Monday, August 24, 2015

दशरथ मांझी ने की थी गया से दिल्ली तक 1400 किलोमीटर की पदयात्रा

पहाड़ का सीना चीर कर सड़क बनाने वाले दशरथ मांझी के जीवन पर अत्यंत खूबसूरत फिल्म बनी है मांझी द माउंटेन मैन। मांझी ऩे अपने जीवन काल में एक बार रेलवे ट्रैक से होते हुए पैदल ही गेहलौर से दिल्ली की 1400 किलोमीटर की दूरी तय की थी। उनकी दिल्ली तक की यात्रा का उद्देश्य था वजीरगंज से अपने गांव तक सड़क का निर्माण करवाना। फिल्म में उनकी इस यात्रा को दिखाया गया है। वे सासाराम जंक्शन पर और सासाराम के प्रसिद्ध शेरशाह के मकबरे के बैकड्राप में यात्रा करते हुए दिखाई देते हैं। इस तरह केतन मेहता की इस फिल्म में सासाराम का ऐतिहासिक शेरशाह का मकबरा दिखाई देता है। दशरथ मांझी को अपनी दिल्ली तक की इस पैदल यात्रा में दो महीने का समय लगा। तकरीबन 60 दिन में 1400 किलोमीटर यात्रा यानी एक दिन में औसतन 25 किलोमीटर की यात्रा। कहा जाता है कि माझी गया से दिल्ली पैदल इसलिए गए क्योंकि उनके पास रेल टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। यात्रा के मार्ग का पता नहीं था इसलिए रेलवे लाइन के साथ साथ चलते हुए दिल्ली पहुंचे।

कबीरपंथी मांझी - इस दौरान उन्होंने रास्ते में पड़ने वाले सभी स्टेशन मास्टरों के हस्ताक्षर भी लिए थे। संत कबीर के अनुयायी मांझी अक्सर ट्रैक्टर के खराब हो चुके टायरों का जूता पहनते थे। उनके जैकेट रिसाइकल्ड जूट बोरों से बनाए हुए होते थे। उनके गले में कबीर पंथी माला देखी जा सकती थी।

अब शानदार फिल्म -  बॉलीवुड के अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी ने दशरथ मांझी की भूमिका अपने शानदार अभिनय से जीवंत कर दिया है। निश्चय ही वे इस साल के बेस्ट एक्टर के दावेदार हैं और ये फिल्म साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए। उनकी पत्नी फगुनिया की भूमिका में पूणे कि अत्यंत सुंदर अभिनेत्री राधिका आप्टे खूब फबी हैं। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग गया के पास दशरथ मांझी के गांव में ही हुई है। कुछ दृश्य सासाराम, वाराणसी, आगरा, दिल्ली और वाई (महाराष्ट्र) में फिल्माए गए हैं। माझी- माउंटेन मैन साल 2015 की सबसे अच्छी फिल्मों में हैं। हर वर्ग के लोग जरूर देखें प्रेरणा मिलेगी।


अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है - दशरथ मांझी
वैसे तो कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। पर अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है, ये दशरथ मांझी ने कर दिखाया था।  दशरथ ने अपने गांव में पहाड़ को चीरकर उसमें रास्ता बनाने के लिए अपनी बकरी को बेचकर छेनी और हथौड़ा खरीदा और 22 साल की कड़ी मेहनत के बाद एक असंभव सा दिखने वाला कारनामा कर दिखाया। गया जिले में गेहलौर उन 2000 से ज्यादा मुसहर समुदाय के लोगों का घर है जो कभी अपनी आजीविका के लिए चूहे खाते थे। पर अब वहां का नजारा बदल चुका है। आज उनकी बदौलत गांव में स्कूल, बिजली और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आदि पहुंच चुके हैं।

पत्नी की मौत से मिली प्रेरणा
वर्ष 1960 में दशरथ मांझी की पत्नी फगुनी देवी गर्भावस्था में पशुओं के लिए पहाड़ से घास काट रही थी कि उसका पैर फिसल गया। दशरथ उसे लेकर शहर के अस्पताल गयापर दूरी के कारण वह समय पर नहीं पहुंच सकेजिससे पत्नी की मृत्यु हो गई। बात दशरथ के मन को लग गई। निश्चय किया कि जिस पहाड़ के कारण मेरी पत्नी की मृत्यु हुई हैमैं उसे काटकर रास्ता बनाऊंगाजिससे भविष्य में किसी अन्य बीमार को अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत्यु का वरण न करना पड़े।

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पहाड़ मुझे उतना ऊंचा कभी नहीं लगा जितना लोग बताते हैं। मनुष्य से ज्यादा ऊंचा कोई नहीं होता। 

हमें कभी ईश्वर के भरोसे नहीं बैठना चाहिए, क्या पता भगवान ही हमारे भरोसे बैठा हो।
-    ----- दशरथ मांझी

दशरथ मांझी - 1934 –  17 अगस्त 2007

माउंटेन कटर ने काटा पहाड़ – 

360 फीट ऊंचा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट गहरा

कितना वक्त लगा – 22 साल

1960 में काम आरंभ हुआ, 1982 में रास्ता बना डाला

2011 में बिहार सरकार ने वहां सड़क बनवा डाली।

55 किलोमीटर की दूरी घटकर हुई 15 किलोमीटर ( अतरी से वजीरगंज की)



(हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संवाददाता विजय कुमार से हुई दशरथ मांझी से बातचीत ) 

पर्वत को काटकर रास्ता बनाने का विचार कैसे आया?
मेरी पत्नी (फगुनी देवी) रोज सुबह गांवसे गहलौर पर्वत पारकर पानी लाने के लिये अमेठी जाती थी। एक दिन वह खाली हाथ उदास मन से घर लौटी। मैंने पूछा तो बताया कि पहाड़ पार करते समय पैर फिसल गया। चोट तो आई ही पानी भरा मटका भी गिर कर टूट गया। बस मैंने उसी समय गहलौर पर्वत को चीर रास्ता बनाने का संकल्प कर लिया।

पहाड़ को काटने की दृढ़ इच्छाशक्ति और ताकत कहाँ से आई?
लोगों ने मुझे सनकी करार दिया। कभी-कभी तो मुझे भी लगता कि मैं यह क्या कर रहा हूँ? क्या इतने बड़े पर्वत को काटकर रास्ता बना पाऊंगा? फिर मेरे मन में विचार आया ,यह पर्वत तो सतयुग,द्वापर और त्रेता युग में भी था।उस समय तो देवता भी यहाँ रहते थे।उन्हें भी इस रास्ते से आने-जाने में कष्ट होता होगा,लेकिन किसी ने तब ध्यान नहीं दिया। तभी तो कलयुग में मेरी पत्नी को कष्ट उठाना पड़ रहा है।मैंने सोचा, जो काम देवताओं को करना था ,क्यों न मैं ही कर दूँ। इसके बाद न जाने कहाँ से शक्ति आ गई मुझमें । न दिन कभी दिन लगा और न रात कभी रात। बस काटता चला गया पहाड़ को।

आपने इतना बडा़ काम किया पर इसका क्या लाभ मिला आपको?
मैंने तो कभी सोचा भी नहीं कि जो काम कर रहा हूं, उसके लिए समाज को मेरा सम्मान करना चाहिये। मेरे जीवन का एकमात्र मकसद है ‘आम आदमी को वे सभी सुविधायें दिलाना ,जिसका वह हकदार है।पहले की सरकार ने मुझ करजनी गांव में पांच एकड़ जमीन दी,लेकिन उस पर मुझे आज तक कब्जा नहीं मिल पाया। बस यही चाहता हूँ कि आसपास के लोगों को इलाज की बेहतर सुविधा मिल जाये। इसलिये मैंने मुख्यमंत्री से करजनी गांव की जमीन पर बड़ा अस्पताल बनवाने का अनुरोध किया है।
मुख्यमंत्री ने आपको अपनी कुर्सी पर बैठा दिया। कैसा लग रहा है? मैं तो जनता दरबार में फरियादी बन कर आया था। सरकार से कुछ मांगने ।मेरा इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा कि बिहार के मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी मुझे सौंप दी। अब आप लोग (मीडियाकर्मी) मुझसे सवाल कर रहे हैं। मेरी तस्वीर ले रहे हैं। मुझे तो बड़ा अच्छा लग रहा है।
( 2006 के जुलाई में दशरथ मांझी पटना में नीतीश कुमार के जनता दरबार में कुछ मांग लेकर पहुंचे थे।)
 शानदार,  जबरदस्तजिंदाबाद....

इस फिल्म की कहानी सुनते ही मैने फिल्म के लिए हां कर दी थी। फिल्म में बिहार के महान सपूत दशरथ मांझी का किरदार निभाकर मैं काफी गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। यह मेरे फिल्मी कैरियर का अब तक का सबसे चैलेजिंग और यादगार किरदार रहा है। फिल्म की शुटिंग के लिए गया जिले के गहलौर गांव में मैने करीब 2 महीने बिताएं और उस पहाड़ को नजदीक से देखा जिसे एक अकेले व्यक्ति ने काटकर रास्ता बना दिया था।

 - नवाजुद्दीन सिद्दकी ( अभिनेता) 

- vidyutp@gmail.com
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