Sunday, August 30, 2015

केवलादेव उद्यान में हैं स्वंभू शिव

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के ठीक मध्य में स्थित है केवलादेव महादेव का मंदिर। केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान के मुख्य द्वार से छह किलोमीटर चलने के बाद केंद्रीय स्थल आता है जहां पर शिव का छोटा सा मंदिर है। इस मंदिर में भगवान शिव का जो शिवलिंग है यह आपरुपि प्रकट हुआ है। इसलिए इसे स्वंयभू शिवलिंगम भी कहते हैं। केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में घूमने आने वाले सैलानियों की आस्था का केंद्र है ये शिव मंदिर। वास्तव में केवलादेव नेशनल पार्क का नामकरण इसी मंदिर के नाम पर ही हुआ है। वैसे तो इस पक्षी उद्यान को घाना भी कहते हैं पर इसका पंजीकृत नाम केवलादेव ही है।


जैसा कि सर्वविदित है कि ये केवलादेव का इलाका घना जंगल हुआ करता था। यह भरतपुर के राजा की शिकारगाह हुआ करता था। मंदिर के पुजारी केवलादेव मंदिर को महाराजा सूरजमल का के काल का बताते हैं। कहते हैं कि राजा जब इस क्षेत्र में शिकार करने आते थे तो एक जगह ऐसी थी जहां आकर गाय अपने आप ही दूध देने लगती थी। महाराजा को कौतूहल हुआ कि ऐसा क्यों होता है। जिस स्थल पर गाय दूध देने लगती थी उसकी थोड़ी सी खुदाई कराई गई तो देखा गया कि वहां शिव लिंग स्थित है। तब लोगों ने सोचा कि निश्चय ही गाय यहां आकर महादेव को दुग्धाभिषेक करती है। तब महाराजा के आदेश पर शिवलिंग को अनावृत किया गया और यहां पर एक छोटा सा मंदिर बना दिया गया। इस मंदिर को केवला देव कहा गया। केवला देव यानी केवल महादेव ही इस क्षेत्र से स्वामी हैं दूसरा कोई नहीं। इस केवलादेव के नाम पर इस पार्क का नाम भी केवलादेव रखा गया। पर कई लोगों को कहना है कि केवलादेव इसलिए भी नाम पड़ा कि यहां कभी केले के पेड़ बहुतायत हुआ करते थे। हालांकि कई लोग इस सिद्धांत को नहीं स्वीकार करते। पर तकरीबन 300 साल से इस मंदिर में आस्थावान लोग पूजा करते आ रहे हैं। सावन में आसपास के श्रद्धालु लोग यहां कांवर लेकर आते हैं। तो कई लोग अपनी मनौती लेकर भी केवलादेव के दरबार में पहुंचते हैं। मंदिर का गर्भगृह छोटा सा है। आसपास में मंदिर के अलावा कोई निर्माण नहीं है। पर आसपास में झील और हरियाली होने के कारण वातावरण अत्यंत मनोरम बन पड़ता है। मंदिर प्रांगण में अदभुत शांति मिलती है। महादेव पशु पक्षियों को भी अपना आशीर्वाद देते हैं।

पुजारी जी का दर्द – केवलादेव मंदिर के पुजारी जी बताते हैं कि यहां प्रशासन की ओर से उन्हे सिर्फ 800 रुपये साल में एक बार मानदेय के तौर पर मिलता है। मंदिर के पास पुजारी के रहने के लिए आवास भी नहीं है। मुख्य द्वार से छह किलोमीटर चल कर यहां आना पड़ता है। पार्क में घूमने आने वाले सिर्फ हिंदू श्रद्धालुओं में से कुछ लोग ही उन्हें दक्षिणा के तौर पर कुछ राशि देकर जाते हैं। इससे गुजारा चलाना बहुत मुश्किल है। उनकी कई पीढ़ियां केवलादेव मंदिर में पूजा कर रही हैं। उनकी सरकार से गुजारिश है कि उनका मानदेय बढ़ाया जाए। कम से कम न्यूनतम मासिक वेतन तो मिले जिससे वे अपना गुजारा चला सकें। हमें उनकी मांग जायज प्रतीत होती है।
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( KEOLADEO, SHIVA TEMPLE, WATER, BIRDS, BHARATPUR ) 
( केवलादेव  राष्ट्रीय पक्षी उद्यान - 3) 



Friday, August 28, 2015

आइए बुला रहे हैं मेहमान परिंदे

केवला देव पक्षी उद्यान में घूमने का बेहतरीन तरीका है कि आप सुबह सुबह पहुंचे। आप सारी रात सफर करके सुबह भरतपुर पहुंच जाएं। या फिर एक दिन पहले भरतपुर पहुंचे। पार्क के आसपास किसी होटल में ठहरें। अगले दिन सुबह छह बजे ही सैर के लिए निकल जाएं। 

अगर आप नवंबर से फरवरी के बीच जाते हैं तो आपकी सबसे ज्यादा विदेशी प्रवासी पक्षियों से मुलाकात हो सकती है। दूसरा लाभ यह होगा कि आप सुबह की प्रदूषण मुक्त हवा में उद्यान का सैर कर सकेंगे। धूप भी कम मिलेगी। उद्यान में पक्षी सुबह के वक्त सबसे ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं।

उद्यान के अंदर थोड़ी दूर चलने पर पक्षियों का कलरव सुनाई देने लगता है। उद्यान को घूमना बड़ा आसान है। छह किलोमीटर लंबी सड़क है जिस पर चलते हुए आप उद्यान के बीचों बीच पहुंच जाते हैं। सड़क के दाहिने और बाएं तरफ कहीं कहीं ट्रैक बने हैं जहां आप अलग अलग तरह के परिंदों का बसेरा देख सकते हैं। सड़क पर चलते हुए आपको गोह ( लिजार्ड) के दर्शन हो जाते हैं। वही गोह जिसे शिवाजी ने पाला था।

यूनेस्को की साइट के मुताबिक केवला देव में 364 प्रजाति के पक्षी पाए जाते हैं। इसे 1982 में राष्ट्रीय पक्षी उद्यान घोषित किया गया। यहां साइबेरिया, तीन, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान आदि देशों से प्रवासी पक्षी हर साल उड़ान भरकर आते हैं। यह प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण प्रजनन केंद्र ( ब्रिडिंग सेंटर) है। कुल 2873 हेक्टेयर भूमि पर फैले इस उद्यान की खास बात यह है कि यहां, घास के मैदान, तालाब, जंगल, नम भूमि (वेटलैंड) सब कुछ है। इस तरह का पक्षियों के लिए निवास क्षेत्र दुर्लभ है। आपको रास्ते में चलते हुए किंगफिशर, वुड पिकर ( कठफोड़वा) पेंटेड स्ट्रोक ( जांघिल), उल्लू जैसे सैकड़ो भारतीय पक्षियों को दर्शन होते जाएंगे। 

पानी में कछुए भी दिखाई दे जाते हैं। इन पक्षियों को करीब से देखने के लिए आपके पास बेहतरीन क्वालिटी की दूरबीन होनी चाहिए। यहां पक्षी अपने बच्चों को खाना खिलाते हुए उन्हे उड़ना सिखाते हुए, कई बड़े पक्षी अपने भींगे हुए पंखों को सुखाते हुए देखे जा सकते हैं। यहां आप स्ट्रोक परिवार के कई पक्षियों को देख सकते हैं। केवलादेव पार्क के मध्य में कई बर्ड वाचिंग सेंटर ( मचान) बनाए गए हैं। इनपर चढ़कर आप अपनी दूरबीन से दूर दूर तक का नजारा कर सकते हैं। अगर पक्षियों से प्रेम करते हैं तो आप सारा दिन यहां गुजार सकते हैं। कई पक्षी प्रेमी तो यहां आकर हफ्ते पर रुकते हैं और पक्षियों को देखते रहते हैं। स्कूली बच्चों के ज्ञान बढाने के लिहाज से इस पार्क की यात्रा बड़ी लाभकारी हो सकती है। वहीं अगर आप जीव विज्ञान के छात्र हैं या शोधार्थी हैं तो आपको लिए ये बेहतरीन जगह हो सकती है।
सारस क्रेन  ( सौ - WWF) 

सारस क्रेन - दुनिया के सबसे बड़े उड़ने वाले पक्षी सारस क्रेन के आपको यहां पर दर्शन हो सकते हैं। मादा सारस 35 से 40 किलो की होती है तो नर सारस 40 से 45 किलो का होता है। आम तौर पर यह जोड़े में दिखाई देता है या फिर तीन या चार के समूह में। यह जीवन भर अपने जोड़े के प्रति वफादार रहता है। यह मानसून के समय प्रजनन करता है।

गर्मी के दिनों में पार्क में कम पक्षी दिखाई देते हैं। पर बरसात के बाद यहां कलरव बढ़ जाता है। अगर आप अक्तूबर तक जाते हैं तो विदेशी प्रवासी मेहमान परिंदे नहीं मिलेंगे। पर अक्तूबर मध्य के बाद उनकी आमद शुरू हो जाती है। सर्दी के दिनों में यहां 20 हजार के करीब पक्षी अपना घोसला बनाते हैं। तब केवलादेव गुलजार हो उठता है देशी- विदेशी रंग बिरंगे मेहमान परिंदों के कलरव से।
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( KEOLADEO NATIONAL PARK, BIRDS, WATER, BHARATPUR, RJASTHAN, CRANE)
( केवलादेव  राष्ट्रीय पक्षी उद्यान - 2) 



Wednesday, August 26, 2015

केवलादेव – चलो परिंदों की जुबां समझें

अगर आप प्रकृति और पशु पक्षियों से प्रेम करते हैं तो आपके लिए घूमने के लिए केवलादेव नेशनल पार्क शानदार जगह हो सकती है। राजस्थान के भरतपुर शहर के बाहरी इलाके में स्थित इस पार्क को घाना पक्षी उद्यान भी कहते हैं। घाना इसलिए कि कभी यहां घने जंगल हुआ करते थे। केवलादेव को संयुक्त राष्ट्र विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिला हुआ है। पक्षी उद्यान 27 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। कभी यहां घना जंगल हुआ करता था। 1964 में यहां शिकार पर रोक लगी। 1982 में इसे राष्ट्रीय पक्षी उद्यान का दर्जा मिला। 1985 में यह विश्व धरोहर की सूची में शामिल हुआ। आजकल यहां 200 प्रजाति के पक्षी देखे जा सकते हैं।

इससे पहले यह कई सदी का राजाओं की शिकारगाह हुआ करती थी। भरतपुर के महाराजा ही नहीं बल्कि उनके आमंत्रण पर आसपास के कई राजा ब्रिटिश अधिकारी यहां शिकार करने आते थे। गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन समेत कई गवर्नर भी यहां शिकार कर चुके हैं। पार्क के अंदर सभी शिकार करने वालों की सूची लगाई गई है। कर्जन ने 1902 में और 1907 में यहां शिकार किया था। पर 1964 से यहां शिकार बंद हो गया। इस पूरे क्षेत्र को पक्षियों के लिए संरक्षित कर दिया गया। इसमें भरतपुर के राज परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इस पार्क का नाम पार्क के बीचोंबीच स्थित भगवान शिव के मंदिर केवलादेव के नाम पर है।

पिछले चार साल केवलादेव में पानी की कमी थी। पर अब यहां गोवर्धन से पानी लिया गया है। पार्क एक बार फिर पक्षियों से गुलजार है। अगर आप केवलादेव घूमने जाना चाहते हैं तो इसके लिए अगस्त से मार्च तक का महीना बेहतर है। नवंबर से फरवरी तक का महीना सबसे बेहतर है।

प्रवेश टिकट - पार्क में प्रवेश टिकट 75 रुपये का है। यह दर भारतीय व्यस्क के लिए है। बच्चों के लिए दर कम है। विदेशियों के लिए और भी ज्यादा है। पार्क सुबह 6 बजे से शाम को अंधेरा होने तक खुला रहता है। पार्क के बाहर बस, कार और बाइक के लिए पार्किंग उपलब्ध है। प्रवेश टिकट घर के पास से आप पक्षियों पर पुस्तकें पार्क की स्मृति में बनी टोपियां, टी शर्ट, जैकेट आदि भी खरीद सकते हैं। ये सब वाजिब दाम पर हैं। इस उद्यान का प्रबंधन राजस्थान सरकार का वन विभाग करता है।  

कैसे घूमें – पार्क घूमाने के लिए साइकिल रिक्सा उपलब्ध है। कुल 140 रिक्सा वाले हैं। उनकी दरें 100 रुपये प्रतिघंटा है। कम से कम 4 घंटे का समय तो रखे हीं। रिक्शा वाले आपको दूरबीन भी देते हैं। बिना दूरबीन के पक्षी बेहतर तरीके से नहीं देख सकते। दो घोड़ागाड़ी और कुछ बैटरी रिक्शा भी पार्क में चलते हैं। आप 40 रुपये में साइकिल भी किराए पर ले सकते हैं। 

कैसे पहुंचे - केवलादेव नेशनल पार्क भरतपुर में आगरा हाईवे पर स्थित है। दिल्ली से तकरीबन 180 किलोमीटर की दूरी पर है भरतपुर। मथुरा और आगरा से इसकी दूरी 55 किलोमीटर है। अगर अपनी गाड़ी से हैं और आप आगरा में हैं तो फतेहपुर सीकरी घूमने के बाद भरतपुर जा सकते हैं। फतेहपुर सीकरी से भरतपुर की दूरी महज 22 किलोमीटर है।


आप अपना टूर प्लान मथुरा वृंदावन, आगरा और भरतपुर का बना सकते हैं। दिल्ली से आप भरतपुर ट्रेन या बस से जा सकते हैं। रास्ता 4 घंटे का है। बस से जाना हो तो मेट्रो रेल से फरीबाद के एस्कार्ट मुजेसर मेट्रो तक जाएं वहां से आगरा जाने वाली बस लें। मथुरा में भरतपुर बाईपास पर उतर कर भरतपुर की बस ले लें। आप भरतपुर के साथ डीग महल, गोवर्धन आदि का भी कार्यक्रम बना सकते हैं।
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( केवलादेव  राष्ट्रीय पक्षी उद्यान - 1)  REMEMBER IT IS A WORLD HERITAGE SITE LISTED IN 1985.  


Monday, August 24, 2015

झूमते बाजरे के साथ चलता सफर


श्री महाबीर जी से करौली जाना चाहता हूं। छोटे से बस स्टैंड पर बसें कम आती है। लोग बताते हैं कि आप जीप से खेड़ा तक चले जाओ वहां से बसें मिल जाएंगी। खेड़ी की जीप में बैठता हूं। रेलवे स्टेशन श्री महाबीर जी के पास जाकर जीप थोड़ी देर के लिए रूक जाती है।
मैं यहां सुबह के नास्ते में कचौड़ियां खाता हूं। जीप खेड़ा गांव में पहुंजा देती है। पर वहां पता चलता है चौक से गली होकर मुख्य सड़क पर जाइए वहां से साधन मिल सकेगा। पैदल चलकर हिंडौन करौली हाईवे पर पहुंचता हूं। एक जीप वाले मिलते हैं वे करौली ले जाने को तैयार हैं। जीप में बैठ जाता हूं। सड़क के दोनों तरफ खेतों में बाजरे की फसल झूम रही है। 

सहयात्री बताते हैं राजस्थान के भरतपुर करौली आदि जिलों में बाजरे की खेती बड़े पैमाने पर होती है। यह गेहूं से सस्ता बिकता है पर कम पानी में तैयार हो जाता है। इसलिए इसकी खेती इधर मुफीद है। बाजरा (पर्ल मिलेट) मोटा अनाज माना जाता है। सूखे में उग जाता है। भीषण गरमी झेल लेता है। ज्वार की तरह इसकी बुआई गर्मियों में होती है। सर्दियों में बाजरा खाना काफी पौष्टिक और लाभकारी माना जाता है।


कहते हैं बाजरा का जन्म स्थान अफ्रीका है। बाजरे की रोटी सरदियों में बल वर्धक और पुष्टिकारक मानी जाती है। सहयात्री बताते हैं कि मंडी में बाजरा का भाव गेहूं से हमेशा 200 से 300 रुपये क्विंटल कम रहता है। बाजरे की तासीर गरम होती है। आयुर्वेद में बाजरा को स्त्रियों में काम शक्ति बढ़ाने वाला माना गया है। बाजरे से बीयर भी बनता है। बाजरा को सरदी आने से पहले काट लिया जाता है। जहां मक्का और गेहूं नहीं होता वहां भी बाजरा शान से उपज देता है। जीप आगे बढ़ रही है। सुंदर पहाड़ी रास्ता है। पंचना नदी आती है। उस पर बना बांध आता है। बांध के बाद करौली शहर दिखाई देने लगता है। 

अगले दिन करौली से वापसी के लिए पता करता हूं। होटल जगदंबा के मैनेजर ने बताया कि भरतपुर की सीधी बस आपको यहां से देर से मिलेगी पर सुबह 4.30 बजे ही अलवर की बस मिलेगी। उससे आप महवा उतर जाएं। वहां से भरतपुर की बस ले लें। मैं सुबह 4. 30 से पहले बस स्टैंड पहुंज जाता हूं। अलवर वाली बस में महवा का टिकट लेता हूं। बस रात अंधेरे चलकर उजाला होने पर हिंडौन सिटी में रूकती है।


हिंडौन से एक घंटे चलकर महवा पहुंचा देती है। कुछ लोग इसे महुआ भी कहते हैं। यह दौसा जिले की तहसील है। ये राजस्थान का विधानसभा क्षेत्र भी है। वैसे हमारे देश में दो और महुआ नाम के शहर हैं। 

एक महुआ तो बिहार के वैशाली जिले में दूसरा महुआ गुजरात के भावनगर जिले में है। पर राजस्थान के दौसा जिले का यह कस्बा महवा है। यहां से मेहंदीपुर बाला जी की दूरी 17 किलोमीटर है। मुझे थोडी देर इंतजार के बाद भरतपुर के लिए एक शेयरिंग टैक्सी मिल जाती है।

सरपट दौड़ती हुई यह टैक्सी एक घंटे में भरतपुर बस स्टैंड पहुंचा देती है। महवा से दूरी 55 किलोमीटर है। सुबह के नौ बजे हैं। नास्ते का समय हो गया है। पर मुझे तो केवलादेव पक्षी उद्यान जाने की जल्दी है। इसलिए रास्ता पूछता हूं। लोगों ने बताया यहां से 4 किलोमीटर है केवलादेव। आटो से काली बगीची तक जाएं वहां से आगे पैदल। चल पड़ता हूं पक्षियों का कलरव सुनने के लिए।


(TRAVEL, BAJRA, PEARL MILLET, RAJSTHAN, KARAULI, DAUSA, BHARATPUR ) 
भरतपुर रेलवे स्टेशन। 

Saturday, August 22, 2015

जय मां कैला देवी – जहां डाकू भी आते हैं मन्नत मांगने

राजस्थान के करौली जिले में शक्ति की देवी कैला देवी का मंदिर सुंदर है। इस मंदिर के प्रति राजस्थान, मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश के लोगों में अगाध आस्था है। यहां तक की चंबल के क्षेत्र में सक्रिय डाकू भी इस मंदिर में मां की आराधना करने आया करते थे।

कैला देवी को  जादौन राजपूत लोग अपनी कुल देवी मानते हैं। कैला देवी का मंदिर ये कैला देवी गांव में कालीसिल नदी के तट पर बना है। 

त्रिकूट की मनोरम पहाड़ियों की तलहटी में स्थित इस मंदिर का निर्माण राजा भोमपाल ने 1600 ई. में करवाया था। मुख्य मन्दिर संगमरमर से बना हुआ है  मंदिर पूरब मुख का है।  कैला देवी मंदिर में चांदी की चौकी और सोने की छतरियों के नीचे दो प्रतिमाएं हैं। इनमें एक बाईं ओर उसका मुंह कुछ टेढ़ा है, वही कैला देवी हैं। मान्यतानुसार कैला देवी मां द्वापर युग में कंस की कारागार में उत्पन्न हुई कन्या है, जो राक्षसों से पीडि़त समाज की रक्षा के लिए एक तपस्वी द्वारा यहां बुलाई गई थीं।

एक कथा के अनुसार करौली के राज्य पर एक दानव बहुत अत्याचार करता था। वहां के राजा दो भाई थे। दोनों भाई दानव से परेशान थे। तो दोनों भाइयो ने मां कैला देवी की पूजा की ओर करोली में आकर दानव से मुत्ति के लिए प्रार्थना की। मां कैला देवी बाड़ी  से करोली पर आई और दानव का संहार किया। जिसका प्रमाण कलिशील नदी के किनारे मां और दानव के पैरो के चिन्ह आज भी देखे जा सकते हैं।

लंबी पदयात्रा करके लोग करते हैं दर्शन - राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिलों के लोग लंबी पदयात्रा करके कैला देवी का दर्शन करने के लिए चैत महीने में आते हैं। लोग कैला देवी से संतान, लंबी उम्र की दुआ मांगते हैं। कहते हैं मां सबकी सुनती हैं।

चैत में विशाल मेला - चैत्र और आश्विन नवरात्रि के इन दोनों अवसरों पर इस क्षेत्र से लाखों श्रद्धालु कैला देवी के करौली स्थित मंदिर के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस मौके पर विशाल मेला लगता है। मेले के समय आसपास के शहरों से कैला देवी के लिए 24 घंटे बसें चलती रहती हैं।

डकैत भी आते हैं माता का दर्शन करने - 

मां कैला देवी के इस मंदिर में डकैत वेश बदलकर आते हैं और मां कैला देवी की साधना करते हैं। लक्ष्य की साधना के लिए मां से मन्नत मांगते हैं। मजे की बात इसकी जानकारी जासूसों के माध्यम से पुलिस को मिल जाती है। पर पुलिस लाख कोशिश कर मंदिर परिसर में उन्हें पकड़ नहीं पाती।

कहां ठहरें - कैला देवी मंदिर से पहले आधा किलोमीटर लंबा बाजार है। इसमें दोनों तरफ प्रसाद की दुकानें और भोजनालय है। कैला देवी में रात्रि विश्राम के लिए अतिथि गृह और धर्मशालाएं भी मौजूद हैं। एक विशाल धर्मशाला करौली के राजघराने द्वारा निर्मित है। मंदिर परिसर में भी एक भोजनालय है जहां रियायती दरों पर भोजन और नास्ता उपलब्ध रहता है।


कैसे पहुंचे रेल मार्ग से जाने पर हिंडौन सिटी या फिर गंगापुर सिटी रेलवे स्टेशन उतर कर कैला देवी बस से जा सकते हैं। आप हिंडौन सिटी से बस से करौली पहुंचे। ( 33 किलोमीटर) करौली शहर से कैला देवी की दूरी 23 किलोमीटर है। हर आधे घंटे पर बसें और जीप मिलती हैं। सवाई माधोपुर जिले के रेलवे स्टेशन गंगापुर सिटी से भी अपने वाहन से कैला देवी पहुंच सकते हैं। गंगापुर सिटी से कैला देवी की दूरी 34 किलोमीटर है।वैसे बेहतर होगा कि आप जिला मुख्यालय करौली में रूकें और यहां से कैला देवी के दर्शन करने जाएं। करौली बस स्टैंड के पास रहने के लिए रियायती और बेहतर जगह है जगदंबा लॉज। अगर थोड़ा बेहतर और महंगी जगह में ठहरना हो तो होटल करौली अजय विकल्प हो सकता है। करौली अजय के साथ भोजनालय भी है।
-         जगदंबा लॉज, गुलाबबाग मार्ट, करौली (राज)- 322241 फोन  (07464) 220577- 07464220577

- vidyutp@gmail.com  ( KAILA DEVI, KARAULI , RAJSTHAN, DAKU  ) 

Thursday, August 20, 2015

अति सुंदर नक्काशियों वाला महल - सिटी पैलेस करौली

करौली बस स्टैंड की तरफ से पैदल चलते हुए बाजार की ओर बढ़ रहा हूं। थोडी देर में एक गेट आता है। इसका नाम है हिंडौन गेट। गेट के आसपास घना बाजार है। आसपास में पतंगों की दुकानें लगी हैं। पर पुराना गेट अभी भी अच्छी हालत में है। किसी समय में करौली शहर में ऐसे छह दरवाजे थे। इसके अलावा दुश्मन का मुकाबला करने के लिए 11 परकोटे भी थे। करौली शहर पंचना नदी के तट पर बसा है। नदी पर बने डैम से शहर को पानी मिलता है। नदी पर बना बांध मिट्टी का है।

करौली सिटी पैलेस राजस्थान के बेहतरीन ऐतिहासिक महलों में से है। पर यहां कम ही सैलानी पहुंचते हैं। इसका निर्माण 14 वीं सदी में हुआ है। ये महल अपने क्लासिक चित्रों, पत्थरों पर सुंदर नक्काशी, वास्तुकला और जाली के सुंदर काम के कारण बहुत प्रसिद्ध है। यहां के दरबार हॉल  में कई पुरानी तस्वीरें हैं जो यहां के 600 साल पहले के कला के इतिहास को दिखाती हैं। ये महल 1938 तक यहां के शाही परिवार का निवास स्थल था। पर शाही परिवार दूसरे महल भंवर विलास पैलेस  के निर्माण के बाद वहां चला गया। भंवर विलास पैलेस को भी अब हेरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। ( http://bhanwarvilaspalace.com/)

करौली के पुराने महल का निर्माण राजा अर्जुन पाल ने 1348 में करवाया था। कहा जाता है कि कभी ये नगर कल्याणपुरी के नाम से जाना जाता था। यहां यदुवंशी राजाओं का शासन रहा। वे खुद को भगवान कृष्ण का वंशज मानते हैं। पुरा करौली शहर लाल पत्थर की दीवारों से सुरक्षित किया गया था जिससे दुश्मनों के हमले से बचाव हो सके। सिटी पैलेस की छत और झरोखों से आसपास का सुंदर नजारा दिखाई देता है। भंवर विलास पैलेस में ठहरने वाले सैलानियों को सिटी पैलेस की सैर ऊंट गाड़ी से कराई जाती है।

बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी करौली किले में मध्यकालीन भारत के संग्रह को देखने आते हैं। यह किला अभी भी राजपरिवार के संरक्षण में है। सिटी पैलेस के दरबार हाल का सौंदर्य देखते ही बनता है। यहां राजस्थान की कई लड़ाइयों और उसके इतिहास से रुबरू हुआ जा सकता है। 


ब्रिटिश राज में करौली 17 तोपों की सलामी वाली राजघराना हुआ करता था। देश आजाद होने के बाद करौली राजघराने से जुड़े कुंअर ब्रिजेंद्र पाल लगातार पांच बार करौली से विधायक चुने जाते रहे। 2008 में एक बार फिर राजघराने के महाराजा कृष्ण चंद्र पाल देव बहादुर की पत्नी रोहिणी कुमारी भाजपा से विधायक चुनी गईं। पर 2013 में रोहिणी कुमारी को जनता ने वसुंधरा की लहर में भी नकार दिया।


प्रवेश टिकट महंगा -  करौली के किले को देखने का प्रवेश टिकट 110 रुपये का है। अगर आप अपने कैमरे से फोटोग्राफी करना चाहते हैं तो उसके लिए 225 रुपये अलग से चुकाने होंगे। हालांकि किले के बाहरी दीवारों का नजारा आप बिना किसी शुल्क के कर सकते हैं। 
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(CITY PALACE, KARAULI, RAJSTHAN, FORT ) 

Tuesday, August 18, 2015

करौली का अदभुत मदन मोहन मंदिर

कान्हा जी यानी मदन मोहनजी का मंदिर करौली किले में मुख्य शहर में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा गोपाल सिंह ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान कृष्ण और देवी राधा की प्रतिमाएं हैं। करौली के निवासियों में मदन मोहन के प्रति अपार श्रद्धा और आस्था है। श्रीकृष्ण  भगवान के अनेक नामों में से एक प्रिय नाम मदन मोहन भी है।

करौली के राजा गोपाल सिंह ने 1725 ये मंदिर बनवाया गया। कहा जाता है कि दौलताबाद पर विजय के बाद महाराजा गोपाल सिंह जी को सपना आया जिसमें उन्हें मदनमोहन जी ने कहा कि मुझे करौली ले चलो। तब मदनमोहन की प्रतिमा को जयपुर के आमेर से करौली ले जाकर स्थापित किया गया। इस मंदिर के निर्माण मे दो से तीन साल का समय लगा था।


मदन मोहन मंदिर में स्थापित कृष्ण जी की ऊंचाई तीन फीट है जबकि राधा जी दो फीट की हैं। दोनों मूर्तियां अष्टधातु की बनी हैं। दोंनो मूर्तियों की सुंदरता अदभुत है।
मंदिर मध्यकालीन वास्तुकला का सुंदर नमूना है। मंदिर के प्रवेश द्वार से गर्भ गृह के बीच लंबा चौबारा है। गर्भ गृह में सुंदर नक्कासियां भी हैं। मंदिर के निर्माण में करौली के पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। मुख्य मंदिर के अलावा मंदिर परिसर में कई और मूर्तियां स्थापित की गई हैं। चांदनी रात में मंदिर का सौंदर्य और बढ़ जाता है।

महाराजा गोपाल सिंह ने जिस गुसाईं को सबसे पहले मंदिर का प्रभार सौंपा था, वह मुर्शिदाबाद के रामकिशोर थे। इसके बाद मदनकिशोर यहां गुसाईं रहे। करौली के मंदिर को राजघराने की ओर से अचल संपत्ति प्रदान की गई थी जिससे  18वीं सदी में 27 हजार  रुपये की सालाना आय होती थी।

दिन में सात बार भोग - भगवान मदन मोहन को दिन में सात बार भोग लगाया जाता है। उन्हें मिष्टान्न काफी प्रिय है। उनके भोग में मुख्य है दोपहर को राजभोग और रात को शयनभोग। शेष पांच भोगों में से मिष्ठान आदि रहता है। इसमें मालपुआ, रसगुल्ले जैसी मिठाइयां होती हैं। खास मौकों पर मदन मोहन जी को 56 भोग लगाया जाता है। इसमे नाना प्रकार के पकवान होते हैं। इसके लिए बड़ी तैयारी की जाती है।

मदनमोहन जी के सेवाकाल में सुबह पांच बजे मंगल आरती  होती है। इसके बाद सुबह नौ  बजे धूप, 11 बजे शृंगार, तीन बजे दुबारा धूप और शाम को सात बजे सांध्य आरती होती है। मंदिर सुबह 5 बजे खुलता है और रात्रि 10 बजे बंद हो जाता है। दोपहर में भी दो घंटे के लिए भी मंदिर बंद होता है। गोपाष्टमी , श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और राधाअष्टमी मंदिर के प्रमुख त्योहार हैं। मंदिर के पूजा में समय के अनुशासन का पूरा पालन होता है। 

ताज खां की भक्ति - कहा जाता है कि ताज खां नाम का एक मुसलमान मदन मोहन मंदिर के कृष्ण की प्रतिमा की एक झलक पाते ही उनका अनन्य भक्त बन बैठा। ताज खां यहां की कचहरी में एक चपरासी था। भक्त ताज खां को आज भी करौली के मदनमोहन मंदिर में संध्या आरती के समय 'ताज भक्त मुसलिम पै प्रभु तुम दया करी। भोजन लै घर पहुंचे दीनदयाल हरी।।' इस दोहे के साथ याद किया जाता है।

कैसे पहुंचे – करौली बस स्टैंड से मंदिर की दूरी दो किलोमीटर है। करौली के मुख्य बस स्टैंड से रिक्शा या आटो से या फिर पैदल चलते हुए भी मंदिर तक जा सकते हैं। मंदिर करौली किले के पीछे चौधरीपाडा में स्थित है। मंदिर के साथ श्रद्धालुओं के लिए एक धर्मशाला भी है।
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(MADAN MOHAN MANDIR, KARAULI, RAJSTHAN ) 

Sunday, August 16, 2015

24वें तीर्थंकर का अनूठा मंदिर- दिगंबर जैन मंदिर श्री महावीर जी

 सुबह सुबह दिल्ली से कोटा जाने वाली ट्रेन से चलकर श्री महाबीर जी रेलवे स्टेशन उतर गया। प्रसिद्ध जैन मंदिर के नाम पर रेलवे स्टेशन का नाम रखा गया है श्री महाबीर जी। 

 जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर श्री महावीर का अदभुत मंदिर राजस्थान के करौली जिले में स्थित है। इस मंदिर के नाम पर ही मथुरा सवाई माधोपुर के मध्य श्री महावीर जी नामक रेलवे स्टेशन है। यह मंदिर दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है। देश भर के दिगंबर जैन मतावलंबियों की इस मंदिर में अगाध श्रद्धा है।

इस मंदिर के बारे एक कथा प्रचलित है। गांव चंदनपुर में मंदिर में स्थापित भगवान महावीर की मूर्ति 16वीं या 17वीं शताब्दी में मिली थीं। यह मूर्ति खुदाई के दौरान मिली थी। कहा जाता है कि एक गाय अपने घर से प्रतिदिन सुबह घास चरने के लिए निकलती थी और शाम को घर लौट आती थी। कुछ दिन बाद जब गाय घर लौटती थी तो उसके थन में दूध नहीं होता था। एक दिन उसके मालिक चर्मकार ने सुबह गाय का पीछा किया और पाया कि एक विशेष स्थान पर वह गाय अपना दूध गिरा देती थी। यह चमत्कार देखने के बाद चर्मकार ने इस टीले की खुदाई की। खुदाई में भगवान महावीर  की पाषाण प्रतिमा मिली। हालांकि ये मूर्ति गुप्तकालीन प्रतीत होती है। पर यह किसी टीले में मिट्टी के अंदर दब गई थी। इस मूर्ति का निर्माण बलुआ पत्थर से हुआ है। 


बाद में इसी स्थल पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर के गर्भ गृह में स्थित भगवान महावीर की मूर्ति पद्मासन में है। ये मंदिर गंभीर नदी के किनारे स्थित है। हालांकि नदी आजकल ज्यादातर सूखी रहती है। नदी तट पर भव्य मंदिर का निर्माण अमर चंद बिलाला (बासवा, जयपुर) की ओर से कराया गया। मंदिर के गर्भ गृह में अति सुंदर नक्काशी की गई है। अब इस मंदिर की व्यवस्था प्रबंधन समिति देखती है।

मंदिर परिस में संदेश लिखा है। इस परिसर में आने के बाद रात में भोजन न करने और पानी को छान कर पीने का संकल्प लेकर जाएं। मंदिर परिसर में जैन धर्म का प्रसिद्ध जीओ और जीने दो संदेश लिखा गया है। मंदिर परिसर में आर्युवेदिक दवाओं का स्टाल भी है।
दिगंबर जैन महावीर मंदिर अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी। 
चैत में मेला – चैत्र शुक्ल एकादशी पर तीर्थंकर महावीर के जन्मदिन के समय यहां विशाल मेला लगता है। ये मेला पांच दिनों तक चलता है। इस मौके पर विशाल रथयात्रा का आयोजन होता है। इस मेले में राजस्थान के गुर्जर और मीणा समुदाय के लोग भी हिस्सा लेते हैं।

कैसे पहुंचे – श्री महावीर जी रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 7 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से हर ट्रेन के आने के बाद टाटा मैजिक जैसे वाहन मंदिर के लिए जाते रहते हैं। मंदिर के पास राजस्थान रोडवेज का बस स्टैंड भी है। पर यहां के लिए बसें बहुत कम ही हैं। आपको लंबी दूरी की बसें खेड़ा से और ट्रेन श्री महावीर जी रेलवे स्टेशन से मिल सकेगी।

कहां ठहरें - मंदिर प्रबंधन की ओर से भोजनालय और आवासीय सुविधा उपलब्ध है। पर इसके लिए शुल्क देना पड़ता है। यहां 750 रुपये में वातानुकूलित कमरे उपलब्ध हैं। आप आवास की बुकिंग आनलाइन भी करा सकते हैं। मंदिर के भोजनालय में बिना लहसुन प्याज का जैन भोजन मिलता है। मंदिर के आसपास कुछ दुकाने हैं जहां भोजन नास्ता आदि उपलब्ध होता है।  ( http://www.mahaveerji.org/index.php )
 विद्युत प्रकाश मौर्य 


Friday, August 14, 2015

चले जाना साइकिल मैन ऑफ इंडिया का...

ओम प्रकाश मुंजाल ( 1928 -2015)
( 26 .08.1928--- 13 .08.2015 ) 
साल 2000 की कोई तारीख थी। मैं अमर उजाला जालंधर में शिक्षा बीट पर संवाददाता हुआ करता था। जालंधर नकोदर रोड पर एक रिजार्ट में रविवार की सुनहरी दोपहर में कई स्कूलों का एक संयुक्त आयोजन था जिसका स्पांसर कंपनी हीरो साइकिल थी। सैकड़ों बच्चे हीरो की नई नई साइकिलों पर रिजार्ट के अंदर फुदक रहे थे। अंतर विद्यालीय प्रतियोगिता के लिए मंच तैयार हो रहा था। 

मैं पत्रकार होने के नाते सबसे अगली पंक्ति में जाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद एक बुजुर्ग सज्जन मेरे पास आए। अपने दो तीन मेहमानो को बिठाने के लिए उन्होंने मुझे उठकर पीछे वाली सीट पर जाने को कहा। मैं पत्रकार होने की ठसक में था। मैंने कहा, मैं क्यों ये सीट छोड़ूं। आपकी तारीफ...उन्होंने कहा, मैं एक जेंटिलमैन हूं। मैने जवाब दिया- तो मैं भी जेंटिलमैन हूं। उसके बाद वे मुझसे आगे उलझे बिना चले गए। बाद में मंच पर जब सभी आयोजक और मुख्य अतिथि अवतरित हुए तो मुझे पता चला कि जिन सज्जन से मैं उलझा था वे हीरो साइकिल्स के चेयरमैन ओम प्रकाश मुंजाल ( OM PRAKASH MUNJAL) थे। आज साइकिलमैन  ओपी मुंजाल इस दुनिया से जा चुके हैं तो मुझे जालंधर की वो घटना बार बार याद आती है।

आम आदमी की सवारी - साइकिल
रोजाना 19 हजार साइकिलें बनाने वाली कंपनी हीरो साइकिल्स के संस्थापक अध्यक्ष ओम प्रकाश मुंजाल का 13 अगस्त 2015 को लुधियाना में निधन हो गया। 86 साल के मुंजाल को लुधियाना के दयानंद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल के हीरो हर्ट इंस्टीट्यूट में अंतिम सांस ली। सात भाई बहनों के परिवार में ओम प्रकाश मुंजाल सबसे छोटे थे। इसी साल 22 फरवरी को उनकी पत्नी सुदर्शन मुंजाल का निधन हो गया था। सुदर्शन उनकी पत्नी के साथ ही उनकी कविताओं की प्रेरणा थीं। सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे ओपी मुंजाल। खत्री परिवार से आने वाले मुंजाल सक्रिय आर्य समाजी थे।
आम आदमी की सवारी क्या है। साइकिल। देश में साइकिल को जन जन में लोकप्रिय किसने बनाया। हीरो साइकिल ने। हीरो से पहले देश में हरक्यूलिस, रेले और फिलिप्स जैसी कंपनियों की साइकिलें विदेश से आती थीं, जो काफी महंगी होती थीं। पर हीरो एक सस्ती और स्वदेश विकल्प बनकर लोगों के बीच आई। ओपी मुंजाल को देश में साइकिल उद्योग का जनक के रूप में जाना जाता है।

अमृतसर में कारोबार की शुरुआत
1944 में ओपी मुंजाल ने अमृतसर में अपने अपने तीन भाइयों-बृजमोहन लाल मुंजाल, दयानंद मुंजाल और सत्यानंद मुंजाल के साथ एक साइकिल स्पेयर पार्ट्स का कारोबार शुरू किया। तब ओम प्रकाश 16 साल के थे। हालांकि, भारत का बंटवारा हुआ, जिसका बुरा असर अमृतसर में कारोबार पर पड़ा। इस कुछ सालों बाद ओपी मुंजाल भाइयों को लेकर लुधियाना आ गए। लुधियाना का प्रसिद्ध डीएमसी हास्पीटल उनके भाई दयानंद मुंजाल के नाम पर बना है जो काफी पहले ही स्वर्ग सिधार गए थे।

हीरो का सफर
1956 में हीरो साइकिल्स का कारखाना स्थापित हुआ था। इसके लिए बैंक से 50 हजार रुपये का कर्ज लिया गया था। तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो ने मुंजाल परिवार को कारोबार बढ़ाने के लिए प्ररेरणा दी थी। तब उसकी उत्पादन क्षमता रोजाना 25 साइकिलों की थी। अब इसमें रोज करीब 19 हजार साइकिलें बनती हैं।ओम प्रकाश व्यापार में धुन के इतने पक्के थे कि एक बार उनकी हीरो साइकिल फैक्ट्री में हड़ताल हो गई तो  वे खुद फैक्ट्री में नई साइकिलों पर पेंट करने के काम में लग गए। एक बार ट्रक आपरेटरों ने हड़ताल कर दी तो साइकिलों को बस में बुक करके भिजवाने लगे।

गिनिज बुक में नाम- दुनिया की नंबर वन कंपनी 
हीरो साइकिल को 1980 में दुनिया की सबसे अधिक साइकिल बनाने वाली कंपनी के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल किया गया था। देश के साइकिल बाजार में हीरो कंपनी की करीब 48 फीसदी हिस्सेदारी है। ओपी मुंजाल के परिवार में एक बेटा पंकज मुंजाल और चार बेटियां हैं। बंटवारे से पहले कमालिया (अब पाकिस्तान में) में ओपी मुंजाल का जन्म हुआ था। 

2010 में हीरो परिवार में बंटवारा
देश में बड़ी बिजनेस फैमिली में बंटवारा सही तरीके से हो जाए, ऐसा होता नहीं है। लेकिन हीरो ग्रुप ने 2010 में ये कर दिखाया। बीस से ज्यादा कंपनियां चलानेवाले मुंजाल भाइयों ने बिजनेस को चार हिस्सों में बांट लिया और कोई हंगामा नहीं हुआ।  बंटवारे में सबसे बड़े भाई बृजमोहन लाल मुंजाल और उनके बेटों - पवन , सुनील और स्वर्गीय रमनकांत मुंजाल के परिवार के हिस्से में फ्लैगशिप कंपनी हीरो होंडा आई । साथ में हीरो कॉरपोरेट सर्विसेज, हीरो। टीईएस, हीरो माइंडमाइन और ईजीबिल पर भी उनका कंट्रोल में रहा। बीएम मुंजाल के भाई ओपी मुंजाल के हिस्से आई बिजनेस को मजबूत बुनियाद देनेवाली हीरो साइकिल। साथ में हीरो मोटर्स। स्व. दयानंद मुंजाल के बेटों को हीरो एक्सपोर्ट्स और सनबीम कंपनियां मिलीं। सत्यानंद मुंजाल को मुंजाल ऑटो, मुंजाल शोवा और मैजेस्टिक ऑटो मिली ।
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REFRENCE -
BOOK - ‘The Inspiring Journey of a Hero’ by Priya Kumar (Penguin 2014)

( OM PRAKASH MUNJAL, HERO, CYCLE, LUDHIYANA, AMRITSAR, JALANDHAR, AMAR UJALA)


Wednesday, August 12, 2015

दशरथ मांझी ने की थी गया से दिल्ली तक 1400 किलोमीटर की पदयात्रा

पहाड़ का सीना चीर कर सड़क बनाने वाले दशरथ मांझी के जीवन पर अत्यंत खूबसूरत फिल्म बनी है मांझी द माउंटेन मैन। मांझी ऩे अपने जीवन काल में एक बार रेलवे ट्रैक से होते हुए पैदल ही गेहलौर से दिल्ली की 1400 किलोमीटर की दूरी तय की थी। उनकी दिल्ली तक की यात्रा का उद्देश्य था वजीरगंज से अपने गांव तक सड़क का निर्माण करवाना। फिल्म में उनकी इस यात्रा को दिखाया गया है। वे सासाराम जंक्शन पर और सासाराम के प्रसिद्ध शेरशाह के मकबरे के बैकड्राप में यात्रा करते हुए दिखाई देते हैं। इस तरह केतन मेहता की इस फिल्म में सासाराम का ऐतिहासिक शेरशाह का मकबरा दिखाई देता है। दशरथ मांझी को अपनी दिल्ली तक की इस पैदल यात्रा में दो महीने का समय लगा। तकरीबन 60 दिन में 1400 किलोमीटर यात्रा यानी एक दिन में औसतन 25 किलोमीटर की यात्रा। कहा जाता है कि माझी गया से दिल्ली पैदल इसलिए गए क्योंकि उनके पास रेल टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। यात्रा के मार्ग का पता नहीं था इसलिए रेलवे लाइन के साथ साथ चलते हुए दिल्ली पहुंचे।

कबीरपंथी मांझी - इस दौरान उन्होंने रास्ते में पड़ने वाले सभी स्टेशन मास्टरों के हस्ताक्षर भी लिए थे। संत कबीर के अनुयायी मांझी अक्सर ट्रैक्टर के खराब हो चुके टायरों का जूता पहनते थे। उनके जैकेट रिसाइकल्ड जूट बोरों से बनाए हुए होते थे। उनके गले में कबीर पंथी माला देखी जा सकती थी।

अब शानदार फिल्म -  बॉलीवुड के अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी ने दशरथ मांझी की भूमिका अपने शानदार अभिनय से जीवंत कर दिया है। निश्चय ही वे इस साल के बेस्ट एक्टर के दावेदार हैं और ये फिल्म साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए। उनकी पत्नी फगुनिया की भूमिका में पूणे कि अत्यंत सुंदर अभिनेत्री राधिका आप्टे खूब फबी हैं। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग गया के पास दशरथ मांझी के गांव में ही हुई है। कुछ दृश्य सासाराम, वाराणसी, आगरा, दिल्ली और वाई (महाराष्ट्र) में फिल्माए गए हैं। माझी- माउंटेन मैन साल 2015 की सबसे अच्छी फिल्मों में हैं। हर वर्ग के लोग जरूर देखें प्रेरणा मिलेगी।


अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है - दशरथ मांझी
वैसे तो कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। पर अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है, ये दशरथ मांझी ने कर दिखाया था।  दशरथ ने अपने गांव में पहाड़ को चीरकर उसमें रास्ता बनाने के लिए अपनी बकरी को बेचकर छेनी और हथौड़ा खरीदा और 22 साल की कड़ी मेहनत के बाद एक असंभव सा दिखने वाला कारनामा कर दिखाया। गया जिले में गेहलौर उन 2000 से ज्यादा मुसहर समुदाय के लोगों का घर है जो कभी अपनी आजीविका के लिए चूहे खाते थे। पर अब वहां का नजारा बदल चुका है। आज उनकी बदौलत गांव में स्कूल, बिजली और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आदि पहुंच चुके हैं।

पत्नी की मौत से मिली प्रेरणा
वर्ष 1960 में दशरथ मांझी की पत्नी फगुनी देवी गर्भावस्था में पशुओं के लिए पहाड़ से घास काट रही थी कि उसका पैर फिसल गया। दशरथ उसे लेकर शहर के अस्पताल गयापर दूरी के कारण वह समय पर नहीं पहुंच सकेजिससे पत्नी की मृत्यु हो गई। बात दशरथ के मन को लग गई। निश्चय किया कि जिस पहाड़ के कारण मेरी पत्नी की मृत्यु हुई हैमैं उसे काटकर रास्ता बनाऊंगाजिससे भविष्य में किसी अन्य बीमार को अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत्यु का वरण न करना पड़े।

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पहाड़ मुझे उतना ऊंचा कभी नहीं लगा जितना लोग बताते हैं। मनुष्य से ज्यादा ऊंचा कोई नहीं होता। 

हमें कभी ईश्वर के भरोसे नहीं बैठना चाहिए, क्या पता भगवान ही हमारे भरोसे बैठा हो।
-    ----- दशरथ मांझी

दशरथ मांझी - 1934 –  17 अगस्त 2007

माउंटेन कटर ने काटा पहाड़ – 

360 फीट ऊंचा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट गहरा

कितना वक्त लगा – 22 साल

1960 में काम आरंभ हुआ, 1982 में रास्ता बना डाला

2011 में बिहार सरकार ने वहां सड़क बनवा डाली।

55 किलोमीटर की दूरी घटकर हुई 15 किलोमीटर ( अतरी से वजीरगंज की)



(हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संवाददाता विजय कुमार से हुई दशरथ मांझी से बातचीत ) 

पर्वत को काटकर रास्ता बनाने का विचार कैसे आया?
मेरी पत्नी (फगुनी देवी) रोज सुबह गांवसे गहलौर पर्वत पारकर पानी लाने के लिये अमेठी जाती थी। एक दिन वह खाली हाथ उदास मन से घर लौटी। मैंने पूछा तो बताया कि पहाड़ पार करते समय पैर फिसल गया। चोट तो आई ही पानी भरा मटका भी गिर कर टूट गया। बस मैंने उसी समय गहलौर पर्वत को चीर रास्ता बनाने का संकल्प कर लिया।

पहाड़ को काटने की दृढ़ इच्छाशक्ति और ताकत कहाँ से आई?
लोगों ने मुझे सनकी करार दिया। कभी-कभी तो मुझे भी लगता कि मैं यह क्या कर रहा हूँ? क्या इतने बड़े पर्वत को काटकर रास्ता बना पाऊंगा? फिर मेरे मन में विचार आया ,यह पर्वत तो सतयुग,द्वापर और त्रेता युग में भी था।उस समय तो देवता भी यहाँ रहते थे।उन्हें भी इस रास्ते से आने-जाने में कष्ट होता होगा,लेकिन किसी ने तब ध्यान नहीं दिया। तभी तो कलयुग में मेरी पत्नी को कष्ट उठाना पड़ रहा है।मैंने सोचा, जो काम देवताओं को करना था ,क्यों न मैं ही कर दूँ। इसके बाद न जाने कहाँ से शक्ति आ गई मुझमें । न दिन कभी दिन लगा और न रात कभी रात। बस काटता चला गया पहाड़ को।

आपने इतना बडा़ काम किया पर इसका क्या लाभ मिला आपको?
मैंने तो कभी सोचा भी नहीं कि जो काम कर रहा हूं, उसके लिए समाज को मेरा सम्मान करना चाहिये। मेरे जीवन का एकमात्र मकसद है ‘आम आदमी को वे सभी सुविधायें दिलाना ,जिसका वह हकदार है।पहले की सरकार ने मुझ करजनी गांव में पांच एकड़ जमीन दी,लेकिन उस पर मुझे आज तक कब्जा नहीं मिल पाया। बस यही चाहता हूँ कि आसपास के लोगों को इलाज की बेहतर सुविधा मिल जाये। इसलिये मैंने मुख्यमंत्री से करजनी गांव की जमीन पर बड़ा अस्पताल बनवाने का अनुरोध किया है।
मुख्यमंत्री ने आपको अपनी कुर्सी पर बैठा दिया। कैसा लग रहा है? मैं तो जनता दरबार में फरियादी बन कर आया था। सरकार से कुछ मांगने ।मेरा इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा कि बिहार के मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी मुझे सौंप दी। अब आप लोग (मीडियाकर्मी) मुझसे सवाल कर रहे हैं। मेरी तस्वीर ले रहे हैं। मुझे तो बड़ा अच्छा लग रहा है।
( 2006 के जुलाई में दशरथ मांझी पटना में नीतीश कुमार के जनता दरबार में कुछ मांग लेकर पहुंचे थे।)
 शानदार,  जबरदस्तजिंदाबाद....

इस फिल्म की कहानी सुनते ही मैने फिल्म के लिए हां कर दी थी। फिल्म में बिहार के महान सपूत दशरथ मांझी का किरदार निभाकर मैं काफी गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। यह मेरे फिल्मी कैरियर का अब तक का सबसे चैलेजिंग और यादगार किरदार रहा है। फिल्म की शुटिंग के लिए गया जिले के गहलौर गांव में मैने करीब 2 महीने बिताएं और उस पहाड़ को नजदीक से देखा जिसे एक अकेले व्यक्ति ने काटकर रास्ता बना दिया था।

 - नवाजुद्दीन सिद्दकी ( अभिनेता) 

- vidyutp@gmail.com
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Monday, August 10, 2015

एक चार मीनार.... रंग हजार

हैदराबाद शहर की पहचान चारमीनार से है। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण स्मारक है चार मीनार। 400 साल से ज्यादा हो गए, चार मीनार शान से खड़ा है। चार मीनार  को मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। सुल्तान मुहम्मद कुली कुतुब शाह, कुतुब शाही राजवंश का पांचवां शासक था। इसका निर्माण 1591 ई में हुआ। 

अल्लाह को धन्यवाद - कहा जाता है कि एक बार हैदराबाद शहर में प्लेग जैसी जानलेवा बीमारी फैल गई। इसमें काफी लोगों की मौत हुई। तब कुली कुतुब शाह प्रार्थना की थी कि हे अल्लाह, इस शहर की शांति और समृद्धि के प्रदान सभी जातियों के लोगों का कल्याण करो। शाह की अल्लाह ने सुन ली। इसके बाद उन्हें धन्यवाद देने के लिए चारमीनार का निर्माण शहर के बीचोंबीच कराया गया।

इसमें कुल चार अलंकृत मीनारें इसलिए इसका नाम चार मीनार है। यह स्‍मारक ग्रेनाइट के मनमोहक चौकोर खम्‍भों से बना है, जो उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिशाओं में स्थित चार विशाल आर्च पर निर्मित किया गया है। यह आर्च कमरों के दो तलों और आर्चवे की गेलरी को सहारा देते हैं। चौकोर संरचना के प्रत्‍येक कोने पर एक छोटी मीनार है जो 24 मीटर ऊंची है। चारमीनार की कुल ऊंचाई 54 मीटर है। चारमीनार की मूसी नदी के पूर्वी तट पर बना है। हालांकि अब मूसी नदी अपने अस्तित्व को खोती जा रही है।

चार मीनार पर चढ़ने के लिए अंदर से सीढ़ियां बनी हुई हैं। इन घुमावदार सीढ़ियों से आप इसकी मुंडेर पर जा सकते हैं। पुरातत्व विभाग इसके लिए 5 रुपये का टिकट लेता है। चार मीनार की मुंडेर मक्का मसजिद का सुंदर नजारा दिखाई देता है, साथ ही इसके चारों ओर हैदराबाद शहर के बाजारों का नजारा दिखाई देता है। इसके मेहराब में हर शाम रोशनी की जाती है जो एक अविस्‍मरणीय दृश्‍य बन जाता है।

चारमीनार सड़क के बीचोंबीच स्थित है। इसके चारों तरफ चार रास्ते शहर के अलग अलग हिस्सों में जाते हैं। चारमीनार के आसपास के बाजार में आपको हैदराबाद शहर का परंपरागत नजारा दिखाई देता है। बुरके में खरीददारी करती महिलाएं। स्ट्रीट फूड का मजा लेते लोग। आदि आदि...


अपने सुनहरे दिनों में, चारमीनार के आसपास 14 हजार दुकानें थी। आज चारमीनार के आसपास शहर का प्रसिद्ध लाह की चूड़ियों का बाजार और मोतियों का बाजार पथरगट्टी मौजूद है। इन बाजारों पर्यटक आभूषण की खरीददारी करने आते हैं। वहीं स्थानीय लोगों भी खूब खरीददारी करने आते हैं।

सुरंग की कहानी - ऐसा कहा जाता है कि कभी ऐतिहासिक गोलकुंडा किला और चारमीनार के बीच 15 फुट चौड़ी और 30 फुट ऊंची एक भूमिगत सुरंग थी। इस सुरंग को सुल्तान मोहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। माना जाता है कि इस सुरंग में शाही परिवार ने अपना शाही खजाना छुपाया था। हैदराबाद की गलियों में ये किस्सा मशहूर की ये खजाना आज भी सुरंग में मौजूद है। 1936 में निजाम मीर ओसमान अली ने एक सर्वे कराया था और साथ ही नक्शा भी बनवाया था। हालांकि उस दौरान यहां खुदाई नहीं कराई गई थी।

कैसे पहुंचे - नामपल्ली ( हैदराबाद रेलवे स्टेशन ) से चारमीनार की दूरी 7 किलोमीटर है। हैदराबाद के एमजी बस स्टैंड से इसकी दूरी पांच किलोमीटर है। भारतीय नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क 5 रुपये हैं। विदेशी नागरिकों के लिए यह शुल्क 100 रुपये है। यह सुबह 9.30 से शाम 5.30 तक खुला रहता है।

- vidyutp@gmail.com  (CHARMINAR, HYDRABAD )