Thursday, July 30, 2015

सोनपुर-वाराणसी पैसेंजर के संग पांच साल सफर

पांच साल काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान 1990 से 1995 के बीच पिताश्री की पोस्टिंग बिहार के हाजीपुर में हुआ करती थी। तब हाजीपुर से वाराणसी आने का सबसे सस्ता तरीका हुआ करता था सोनपुर वाराणसी इलाहाबाद पैसेंजर (SONEPUR BSB ALLAHABAD CITY PASSENGER) । तब ये ट्रेन मीटर गेज पर चलती थी। किराया था 16 रुपये। शाम 4.45 बजे सोनपुर से खुलने वाली 71 फास्ट पैसेंजर सुबह 4 बजे आसपास पौने तीन सौ किलोमीटर का सफर करके वाराणसी पहुंचा देती थी। तब ये ट्रेन स्टीम इंजन से चलती थी। पहली बार इस ट्रेन से बनारस आया था अपने एलएस कालेज के दोस्त विष्णु वैभव के साथ। सोनपुर से परमानंदपुर, शीतलपुर, दीघवारा होते हुए छपरा कचहरी।

 फिर छपरा जंक्शन, गौतम स्थान, घाघरा नदी पर मांझी का पुल बकुलहां और ट्रेन घुस गई यूपी में। मैं अपना बैग खोलता हूं, मां ने जो राह के लिए बनाकर दिया है, पूड़ियां और भुजिया उसे उदरस्थ करता हूं। इसके बाद भी सोने का तो कोई सवाल ही नहीं होता था। वाराणसी की ओर आगे बढ़ने के साथ ही पैसेंजर ट्रेन में भीड़ बढ़ती जाती थी। बलिया में ट्रेन 10 मिनट रुकती थी। वहां स्टेशन पर भी कुछ खाने पीने को मिलता था। सुरेमनपुर, बलिया, चितबड़ागांव, फेफना जंक्शन, सागरपाली जैसे स्टेशनों के बाद आता था औरिहार जंक्शन। यहां से गोरखपुर के लिए लाइन अलग होती है। यहां भी ट्रेन का ठहराव लंबा रहता था। वाराणसी से पहले आता था ऐतिहासिक पर्यटन स्थली सारनाथ। ये सब स्टेशन रात में आते थे, लेकिन भीड़ के कारण जागते रहना पड़ता था।

इस पैसेंजर ट्रेन में एक स्लीपर का भी कोच होता था। कई बार मैं 20 रुपये अतिरिक्त देकर पैंसेजर में स्लीपर कोच में जाकर आरक्षण करा लेता था। तब सफर आरामदेह हो जाता था। पर उस समय 20 रुपये की भी बहुत कीमत थी। ये बच जाए तो बनारस पहुंच कर इतने में कई बार लौंगलता खाया जा सकता था। लौंगलता बनारस की लोकप्रिय मिठाई है।
सन 1995 में प्रकाशित इंडियन ब्राडशॉ में छपरा से वाराणसी के बीच की समय सारणी। 

सोनपुर से इलाहाबाद का सफर - मैं वाराणसी सोनपुर पैसेंजर से 1990 में पहली वाराणसी गया था अपने दोस्त विष्णु वैभव के साथ। वह मेरी पहली लंबी रेल यात्रा थी, जिसमें एक राज्य से दूसरे राज्य में गया था। पर जल्दी ही मुझे इसी पैसेंजर ट्रेन से एक और लंबी यात्रा करने का मौका मिला। बीएचयू के बाद मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक कक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा देनी थी। फार्म डाक से मंगा कर भरा चुका था। इस भी बार मेरा सफर अकेले शुरू हुआ। सोनपुर से वाराणसी तक तो मैं इस ट्रेन में आ चुका था पर आगे का सफर मेरे लिए नया था। 


वाराणसी सोनपुर पैंसेजर पहले सोनपुर से इलाहाबाद सिटी तक जाती थी। तब वाराणसी से भुलनपुर (डीएलडब्लू) माधो सिंह होते हुए इलाहाबाद सिटी (रामबाग) के लिए मीटर गेज लाइन थी। तब मेरे लिए वह एक लंबा और उबाऊ सफर था। वाराणसी कैंट के बाद ट्रेन मंडुआडीह स्टेशन पहुंची। यहां से आगे भूलनपुर। भूलनपर डीजल रेल कारखाना वाराणसी के कैंपस के अंदर का रेलवे स्टेशन है। इसके बाद इलाहाबाद से पहले माधो सिंह, हांडिया खास, ज्ञानपुर रोड जैसे प्रमुख स्टेशन आए। ट्रेन लेट होती जा रही है। दोपहर के बाद मैं इलाहाबाद सिटी स्टेशन पहुंचा। इसे लोग रामबाग भी कहते हैं। हमारे पास रामबाग के पास नागबासुकि मुहल्ले में रहने वाले शुक्ला जी का पता था। पर मैं उनके यहां नहीं गया। 


हमारे पास दूसरा पता था मालति प्रजापति का जो इलाहाबाद के लाला की सराय में रहती थी। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए किया था। वे कविताएं भी लिखती थीं। साहित्यिक पत्रिका आजकल में उनकी एक कविता पढ़कर मेरी बहन ऋतंभरा ने उनसे पत्रमित्रता की थी। तो मैं आटो रिक्शा से तेलियरगंज पहुंचा। वहां से लाला की सराय। मालती जी के घर के सदस्य मेरा इंतजार कर रहे थे। क्योंकि हम उन्हें पहले ही खत लिखकर आने की सूचना दे चुके थे। 

मैंने उनके घर रहकर ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी थी। मेरा परीक्षा केंद्र मम्सफोर्डगंज के एक स्कूल में था। मालती जी के सहपाठी राम प्रसाद वर्मा मुझे साइकिल पर बिठाकर परीक्षा केंद्र ले गए। परीक्षा पहली पाली में थी। परीक्षा खत्म होने के बाद वे मुझे अल्फ्रेड पार्क और आनंद भवन घुमाने ले गए। उनके साथ मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ताराचंद छात्रावास में भी थोड़ी देर के लिए गया। 

हालांकि मेरा चयन इलाहाबाद और बीएचयू दोनों जगह हो गया। पर बीएचयू का कैंपस और होस्टल मुझे भा गए थे इसलिए एडमिशन बीएचयू में लेना तय किया। यहां होस्टल मिलने की गारंटी थी क्योंकि प्रवेश परीक्षा में मैं सेकैंड टॉप था। मेरा इंडेक्स (अंक ) 250 में 222 आया था। इस तरह 1990 के जुलाई में मैं वाराणसी आ गया।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( SONEPUR, ALLAHABAD CITY, RAMBAG, MADHO SINGH, METER GAUGE, COLORS OF BANARAS ) 

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