Thursday, July 2, 2015

सीतामढ़ी टू दरभंगा वाया रेल एंड रोड - मुश्किलों भरा सफऱ

सीतामढ़ी से दरभंगा के बीच कभी मीटर गेज रेलवे लाइन हुआ करती थी। पर अब ब्राडगेज पर रेलगाड़ियां दौड़ने लगी हैं। पर रेल सेवा मे ज्यादा बदलाव नहीं आया। सीतामढ़ी से दरभंगा के  बीच दिन भर में दो पैसेंजर ट्रेनें चलती हैं। इनमें बेतहासा भीड़ होती है। मैं सुबह सात बजे से पहले पहले मैं सीतामढ़ी स्टेशन पर पहुंच गया हूं। एक टिकट खरीद लेता हूं पंडौल तक के लिए। सात बजकर 10 मिनट पर आने वाली 55508 पैसेंजर ट्रेन 20 मिनट देर से प्लेटफार्म पर अनमने भाव से आती है।

सीतामढ़ी रेलवे स्टेशन के बाहर सीता अवतरण की झांकी लगी है। स्टेशन का प्रतीक्षालय बड़े आकार का बना है। इसमें कई मधुबनी पेंटिंग लगाई गई हैं। सेकेंड क्लास के वेटिंग हाल में भी मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट भली प्रकार काम कर रहे हैं।  दरभंगा जाने वाली पैसेंजर ट्रेन के हर डिब्बे में भीड़ दिखाई दे रही है। पर एक डिब्बे में मुझे  मुश्किल से  जगह मिल जाती है। ट्रेन आगे चल पड़ती है। हर स्टेशन पर लोगों की भीड बढ़ती जा रही है। जनकपुर रोड तक सीतामढ़ी जिले में ट्रेन दौड़ती है।


इसके बाद दरभंगा जिले का चंदौना स्टेशन आता है। यहां पर एक डिग्री कॉलेज भी है। ट्रेन के डिब्बे में भीड़ और बढ़ने लगी है। बडी संख्या में महिलाएं चढ़ रही हैं। लोग बता रहे हैं कि दरभंगा जाने के लिए पैंसेजर ही एकमात्र सहारा है। इस तरफ का सड़क मार्ग बहुत खराब है और बसों में किराया भी ज्यादा है। सुबह की ट्रेन अगर छुट गई तो फिर दोपहर ढाई तीन बजे दूसरी ट्रेन आएगी। हर डिब्बे के हर दरवाजे पर बड़ी संख्या में लोग लटक कर सफर करने लगे थे। यहां तक कि कई महिलाएं भी लटक कर सफर करने लग गई थीं।
जनकपुर रोड  रेलवे स्टेशन भी रास्ते  में आता है...
और रेल में बढ़ने लगी भीड़ - चंदौना के बाद जोगियारा और देवरा बंधौली में भीड और बढ़ गई। ट्रेन चलने के लिए सिटी दे रही थी। पर तभी कुछ लोगों ने ड्राइवर और गार्ड को जाकर धमकाया कि जब तक सारे लोग चढ़ नहीं जाएं गाड़ी आगे नहीं बढ़ाना। मतलब यहां रेलवे के सारे नियम बेकार हैं। लोगों के बनाए नियम ही चलते हैं। स्थानीय लोग बता रहे हैं कि कई बार रेलवे से सीतामढ़ी दरभंगा मार्ग पर कुछ और पैसेंजर ट्रेनें चलाने की मांग की जा चुकी है पर अभी तक सुनवाई नहीं हो रही है।

और मैं मुरैठा में रेलगाड़ी से उतर गया - 

रेल के डिब्बे में लगातार बढ़ रही भीड़ के कारण मेरा दम घुटने लगा था। मुरैठा रेलवे स्टेशन पर मैंने अचानक ट्रेन से उतरकर बस से जाने के फैसला लिया। बड़ी मुश्किल से भीड़ में जगह बनाते हुए मैं ट्रेन के दरवाजे तक पहुंचा। इसके बाद बाहर उतर गया। पर यह क्या आसमान से गिरे तो खजूर पर अटके। मुरैठा में मैंने एक दर्जी की दुकान से पूछा तो उसने बताया कि यहां से दरभंगा के लिए कोई बस नहीं जाती। 

उसने बताया हां, आप किसी तरह कमतौल पहुंचे तो वहां से बस मिल सकती है। पहले रेलवे रोड से एक किलोमीटर आगे कमतौल रोड पर जाएं शायद वहां कोई निजी वाहन वाला आपको लिफ्ट दे दे। कमतौल यहां से 7 किलोमीटर है पर सड़क खराब होने के कारण कोई आटो, जीप बस जैसा सार्वजनिक वाहन इस रोड पर नहीं चलता।

बाइक वाले से लिफ्ट -  अब मैंने एक बाइक वाले से लिफ्ट मांगी, उन्होंने कहा कमतौल नहीं जा रहा हूं मैंने कहा जहां तक जा रहे हैं वहीं तक छोड़ दें। मुझे लगा कि अब शायद कमतौल तक पैदल जाना पड़े। उन सज्जन ने एक किलोमीटर आगे छोड़ा। वहां से उन्होंने कमतौल जा रहे एक और सज्जन के बाइक पर लिफ्ट दिला दी। उन दोनों को धन्यवाद मैं कमतौल पहुंच गया। 


लोग बिहार से बाहर बिहार के बारे में चाहे जो भी छवि रखते हों पर लगभग पूरा हिन्दुस्तान घूम चुका हूं और  मुझे लगता है कि बिहार के ग्रामीण इलाके के लोग अजनबियों के लिए काफी सहयोगात्मक रवैया रखते हैं।   यह सुखद संयोग रहा कि कमतौल से मुझे दरभंगा के लिए बस मिल गई। कमतौल के पास अहिल्याबाई का स्थान और महाकवि विद्यापति का गांव बिस्फी है।


सीतामढ़ी से दरभंगा के बीच के स्टेशन – सीतामढ़ी, भीसा हाल्ट, परसौनी, बाजपट्टी, आवापुर, बछारपुर हाल्ट, जनकपुर रोड, चंदौना हाल्ट, जोगियारा, देवरा बंधौली हाल्ट, मुरैठा, कमतौल टेकटार, मुहम्मदपुर, शीशो, दरभंगा जंक्शन।

मेरी बस दरभंगा शहर के बाहरी इलाके में पहुंच गई थी। पर शहर के अंदर दोपहर में भी इतना जाम था कि बस को रेलवे स्टेशन जाने के लिए 10 किलोमीटर अतिरिक्त फेरा लेना पड़ा। इसमें काफी समय बरबाद हुआ। पर बस के  चालक का  सवारियों  से करार था कि वह रेलवे स्टेशन तक पहुंचाएगा।  तो उसने ऐसा किया भी। भीड़  और जाम की बात करें तो दरभंगा ही नहीं बिहार के लगभग सभी जिला स्तर के शहरों का यही आलम है। सड़के चौड़ी नहीं हैं पर वाहनों की भीड़ बढ़ी है। इसलिए भारी जाम लगने लगा है।

बस पहले दरभंगा के कादिराबाद स्थित निजी बस स्टैंड पहुंची। यहां  आसपास काफी गंदगी का आलम नजर आया। हां यहां फुटपाथ पर मखाा काफी सस्ता बिक रहा है। थोड़ी देर बाद मैं दरभंगा जंक्शन स्टेशन पर पहुंच जाता हूं। रेलवे स्टेशन के आसपास दिल्ली की तरफ जाने वाले मजदूरों की विशाल भीड़ दिखाई देती है। रेलवे स्टेशन  के बाहर बने  निजी टिकट घर के आगे भी भारी भीड़ लगी हुई है। 


ये यहां रोज का आलम है। दरअसल मिथिलांचल में भारी गरीबी होने के कारण बड़ी संख्या में लोग जनसाधारण और बिहार संपर्क क्रांति, पवन एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों से दिल्ली मुंबई और देश के दूसरे औद्योगिक शहरों की ओर जाते हैं। स्टेशन के बाहर टिकट एजेंट के काउंटर पर भी लंबी लाइन लगे हुए जनता जनार्दन को नमस्कार कर मैं आगे बढ़ता हूं।

दरभंगा रेलवे स्टेशन पर  पहुंचने के बाद 10.40 पर मुझे उगना हाल्ट के लिए हावड़ा जयनगर पैसेंजर लेने की योजना बना रखी  थी। मेरे पास पंडौल तक का टिकट जेब में था। पर अब बस के सफर और जाम के कारण समय इससे ज्यादा हो चुका है। पर  देखा कि मेरी वह ट्रेन डेढ़ घंटे लेट है और दरभंगा जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर एक से खुलने को तैयार है।


इस ट्रेन में ज्यादा भीड़ भी नहीं है। मैं फटाफट ट्रेन के डिब्बे  में जाकर जगह ले लेता हूं। ऐसा  लगा कि मानो उगना महादेव दर्शन के लिए बुला रहे हैं। ट्रेन में एक रेलवे कर्मचारी और एक इंजीनियर मिलते हैं। उनसे बातें करते हुए कब सकरी जंक्शन गुजरता है और उगना हाल्ट आ जाता है पता ही नहीं चलता।

- विद्युत प्रकाश मौर्य   -   vidyutp@gmail.com 
( RAIL, SITAMARHI, DARBHANGA, KAMTAUL, MURAITHA  )  


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