Saturday, July 18, 2015

और इस तरह विविदिषानंद बन गए स्वामी विवेकानंद

 

शेखावटी  क्षेत्र की  यात्रा  के बाद अब  झुंझनू से अब मैं दिल्ली की राह पर हूं। झुंझनू से चलने के बाद बागड धाम आया और इसके बाद   चिड़ावा   कस्बा आता है। यहां के पेड़े खूब मशहूर हैं। हांलांकि हमने पेड़े खरीदे नहीं। इसके बाद पहुंच गई है   सिंघाना।    सिंघाना झुंझनू जिले का छोटा सा कस्बा है।  इसके बगल  में  है   खेतड़ी।  खेतड़ी कभी छोटी सी रियासत हुआ करती थी।  खेतड़ी का संबंध स्वामी विवेकानंद  से है।  पहली बात की  स्वामी विवेकानंद को उनका नाम यहीं पर मिला था।  

 शिकागो  विश्वधर्म सम्मेलन में जाने से पहले उन्होंने अपना नाम  विविदिषानंद रखा हुआ था।  खेतड़ी के राजा अजीत सिंह   उनके दोस्त और सहयोगी थे।   उन्होंने  स्वामी जो सलाह दी  कि  विविदिषानंद नाम थोड़ा सहज नहीं है।  तब  स्वामी जी ने कहा कि आप ही कोई नया नाम सुझाएं। फिर उनका नाम रखा गया विवेकानंद। फिर वे पूरी दुनिया में इसी नाम से जाने  गए।खेतड़ी राजस्थान के झुंझनू जिले का छोटा सा कस्बा है। चिड़ावा से नारनौल मार्ग पर सिंघाना के पास पड़ता है खेतड़ी।



खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह उम्र  में विवेकानंद जी के आसपास ही थे।  उनकी माउंट आबू में विवेकानंद से पहली मुलाकात हुई थी। ये  मुलाकात प्रगाढ़ मित्रता में बदल गई। उन्होंने स्वामी जी को खेतड़ी आने के लिए आमंत्रित किया। स्वामी जी  7 अगस्त 1891 को पहली बार खेतड़ी आए।   वे 27  अक्तूबर 1891  तक  यहां रहे।  दूसरी बार स्वामी जी 21 अप्रैल 1893 को खेतड़ी आए।  इस बार वे 10 मई तक यहां रहे। यहीं से मद्रास होते हुए शिकागो के लिए प्रस्थान किया।  तब स्वामी जी  की  उम्र 28 वर्ष थी। 
शिकागो जाने का इंतजाम किया - खेतड़ी के  राजा अजीत सिंह ने ही स्वामी के जिले  विश्व धर्म सम्मेलन, शिकागो जाने के लिए   यात्रा व्यय का इंतजाम  किया था।  इसके अलावा भी कई बार  स्वामी जी के परिवार की उन्होंने मदद की थी।  स्वामी जी ने कहा था,  अगर मुझे राजा अजीत सिंह नहीं मिलते तो भारत के लिए मैं जो कुछ कर पाया हूं, शायद वह नहीं कर पाता।   देश  में  उस समय   अमीरी और संपन्नता में राजा तो बहुत सारे थे,   खेतड़ी के अजीत सिंह जैसे दूरदर्शी बहुत कम ही थे।


स्वामी जी 17  दिसंबर 1897 को तीसरी बार खेतड़ी आए।  विश्व धर्म सम्मेलन में भारतीय संस्कृति का  डंका बजाने के बाद लौटे स्वामी जी का इस बार खेतड़ी में भव्य स्वागत हुआ। अजीत   सिंह उनका स्वागत करने  खेतड़ी से 12 मील आगे चलकर आए।   अपनी तीसरी यात्रा में स्वामी जी 21 दिसंबर 1897 तक यहां रहे।

आजकल खेतड़ी की पहचान तांबे के खान के कारण भी है।  इस इलाके में बड़े पैमाने पर तांबा निकलता  है। यहां  पर हिन्दुस्तान कॉपर लिमिटेड की खान है। खेतड़ी में इन दिनों  रियासत के महल भोपालगढ़,  फतेहसिंह महल, जयनिवास महल आदि को देखा जा सकता है। यहां पर रामकृष्ण आश्रम का  एक केंद्र भी है।  सन 1958 में   खेतड़ी रियासत के मुख्य महल फतेह विलास पैलेस को आश्रम के लिए दान में दे दिया गया। 

 स्वामी विवेकानंद और महान राजा अजीत सिंह जी की स्मृतियों को नमन करते हुए मैं आगे बढ़ता हूं। सिंघाना के बाद आता है पचेड़ी। वास्तव  में पचेड़ी  हरियाणा की सीमा है। यहां पर अब खुल  गई है निजी क्षेत्र की सिंघानिया यूनीवर्सिटी।   http://singhaniauniversity.co.in/   इसके बाद बस हरियाणा के शहर नारनौल की ओर दौड़ रही है। हरियाणा के शहर नारनौल में कई जगह जल कुटीर दिखाई दिए लोग यहां निःशुल्क पानी पिलाते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com

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