Sunday, August 9, 2015

गोदौलिया से लंका की ओर : आज मैं फिर पुरानी राहों पर


बनारस की सुबह का नजारा करने के बाद हमलोग चल पड़े  बीएचयू की ओर। कई साल बाद गोदोलिया पर उन्ही दुकानों पर नजर दौड़ाई जहां छात्र जीवन में खरीददारी करने पहुंचते थे। गिरिजाघर चौमुहानी पर दीप्ति ड्रेसेज। जहां से हम रेडीमेड कपड़े खरीदा करते थे। जलयोग पुरानी दुकान जहां का समोसा काफी प्रसिद्ध था। केसरी जलपान गृह जहां यदा कदा नास्ते के लिए पहुंचा करते थे। कन्हैया स्वर्णकला केंद्र और बनारस स्वर्णकला केंद्र मेरी नजरों के सामने है। इनके कैलेंडर बचपन में हमारी दीवारों की शोभा बढ़ाते थे।  

गोदौलिया चौराहा से रिक्शा किया लंका तक जाने के लिए, ताकि दोनों तरफ के नजारे दिखाई देते रहें। हालांकि इस मार्ग पर शेयरिंग आटो-रिक्शा भी चलते रहते हैं। जंगमबाड़ी, शिवाला, मदनपुरा, सोनारपुरा, बंगाली टोला, भदैनी, अस्सी जैसे मुहल्लों से गुजरते हुए करीब आधे घंटे में हमलोग लंका चौराहे पर थे। इस रास्ते पर पांच साल बनारस में रहते हुए न जाने कितनी बार हमने साइकिल दौड़ाई है। 
रास्ते में बनारस की प्रसिद्ध दुकानें नजर आ रही हैं। सोने चांदी की, मूर्तियों की। इन सब साइन बोर्ड से एक पुराना सा रिश्ता लगता है। तो लंका गेट को पार करने के बाद हमलोग बीएचयू परिसर में हैं। बीएचयू की सड़कों पर घूमते हुए मैंने अपने चार साल के नौनिहाल को यह बताया कि यही वह स्कूल है जहां मैंने पांच साल पढ़ाई की। बेटा बोला- वाहपापा आपका स्कूल तो बहुत सुंदर है। यहां तो हरियाली भी खूब है। शाम ढल रही थी सारे विभाग बंद थेलेकिन एक बार फिर मैं उस समाजिक विज्ञान संकाय के चौखट तक गया जहां पांच साल की सैकड़ो खट्टी मीठी स्मृतियां जुड़ी हैं।

हमने मैत्री जलपान गृह को बाहर से देखा। उसकी वह टेबल जहां कभी मैं अपने से दो साल सीनियर रहे मनोज तिवारी जो अब भोजपुरी फिल्मों के बड़े स्टार और गायक हैंसे आग्रह कर गीत सुना करता था। सब कुछ वैसा ही था। हमार धीरे धीरे साल दर साल उम्र पायदान को लांघते जा रहे हैं। जवानी की वह शैतानियां कम होती जा रही हैंलेकिन ऐसा लगता है मानो बीएचयू अभी उसी तरह जवान है।


हमारी उम्र भले ही बढ़ती जा रही हो पर वो पुल वो पुलिया.. वो मधुबन..वो कैफेटेरिया की टेबलें अभी भी तरह जवां-जवां है। बस वहां चेहरे हर साल बदल जाते हैं। पीढ़ियां बदल जाती हैं। फरवरी 1916 को स्थापित इस ज्ञान के मंदिर में हर साल कुछ नया जुड़ता है लेकिन पुरानी चीजें सब कुछ वैसी ही रहती हैं...
बीएचयू के सामजिक विज्ञान संकाय में आखिरी दिनों की एक तस्वीर। ( 1995 )
वाराणसी में एक नया विश्वनाथ मंदिर भी है। यह काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर में हैं।कुल 25 एकड़ में फैले मंदिर का गुंबद 252 फीट ऊंचा है। न सिर्फ बीएचयू में पढ़ने वाले छात्र बल्कि देश भर से आने वाले सैलानियों को भी यह मंदिर खूब पसंद आता है। मंदिर के बाहर एक दुकान है समोसे की। यहां आज भी दो रुपये में समोसा मिलता है।  बनारस की दूसरी प्रसिद्ध मिठाई है लौंगलता जो हर चौक चौराहे पर मिलती है। कई साल बाद मैंने फिर से समोसा और लौंगलता का लुत्फ उठाया।
काशी हिंदू विवि के सामाजिक विज्ञान संकाय के आगे अनादि अनत। ( मई 2011 ) 

विश्वनाथ मंदिर के पास स्थित मार्केट कांप्लेक्स में है इशान स्टूडियो इसके संचालक है फोटोग्राफ जग नारायण मौर्य। कई साल बाद उनसे भी मिलना हुआ। जग नारायण अक्सर खादी पहनते हैं। विचारों से समाजवादी हैं। एक्टिविस्ट हैं। किसी की भी आलोचना मुंह पर करने का माद्दा रखते हैं। फोटोग्राफी के साथ लेख भी लिखते रहते हैं। उनका घर सिगरा इलाके में है। इसी विश्वनाथ मंदिर मार्केट में प्रसिद्ध नाटककार विश्वनाथ बोस की फूलों की दुकान हुआ करती थी। 
जग नारायण जी से थोड़ी देर वार्ता के बाद इसके बाद हमलोग बाबा विश्वनाथ के मंदिर में दर्शन के लिए चल पड़े। नन्हें अनादि को मंदिर परिसर में खूब आनंद आया। पूरा मंदिर चारों तरफ से घूमकर देखा और हरी भरी घास पर खूब मस्ती की। 
 विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com  ( मई 2009 में वाराणसी में)
UTTAR PRADESH, BHU, VISHWANTH TEMPLE, MADHUBAN, SOCIAL SCIENCE, COLORS OF BANARAS )
बाबा विश्वनाथ मंदिर की दूसरी मंजिल पर। 

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