Monday, August 31, 2015

जय मां कैला देवी – जहां डाकू भी आते हैं मन्नत मांगने

राजस्थान के करौली जिले में शक्ति की देवी कैला देवी का मंदिर सुंदर है। इस मंदिर के प्रति राजस्थान, मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश के लोगों में अगाध आस्था है। यहां तक की चंबल के क्षेत्र में सक्रिय डाकू भी इस मंदिर में मां की आराधना करने आया करते थे।

कैला देवी को  जादौन राजपूत लोग अपनी कुल देवी मानते हैं। कैला देवी का मंदिर ये कैला देवी गांव में कालीसिल नदी के तट पर बना है। 

त्रिकूट की मनोरम पहाड़ियों की तलहटी में स्थित इस मंदिर का निर्माण राजा भोमपाल ने 1600 ई. में करवाया था। मुख्य मन्दिर संगमरमर से बना हुआ है  मंदिर पूरब मुख का है।  कैला देवी मंदिर में चांदी की चौकी और सोने की छतरियों के नीचे दो प्रतिमाएं हैं। इनमें एक बाईं ओर उसका मुंह कुछ टेढ़ा है, वही कैला देवी हैं। मान्यतानुसार कैला देवी मां द्वापर युग में कंस की कारागार में उत्पन्न हुई कन्या है, जो राक्षसों से पीडि़त समाज की रक्षा के लिए एक तपस्वी द्वारा यहां बुलाई गई थीं।

एक कथा के अनुसार करौली के राज्य पर एक दानव बहुत अत्याचार करता था। वहां के राजा दो भाई थे। दोनों भाई दानव से परेशान थे। तो दोनों भाइयो ने मां कैला देवी की पूजा की ओर करोली में आकर दानव से मुत्ति के लिए प्रार्थना की। मां कैला देवी बाड़ी  से करोली पर आई और दानव का संहार किया। जिसका प्रमाण कलिशील नदी के किनारे मां और दानव के पैरो के चिन्ह आज भी देखे जा सकते हैं।

लंबी पदयात्रा करके लोग करते हैं दर्शन - राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिलों के लोग लंबी पदयात्रा करके कैला देवी का दर्शन करने के लिए चैत महीने में आते हैं। लोग कैला देवी से संतान, लंबी उम्र की दुआ मांगते हैं। कहते हैं मां सबकी सुनती हैं।

चैत में विशाल मेला - चैत्र और आश्विन नवरात्रि के इन दोनों अवसरों पर इस क्षेत्र से लाखों श्रद्धालु कैला देवी के करौली स्थित मंदिर के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस मौके पर विशाल मेला लगता है। मेले के समय आसपास के शहरों से कैला देवी के लिए 24 घंटे बसें चलती रहती हैं।

डकैत भी आते हैं माता का दर्शन करने - 

मां कैला देवी के इस मंदिर में डकैत वेश बदलकर आते हैं और मां कैला देवी की साधना करते हैं। लक्ष्य की साधना के लिए मां से मन्नत मांगते हैं। मजे की बात इसकी जानकारी जासूसों के माध्यम से पुलिस को मिल जाती है। पर पुलिस लाख कोशिश कर मंदिर परिसर में उन्हें पकड़ नहीं पाती।

कहां ठहरें - कैला देवी मंदिर से पहले आधा किलोमीटर लंबा बाजार है। इसमें दोनों तरफ प्रसाद की दुकानें और भोजनालय है। कैला देवी में रात्रि विश्राम के लिए अतिथि गृह और धर्मशालाएं भी मौजूद हैं। एक विशाल धर्मशाला करौली के राजघराने द्वारा निर्मित है। मंदिर परिसर में भी एक भोजनालय है जहां रियायती दरों पर भोजन और नास्ता उपलब्ध रहता है।


कैसे पहुंचे रेल मार्ग से जाने पर हिंडौन सिटी या फिर गंगापुर सिटी रेलवे स्टेशन उतर कर कैला देवी बस से जा सकते हैं। आप हिंडौन सिटी से बस से करौली पहुंचे। ( 33 किलोमीटर) करौली शहर से कैला देवी की दूरी 23 किलोमीटर है। हर आधे घंटे पर बसें और जीप मिलती हैं। सवाई माधोपुर जिले के रेलवे स्टेशन गंगापुर सिटी से भी अपने वाहन से कैला देवी पहुंच सकते हैं। गंगापुर सिटी से कैला देवी की दूरी 34 किलोमीटर है।वैसे बेहतर होगा कि आप जिला मुख्यालय करौली में रूकें और यहां से कैला देवी के दर्शन करने जाएं। करौली बस स्टैंड के पास रहने के लिए रियायती और बेहतर जगह है जगदंबा लॉज। अगर थोड़ा बेहतर और महंगी जगह में ठहरना हो तो होटल करौली अजय विकल्प हो सकता है। करौली अजय के साथ भोजनालय भी है।
-         जगदंबा लॉज, गुलाबबाग मार्ट, करौली (राज)- 322241 फोन  (07464) 220577- 07464220577

- vidyutp@gmail.com  ( KAILA DEVI, KARAULI , RAJSTHAN, DAKU  ) 

Saturday, August 29, 2015

अति सुंदर नक्काशियों वाला महल - सिटी पैलेस करौली

करौली बस स्टैंड की तरफ से पैदल चलते हुए बाजार की ओर बढ़ रहा हूं। थोडी देर में एक गेट आता है। इसका नाम है हिंडौन गेट। गेट के आसपास घना बाजार है। आसपास में पतंगों की दुकानें लगी हैं। पर पुराना गेट अभी भी अच्छी हालत में है। किसी समय में करौली शहर में ऐसे छह दरवाजे थे। इसके अलावा दुश्मन का मुकाबला करने के लिए 11 परकोटे भी थे। करौली शहर पंचना नदी के तट पर बसा है। नदी पर बने डैम से शहर को पानी मिलता है। नदी पर बना बांध मिट्टी का है।

करौली सिटी पैलेस राजस्थान के बेहतरीन ऐतिहासिक महलों में से है। पर यहां कम ही सैलानी पहुंचते हैं। इसका निर्माण 14 वीं सदी में हुआ है। ये महल अपने क्लासिक चित्रों, पत्थरों पर सुंदर नक्काशी, वास्तुकला और जाली के सुंदर काम के कारण बहुत प्रसिद्ध है। यहां के दरबार हॉल  में कई पुरानी तस्वीरें हैं जो यहां के 600 साल पहले के कला के इतिहास को दिखाती हैं। ये महल 1938 तक यहां के शाही परिवार का निवास स्थल था। पर शाही परिवार दूसरे महल भंवर विलास पैलेस  के निर्माण के बाद वहां चला गया। भंवर विलास पैलेस को भी अब हेरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। ( http://bhanwarvilaspalace.com/)

करौली के पुराने महल का निर्माण राजा अर्जुन पाल ने 1348 में करवाया था। कहा जाता है कि कभी ये नगर कल्याणपुरी के नाम से जाना जाता था। यहां यदुवंशी राजाओं का शासन रहा। वे खुद को भगवान कृष्ण का वंशज मानते हैं। पुरा करौली शहर लाल पत्थर की दीवारों से सुरक्षित किया गया था जिससे दुश्मनों के हमले से बचाव हो सके। सिटी पैलेस की छत और झरोखों से आसपास का सुंदर नजारा दिखाई देता है। भंवर विलास पैलेस में ठहरने वाले सैलानियों को सिटी पैलेस की सैर ऊंट गाड़ी से कराई जाती है।

बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी करौली किले में मध्यकालीन भारत के संग्रह को देखने आते हैं। यह किला अभी भी राजपरिवार के संरक्षण में है। सिटी पैलेस के दरबार हाल का सौंदर्य देखते ही बनता है। यहां राजस्थान की कई लड़ाइयों और उसके इतिहास से रुबरू हुआ जा सकता है। 


ब्रिटिश राज में करौली 17 तोपों की सलामी वाली राजघराना हुआ करता था। देश आजाद होने के बाद करौली राजघराने से जुड़े कुंअर ब्रिजेंद्र पाल लगातार पांच बार करौली से विधायक चुने जाते रहे। 2008 में एक बार फिर राजघराने के महाराजा कृष्ण चंद्र पाल देव बहादुर की पत्नी रोहिणी कुमारी भाजपा से विधायक चुनी गईं। पर 2013 में रोहिणी कुमारी को जनता ने वसुंधरा की लहर में भी नकार दिया।


प्रवेश टिकट महंगा -  करौली के किले को देखने का प्रवेश टिकट 110 रुपये का है। अगर आप अपने कैमरे से फोटोग्राफी करना चाहते हैं तो उसके लिए 225 रुपये अलग से चुकाने होंगे। हालांकि किले के बाहरी दीवारों का नजारा आप बिना किसी शुल्क के कर सकते हैं। 
- vidyutp@gmail.com

(CITY PALACE, KARAULI, RAJSTHAN, FORT ) 

Thursday, August 27, 2015

करौली का अदभुत मदन मोहन मंदिर

कान्हा जी यानी मदन मोहनजी का मंदिर करौली किले में मुख्य शहर में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा गोपाल सिंह ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान कृष्ण और देवी राधा की प्रतिमाएं हैं। करौली के निवासियों में मदन मोहन के प्रति अपार श्रद्धा और आस्था है। श्रीकृष्ण  भगवान के अनेक नामों में से एक प्रिय नाम मदन मोहन भी है।

करौली के राजा गोपाल सिंह ने 1725 ये मंदिर बनवाया गया। कहा जाता है कि दौलताबाद पर विजय के बाद महाराजा गोपाल सिंह जी को सपना आया जिसमें उन्हें मदनमोहन जी ने कहा कि मुझे करौली ले चलो। तब मदनमोहन की प्रतिमा को जयपुर के आमेर से करौली ले जाकर स्थापित किया गया। इस मंदिर के निर्माण मे दो से तीन साल का समय लगा था।


मदन मोहन मंदिर में स्थापित कृष्ण जी की ऊंचाई तीन फीट है जबकि राधा जी दो फीट की हैं। दोनों मूर्तियां अष्टधातु की बनी हैं। दोंनो मूर्तियों की सुंदरता अदभुत है।
मंदिर मध्यकालीन वास्तुकला का सुंदर नमूना है। मंदिर के प्रवेश द्वार से गर्भ गृह के बीच लंबा चौबारा है। गर्भ गृह में सुंदर नक्कासियां भी हैं। मंदिर के निर्माण में करौली के पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। मुख्य मंदिर के अलावा मंदिर परिसर में कई और मूर्तियां स्थापित की गई हैं। चांदनी रात में मंदिर का सौंदर्य और बढ़ जाता है।

महाराजा गोपाल सिंह ने जिस गुसाईं को सबसे पहले मंदिर का प्रभार सौंपा था, वह मुर्शिदाबाद के रामकिशोर थे। इसके बाद मदनकिशोर यहां गुसाईं रहे। करौली के मंदिर को राजघराने की ओर से अचल संपत्ति प्रदान की गई थी जिससे  18वीं सदी में 27 हजार  रुपये की सालाना आय होती थी।

दिन में सात बार भोग - भगवान मदन मोहन को दिन में सात बार भोग लगाया जाता है। उन्हें मिष्टान्न काफी प्रिय है। उनके भोग में मुख्य है दोपहर को राजभोग और रात को शयनभोग। शेष पांच भोगों में से मिष्ठान आदि रहता है। इसमें मालपुआ, रसगुल्ले जैसी मिठाइयां होती हैं। खास मौकों पर मदन मोहन जी को 56 भोग लगाया जाता है। इसमे नाना प्रकार के पकवान होते हैं। इसके लिए बड़ी तैयारी की जाती है।

मदनमोहन जी के सेवाकाल में सुबह पांच बजे मंगल आरती  होती है। इसके बाद सुबह नौ  बजे धूप, 11 बजे शृंगार, तीन बजे दुबारा धूप और शाम को सात बजे सांध्य आरती होती है। मंदिर सुबह 5 बजे खुलता है और रात्रि 10 बजे बंद हो जाता है। दोपहर में भी दो घंटे के लिए भी मंदिर बंद होता है। गोपाष्टमी , श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और राधाअष्टमी मंदिर के प्रमुख त्योहार हैं। मंदिर के पूजा में समय के अनुशासन का पूरा पालन होता है। 

ताज खां की भक्ति - कहा जाता है कि ताज खां नाम का एक मुसलमान मदन मोहन मंदिर के कृष्ण की प्रतिमा की एक झलक पाते ही उनका अनन्य भक्त बन बैठा। ताज खां यहां की कचहरी में एक चपरासी था। भक्त ताज खां को आज भी करौली के मदनमोहन मंदिर में संध्या आरती के समय 'ताज भक्त मुसलिम पै प्रभु तुम दया करी। भोजन लै घर पहुंचे दीनदयाल हरी।।' इस दोहे के साथ याद किया जाता है।

कैसे पहुंचे – करौली बस स्टैंड से मंदिर की दूरी दो किलोमीटर है। करौली के मुख्य बस स्टैंड से रिक्शा या आटो से या फिर पैदल चलते हुए भी मंदिर तक जा सकते हैं। मंदिर करौली किले के पीछे चौधरीपाडा में स्थित है। मंदिर के साथ श्रद्धालुओं के लिए एक धर्मशाला भी है।
- vidyutp@gmail.com

(MADAN MOHAN MANDIR, KARAULI, RAJSTHAN ) 

Tuesday, August 25, 2015

24वें तीर्थंकर का अनूठा मंदिर- दिगंबर जैन मंदिर श्री महावीर जी

 सुबह सुबह दिल्ली से कोटा जाने वाली ट्रेन से चलकर श्री महाबीर जी रेलवे स्टेशन उतर गया। प्रसिद्ध जैन मंदिर के नाम पर रेलवे स्टेशन का नाम रखा गया है श्री महाबीर जी। 

 जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर श्री महावीर का अदभुत मंदिर राजस्थान के करौली जिले में स्थित है। इस मंदिर के नाम पर ही मथुरा सवाई माधोपुर के मध्य श्री महावीर जी नामक रेलवे स्टेशन है। यह मंदिर दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है। देश भर के दिगंबर जैन मतावलंबियों की इस मंदिर में अगाध श्रद्धा है।

इस मंदिर के बारे एक कथा प्रचलित है। गांव चंदनपुर में मंदिर में स्थापित भगवान महावीर की मूर्ति 16वीं या 17वीं शताब्दी में मिली थीं। यह मूर्ति खुदाई के दौरान मिली थी। कहा जाता है कि एक गाय अपने घर से प्रतिदिन सुबह घास चरने के लिए निकलती थी और शाम को घर लौट आती थी। कुछ दिन बाद जब गाय घर लौटती थी तो उसके थन में दूध नहीं होता था। एक दिन उसके मालिक चर्मकार ने सुबह गाय का पीछा किया और पाया कि एक विशेष स्थान पर वह गाय अपना दूध गिरा देती थी। यह चमत्कार देखने के बाद चर्मकार ने इस टीले की खुदाई की। खुदाई में भगवान महावीर  की पाषाण प्रतिमा मिली। हालांकि ये मूर्ति गुप्तकालीन प्रतीत होती है। पर यह किसी टीले में मिट्टी के अंदर दब गई थी। इस मूर्ति का निर्माण बलुआ पत्थर से हुआ है। 


बाद में इसी स्थल पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर के गर्भ गृह में स्थित भगवान महावीर की मूर्ति पद्मासन में है। ये मंदिर गंभीर नदी के किनारे स्थित है। हालांकि नदी आजकल ज्यादातर सूखी रहती है। नदी तट पर भव्य मंदिर का निर्माण अमर चंद बिलाला (बासवा, जयपुर) की ओर से कराया गया। मंदिर के गर्भ गृह में अति सुंदर नक्काशी की गई है। अब इस मंदिर की व्यवस्था प्रबंधन समिति देखती है।

मंदिर परिस में संदेश लिखा है। इस परिसर में आने के बाद रात में भोजन न करने और पानी को छान कर पीने का संकल्प लेकर जाएं। मंदिर परिसर में जैन धर्म का प्रसिद्ध जीओ और जीने दो संदेश लिखा गया है। मंदिर परिसर में आर्युवेदिक दवाओं का स्टाल भी है।
दिगंबर जैन महावीर मंदिर अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी। 
चैत में मेला – चैत्र शुक्ल एकादशी पर तीर्थंकर महावीर के जन्मदिन के समय यहां विशाल मेला लगता है। ये मेला पांच दिनों तक चलता है। इस मौके पर विशाल रथयात्रा का आयोजन होता है। इस मेले में राजस्थान के गुर्जर और मीणा समुदाय के लोग भी हिस्सा लेते हैं।

कैसे पहुंचे – श्री महावीर जी रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 7 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से हर ट्रेन के आने के बाद टाटा मैजिक जैसे वाहन मंदिर के लिए जाते रहते हैं। मंदिर के पास राजस्थान रोडवेज का बस स्टैंड भी है। पर यहां के लिए बसें बहुत कम ही हैं। आपको लंबी दूरी की बसें खेड़ा से और ट्रेन श्री महावीर जी रेलवे स्टेशन से मिल सकेगी।

कहां ठहरें - मंदिर प्रबंधन की ओर से भोजनालय और आवासीय सुविधा उपलब्ध है। पर इसके लिए शुल्क देना पड़ता है। यहां 750 रुपये में वातानुकूलित कमरे उपलब्ध हैं। आप आवास की बुकिंग आनलाइन भी करा सकते हैं। मंदिर के भोजनालय में बिना लहसुन प्याज का जैन भोजन मिलता है। मंदिर के आसपास कुछ दुकाने हैं जहां भोजन नास्ता आदि उपलब्ध होता है।  ( http://www.mahaveerji.org/index.php )
 विद्युत प्रकाश मौर्य 


Sunday, August 23, 2015

दशरथ मांझी ने की थी गया से दिल्ली तक 1400 किलोमीटर की पदयात्रा

पहाड़ का सीना चीर कर सड़क बनाने वाले दशरथ मांझी के जीवन पर अत्यंत खूबसूरत फिल्म बनी है मांझी द माउंटेन मैन। मांझी ऩे अपने जीवन काल में एक बार रेलवे ट्रैक से होते हुए पैदल ही गेहलौर से दिल्ली की 1400 किलोमीटर की दूरी तय की थी। उनकी दिल्ली तक की यात्रा का उद्देश्य था वजीरगंज से अपने गांव तक सड़क का निर्माण करवाना। फिल्म में उनकी इस यात्रा को दिखाया गया है। वे सासाराम जंक्शन पर और सासाराम के प्रसिद्ध शेरशाह के मकबरे के बैकड्राप में यात्रा करते हुए दिखाई देते हैं। इस तरह केतन मेहता की इस फिल्म में सासाराम का ऐतिहासिक शेरशाह का मकबरा दिखाई देता है। दशरथ मांझी को अपनी दिल्ली तक की इस पैदल यात्रा में दो महीने का समय लगा। तकरीबन 60 दिन में 1400 किलोमीटर यात्रा यानी एक दिन में औसतन 25 किलोमीटर की यात्रा। कहा जाता है कि माझी गया से दिल्ली पैदल इसलिए गए क्योंकि उनके पास रेल टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। यात्रा के मार्ग का पता नहीं था इसलिए रेलवे लाइन के साथ साथ चलते हुए दिल्ली पहुंचे।

कबीरपंथी मांझी - इस दौरान उन्होंने रास्ते में पड़ने वाले सभी स्टेशन मास्टरों के हस्ताक्षर भी लिए थे। संत कबीर के अनुयायी मांझी अक्सर ट्रैक्टर के खराब हो चुके टायरों का जूता पहनते थे। उनके जैकेट रिसाइकल्ड जूट बोरों से बनाए हुए होते थे। उनके गले में कबीर पंथी माला देखी जा सकती थी।

अब शानदार फिल्म -  बॉलीवुड के अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी ने दशरथ मांझी की भूमिका अपने शानदार अभिनय से जीवंत कर दिया है। निश्चय ही वे इस साल के बेस्ट एक्टर के दावेदार हैं और ये फिल्म साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए। उनकी पत्नी फगुनिया की भूमिका में पूणे कि अत्यंत सुंदर अभिनेत्री राधिका आप्टे खूब फबी हैं। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग गया के पास दशरथ मांझी के गांव में ही हुई है। कुछ दृश्य सासाराम, वाराणसी, आगरा, दिल्ली और वाई (महाराष्ट्र) में फिल्माए गए हैं। माझी- माउंटेन मैन साल 2015 की सबसे अच्छी फिल्मों में हैं। हर वर्ग के लोग जरूर देखें प्रेरणा मिलेगी।


अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है - दशरथ मांझी
वैसे तो कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। पर अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है, ये दशरथ मांझी ने कर दिखाया था।  दशरथ ने अपने गांव में पहाड़ को चीरकर उसमें रास्ता बनाने के लिए अपनी बकरी को बेचकर छेनी और हथौड़ा खरीदा और 22 साल की कड़ी मेहनत के बाद एक असंभव सा दिखने वाला कारनामा कर दिखाया। गया जिले में गेहलौर उन 2000 से ज्यादा मुसहर समुदाय के लोगों का घर है जो कभी अपनी आजीविका के लिए चूहे खाते थे। पर अब वहां का नजारा बदल चुका है। आज उनकी बदौलत गांव में स्कूल, बिजली और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आदि पहुंच चुके हैं।

पत्नी की मौत से मिली प्रेरणा
वर्ष 1960 में दशरथ मांझी की पत्नी फगुनी देवी गर्भावस्था में पशुओं के लिए पहाड़ से घास काट रही थी कि उसका पैर फिसल गया। दशरथ उसे लेकर शहर के अस्पताल गयापर दूरी के कारण वह समय पर नहीं पहुंच सकेजिससे पत्नी की मृत्यु हो गई। बात दशरथ के मन को लग गई। निश्चय किया कि जिस पहाड़ के कारण मेरी पत्नी की मृत्यु हुई हैमैं उसे काटकर रास्ता बनाऊंगाजिससे भविष्य में किसी अन्य बीमार को अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत्यु का वरण न करना पड़े।

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पहाड़ मुझे उतना ऊंचा कभी नहीं लगा जितना लोग बताते हैं। मनुष्य से ज्यादा ऊंचा कोई नहीं होता। 

हमें कभी ईश्वर के भरोसे नहीं बैठना चाहिए, क्या पता भगवान ही हमारे भरोसे बैठा हो।
-    ----- दशरथ मांझी

दशरथ मांझी - 1934 –  17 अगस्त 2007

माउंटेन कटर ने काटा पहाड़ – 

360 फीट ऊंचा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट गहरा

कितना वक्त लगा – 22 साल

1960 में काम आरंभ हुआ, 1982 में रास्ता बना डाला

2011 में बिहार सरकार ने वहां सड़क बनवा डाली।

55 किलोमीटर की दूरी घटकर हुई 15 किलोमीटर ( अतरी से वजीरगंज की)



(हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संवाददाता विजय कुमार से हुई दशरथ मांझी से बातचीत ) 

पर्वत को काटकर रास्ता बनाने का विचार कैसे आया?
मेरी पत्नी (फगुनी देवी) रोज सुबह गांवसे गहलौर पर्वत पारकर पानी लाने के लिये अमेठी जाती थी। एक दिन वह खाली हाथ उदास मन से घर लौटी। मैंने पूछा तो बताया कि पहाड़ पार करते समय पैर फिसल गया। चोट तो आई ही पानी भरा मटका भी गिर कर टूट गया। बस मैंने उसी समय गहलौर पर्वत को चीर रास्ता बनाने का संकल्प कर लिया।

पहाड़ को काटने की दृढ़ इच्छाशक्ति और ताकत कहाँ से आई?
लोगों ने मुझे सनकी करार दिया। कभी-कभी तो मुझे भी लगता कि मैं यह क्या कर रहा हूँ? क्या इतने बड़े पर्वत को काटकर रास्ता बना पाऊंगा? फिर मेरे मन में विचार आया ,यह पर्वत तो सतयुग,द्वापर और त्रेता युग में भी था।उस समय तो देवता भी यहाँ रहते थे।उन्हें भी इस रास्ते से आने-जाने में कष्ट होता होगा,लेकिन किसी ने तब ध्यान नहीं दिया। तभी तो कलयुग में मेरी पत्नी को कष्ट उठाना पड़ रहा है।मैंने सोचा, जो काम देवताओं को करना था ,क्यों न मैं ही कर दूँ। इसके बाद न जाने कहाँ से शक्ति आ गई मुझमें । न दिन कभी दिन लगा और न रात कभी रात। बस काटता चला गया पहाड़ को।

आपने इतना बडा़ काम किया पर इसका क्या लाभ मिला आपको?
मैंने तो कभी सोचा भी नहीं कि जो काम कर रहा हूं, उसके लिए समाज को मेरा सम्मान करना चाहिये। मेरे जीवन का एकमात्र मकसद है ‘आम आदमी को वे सभी सुविधायें दिलाना ,जिसका वह हकदार है।पहले की सरकार ने मुझ करजनी गांव में पांच एकड़ जमीन दी,लेकिन उस पर मुझे आज तक कब्जा नहीं मिल पाया। बस यही चाहता हूँ कि आसपास के लोगों को इलाज की बेहतर सुविधा मिल जाये। इसलिये मैंने मुख्यमंत्री से करजनी गांव की जमीन पर बड़ा अस्पताल बनवाने का अनुरोध किया है।
मुख्यमंत्री ने आपको अपनी कुर्सी पर बैठा दिया। कैसा लग रहा है? मैं तो जनता दरबार में फरियादी बन कर आया था। सरकार से कुछ मांगने ।मेरा इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा कि बिहार के मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी मुझे सौंप दी। अब आप लोग (मीडियाकर्मी) मुझसे सवाल कर रहे हैं। मेरी तस्वीर ले रहे हैं। मुझे तो बड़ा अच्छा लग रहा है।
( 2006 के जुलाई में दशरथ मांझी पटना में नीतीश कुमार के जनता दरबार में कुछ मांग लेकर पहुंचे थे।)
 शानदार,  जबरदस्तजिंदाबाद....

इस फिल्म की कहानी सुनते ही मैने फिल्म के लिए हां कर दी थी। फिल्म में बिहार के महान सपूत दशरथ मांझी का किरदार निभाकर मैं काफी गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। यह मेरे फिल्मी कैरियर का अब तक का सबसे चैलेजिंग और यादगार किरदार रहा है। फिल्म की शुटिंग के लिए गया जिले के गहलौर गांव में मैने करीब 2 महीने बिताएं और उस पहाड़ को नजदीक से देखा जिसे एक अकेले व्यक्ति ने काटकर रास्ता बना दिया था।

 - नवाजुद्दीन सिद्दकी ( अभिनेता) 

- vidyutp@gmail.com
( DASHRATH MANJHI, MOUNTAIN MAN, MOVIE, STONE CUTTER, GAYA, SASARAM, RAIL, TRAVEL, DELHI)

Friday, August 21, 2015

चले जाना साइकिल मैन ऑफ इंडिया का...

ओम प्रकाश मुंजाल ( 1928 -2015)
( 26 .08.1928--- 13 .08.2015 ) 
साल 2000 की कोई तारीख थी। मैं अमर उजाला जालंधर में शिक्षा बीट पर संवाददाता हुआ करता था। जालंधर नकोदर रोड पर एक रिजार्ट में रविवार की सुनहरी दोपहर में कई स्कूलों का एक संयुक्त आयोजन था जिसका स्पांसर कंपनी हीरो साइकिल थी। सैकड़ों बच्चे हीरो की नई नई साइकिलों पर रिजार्ट के अंदर फुदक रहे थे। अंतर विद्यालीय प्रतियोगिता के लिए मंच तैयार हो रहा था। 

मैं पत्रकार होने के नाते सबसे अगली पंक्ति में जाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद एक बुजुर्ग सज्जन मेरे पास आए। अपने दो तीन मेहमानो को बिठाने के लिए उन्होंने मुझे उठकर पीछे वाली सीट पर जाने को कहा। मैं पत्रकार होने की ठसक में था। मैंने कहा, मैं क्यों ये सीट छोड़ूं। आपकी तारीफ...उन्होंने कहा, मैं एक जेंटिलमैन हूं। मैने जवाब दिया- तो मैं भी जेंटिलमैन हूं। उसके बाद वे मुझसे आगे उलझे बिना चले गए। बाद में मंच पर जब सभी आयोजक और मुख्य अतिथि अवतरित हुए तो मुझे पता चला कि जिन सज्जन से मैं उलझा था वे हीरो साइकिल्स के चेयरमैन ओम प्रकाश मुंजाल ( OM PRAKASH MUNJAL) थे। आज साइकिलमैन  ओपी मुंजाल इस दुनिया से जा चुके हैं तो मुझे जालंधर की वो घटना बार बार याद आती है।

आम आदमी की सवारी - साइकिल
रोजाना 19 हजार साइकिलें बनाने वाली कंपनी हीरो साइकिल्स के संस्थापक अध्यक्ष ओम प्रकाश मुंजाल का 13 अगस्त 2015 को लुधियाना में निधन हो गया। 86 साल के मुंजाल को लुधियाना के दयानंद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल के हीरो हर्ट इंस्टीट्यूट में अंतिम सांस ली। सात भाई बहनों के परिवार में ओम प्रकाश मुंजाल सबसे छोटे थे। इसी साल 22 फरवरी को उनकी पत्नी सुदर्शन मुंजाल का निधन हो गया था। सुदर्शन उनकी पत्नी के साथ ही उनकी कविताओं की प्रेरणा थीं। सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे ओपी मुंजाल। खत्री परिवार से आने वाले मुंजाल सक्रिय आर्य समाजी थे।
आम आदमी की सवारी क्या है। साइकिल। देश में साइकिल को जन जन में लोकप्रिय किसने बनाया। हीरो साइकिल ने। हीरो से पहले देश में हरक्यूलिस, रेले और फिलिप्स जैसी कंपनियों की साइकिलें विदेश से आती थीं, जो काफी महंगी होती थीं। पर हीरो एक सस्ती और स्वदेश विकल्प बनकर लोगों के बीच आई। ओपी मुंजाल को देश में साइकिल उद्योग का जनक के रूप में जाना जाता है।

अमृतसर में कारोबार की शुरुआत
1944 में ओपी मुंजाल ने अमृतसर में अपने अपने तीन भाइयों-बृजमोहन लाल मुंजाल, दयानंद मुंजाल और सत्यानंद मुंजाल के साथ एक साइकिल स्पेयर पार्ट्स का कारोबार शुरू किया। तब ओम प्रकाश 16 साल के थे। हालांकि, भारत का बंटवारा हुआ, जिसका बुरा असर अमृतसर में कारोबार पर पड़ा। इस कुछ सालों बाद ओपी मुंजाल भाइयों को लेकर लुधियाना आ गए। लुधियाना का प्रसिद्ध डीएमसी हास्पीटल उनके भाई दयानंद मुंजाल के नाम पर बना है जो काफी पहले ही स्वर्ग सिधार गए थे।

हीरो का सफर
1956 में हीरो साइकिल्स का कारखाना स्थापित हुआ था। इसके लिए बैंक से 50 हजार रुपये का कर्ज लिया गया था। तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो ने मुंजाल परिवार को कारोबार बढ़ाने के लिए प्ररेरणा दी थी। तब उसकी उत्पादन क्षमता रोजाना 25 साइकिलों की थी। अब इसमें रोज करीब 19 हजार साइकिलें बनती हैं।ओम प्रकाश व्यापार में धुन के इतने पक्के थे कि एक बार उनकी हीरो साइकिल फैक्ट्री में हड़ताल हो गई तो  वे खुद फैक्ट्री में नई साइकिलों पर पेंट करने के काम में लग गए। एक बार ट्रक आपरेटरों ने हड़ताल कर दी तो साइकिलों को बस में बुक करके भिजवाने लगे।

गिनिज बुक में नाम- दुनिया की नंबर वन कंपनी 
हीरो साइकिल को 1980 में दुनिया की सबसे अधिक साइकिल बनाने वाली कंपनी के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल किया गया था। देश के साइकिल बाजार में हीरो कंपनी की करीब 48 फीसदी हिस्सेदारी है। ओपी मुंजाल के परिवार में एक बेटा पंकज मुंजाल और चार बेटियां हैं। बंटवारे से पहले कमालिया (अब पाकिस्तान में) में ओपी मुंजाल का जन्म हुआ था। 

2010 में हीरो परिवार में बंटवारा
देश में बड़ी बिजनेस फैमिली में बंटवारा सही तरीके से हो जाए, ऐसा होता नहीं है। लेकिन हीरो ग्रुप ने 2010 में ये कर दिखाया। बीस से ज्यादा कंपनियां चलानेवाले मुंजाल भाइयों ने बिजनेस को चार हिस्सों में बांट लिया और कोई हंगामा नहीं हुआ।  बंटवारे में सबसे बड़े भाई बृजमोहन लाल मुंजाल और उनके बेटों - पवन , सुनील और स्वर्गीय रमनकांत मुंजाल के परिवार के हिस्से में फ्लैगशिप कंपनी हीरो होंडा आई । साथ में हीरो कॉरपोरेट सर्विसेज, हीरो। टीईएस, हीरो माइंडमाइन और ईजीबिल पर भी उनका कंट्रोल में रहा। बीएम मुंजाल के भाई ओपी मुंजाल के हिस्से आई बिजनेस को मजबूत बुनियाद देनेवाली हीरो साइकिल। साथ में हीरो मोटर्स। स्व. दयानंद मुंजाल के बेटों को हीरो एक्सपोर्ट्स और सनबीम कंपनियां मिलीं। सत्यानंद मुंजाल को मुंजाल ऑटो, मुंजाल शोवा और मैजेस्टिक ऑटो मिली ।
- vidyutp@gmail.com 

REFRENCE -
BOOK - ‘The Inspiring Journey of a Hero’ by Priya Kumar (Penguin 2014)

( OM PRAKASH MUNJAL, HERO, CYCLE, LUDHIYANA, AMRITSAR, JALANDHAR, AMAR UJALA)


Wednesday, August 19, 2015

मुरादें पूरी करती हैं मां विंध्यवासिनी

शक्ति की देवी मां विंध्यवासिनी का मंदिर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के विंध्याचल में स्थित है। यह स्थान मुगलसराय से इलाहाबाद रेल मार्ग पर पड़ता है। इसे जागृत शक्ति पीठ माना जाता है। यह देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। आद्य शक्ति भगवती विंध्यवासिनी का विंध्य पर्वत माला में हमेशा से निवास स्थान रहा है।

महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युद्धिष्ठिर ने मां विंध्यवासिनी की स्तुति की है। उन्होंने कहा है कि पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचल पर्वत पर आप सदैव विद्यमान रहती हैं। पद्म पुराण में देवी को मां विंध्यवासिनी कहा गया है। सृष्टि से आरंभ से ही मां विंध्यवासिनी की पूजा का आख्यान मिलता है। कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान राम भी सीता के साथ विंध्याचल आए थे। मार्केंडेय पुराण के दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में भी मां विंध्यवासिनी की कथा आती है। उन्होंने शुंभ और निशुंभ नामक दैत्यों का नाश किया।


हमेशा से ही विंध्य क्षेत्र में घने जंगल थे इसलिए देवी का नाम वन दुर्गा भी पड़ गया। वन को अरण्य भी कहा जाता है। इसलिए ज्येष्ठ मास के शुक्ल  पक्ष की षष्ठी तिथि को मां की विशेष पूजा की जाती है। इसे अरण्य षष्ठी भी कहा जाता है।
मां का मंदिर गंगा की जल धारा और विंध्य पर्वत श्रंखलाओं के बीच स्थित है। परिसर में बड़ा ही मनोरम वातावरण बन पड़ता है। कई भक्त मां गंगा के जल में स्नान के बाद विंध्यवासिनी के दर्शन करते हैं। मां विंध्यवासिनी के दरबार में लोग मन्नते मांगने दूर दूर से आते हैं। यहां लालू प्रसाद यादव , अमिताभ बच्चन जैसी हस्तियां हाजिरी लगाने पहुंच चुकी हैं।
नवरात्र के समय मां के दर्शन का विशेष प्रावधान है। इसलिए दोनों नवरात्र के नौ दिनों में मां विंध्यवासिनी के मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। नवरात्र के दिनों में मां के श्रंगार के लिए मंदिर के कपाट चार दिन बंद किए जाते हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में ज्योतिष और तांत्रिक तंत्र-मंत्र की साधना के लिए भी इन दिनों मां विंध्यवासिनी देवी के मंदिर के आसपास डेरा डालते हैं।  यहां अष्टमी के दिन दक्षिण मार्गी और वाममार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा लगता है।

पताका दर्शन - कहा जाता है कि नवरात्र में मां मंदिर छोड़कर आसमान मेंजाकर पताका में वास करती हैं। इसलिए इन दिनो श्रद्धालु पताका के दर्शन करके भी धन्य हो जाते हैं। मां मंदिर सुबह 4 बजे से रात्रि 12बजे तक खुला रहता है। रात्रि दर्शन में मां का सुंदर श्रंगार देखने को मिलता है।
काली खोह – विंध्याचल में थोड़े दायरे में तीन देवियों के मंदिर हैं। विंध्यवासिनी देवी के मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर काली खोह गुफा में महाकाली और अष्टभुजा पहाड़ी पर मां अष्टभुजा देवी का मंदिर है। कालीखोह गुफा में जाने का रास्ता अत्यंत संकरा है।

कैसे पहुंचे - विंध्याचल शहर गंगा तट पर स्थित है। यहां विंध्याचल नाम से रेलवे स्टेशन भी है , जहां कुछ रेलगिड़यों का ठहराव है। आप वाराणसी या इलाहाबाद से चलने वाली नियमित बस सेवाओं से भी विंध्याचल पहुंच सकते हैं। वाराणसी से विंध्याचल की दूरी सड़क मार्ग से 65 किलोमीटर है। मिर्जापुर से विंध्याचल की दूरी तकरीबन 8 किलोमीटर है जबकि इलाहाबाद से विंध्याचल की दूरी 82 किलोमीटर है। आप मिर्जापुर में रुककर मां के दर्शन करने जा सकते हैं।


Monday, August 17, 2015

अभय मुद्रा में 80 फीट के गौतम बुद्ध

साल 2011 में सारनाथ में एक और आकर्षण जुड़ गया है वह है विशाल बुद्ध प्रतिमा। वाराणसी के पास स्थित दर्शनीय स्थल सारनाथ में वैसे तो सैलानियों कई आकर्षण है। सारनाथ के इतिहास में अब एक नया अध्याय जुड गया है। 

अब जब आप सारनाथ जाएंगे तो वहां भगवान बुद्ध की चलायमान अभय मुद्रा में बनी देश की सबसे ऊंची लगभग 80 फीट प्रतिमा देखने को मिलेगी। हालांकि सारनाथ में पहले से ही बुद्ध की प्रतिमा है लेकिन बुद्ध की चलायमान प्रतिमा अनूठी है।

 ये प्रतिमा सारनाथ संग्रहालय के पास ही थाई बौद्ध विहार में स्थापित की गई है। इसके निर्माण में कुल 14 साल का वक्त लगा है। प्रतिमा के निर्माण का कार्य 1997 में आरंभ हुआ था। हालांकि इसके निर्माण की योजना 1970 में ही बनी थी। 

इस प्रतिमा का निर्माण भारत और थाईलैंड के सहयोग से हुआ है। ये प्रतिमा थाई बौद्ध विहार के ढाई एकड़ के परिसर में स्थित है। इसके निर्माण में 2 करोड़ की राशि खर्च हुई है। इसके निर्माण में कई बौद्ध संस्थाओं ने दान दिया है। प्रतिमा के आसपास खूबसूरत पार्क है। इसे वाराणसी के पास चुनार से लाए गए पत्थरों से बनाया गया है। इसमें कुल 815 पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इस प्रतिमा का अनावरण 16 मार्च 2011 को किया गया।


हैदराबाद के हुसैनसागर झील में भी गौतम बुद्ध की ग्रेनाइट से बनी प्रतिमा लगी है लेकिन ये प्रतिमा 60 फीट के आसपास की है। लेकिन सारनाथ में लगी गौतम बुद्ध की प्रतिमा 80 फीट की होने के कारण देश में सबसे ऊंची मानी जा रही है। बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ ही वह जगह जहां गौतम बुद्ध ने अपना पहला संदेश उन पांच शिष्यों को दिया था जो कभी गौतम बुद्ध का साथ छोड़कर चले गए थे। इस घटना को धर्म चक्र परिवर्तन की संज्ञा दी गई थी। गौतम बुद्ध के जीवन में और बौद्ध धर्म के इतिहास में सारनाथ का खास महत्व है।

कैसे पहुंचे-  वाराणसी जंक्शन से छह किलोमीटर दूर सारनाथ पहुंचना आसान है। यहां पर धमेक स्तूप, चौखंडी स्तूप, मूलगंध कुटी मंदिर, संग्रहालय, सारनाथ के खंडहर, सुरंग, चिड़ियाघर जैसी कई चीजें देखने लायक पहले से ही हैं। अब सारनाथ में बौद्ध प्रतिमा बड़ा आकर्षण बन गई है। 

इसलिए जब आप अगली बार वाराणसी जाएं तो सारनाथ में गौतम बुद्ध की प्रतिमा के दर्शन करना न भूलें।हां सारनाथ को घूमने का सबसे बेहतर तरीका है कि ज्यादा से ज्यादा पैदल चलें।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( BUDDHA, SARNATH, VARANASI,  BANARAS, UTTRAR PRADESH))


Saturday, August 15, 2015

सारनाथ – आइए यहां इतिहास से संवाद करें

सारनाथ - मूलगंध कुटी।
वाराणसी घूमने गए हों तो सारनाथ न जाएं ये कैसे हो सकता है। सारनाथ भारत के ऐतिहासिक विरासत का जीता जागता उदाहरण है। भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था। बौद्ध धर्म के इतिहास में इस घटना को धर्म चक्र प्रवर्तन ( Turning of the Wheel) का नाम दिया जाता है।तथागत के जन्म, ज्ञान प्राप्ति के बाद उनके जीवन से जुड़ा यह तीसरा महत्वपूर्ण स्थल है। इसलिए दुनिया भर से बौद्ध श्रद्धालु सालों भर सारनाथ पहुंचते हैं। यहां पर बर्मा, थाइलैंड समेत कई देशों के बौद्ध मंदिर हैं।

सारनाथ को जैन धर्म एवं हिन्दू धर्म में भी महत्व है। जैन ग्रंथों में इसे सिंहपुर कहा गया है और माना जाता है कि जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ का जन्म यहां से थोड़ी दूर पर हुआ था। यहां पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर भी है जहां सावन में मेला लगता है।

ऋषिपतन था पुराना नाम - कहा जाता है कि सारनाथ का प्राचीन नाम ऋषिपतन (इसिपतन या मृगदाव) (हिरनों का जंगल) था।  मुहम्मद गजनवी ने 1017 में आक्रमण कर सारनाथ के पूजा स्थलों आक्रमण कर नष्ट कर दिया था। सन 1905 में पुरातत्व विभाग ने यहां खुदाई करवाई। आप सारनाथ में धमेक स्तूप के पास खुदाई के अवशेष और सुरंगें देख सकते हैं। सारनाथ में खुदाई से मिली कई सामग्री कलकाता के इंडियन म्युजिम में देखी जा सकती हैं।  गुप्तकाल में सारनाथ कला का बड़ा केंद्र था। खुदाई के दौरान ही यहां अशोक स्तंभ और कई शिलालेख मिले।

सारनाथ का धमेक स्तूप। 
मूलगंध कुटी मंदिर  – सारनाथ का मूलगंध कुटी गौतम बुद्ध से जुड़ा हुआ प्रमुख  मंदिर है। सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसका वर्णन 200 फीट ऊंचे मूलगंध कुटी विहार के नाम से किया है। इस मंदिर पर बने हुए नक्काशीदार गोले और छोटे-छोटे स्तंभों से लगता है कि इसका निर्माण गुप्तकाल में हुआ होगा। मंदिर के बदल में गौतम बुद्ध के अपने पांच शिष्यों को दीक्षा देते हुए मूर्तियां बनाई गई हैं।

धमेक स्तूप –  यह सारनाथ का प्रमुख स्तूप है। इसे धर्माराजिका स्तूप भी कहते हैं। इसका निर्माण अशोक ने करवाया था। दुर्भाग्यवश 1794 में जगत सिंह के आदमियों ने काशी का प्रसिद्ध मुहल्ला जगतगंज बनाने के लिए इसकी ईंटों को खोद डाला था। खुदाई के समय 8.23 मीटर की गहराई पर एक संगरमरमर की मंजूषा में कुछ हड्डियां एवं स्वर्ण पात्र, मोती के दाने एवं रत्न मिले थे, जिसे तब लोगों ने गंगा में बहा दिया। धमेक स्तूप के आसपास खुदाई के अवशेष देखे जा सकते हैं। 

चौखंडी स्तूप – वाराणसी से सारनाथ जाते समय चौखंडी स्तूप नजर आता है। चौखंडी स्तूप सारनाथ का अवशिष्ट स्मारक है। इस स्थान पर गौतम बुद्ध की अपने पांच शिष्यों से मुलाकात हुई थी। बुद्ध ने उन्हें अपना पहला उपदेश दिया था। बुद्ध ने उन्हें चार आर्य सत्य बताए थे। उस दिन गुरु पूर्णिमा का दिन था। बुद्ध 234 ईस्वी पूर्व में सारनाथ आए थे। इसकी याद में इस स्तूप का निर्माण हुआ। इस स्तूप के ऊपर एक अष्टपार्श्वीय बुर्जी बनी हुई है। कहा जाता है कि यहां हुमायूं ने भी एक रात गुजारी थी।

भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ है यहां
सारनाथ का संग्रहालय भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण का प्राचीनतम स्‍थल संग्रहालय है। इसकी स्थापना 1904 में हुई थी। यह भवन योजना में आधे मठ (संघारम) के रूप में है। इसमें ईसा से तीसरी शताब्दी पूर्व से 12वीं शताब्दी तक की पुरातन वस्तुओं का भंडार है। इस संग्रहालय में मौर्य स्‍तंभ का सिंह स्‍तंभ शीर्ष मौजूद है जो अब भारत का राष्‍ट्रीय प्रतीक है। चार शेरों वाले अशोक स्तंभ का यह मुकुट लगभग 250 ईसा पूर्व अशोक स्तंभ के ऊपर स्थापित किया गया था।  इस स्तंभ में चार शेर हैं, पर किसी भी कोण से तीन ही दिखाई देते हैं। 
अशोक स्तंभ का मॉडल।
कई मुद्राओं में बुद्ध की मूर्तियों के अलावा, भिक्षु बाला बोधिसत्‍व की खड़ी मुद्रा वाली विशालकाय मूर्तियां, छतरी आदि भी प्रदर्शित की गई हैं। संग्रहालय की त्रिरत्‍न दीर्घा में बौद्ध देवगणों की मूर्तियां और कुछ वस्‍तुएं हैं। तथागत दीर्घा में विभिन्‍न मुद्रा में बुद्ध, वज्रसत्‍व, बोधित्‍व पद्मपाणि, विष के प्‍याले के साथ नीलकंठ लोकेश्‍वर, मैत्रेय, सारनाथ कला शैली की सर्वाधिक उल्‍लेखनीय प्रतिमा उपदेश देते हुए बुद्ध की मूर्तियां प्रदर्शित हैं।

सारनाथ वाराणसी के बाकी पर्यटक स्थलों की तुलना में खुला खुला और हरा भरा है। यहां आप छोटा सा चिडियाघर (डियर पार्क) भी देख सकते हैं। यहां घूमने के लिए आधे दिन का समय जरूर निकाल कर रखें।

अपने पांच साल के वाराणसी प्रवास के दौरान हमलोग अनगिनत बार सारनाथ गए पिकनिक मनाने। हालांकि गरमी  की दोपहरी में सारनाथ घूमने में परेशानी हो सकती है। यहां सर्दियों में जाना बेहतर है।

कैसे पहुंचे - वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से आठ किलोमीटर की दूरी पर है सारनाथ। सारनाथ नाम का रेलवे स्टेशन भी है जो वाराणसी से औरिहार जंक्शन जाने वाली लाइन पर है। आप वाराणसी कैंट से आटो रिक्सा से सारनाथ जा सकते हैं। हाल ही में बीएसएनएल ने यहां सैलानियों के लिए फ्री वाईफाई सुविधा शुरू कर दी है।


वाराणसी में और क्या देखें -  दश्वाश्वमेध घाट, काशी विश्वनाथ मंदिर. जंतरमंतर. रामनगर का किला, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, संकट मोचन मंदिर, मानस मंदिर, दुर्गा कुंड मंदिर। भारत माता मंदिर, भारत कला भवन (बीएचयू)। 

 - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( SARNATH, BUDDHA, VARANASI, BANARAS, UTTRAR PRADESH)

Thursday, August 13, 2015

प्रभु यीशू यहां भोजपुरी में सुनते हैं प्रार्थना


आपको पता है बनारस में एक ऐसा चर्च भी है जहां पर परमपिता परमेश्वर के लिए प्रार्थना भोजपुरी में की जाती है। जी हां, उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में सौ साल से ज्यादा पुराना एक ऐसा गिरिजाघर है जहां प्रभु ईसा की प्रार्थना भोजपुरी में की जाती है। वाराणसी के छावनी क्षेत्र में लाल गिरिजाघर ( CNI  LAL GIRJA VARANASI )   की स्थापना सन् 1879 में रेव्हटन एलबर्ट ने की थी। 18वीं सदी के यूरोपीय शैली में बने गिरिजाघरों की तर्ज पर इस वेस्लेयन मेथोडिस्ट चर्च (Wesleyan Methodist church ) को बाद में चर्च नॉर्थ ऑफ इंडिया गिरजाघरों में शामिल किया गया। लाल रंग से रंगे होने के कारण इसका नाम लाल गिरजा पड़ा। हर साल गिरिजाघर की क्रिसमस के पहले लाल रंग से पुताई की जाती है।

लाल गिरिजाघर में आसपास के गांवों के लोगों को सहजता से समझाने के लिए सरल भोजपुरी भाषा में प्रार्थना की जाती है। फादर ने दलितों और समाज के पिछड़े लोगों के साथ काम करते हुए भोजपुरी भाषा अपना कर उनको मुख्य धारा से जोडऩे के लिए ये कदम उठाया था। हर रविवार को भोजपुरी में प्रार्थना सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां आते हैं। 

इस गिरिजाघर के स्थापना के बाद से ही प्रार्थना तथा अन्य आयोजन भोजपुरी भाषा में ही किए जाते रहे। हर रविवार को ईसाई समुदाय के लोग यहां प्रार्थना के लिए आते हैं। रविवार को यहां प्रार्थना सुनने स्थानीय लोग भी जुटते हैं। प्रार्थना कुछ इस तरह से की जाती हैः 

प्रभु जी हम बे-सराहा हंई,
हमनी का सहारा देई,
संसार में हमनी के लोग निर्बल समझेला,
 तोहार दृष्टि में हमनी के मूल्य अधिक होला..।

भले ही दुनिया भर में काशी की पहचान महादेव की नगरी के रूप में हो लेकिन अपने घाटों, पंडों,गलियों और अल्हड़ मस्ती के लिए मशहूर वाराणसी में यीशु के भक्तों के लिए कुछ न कुछ खास जरूर है। यहां का लाल गिरिजाघर वाराणसी के तमाम विशेषताओं में एक और अध्याय जोड़ता है।

हालांकि एक दौर ऐसा भी आया था जब लाल गिरिजाघर में भोजपुरी का चलन कम होने लगा था। चर्च की स्थापना के बाद से ही प्रार्थना और अन्य आयोजन भोजपुरी भाषा में ही किए जाते रहे थे। मगर बाद में बीच के दौर में लोगों का विरोध बढ़ा तो भोजपुरी का चलन भी कम होता गया।

मगर 1991 में चर्च की 112 वीं सालगिरह के बाद फादर सैम जोशुआ सिंह के कार्यभार ग्रहण करते ही यहां हर रविवार और विशेष अवसर पर भोजपुरी कलीसिया (प्रार्थना) का आयोजन फिर से किया जाने लगा। फादर मानते हैं भोजपुरी में प्रार्थना के आयोजन से स्थानीय लोगों का जुड़ाव बढ़ता है।
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   --- विद्युत प्रकाश मौर्य

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( VARANASI, BANARAS, UTTRAR PRADESH)