Tuesday, July 28, 2015

जीएल मतलब गुवाहाटी लखनऊ एक्सप्रेस


साल 1990 से 1995 के बीच सोनपुर से वाराणसी आने के लिए सोनपुर पैसेंजर के अलावा हमारे पास विकल्प थी जीएल यानी गुवाहाटी इलाहाबाद एक्सप्रेस। ये ट्रेन कभी गुवाहाटी से लखनऊ तक जाती थी इसलिए ये जीएल कहलाती थी। पर 1990 के दौरान वाराणसी से लखनऊ के बीच लाइन ब्राडगेज हो चुकी थी। तब जीएल गुवाहाटी से इलाहाबाद सिटी तक मंडुवाडीह, ज्ञानपुर रोड होकर चल रही थी। हाजीपुर के बाद ये सोनपुर, छपरा, बलिया, गाजीपुर, औड़िहार जंक्शन जैसे प्रमुख स्टेशनों पर ही रुकती थी। ये ट्रेन रात को 8 बजे हाजीपुर से ही मिल जाती थी। इसमें आरक्षण करा लेने के बाद सोने की बर्थ मिल जाती थी, जिससे सफर थोड़ा आसान हो जाता था। पर इसमें 50 रुपये के करीब टिकट का लग जाता था। पीछे से आने के कारण जीएल कई बार लेट भी जाती थी।


साल 1993-94 में वाराणसी इलाहाबाद के बीच की मीटर गेज लाइन ब्राडगेज में बदल गई। तब जीएल के सफर को वाराणसी तक ही सीमित कर दिया गया। पैसेंजर की तुलना में जीएल थोड़ा जल्दी पहुंचा देती थी। इसलिए कभी कभी इस ट्रेन में सवार हो जाता था। एक कारण और था पैसेंजर ट्रेन में बलिया जंक्शन के आसपास के स्टेशनों भारी भीड़ होने लगती थी। तब उस मीटर गेज के कोच में बैठना भी मुश्किल होने लगता था।  जब पैसेंजर ट्रेन गाजीपुर के बाद औड़िहार पहुंचती थी तो थोड़ी राहत महसूस होती थी। क्योंकि अब दिल को तसल्ली होती थी कि बनारस अब ज्यादा दूर नहीं है। कई बार ट्रेन के लेट होने पर तो औड़िहार में ही सुबह हो जाती थी। ओड़िहार में भटनी की तरफ से आने वाली लाइन भी मिलती है। इसलिए औड़िहार जंक्शन था। यहां ट्रेन 10 मिनट रूकती थी।


कई रेलवे स्टेशनों पर तो लोग ट्रेन को उसके तय ठहराव से कई मिनट ज्यादा रोक लेते थे। इसके कारण वाराणसी पहुंचने में ट्रेन कई-कई घंटे लेट भी हो जाती थी। मुझे बलिया जंक्शन का एक वाकया याद आता है। अपने बड़े भाई के साथ एक दस साल का गोरा चिट्टा बच्चा चढ़ा। भीड़ भरे डिब्बे में अपने लिए जगह बनाने के बाद वह बीड़ी निकालकर पीने लगा। मैंने उससे बड़े प्रेम से पूछा - इतनी छोटी उम्र में बीड़ी पीते हो। वह बोला - बीड़ी ना पियब तक गुंडई कइसे होई। मतलब साफ था कि उस बच्चे का लक्ष्य गुंडा बनना था। वैेसे सोनपुर से लेकर वाराणसी तक इस ट्रेन में भोजपुरी का माहौल रहता था। क्योंकि पूरी ट्रेन खालिस भोजपुरी के हृदय रेखा से होकर गुजरती थी। 
जीएल का वह सफर - एक बार में जीएल से वाराणसी से अपने घर से वापस लौट रहा था। जनरल डिब्बे में भारी भीड़ होने के कारण मैं स्लिपर डिब्बे में चढ़ गया। रास्ते टिकटचेकर आए उन्होंने मुझे हिदायत दी अगले स्टेशन पर डिब्बा बदल लेना नहीं तो फाइन भरना पड़ेगा। मैंने बलिया जंक्शन में डिब्बा बदल लिया। इस डिब्बे में कटिहार के किसी कालेज की लड़कियों का दल आ धमका। वे किसी खेल प्रतिस्पर्धा में हिस्सा लेकर लौट रही थीं। सभी लड़कियां मेरे अगल बगल में बैठ गईं। वे मुझसे बातें करने लगी। उन्होंने मुझसे अपने कोच की खूब शिकायत की।


ट्रेन अपनी गति से चलती जा रही थी। बैठे बैठे मुझे झपकी आ रही थी। मैं कब बगल वाली लड़की के गोद में सिर रखकर सो गया, मुझे पता नहीं चला। वह कन्या बडे़ मनुहार से मुझे सुलाती रही। जब हाजीपुर आने को हुआ तो उसने मुझे जगाया। मैं चौंक कर जागा। थोड़ा झेंप गया। पहले क्यों नहीं जगाया। आप सो रहे थे ना। वह सफर किसी सुंदर सपने सा याद आता है। 

बीएचयू के हमारे सहपाठी और राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर विद्या कुमार चौधरी कहते हैं कि मैं कई बार दलसिंह सराय से वाराणसी इस ट्रेन से आया करता था। तो हमारे एक और साथी कुमार राजीव रंजन इस ट्रेन से  सहरसा से आया करते थे। तब उनके पिताजी की पोस्टिंग वहां हुआ करती थी। वे दोनों ही इसके रास्ते में कई बार इंजन आगे पीछे किए जाने के प्रसंग को याद करते हैं। 

ओटी मेल यानी अवध तिरहुत मेल की याद
लखनऊ के चारबाग स्थित लखनऊ जंक्शन स्टेशन से उन दिनों सुबह आठ बजे पूर्वोत्तर रेलवे की प्रतिष्ठित ट्रेन लखनऊ-गुवाहाटी (तत्कालीन गौहाटी) अवध तिरहुत मेल ( OUDH TIRHUT MAIL) रवाना हुआ करती थी। यह ट्रेन ओटी मेल के संक्षिप्त नाम से लोकप्रिय थी। इस ट्रेन में शानदार डाइनिंग कार भी हुआ करता था। यह ट्रेन अपने समय देश की सबसे लंबी मीटर गेज ट्रेन थी। यह ट्रेन गुवाहाटी से लखनऊ के बीच 1427 किलोमीटर की दूरी तय करती थी।

बाद में मीटर गेज का संभवतः पहला डीजल इंजन भी इसी ट्रेन को मिला था। तब लखनऊ जंक्शन स्टेशन पर सिर्फ मीटर गेज की ट्रेनें आती-जाती थीं। अस्सी के दशक में लखनऊ-गोरखपुर-बरौनी-गुवाहाटी रूट मीटर गेज से ब्रॉड गेज में बदले जाने के साथ ही इस प्रतिष्ठित ट्रेन का मार्ग बदल दिया गया। यह ट्रेन गेज गुवाहाटी से बरौनी, हाजीपुर, सोनपुर, छपरा, बलिया वाराणसी होकर इलाहाबाद के बीच चलने लगी। इसका नाम तब जीएल हो गया। वाराणसी से इलाहाबाद के बीच आमान परिवर्तन हो जाने के बाद ये सीमित तौर पर वाराणसी से सिलीगुड़ी के बीच चलती रही। एक दिन ऐसा आया जब इस ट्रेन की पटिरयों विदाई हो गई। आज भारतीय रेलवे के यात्री डिब्बों के लिए जो नीला और आसमानी रंग सामान्यतः प्रयुक्त होता है वह बहुत पहले ही ओटी मेल के डिब्बों पर देखा जा सकता था। तब अन्य यात्री ट्रेनों में डिब्बे आमतौर पर लाल रंग के हुआ करते थे। साल 1996 में औरिहार छपरा खंड बड़ी लाइन में बदल गया। इसके साथ ही बलिया जिला में भी छोटी लाइन इतिहास हो गई। हालांकि तब मैं वाराणसी छोड़कर दिल्ली आ गया था। बाद में ओटी मेल मीटरगेज पर लखनऊ से लालकुआं के बीच चल रही थी।

दिसंबर 2011 के आखिरी दिन के साथ ही बरेली से लालकुंआ तक जाने वाली मीटर गेज की रेलगाड़ी भी इतिहास बन गई। तकरीबन 126 साल का इस रेलगाड़ी का यह सफर जनवरी 2012 से इतिहास में दर्ज हो गया। लाल कुंआ से चलने वाली  छोटी लाइन की सभी रेल गाड़ियां भी बंद हो गई। लालकुआं रेलवे स्टेशन से नवाबों के शहर लखनऊ तकछोटी लाईन की यह रेल 23 अप्रैल 1882 को अवध तिरहुत मेल के नाम से शुरू हुई थी। भारत में पहली बार रेल का संचालन 16 अप्रैल 1853 को होने के लगभग 30 साल बाद रेल लाल कुंआ के रास्ते काठगोदाम पहुंची और काठगोदाम रेलवे स्टेशन पहुंचने वाली ये ट्रेन कभी पूर्वोत्तर के शहर गुवाहाटी तक का लंबा सफर तय करती थी।
- vidyutp@gmail.com

(BHU, BIHAR, RAIL, METER GAUGE, UTTAR PRADESH, SONEPUR, VARANASI, COLORS OF BANARAS ) 


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