबमीनार के इतिहास में सबसे बड़ा हादसा था। इससे पूर्व 1955 के बाद से दर्शकों को 29 मीटर तक चढ़ाई करने की इजाजत थी।

पूरी नहीं हो सकी अलई मीनार - पर कुतुबमीनार से भी बड़ा मीनार इसके बगल में बनाने की कोशिश हुई थी जो कभी पूरी नहीं हो सकी। अलई मीनार अधूरी रह गई। इसका निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने शुरू कराया था। इसे बडा भव्य रूप देने की योजना थी। इसे कुतुब मीनार से दुगुनी ऊंची बनाने का निश्चय किया गया था, परंतु इसका निर्माण 24.5 मीटर पर प्रथम मंजिल पर ही  आकर रूक गया। इसका निर्माण 1311 में आरंभ हुआ था। पर 1316 में  अलाउद्दीन अल्लाह को प्यारे हो गए। अगर अलाउद्दीन खिलजी की मौत न हुई होती तो कुतुबमीनार आज अलई मीनार कांप्लेक्स के नाम से जाना जाता। और कुतुबमीनार की ऊंचाई फीकी पड़ गई होती। एक समय तक अलाउद्दीन खिलजी की ये कोशिश अनजान थी। 1912 में खुदाई के दौरान अलई मीनार का खुलासा हो पाया।

 कुव्‍वत-ए-इस्‍लाम मस्जिद  - कुतुब परिसर के खंड़हरों में भी कुव्‍वत-ए-इस्‍लाम (इस्‍लाम का नूर) मस्जिद विश्‍व का एक भव्‍य मस्जिद मानी जाती है। कुतुबुद्दीन-ऐबक ने 1193 में इसका निर्माण शुरू कराया और 1197 में मस्जिद पूरी हो गई। आजकल यह मस्जिद खंडहर के रूप में हैं।  मस्जिद के निर्माण हेतु मंदिरों में लूटपाट की गई थी। वास्तव में यह मस्जिद पारंपरिक रूप से हिन्‍दू स्थापत्‍यअवशेषों का ही रूप है।


अजूबा लौह स्तंभ जिसमें जंग नहीं लगता  – कुतुब मीनार के पास मस्जिद के प्रांगण में एक 7 मीटर ऊंचा लौह-स्‍तंभ है। यह कहा जाता है कि यदि आप इसके पीछे पीठ लगाकर इसे घेराबंद करते हो जो आपकी इच्‍छा होगी पूरी हो जाएगी। राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (375 – 413 ) से निर्माण कराया गया। ऐसा माना जाता है कि तोमर साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तंभ कुतुब परिसर में लगवाया।

 लौह स्तंभ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन् 1052 के तोमर राजा अनंगपाल द्वितीय का जिक्र है। सैकडों वर्षों से अपने स्थान पर बुलंदी से खडा यह स्तम्भ अपनी जंग प्रतिरोधक क्षमता की वजह से समस्त विश्व के धातुविज्ञानियों के बीच अचरज का विषय है। इतिहासकारों का मानना है कि 'लौह स्तंभ' को बनाने के लिए 'वूज स्टील' का इस्तेमाल किया गया होगा, जो शुद्ध लोहा नहीं है। सन् 1997 में पर्यटकों के द्वारा इस स्तंभ को नुकसान पहुंचाने के पश्चात इसके चारों ओर लोहे का गेट लगा दिया गया है।

कैसे पहुंचे - कुतुबमीनार कांप्लेक्स सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। यह सातों दिन खुला रहता है। प्रवेश टिकट 10 रुपये है। यहां क्लाक रूम, पार्किंग और शौचालय आदि की सुविधाएं उपलब्ध है। वैसे नजदीक का मेट्रो स्टेशन कुतुबमीनार है। यहां घूमने के लिए दो घंटे का समय जरूर निकालें।
vidyutp@gmail.com

( WORLD HERITAGE SITE  LISTED IN 1993 ) 



Thursday, September 24, 2015

कमल मंदिर यानी लोटस टेंपल

अगर आप दिल्ली में कोई हरा भरा और सुंदर आध्यात्मिक स्थल तलाशकर वहां कुछ वक्त गुजारना चाहते हैं तो लोटस टेंपल यानी कमल मंदिर से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती। 27 एकड़ के दायरे में फैली हरियाली यहां आपका मनमोह लेगी। इस हरियाली की सिंचाई के लिए रिसाइकिल किए गए जल का इस्तेमाल किया जाता है जो प्रेरक कार्य है। ये मंदिर वास्तुकला, पर्यावरण संरक्षण का अदभुत उदाहरण है।

लोटस टैंपल वैसे तो बहाई धर्म का मंदिर है। बहाई धर्म बहाउल्ला द्वारा स्थापित एक ऐसा धर्म है जिसमें दुनिया के अलग अलग धर्मों की अच्छी बातों का संग्रह किया गया है। इस धर्म में कोई लंबा चौड़ा कर्मकांड नहीं है। लिहाजा काफी लोगों को ये प्रभावित करता है। दिल्ली के दर्शनीय स्थलों की सूची में लोटस टेंपल नया नाम है क्योंकि ये दिसंबर 1986 में तैयार हुआ था। वहीं दुनिया भर में जो बहाई धर्म के मंदिर हैं उनमें भी लोटस टेंपल सबसे नया है। इसका निर्माण छह साल में पूरा हुआ था। तब इसके निर्माण में 10 करोड़ रुपये की लागात आई थी।

27 पंखुडियों वाला कमल – मुख्य मंदिर में कमल की 27 पंखुडिया बनी हुई हैं। मंदिर का वास्तु इस तरह का है इसमें सूर्य के प्रकाश आने का सुंदर इंतजाम है। मंदिर में अंदर के विशाल प्रार्थना हॉल है। अंदर कोई मूर्ति नहीं है। प्रार्थना हाल में प्राकृतिक तौर पर रोशनी आती रहती है। अंदर आने वाले दर्शकों से पूरी तरह शांति बनाए रखने की अपील की जाती है।

जल संरक्षण की मिसाल – लोटस टेंपल के अंदर की हरियाली को बनाए रखने के लिए मंदिर प्रबंधन तीन लाख लीटर रिसाइकिल किए हुए पानी का प्रतिदिन इस्तेमाल करता है। इसके लिए मंदिर परिसर में रिसाइक्लिंग प्लांट लगाए गए हैं। मुख्यमंदिर के परिसर में  कुल 9 सरोवर बनाए गए हैं जिनमें हमेशा पानी भरा रहता है।

मंदिर  में संग्रहालय – मंदिर में एक भव्य संग्रहालय और सूचना केंद्र का निर्माण किया गया है। इस भवन के ऊपर हरा भरा घास का मैदान है। अंदर बने संग्रहालय में शीतल वातावरण में आप बहाई धर्म के बारे में जानकारी, दुनिया के दूसरे मंदिरों को बारे में जानकारी साथ ही बहाई धर्म के साहित्य के बारे में जानकारी ले सकते हैं। इस खंड में लोटस टेंपल के निर्माण की भी जानकारी विस्तार से उपलब्ध है। लोटस टेंपल के अलावा दुनिया में पांच और बहाई मंदिर बनाए गए हैं।
कमल मंदिर के प्रांगण में अनादि। 

खुलने का समय – लोटस टेंपल आमतौर पर सुबह 9.30 बजे से शाम 7 बजे तक खुला रहता है। हर सोमवार को ये मंदिर बंद रहता है। सुबह 10 बजे, दोपहर 12 बजे और शाम 3 और 5 बजे मंदिर  में प्रार्थना होती है। ये प्रार्थना 5 मिनट की होती है। मुख्य कक्ष में 1300 लोगों के बैठने का इंतजाम है। मंदिर के मुख्य द्वार के पास वाहनों के लिए फ्री में पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है।

कैसे पहुंचे - यहां मेट्रो के नेहरु प्लेस या कालकाजी स्टेशन से पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। मंदिर में जाने के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं है। मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क जूता घर और पेयजल का भी इंतजाम है। हर रोज 8 से 10 हजार लोग लोटस टेंपल देखने के लिए पहुंचते हैं।

( LOTUS TEMPLE, DELHI, BAHAI WORSHIP HOUSE ) 


Sunday, September 13, 2015

गली कासिम जान- गालिब की हवेली

पुरानी दिल्ली में चांदनी चौक से फतेहपुर मसजिद की ओर बढ़ते हुए गुरुद्वारा शीशगंज और नई सड़क के बाद बायीं तरफ आता है बल्लीमारान। वैसे तो बल्लीमारान आज की तारीख में चश्मे और जूते चप्पलों को बड़ा बाजार है। पर इन्ही बल्लीमारान की गलियों में थोड़ी दूर चलने पर आपको गली कासिम जान का बोर्ड नजर आता है। इस बोर्ड को देखकर कुछ याद आने लगता है। 

गली काफी लंबी है जो लालकुआं की तरफ चली जाती है। पर गली कासिम जान में बस थोड़ा सा आगे बढ़ने पर एक देश के एक महान शायर का घर आता है। ये महान शायर हैं मिर्जा गालिब। उर्दू और फारसी के जाने माने शायर मिर्जा असदुल्ला खां गालिब अपने आखिरी दिनों में दो दशक से ज्यादा इसी हवेली में रहे। वे साल 1860 से 1869 में इस हवेली में आए थे। फिर यहां के होकर रह गए। कौन जाए अब दिल्ली की गलियां छोड़ कर। 15 फरवरी 1869 को उन्होंने आखिरी सांस ली। उनकी मजार हजरत निजामुद्दीन की दरगाह के पास है।


गालिब की हवेली की सरंचना शानदार है। ईंटो से बना ये अर्धवृताकार भवन किसी हवेली सा लगता है। हालांकि भारत विभाजन के बाद ये हवेली बुरे हाल में थी। गालिब के प्रेमी लोगों ने इस हवेली के संरक्षण में बड़ी भूमिका निभाई। अब ये हवेली गालिब के संग्रहालय के तौर पर विकसित हो गई। पर सोमवार को मत जाइएगा। इस दिन हवेली बंद रहती है। बाकी दिन ये हवेली 11 बजे से शाम 6 बजे तक खुली रहती है। गालिब का जन्म 27 दिसंबर 1797 को आगरा में हुआ था। आगरा में गालिब की स्मृति में कुछ नहीं है पर ताज के शहर में अब गालिब की स्मृतियों के नाम पर केवले दो मोहल्ले छोटा गालिबपुरा और बड़ा गालिबपुरा शेष हैं। गालिब जब गली कासिम जान में रहने आए तब वे साठ को पार कर चुके थे। देश 1857 की क्रांति से आगे निकल चुका था। एक शायर के तौर पर गालिब का काफी नाम हो चुका था।

तो गौर फरमाइए- 
पूछते हैं वो के गालिब कौन है... कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या?
गालिब की इस हवेली का नया जीवन देने में मशहूर फिल्मकार गुलजार की भी बड़ी भूमिका है। गालिब की हवेली के बाहर विख्यात विद्वान राल्फ रसेल की उक्ति लिखी हुई है- गालिब अगर अंगरेजी भाषा के कवि होते तो उनकी गिनती विश्व इतिहास के महानतम कवियों में होती। गालिब की इस हवेली को देखकर उनका ये शेर सबसे पहले याद आता है-

वो आएं घर में हमारेखुदा की कुदरत है।
कभी हम उनकोकभी अपने घर को देखते हैं।
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आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक
कौन जीता  है तेरी जुल्फ के सर होने तक।
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उनके देखे से आ जाती है चेहरे पर रौनक
वे समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है।

और गालिब का सबसे लोकप्रिय शेर

न कुछ था तो खुदा था, न कुछ होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता तो मैं क्या होता।
-         
और अंत में...

हमने माना के तगाफुल न करोगे लेकिन,
खाक हो जायेंगे हम तुमको खबर होने तक।

तो कभी आइए ना गली कासिम जान में....




शायर का संग्रहालय - गालिब की हवेली को फिल्मकार गुलजार के प्रयास से नया रूप दिया गया है। हवेली के दो कमरों में मशहूर शायर की यादें समेटने की कोशिश की गई है। यहां गालिब के दो दीवान देखे जा सकते हैं। इसके अलावा गालिब के पसंदीदा खेल चौसर और शतरंज की बिसात भी देख सकते हैं। गालिब जैसे बरतनों का इस्तेमाल करते थे, वैसे कुछ बरतन यहां संकलित किए गए हैं।

दीवारों पर उनकी प्रसिद्ध शायरी का संकलन किया गया है। गालिब साहब की दो मूर्तियां और और एक विशालकाय पेंटिंग भी यहां पर है। 26 दिसंबर 2010 को गालिब की एक मूर्ति यहां स्थापित की गई है।

उग रहा है दरो दीवार पर सब्जा गालिब
 हम बयाबां में हैं, और घर में बहार आई है।


घुम्मकड़ गालिब आगरा में पैदा हुए मिर्जा गालिब का ज्यादातर वक्त दिल्ली में गुजरा, पर वे बड़े घुम्मकड़ किस्म के इंसान थे। उन्होंने कई शहरों का पानी पीया। उन्होंने रामपुर, फिरोजपुर झिरकाभरतपुर, बांदा, लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना, मुर्शिदाबाद और कोलकाता में भी अपना वक्त गुजारा। पर अंत में दिल्ली पहुंचे। अंतिम दिनों में वे दो बार रामपुर के दरबार में भी गए। उनके देश भर में करीब 200 शागिर्द थे। जिसमें बादशाह बहादुर शाह जफर, अल्ताफ हसन हाली ( पानीपत), दाग देहलवी और मुंशी हरगोपाल प्रमुख थे।

गालिब की पत्नी उमराव बेगम- गालिब की पत्नी उमराव बेगम गली कासिम जान के रहने वाले नवाब लोहारू इलाही बक्श मारूफ की बेटी थीं। उनका जो घर था उसमें आजकल राबिया गर्ल्स स्कूल संचालित होता है। गालिब 13 के थे और उमराव 12 तब दोनों का निकाह हुआ। दोनों की शादी खूब निभी।


 उमराव बेगम बड़ी वफादार पत्नी थीं। हालांकि गालिब को शिकायत रहती थी कि वे उनकी शायरी की तारीफ नहीं करतीं। वास्तव में उमराव बेगम को शायरी पसंद नहीं थी, पर उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। गालिब को कुल सात बच्चे हुए पर सभी कच्ची उम्र में ही अल्लाह को प्यार हो गए।
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( MIRJA GALIB, GALI KASIM JAN, OLD DELHI,  NIJAMUDDIN, DELHI )
  



Friday, September 11, 2015

पुण्य सलिला मां गंगा का मंदिर - गंगा महारानी मंदिर

पुण्य सलिला मां गंगा राजस्थान में नहीं बहतीं, पर उनका एक मंदिर राजस्थान में है। गंगा महारानी का मंदिर  राजस्थान के भरतपुर शहर का बहुत ही सुंदर मंदिर है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसके बनने में 90 साल का समय लगा था। ये मंदिर भरतपुर किले के मुख्य द्वार के सामने स्थित है। मंदिर की वास्तुकला देखते ही बनती है। मंदिर के अंदर मगरमच्छ पर सवार मां गंगा की प्रतिमा है।

इस मंदिर का निर्माण 1845 में भरतपुर के जाट राजा महाराजा बलवंत सिंह ने प्रारंभ करवाया। पांच राजाओं के शासन काल तक इस मंदिर का निर्माण चलता रहा। महाराजा ब्रजेंद्र सिंह के शासन काल में इसका निर्माण पूरा हुआ। मंदिर में पुण्य सलिला गंगा नदी की विशाल प्रतिमा है। यहां गंगा मगरमच्छ पर सवार दिखाई गई हैं। 

मंदिर में गंगा मां की प्रतिमा संगमरमर की बनी है। उनके बगल में चार फीट ऊंची राजा भगीरथ की प्रतिमा है जो मां गंगा को प्रणाम कर रहे हैं। गंगा मां की मूर्ति का निर्माण एक मुस्लिम मूर्तिकार ने किया था। गंगा मां मंदिर का भवन दो मंजिला है। दीवारों पर शानदार नक्काशी की गई है। बादामी रंग के इस मंदिर के निर्माण के लिए भरतपुर जिले के बंशी पहाड़पुर से पत्थर लाए गए थे। वास्तु के लिहाज से मुगल, राजपूत और दक्षिण भारतीय शैली का मेल दिखाई देता है। मंदिर करीब डेढ़ एकड़ क्षेत्र में फैला है।

प्रसाद में मिलता है गंगा जल - यहां दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को प्रसाद में गंगा जल वितरित किया जाता है। मंदिर के दो प्रवेश द्वार है। एक प्रवेश द्वार पर भगवान कृष्ण खड़े हैं जबकि दूसरे प्रवेश द्वार में शिव पार्वती और लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा है। मंदिर में दूर दूर से श्रद्धालु मां गंगा का आशीर्वाद लेने आते हैं। 

निर्माण की कहानी - कहा जाता है कि भरतपुर के महाराजा बलवंत सिंह को लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई। जब उन्हें संतान रत्न की प्राप्ति हुई तो उन्होंने अपने पुरोहित की सलाह पर गंगा महारानी का मंदिर बनवाने का निश्चय किया। इस मंदिर के निर्माण में कोई चंदा नहीं लिया गया, पर राज घराने से जुड़े कर्मचारियों के वेतन से मामूली राशि की कटौती की गई। मंदिर की खास बात ये है कि राजमहल के एक झरोखे से हमेशा सीधे गंगा महारानी मंदिर के दर्शन होते हैं। 


खुलने का समय – मंदिर सुबह 5 बजे खुल जाता है।  दोपहर 12 बजे बंद हो जाता है। फिर शाम 5 बजे से रात्रि 10.00 बजे तक खुला रहता है। गंगा सप्तमी और गंगा दशहरा मंदिर के प्रसिद्ध त्योहार हैं, जब यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे – भरतपुर के मुख्य बस स्टैंड या फिर रेलवे स्टेशन से साइकिल रिक्शा या फिर आटो रिक्शा से पहुंचा जा सकता है। बस स्टैंड से मंदिर की दूरी 4 किलोमीटर के करीब है। रेलवे स्टेशन से भी इसकी दूरी 5 किलोमीटर के आसपास है। मंदिर के आसपास घना बाजार है।


मां गंगा के दर्शन के बाद भरतपुर शहर के बाजारो को घूमता हुआ मैं लोगों से बस स्टैंड का रास्ता पूछकर आगे बढ़ता जा रहा हूं। रास्ते में कई सरसों तेल की मिलें दिखाई दे रही हैं। सावन का महीना है बाजार मौसमी मिठाई घेवर से पटा पड़ा है। बस स्टैंड पहुंच कर दोपहर में हल्का सा भोजन लेने के बाद दिल्ली वाली बस में बैठ गया।  
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( GANGA MAHARANI TEMPLE, BHARATPUR, RAJSTHAN ) 

Wednesday, September 9, 2015

भरतपुर का संग्रहालय – 56 खंभे लाल दीवारें

भरतपुर किले के अंदर भरतपुर स्टेट म्यूजियम स्थित है जिसको देखे बिना आपकी भरतपुर यात्रा अधूरी है। आटो रिक्शा वाला मुझे भरतपुर किले के मुख्य द्वार पर छोड़ देता है। पुल पारकर अष्टधातु गेट से  मैं अंदर प्रवेश करता हूं। कई घोड़ा गाड़ी दिखाई देते हैं। यानी भरतपुर शहर में अभी भी घोड़ा गाड़ी चलते हैं। मैं देखता हूं कि किले के मुख्य द्वार के अंदर भी आबादी बसी है। दुकाने हैं लोगों के घर हैं। थोड़ी दूर आगे चलने पर टाउन हाल आता है। यहां से बाईं तरफ चलने पर स्टेट म्यूजियम का पता पा लेता हूं। गरमी है इसलिए रूक कर जूस पीता हूं। संग्राहलय के प्रवेशद्वार पर टिकट घर है। प्रवेश टिकट 10 रुपये का है।

लोहागढ़ किले के अंदर स्थित भरतपुर संग्रहालय में अद्वितीय और पुरातन कलाकृतियाँ और पुरातात्विक संसाधन हैं। यहां आने वाले सैलानी इसके पुरातन सौंदर्य को देख कर चकाचैंध हो जाते हैं। यहां खास तौर पर अस्त्र शस्त्र और मूर्तियों का विशाल संग्रह है।

पहले राजा की कचहरी था - इस तीन मंजिला इमारत का निर्माण महाराजा बलवंत सिंह ने 19 वीं शताब्दी के दौरान किया था। यह संग्रहालय पहले भरतपुर के शासकों का प्रशासनिक कार्यालय था और इसे कचहरी कलां के नाम से जाना जाता था। भरतपुर के शासकों का प्रशासनिक खंड हुआ करता था। बाद में  1 नवंबर 1944 में इसे संग्रहालय का रुप दिया गया।  यह संग्रहालय भरतपुर की ऐतिहासिक संपत्ति के शानदार संचयन का प्रदर्शन करता है। यहां रियासतकालीन 500 से अधिक कलाकृतियां हैं।
भरतपुर के राजाओं का कमरा, खास या व्यक्तिगत ब्लॉक संग्रहालय का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

इस संग्रहालय को देखकर दर्शक भरतपुर के राजाओं के वैभव और भव्यता का अंदाज लगा सकते हैं। यहां की कलाकृतियां और स्मृति चिन्ह भरतपुर के स्थानीय निकाय ने बहुत ही सावधानी से सहेजे हैं। भरतपुर राजकीय संग्रहालय में बेहद बेशकीमती मूर्तियां भी रखी हैं। ये कीमती सामान मैलाह, नोह, बयाना और बारेह नाम के पुराने गांवों की पुरातात्विक खुदाई के दौरान मिले थे। यह संग्रहालय प्राचीन मूर्तियों, चित्रों, सिक्कों, शिलालेखों, सिक्कों, प्राणी नमूनों, सजावटी कला वस्तुओं और जाट शासकों द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले हथियारों का दुर्लभ संचयन प्रस्तुत करता है। इस संग्रहालय की आर्ट गैलरी में लिथो पेपर, अबरख और पीपल के पत्तों पर बने लघु चित्र दिखाए गए हैं।
इसमें बनता था पूरे गांव का भोजन। 

अदभुत् स्नानागार (हमाम)  मुख्य द्वार से दाहिनी तरफ जाने पर इस भवन में महाराजा का बनवाया हुआ स्नानागार है। इस तरह का विशाल स्नानागार देश में आपको शायद ही कहीं और देखने को मिले। इस स्नानागार में कई हाल बने हुए हैं। इनमें प्राकृतिक तौर पर रोशनी आने का इंतजाम है। इनमें पानी लाने के लिए पाइप से अंडरग्राउंड इंतजाम किया गया था। स्नानागर के अंदर कुछ हाल ऐसे हैं जिसमें पानी गरम करने का भी इंतजाम किया गया था। हौद के नीचे भट्टियां लगाई गई थीं जिससे पानी गरम हो जाता है। स्नानागार की दीवारों पर शानदार नक्कासी की गई है। कपड़े बदलने के लिए भी कमरे बनाए गए हैं। इन्हें देखकर राजा रानियों के शाही अंदाज और शौक का एहासास होता है।
संग्रहालय की पहली मंजिल पर बने हाल में कई तरह के अस्त्र शस्त्र का संग्रह देखा जा सकता है। इसमें बहुत ही छोटे का आकार की पिस्तौल भी देखी जा सकती है तो बड़े हथियार भी देखे जा सकते हैं। घड़ियां, राजाओ द्वारा इस्तेमाल की गई कटलरी का विशाल संग्रह भी यहां है। संग्रहालय के द्वार के पास एक विशाल कड़ाही रखी गई है जिसमें एक साथ कई हजार लोगों के भोजन तैयार किया जाता था। गरमी से बचने के लिए विशाल चंवर देखा जा सकता है। यहां बंदर समेत कई जानवरों को केमिकल ट्रिटमेंट से बचाकर शोकेस मे रखा गया है।

तीसरी मंजिल पर 56 खंभे। 
56 खंभे से देखें नजारा - पर जब आप तीसरी मंजिल पर पहुंचते हैं तो नजारा देख चौंक जाते हैं। 56 खंभो वाली बारादरी का नजारा अदभुत है। इस चौबारे में बैठकर  आप आसपास के नजारे देख सकते हैं। चांदनी रात में इस छत पर आना और भी बेहतर लगता होगा। यहां से शहर का नजारा भी शानदार दिखाई देता है। बताया जाता है कि इस किले में ऐतिहासिक फिल्म नूरजहां की शूटिंग भी हुई थी।

कैसे पहुंचे –  संग्रहालय सुबह 9.30 बजे से शाम 5.30 बजे तक खुला रहता है। टिकट 10 रुपये का है। भरतपुर का स्टेट संग्रहालय भरतपुर के मुख्य बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन से केवल 4 किलोमीटर की दूरी पर है। आप साइकिल रिक्शा या आटो रिक्शा लेकर जा सकते हैं। अब राजस्थान सरकार इस संग्रहालय कायाकल्प कराकर और भी बेहतर बनवा रही है।
- Vidyut Prakash Maurya

( BHARTPUR FORT, BARADARI,  RAJSTHAN ) 



Monday, September 7, 2015

भरतपुर का लोहगढ़ किला जिसे कोई भेद नहीं पाया

भरतपुर जिले में स्थित लोहागढ़ किला आयरन फोर्ट के नाम से भी लोकप्रिय है और इसका निर्माण 18वीं सदी में हुआ था।  भरतपुर में लौहगढ़ का किला भारत में एकमात्र ऐसा गढ़ है जिसे कभी कोई दूसरा कब्जा नहीं कर पाया।
भरतपुर के राजाओं ने मातृभूमि की सेवा के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। राजस्थान प्रदेश की ऐसी ही एक रियासत थी भरतपुर। किला भरतपुर के जाट शासकों की हिम्मत और शौर्य का प्रतीक है. मिट्टी के इस किले की यह एक विशेषता रही है कि उसे आजतक कोई भी हरा नहीं सका है। इसलिए यह किला आज भी अजेय दुर्ग लोहागढ़ के नाम से विख्यात है। भरतपुर का पुराना नाम भी लोहागढ़ रहा है। 
महाराजा सूरजमल ने एक अभेध्य किले की परिकल्पना की थी, जिसके अन्तर्गत शर्त यह थी कि पैसा भी कम लगे और मजबूती मे बेमिशाल हो। अपने क्षेत्र की सुरक्षा के लिए ऐसे किले का निर्माण करते थे जिसे दुश्मन के तोप के गोले भी न भेद पाए। इस किले को कभी कोई नहीं जीत पाया यहां तक की अंग्रेज भी नहीं जिन्होंने इस किले पर 13 बार अपनी तोपों के साथ हमला किया पर हर बार नाकामी हाथ लगी। 1805 ई. में जनवरी से अप्रैल तक लॉर्ड लेक ने भरतपुर के किले का घेरा डाला था। मिट्टी से बने इस किले की दीवारों को अंगरेजों की तोपें भेद नहीं पाईं।

भरतपुर का किला बांसी और पहाड़पुर के गुलाबी पत्थरों से बना है। इसका काव्यमय वर्णन सूरजमल के राजकवि सोमनाथ द्वारा रचित सुजान-विलास में मिलता है। बांसी पहाड़पुर से संगमरमर और बरेठा से लाल पत्थरभरतपुर, कुम्हेर और वैर तक पहुचाया जाना तब बड़ा दुष्कर कार्य था। के नटवर सिंह अपनी पुस्तक – महाराजा सूरजमल में लिखते हैं-  डीग से बीस मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित सोघर के जंगल काट दिए गए और दलदतें पाट ही गई और वहाँ विशाल एवं भव्य  भरतपुर का किला बना । एक ओर से भरतपुर दलदली जमीन से घिरा था तो दो तरफ से वाणगंगा और रुपारेल नदियां इसकी रक्षा करती थीं। इस किले को बनाने का काम 1732 में आरंभ हुआ। जो कई राजाओं के कार्यकाल तक चलता रहा।
अनाह गेट भरतपुर। 
 मुख्य किले के चारों तरफ विशाल खाई बनवाई गई। इसमें पानी लाने का इंतजाम किया गया। ये खाई 40 फीट गहरी और 175 फीट चौड़ी है। किले में प्रवेश के लिए दो पुल बनाए गए थे। पूर्वी द्वार को अष्टधातु द्वार कहते थे। मुख्य किले की दीवारें 100 फीट ऊंची और 30 फीच चौड़ी थी। किले में सुरक्षा के लिए कुल 8 बुर्ज बनाए गए थे। सबसे ऊंचे बुर्ज से फतेहपुर सीकरी तक दिखाई देता था।

भरतपुर शहर के दस दरवाजे

भरतपुर शहर के बाहरी इलाके में भी सुरक्षा के लिए एक बाहरी खाई बनवाई गई जो 250 फीट चौड़ी और 20 फीट गहरी है। खाई बनाने से जो मलबा निकला उससे मोटी मिट्टी की दीवार बनाई गई। किले में कुल 10 बड़े दरवाजे थे। मथुरा पोल, वीर नारायण पोल, अटलबंद पोल, नीम पोल, अनाह पोल, कुम्हेर पोल, चांद पोल, गोवर्धन पोल, जघीना पोल, सूरज पोल जैसे नाम थे दरवाजों के। अब मिट्टी की दीवारें नजर नहीं आतीं पर शहर के दरवाजे आज भी दिखाई देतें हैं। 

vidyutp@gmail.com

( BHARATPUR FORT, LOHAGARH, 10 GATES , ANAH GATE  ) 

Saturday, September 5, 2015

केवलादेव - पानी बचाएं तभी बचेगी जिंदगी और बचेंगे परिंदे

कुदरत ने इंसान के ढेर सारी खूबियां बक्शी हैं पर उसे उड़ने का इल्म नहीं दिया। जिन पक्षियों को उड़ने को इल्म दिया है उन्हें प्रकृति से समन्वय बनाने की ताकत भी दी है। बदलते मौसम की मार से खुद को बचाए रखने के लिए पक्षी साल में कई महीने स्थान परिवर्तन करते हैं। ये परिवर्तन न सिर्फ मौसम से अनुकूलन के लिए होता है बल्कि प्रजनन के लिए भी होता है।

भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में आने वाले परिंदे अपने चार महीने के प्रवास में न सिर्फ प्रजनन करते हैं बल्कि अपने बच्चों के उड़ना भी सिखाते हैं। जब इन पंक्षियों को उड़ना भली प्रकार आ जाता है तब वे उन्हें अपने साथ ले जाते हैं। यह क्रम हर साल चलता है। पक्षियों की इस दुनिया को जितना गहराई में समझने की कोशिश करें उतना ही रूचिकर लगता है।
केवलादेव की कहानी शुरू होती है साल 1726 के आसपास से। साल 1726 से 1763 के बीच भरतपुर के प्रतापी जाट राजा महाराजा सूरजमल ने अजान बांध का निर्माण कराया। तब ये इलाका नमभूमि (वेटलैंड) था और यहां परिंदों बसेरा करने आते थे। पर 1893 से 1900 के बीच भरतपुर के राजा राम सिंह ने यहां पक्षी उद्यान बनाने के बारे में सोचा। उन्हें ब्रिटेन प्रवास के दौरान बतखों के शिकार के दौरान इसकी प्रेरणा मिली। उसके बाद केवलादेव क्षेत्र का संरक्षण शुरू हो गया। मीठे पानी की झील होने के कारण यहां बड़ी संख्या में विदेशी और देशी मेहमान परिंदे आकर बसेरा करने लगे। 1956 में देश की आजादी के बाद महाराजा ने इस क्षेत्र को राजस्थान सरकार को सौंप दिया और इसे पक्षियों के संरक्षण क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाने लगा।

पर सच्चाई है कि पक्षी वहीं बसेरा करने आते हैं जहां उन्हें नमभूमि और पानी मिलता है। ताल, चौर जैसे इलाके उनके लिए प्रिय होते हैं। राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र में सूखा पड़ा रहता है पर भरतपुर जिले का इस क्षेत्र ताजे पानी का संकट नहीं रहा। लिहाजा हर साल यहां साइबेरियन क्रेन समेत कई विदेशी पक्षी आते थे। पर सन 2000 के आसपास यहां पानी का ऐसा संकट आया कि विदेशी मेहमान परिंदों का आवक घटने लगी। परिंदे कम आने लगे तो सैलानियों का आना भी कम होने लगा। एक समय तो ऐसा आया जब लगा कि केवलादेव से विश्व धरोहर स्थल ( जो दर्जा इसे 1985 में मिला था) छिन लिया जा सकता है।

केवलादेव की खासियत ऐसी है कि यहां न सिर्फ ताल तलैया बल्कि नम भूमि, वन क्षेत्र, दलदली भूमि सब कुछ हुआ करती है। पर पानी के संकट ने इस गुलशन को वीराना कर दिया था। पर वन विभाग के अधिकारियों और राज्य सरकार के प्रयास से यहां पानी लाने की कोशिश की गई। साल 2012 में यहां 44 करोड़ की ज्यादा लागात से गोवर्धन ड्रेन से पानी लाने के इंतजाम किया गया। इसके लिए अंडरग्राउंड पाइपलाइन बिछाई गई। इसके बाद से केवलादेव के वन क्षेत्र में पानी तो आने लगा है। एक बार फिर से मेहमान परिंदो की आवक शुरू हो गई है। सैलानी भी आने लगे हैं। बाग गुलजार हो उठा है। पर अभी तक साइबेरियन क्रेन नहीं आया।

पानी बचाएं तभी बचेगा जीवन पार्क के अंदर 2006 में सलीम अली पेवेलियन बनाया गया है। यहां पानी का महत्व बताते हुए कई रोचक जानकारियां दी गई हैं। कई ग्रहों के बीच हमारी पृथ्वी ही ऐसी है जहां पर पानी है। पानी है इसलिए यहां जीवन है। हमारी धरती का 70 फीसदी हिस्सा पानी है। इस पानी में 12 फीसदी भूजल है। पानी का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा बर्फ के रूप में है। सिर्फ दो फीसदी ही मीठा पानी है जो पीने लायक है। हमें प्रकृति का दोहन इस तरीके से करना है कि हम पानी को बचाकर रख सकें , जिससे जिंदगी भी बची रहे।

आइए इन परिंदों से सीखें - केवला देव में आने वाले कई मेहमान परिंदे 5000 किलोमीटर से ज्यादा की उड़ान भर कर हर साल यहां पहुंचते हैं। कई परिंदे 200 किलोमीटर प्रतिघंटे की उड़ान भरते हैं। आसमान में 20 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरने वाले परिंदे अपने रास्ते का पता सूरज और चांद को देखकर लगाते हैं। इन परिंदों की खासबात है कि वे पहले साल जिस शहर के जिस उद्दान में जाकर बसेरा करते हैं, अगले साल फिर वहीं पहुंचते हैं। वे स्थान और रास्ता याद रखते हैं। यहां तक की अपना पेड़ और अपना घोसला भी याद रखते हैं।

 गाइड सरदार राजू सिंह बताते हैं कि केवला देव में आने वाले 90 फीसदी विदेशी परिंदे शाकाहारी होते हैं। जबकि 90 फीसदी देशी परिंदे मांसाहारी। भला क्यों आते हैं परिंदे केवलादेव में। इतना सब कुछ भला किसलिए... क्योंकि यहां उन्हें जीवन के लिए जरूरी पानी मिलता है। तो आइए पानी बचाने का संकल्प लें। परिंदों को बचाने का संकल्प लें।
साइकिल रिक्शा की हो विदाई - केवलादेव पार्क में फिलहाल साइकिल रिक्शा से सैलानियों को घूमाने की अनुमति है। पर साइकिल रिक्शा से 12 किलोमीटर से ज्यादा सैर करवाना रिक्शा चालकों के लिए थका देने वाला है। इसलिए मांग की जा रही है कि इसकी जगह बैटरी रिक्शा का इस्तेमाल किया जाए। बैटरी रिक्शा का एक और लाभ है कि इसमें बैक गियर होता है। इससे बार बार सैलानियों को घूमाने के लिए साइकिल रिक्शा को पीछे मोड़ने में दिक्कत नहीं आएगी। पार्क में रिक्शा चलाने वाले 130 से ज्यादा चालकों में से ज्यादातर बैटरी रिक्शा लेने को तैयार हैं। जरूरत है कि इसके लिए राजस्थान का वन विभाग पहल करे। खासकर वे रिक्शा वाले जो अनुभवी हैं पर उनकी उम्र ज्यादा हो चुकी है उन्हें बैटरी रिक्शा आ जाने से राहत मिलेगी।

हर डीजल पेट्रोल वाहन पर रोक लगे-  साथ ही पार्क में किसी भी तरह के डीजल और पेट्रोल वाहन पर रोक लगाई जानी चाहिए। वन विभाग के अधिकारियों को भी चाहिए कि वे इलेक्ट्रिक स्कूटर से पार्क का दौरा करें। पार्क के पर्यावरण को बचाए रखने के लिए ये निहायत जरूरी है। राजस्थान के वन विभाग के इस मामले में सख्त नियम बनाना चाहिए। इसके अलावा पार्क के पास से गुरजने वाले नेशनल हाईवे को पूरी तरह नो हार्न जोन में तब्दील किया जाए। हार्न बजाने वालों पर भारी जुर्माना का प्रावधान किया जाए।



( WATER, BIRD, KEOLADEV, BHARATPUR, WETLAND, POND, JUNGLE, GRASSLAND)
( केवलादेव  राष्ट्रीय पक्षी उद्यान - 6 )