Thursday, July 30, 2015

सोनपुर-वाराणसी पैसेंजर के संग पांच साल सफर

पांच साल काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान 1990 से 1995 के बीच पिताश्री की पोस्टिंग बिहार के हाजीपुर में हुआ करती थी। तब हाजीपुर से वाराणसी आने का सबसे सस्ता तरीका हुआ करता था सोनपुर वाराणसी इलाहाबाद पैसेंजर (SONEPUR BSB ALLAHABAD CITY PASSENGER) । तब ये ट्रेन मीटर गेज पर चलती थी। किराया था 16 रुपये। शाम 4.45 बजे सोनपुर से खुलने वाली 71 फास्ट पैसेंजर सुबह 4 बजे आसपास पौने तीन सौ किलोमीटर का सफर करके वाराणसी पहुंचा देती थी। तब ये ट्रेन स्टीम इंजन से चलती थी। पहली बार इस ट्रेन से बनारस आया था अपने एलएस कालेज के दोस्त विष्णु वैभव के साथ। सोनपुर से परमानंदपुर, शीतलपुर, दीघवारा होते हुए छपरा कचहरी।

 फिर छपरा जंक्शन, गौतम स्थान, घाघरा नदी पर मांझी का पुल बकुलहां और ट्रेन घुस गई यूपी में। मैं अपना बैग खोलता हूं, मां ने जो राह के लिए बनाकर दिया है, पूड़ियां और भुजिया उसे उदरस्थ करता हूं। इसके बाद भी सोने का तो कोई सवाल ही नहीं होता था। वाराणसी की ओर आगे बढ़ने के साथ ही पैसेंजर ट्रेन में भीड़ बढ़ती जाती थी। बलिया में ट्रेन 10 मिनट रुकती थी। वहां स्टेशन पर भी कुछ खाने पीने को मिलता था। सुरेमनपुर, बलिया, चितबड़ागांव, फेफना जंक्शन, सागरपाली जैसे स्टेशनों के बाद आता था औरिहार जंक्शन। यहां से गोरखपुर के लिए लाइन अलग होती है। यहां भी ट्रेन का ठहराव लंबा रहता था। वाराणसी से पहले आता था ऐतिहासिक पर्यटन स्थली सारनाथ। ये सब स्टेशन रात में आते थे, लेकिन भीड़ के कारण जागते रहना पड़ता था।

इस पैसेंजर ट्रेन में एक स्लीपर का भी कोच होता था। कई बार मैं 20 रुपये अतिरिक्त देकर पैंसेजर में स्लीपर कोच में जाकर आरक्षण करा लेता था। तब सफर आरामदेह हो जाता था। पर उस समय 20 रुपये की भी बहुत कीमत थी। ये बच जाए तो बनारस पहुंच कर इतने में कई बार लौंगलता खाया जा सकता था। लौंगलता बनारस की लोकप्रिय मिठाई है।
सन 1995 में प्रकाशित इंडियन ब्राडशॉ में छपरा से वाराणसी के बीच की समय सारणी। 

सोनपुर से इलाहाबाद का सफर - मैं वाराणसी सोनपुर पैसेंजर से 1990 में पहली वाराणसी गया था अपने दोस्त विष्णु वैभव के साथ। वह मेरी पहली लंबी रेल यात्रा थी, जिसमें एक राज्य से दूसरे राज्य में गया था। पर जल्दी ही मुझे इसी पैसेंजर ट्रेन से एक और लंबी यात्रा करने का मौका मिला। बीएचयू के बाद मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक कक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा देनी थी। फार्म डाक से मंगा कर भरा चुका था। इस भी बार मेरा सफर अकेले शुरू हुआ। सोनपुर से वाराणसी तक तो मैं इस ट्रेन में आ चुका था पर आगे का सफर मेरे लिए नया था। 


वाराणसी सोनपुर पैंसेजर पहले सोनपुर से इलाहाबाद सिटी तक जाती थी। तब वाराणसी से भुलनपुर (डीएलडब्लू) माधो सिंह होते हुए इलाहाबाद सिटी (रामबाग) के लिए मीटर गेज लाइन थी। तब मेरे लिए वह एक लंबा और उबाऊ सफर था। वाराणसी कैंट के बाद ट्रेन मंडुआडीह स्टेशन पहुंची। यहां से आगे भूलनपुर। भूलनपर डीजल रेल कारखाना वाराणसी के कैंपस के अंदर का रेलवे स्टेशन है। इसके बाद इलाहाबाद से पहले माधो सिंह, हांडिया खास, ज्ञानपुर रोड जैसे प्रमुख स्टेशन आए। ट्रेन लेट होती जा रही है। दोपहर के बाद मैं इलाहाबाद सिटी स्टेशन पहुंचा। इसे लोग रामबाग भी कहते हैं। हमारे पास रामबाग के पास नागबासुकि मुहल्ले में रहने वाले शुक्ला जी का पता था। पर मैं उनके यहां नहीं गया। 

हमारे पास दूसरा पता था मालति प्रजापति का जो इलाहाबाद के लाला की सराय में रहती थी। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए किया था। वे कविताएं भी लिखती थीं। साहित्यिक पत्रिका आजकल में उनकी एक कविता पढ़कर मेरी बहन ऋतंभरा ने उनसे पत्रमित्रता की थी। तो मैं आटो रिक्शा से तेलियरगंज पहुंचा। वहां से लाला की सराय। मालती जी के घर के सदस्य मेरा इंतजार कर रहे थे। क्योंकि हम उन्हें पहले ही खत लिखकर आने की सूचना दे चुके थे। 

मैंने उनके घर रहकर ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी थी। मेरा परीक्षा केंद्र मम्सफोर्डगंज के एक स्कूल में था। मालती जी के सहपाठी राम प्रसाद वर्मा मुझे साइकिल पर बिठाकर परीक्षा केंद्र ले गए। परीक्षा पहली पाली में थी। परीक्षा खत्म होने के बाद वे मुझे अल्फ्रेड पार्क और आनंद भवन घुमाने ले गए। उनके साथ मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय के ताराचंद छात्रावास में भी थोड़ी देर के लिए गया। 

हालांकि मेरा चयन इलाहाबाद और बीएचयू दोनों जगह हो गया। पर बीएचयू का कैंपस और होस्टल मुझे भा गए थे इसलिए एडमिशन बीएचयू में लेना तय किया। यहां होस्टल मिलने की गारंटी थी क्योंकि प्रवेश परीक्षा में मैं सेकैंड टॉप था। मेरा इंडेक्स (अंक ) 250 में 222 आया था। इस तरह 1990 के जुलाई में मैं वाराणसी आ गया।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( SONEPUR, ALLAHABAD CITY, RAMBAG, MADHO SINGH ) 

Tuesday, July 28, 2015

और हम विद्या अध्ययन के लिए निकल पड़े काशी

बचपन में जब यज्ञोपवीत संस्कार होता है तो पुरोहित बालक पूछता है- कहां जा रहे हो तो वह बोलता है काशी...काशी क्यों तो पढ़ाई करने....काशी यानी विद्या अध्ययन का पर्याय....विद्वानों की नगरी...

संयोग कुछ ऐसा बना की इंटर की परीक्षा पास करने के बाद मेरी भी इच्छा बनारस में पढ़ाई करने की हुई...मैंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए मन बनाया...

मार्च का महीना था...प्रवेश की तारीखों के बारे में कुछ नहीं पता था। यह 1990 का साल था। मैं और मेरे मित्र विष्णु वैभव दोनों एक शाम सोनपुर से वाराणसी पैसेंजर में सवार हुए... यह मीटर गेज रेलवे लाइन थी। सुबह चार बजे ट्रेन छोटे छोटे दर्जनों स्टेशनों को पार करती हुई बनारस पहुंच गई...तब वाराणसी सोनपुर के बीच छोटी लाइन थी जो अब ब्राड गेज में बदल चुकी है। बनारस रेलवे स्टेशन का आकार भी बाहर से मंदिर जैसा ही है....

हमारे पास संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का पता था। वे वहां बीएड विभाग के हेड थे...कुछ नाम था शायद वाचस्पति द्विदेदी....संपूर्णानंद यूनीवर्सिटी वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन के पास ही है। सुबह सुबह हमने उनका दरवाजा खटखटाया...

उन्होंने समान्य शिष्टाचार के बाद सलाह दी... पहली बार बनारस आए हो तो दोनों यहां से सीधे दश्वाश्वमेध घाट चले जाओ वहां गंगा जी में स्नान कर लेना उसके बाद वहीं से बीएचयू चले जाना...तब तक नौ बज जाएंगे और यूनीवर्सिटी खुल भी जाएगी....हमने विद्वान पुरूष की राय पर अमल किया...
हमलोग सुबह सुबह दशाश्वमेध घाट पहुंच गए... वहां देखा हजारों लोग गंगा स्नान कर रहे हैं। गंगा जी बनारस में उत्तर-दक्षिण बहती हैं। इसलिए सुबह के सूरज की पहली किरण दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर आकर पड़ती है। उसके बाद वाराणसी के घाटों का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाता है। तभी बनारस की सुबह का कई कवियों ने अपने अपने तरीके से गुणगान किया है।



बनारस में गंगा स्नान करने के बाद हमने बाबा विश्वनाथ के दर्शन की सोची... बाहर निकल कर एक गली में घुस गए...कई घंटे चक्कर लगाने के बाद भी भोले बाबा का दरबार नहीं मिला...तब जाकर याद आया कि बनारस की गलियों के बारे में भी कितने तरह के किस्से मशहूर हैं। खैर हमने किसी से बाहर सड़क पर निकलने का रास्ता पूछा और आटो रिक्शा पर बैठकर पहुंच गए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के गेट पर....


विशाल सिंह द्वार और उसके बाहर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की विशाल मूर्ति....खैर हम गेट के अंदर घुसे... हमारे पास बीएचयू के मेडिकल कालेज की कैंटीन में काम करने वाले बीएन तिवारी जी का पता था...

मेडिकल कालेज की तीसरी मंजिल पर स्थित कैंटीन में तिवारी जी मिले...उन्होंने बातें करने से पहले चाय नास्ता कराया....फिर हमने उन्हें अपने आने का उद्देश्य बताया....उन्होंने प्रवेश परीक्षा फार्म खरीदने के लिए सेंट्रल आफिस जाने को कहा... 

इस दौरान हमें बीएचयू के भव्य परिसर का साक्षात्कार हुआ। फार्म खरीदने के साथ बीएचयू का भव्य परिसर देखकर मोहित हो गया। मन ही मन तय किया किसी भी तरह यहीं पढ़ाई करने आना है। इसके बाद अगले दो दिन हमलोग महामनापुरी कालोनी में अपने पिताजी के एक मित्र गजेंद्रनाथ शुक्ला के घर रुके। शुक्ला जी वैशाली जिले के कन्हौली एस्टेट परिवार से आते हैं। वे बीएचयू में कर्मचारी के तौर पर कार्यरत थे।

प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन करने के बाद हमने लंका पर आकर बीएचयू प्रवेश परीक्षा की गाइड खरीदी...

कुछ महीने बाद दुबारा प्रवेश परीक्षा देने बनारस आना हुआ...। इस बार हमलोग पटना जंक्शन से पंजाब मेल ट्रेन से वाराणसी आए। दूसरी यात्रा में हमारा ठहरना  डीजल रेल कारखाना की कालोनी में मामाजी के घर हुआ। मेरा परीक्षा केंद्र बीएचयू के सांख्यिकी विभाग में था। 
प्रवेश परीक्षा यानी इंट्रेस के रिजल्ट में 1990 में मैं सेकेंड टाप पोजीशन पर आया था....इसके बाद में सामाजिक विज्ञान संकाय में इतिहास (प्रतिष्ठा) में नामांकन लिया। उसके बाद पांच साल बीएचयू कैंपस में गुजारे। जिसके सैकड़ो खट्टे-मीठे अनुभव हैं।

-विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com 

( BHU, VARANASI, UTTAR PRADESH, RAIL, DASHASHWAMEDH GHAT  ) 

Sunday, July 26, 2015

12 मार्च 1993 - जब मुंबई दहल उठी...

12 मार्च 1993 को मुंबई में 13 सिलसिलेवार धमाके हुए जिसमें 257 लोग मारे गए और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए। इसी दिन से मुंबई में राष्ट्रीय युवा योजना का राष्ट्रीय शिविर शुरू होना था।
इस शिविर में मुझे भी जाना था पर मैं पारिवारिक कारणों से नहीं जा सका। पर मेरे बीएचयू के पांच दोस्त, हाजीपुर से राष्ट्रीय युवा योजना ईकाई से शिवपूजन कुमार की अगुवाई में सात लोगों की टीम गई थी। इस टीम में दो बहनें भी थीं। सोनपुर की रजनी और प्रियंका।

जैसे सुबह 10 बजे हाजीपुर के साथियों की ट्रेन मुंबई पहुंची वहां धमाके होने लगे। यहां खास तौर पर लड़कियों के माता पिताओं की चिंता बढ़ गई। वे मेरे पास आए। तब फोन संपर्क का कोई साधन नहीं था। मैं सिर्फ आत्मविश्वास के आधार पर कह पा रहा था कि सभी भाई बहन सुरक्षित हैं। पर मुझे भी नहीं पता था कि वे मुंबई में किस हाल में हैं। उस समय पिताओं को दो दिन बाद एक साथी का फोन आने पर कुशल क्षेम पता चला। इसी समूह में वाराणसी से गए हमारे एएनडी होस्टल में रहने वाले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के साथी विद्या कुमार चौधरी ने मुंबई धमाके के दिन को याद किया है। पढ़िए... उन्ही की जुबानी....

बॉम्बे धमाका और मैं !

विद्या कुमार चौधरी  ( लेखक इन दिनों बिहार के एक सम्मानित कॉलेज में राजनीति विज्ञान के व्याख्ता हैं)

लगभग 24 घंटे की उबाऊ रेल यात्रा के बाद 12 मार्च 1993 को अपने दो बनारसी मित्रों के साथ मैं विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन पर सुबह 6 बजे पंहुचा। आल इंडिया कम्युनल हारमोनी कैंप में भाग लेना तो एक बहाना था असली मकसद था बॉम्बे घुमना। स्टेशन से कुछ ही दूर एक ख़ाली रेलवे गोदाम में राष्ट्रीय युवा योजना का कैंप लगा था। मैं अपने मित्रों के साथ BHU और बनारस का प्रतिनिधि बनकर गया था। भाई जी यानी सुब्बाराव जी से मिलकर यात्रा की सारी थकान छू मंतर हो गई और हम कैंप की विभिन्न गतिविधियों में शामिल हो गए । कैंप की शुरुआत में सर्व धर्म प्रार्थना हो रही थी शायद ...जब पहला धमाका हुआ........! 


कुछ ही अंतराल में कई धमाके हुए । भाई सुब्बाराव जी ने देश भर से आये लगभग 300 से ज्यादा युवाओं को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया और 10-10 लोगों का 20 ग्रुप बनाने का आदेश दिया। आधे घंटे के अंदर एक ग्रुप का हिस्सा बनकर मैं BSE (शेयर मार्किट) के उजड़े इमारत के सामने खड़ा था। क्या करना चाहिए ये सोच ही रहा था कि NYP का परिचय पत्र देखकर एक एम्बुलेंस वाले ने मुझे बुलाया। एम्बुलेंस के बगल में फायर ब्रिगेड वाले घायलों और लाशों को लाकर रख रहे थे। उसने मुझसे मराठी में कुछ करने को कहा....मेरी दिक्कत समझकर उसने बम्बइया हिंदी में कहा..."मुँह क्या देख रहे हो जो मर गए हैं उन्हें छोड़ दो जो ज़िंदा हैं उन्हें एम्बुलेंस में डालों।"


राजनीति विज्ञानं में स्नातक कर रहे 20 साल के एक लड़के के लिए यह जीवन का सबसे कठिन काम था।लगभग 20 जिन्दगियों का फैसला उस दिन मैंने किया। उनमे से कितने आज जिन्दा हैं मुझे पता नहीं ।लेकिन एक अपराधबोध की आशंका से मैं आज भी ग्रस्त हूँ... उस दिन घायलों को चुनकर एम्बुलेंस में डालने और लाशों को सड़क पर छोड़ने में मुझसे कोई गलती तो नहीं हुई थी ?
शायद कल सुबह से यह अपराध बोध मेरा पीछा छोड़ दे... बॉम्बे धमाके में एक और 'लाश' बढ़ने वाला जो हैं ।


कैंप कैसे पहुंचा -  होली की छुट्टी थी शायद....ज्यादातर लोग घर गए थे। जहाँ तक मुझे याद हैं कैंप में Vidyut Prakash Maurya को जाना था ...लेकिन उसे भी घर जाना था ....इसलिए उसने मुझे भेज दिया था ।  
( विद्या के फेसबुक वाल से साभार)  

(BHU, VARANASI, UTTAR PRADESH, NYP CAMP, MUMBAI ) 

Friday, July 24, 2015

एक महान आत्मा से मुलाकात…

छह माह के अनादि सुब्बराव जी के साथ ( जनवरी 2006)
ये 1991 के फरवरी महीने की बात है। मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रथम वर्ष का छात्र था। राष्ट्रीय सेवा योजना का मैं सक्रिय स्वयंसेवक था। एक बार हमने अपने प्रोग्राम आफिसर आद्या प्रसाद पांडे जी से इच्छा जताई कि मैं किसी राष्ट्रीय शिविर में जाना चाहता हूं। उन्होंने कहा, एनएसएस के राष्ट्रीय शिविर तो कम ही होते हैं। आप महान गांधीवादी सुब्बराव जी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय युवा योजना के किसी शिविर में जाना चाहो तो मैं बात करूं। मैंने हामी भर दी। उन्होंने मुझे अजय पांडे से मिलने को कहा। मैं साइकिल चलाता हुआ बनारस के लहरतारा रेलवे कालोनी अजय पांडे जी के घर पहुंचा। अजय जी ने बताया कि अप्रैल 1991 में जम्मू के पास राष्ट्रीय एकता शिविर होगा, आप बीएचयू के अपने पांच दोस्तों का समूह बनाएं और जाएं। मैं तैयार हो गया। पर वार्षिक परीक्षा निकट होने के कारण और कोई मित्र तैयार नहीं हुआ जाने को। इस बीच काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उद्यमिता विकास कार्यक्रम का उदघाटन होना था। स्वतंत्रता भवन में होने वाले कार्यक्रम में सुब्बराव जी मुख्य अतिथि बन कर आने वाले थे। मैं इस कार्यक्रम में वालंटियर भी था। यहां सुब्बराव जी से मेरी पहली मुलाकात हुई।


पंजाब के डीएवी स्कूल बिलगा में। ( 2003)
 काशी हिंदू विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर डाक्टर रघुनाथ प्रसाद रस्तोगी ने एक खादी की बुशर्ट और खादी की निक्कर पहने हुए सज्जन का स्वागत किया। उनके चेहरे पर अप्रतिम आभा थी। वे सुब्बराव जी थे। जब उन्हें मंच पर बोलने के बुलाया गया तो उन्होंने संबोधन में कुछ भी कहने से पहले स्वतंत्रता भवन मे मौजूद दो हजार लोगों से कहा, आज के नौजवानों के होठों पर कैसा गीत होना चाहिए...सब लोग मेरे साथ गाएं...  उन्होंने ओजस्वी आवाज में गाना शुरू किया.... युग की जड़ता के खिलाफ एक इन्क्लाब है...हिंद के जवानों का सुनहरा ख्वाब है....भारतीय सांस्कृतिक क्रांति.... कार्यक्रम के दौरान सुब्बराव जी  से मेरा परिचय हुआ। उन्हें ये जानकर खुशी हुई कि मैं जम्मू शिविर में आ रहा हूं। पर मैं जम्मू नहीं जा सका। मई 1991 में वाराणसी में दुर्गा कुंड स्थित अंध विद्यालय में राष्ट्रीय शिविर का आयोजन हुआ। पर मेरी वार्षिक परीक्षाएं थी इसलिए मैं इसमें हिस्सा नहीं ले सका। एक दिन शिविर में गया जरूर। फिर सुब्बराव जी का सानिध्य मिला थोड़ी देर के लिए।

अक्तूबर 1991 में अलीगढ़ में राष्ट्रीय एकता एवं सांप्रदायिक सौहार्द शिविर हुआ जिसमें पहली बार पहुंचा। इस तरह अलीगढ़ मेरा पहला राष्ट्रीय शिविर था। यहां वाराणसी से मेरे साथ बिपिन चंद्र चतुर्वेदी, अजय कुमार सिंह, ओम हरि त्रिपाठी आदि गए थे। 
बूढ़ा केदार (टेहरी) में सुब्बराव जी के साथ। ( 1991)
इसके बाद 1991 के दिसंबर में उत्तराखंड के टेहरी में भूकंप राहत शिविर में जाने का अवसर मिला। इस शिविर में हमारे साथ मनोज कुमार बोस,  बिपिन चंद्र चतुर्वेदी, मुगलसराय के चंद्रभूषण मिश्रा कौशिक, संजय पाठक और मेरे रुम पार्टनर राजीव कुमार सिंह थे। इसके बाद बेंगलुरु में 1992 में आध्यात्मिक युवा शिविर में हमलोग पहुंचे। इस शिविर में मेरे साथ दिग्विजय नाथ सिंह थे। बीएचयू के दोस्तों में राजीव कुमार सिंह, अमिताभ सिंह, संदीप कुमार, आदित्य आदि थे। बेंगलुरु शिविर से पहले मैं बिहार के हाजीपुर शहर में राष्ट्रीय युवा योजना की इकाई शुरू करवा चुका था। हाजीपुर से बेंगलुरु शिविर में पंकज कुमार सिंह, राकेश पाठक, नवीन झा और मनीष चंद्र गांधी पहुंचे थे।

 1992 के जून महीने में मैं मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम में योगदान करने दिग्विजय नाथ सिंह के साथ गया। हमलोग एक महीने से ज्यादा चंबल नदी के किनारे बगदिया गांव के पास कीर का झोपड़ा में रहे। वह अदभुत अनुभव था। इसके बाद अक्तूबर 1992 में यूथ वर्कर्स मीट में पंकज के साथ दिल्ली जाना हुआ। यह सम्मेलन एनवाईपी के सक्रिय कार्यकर्ताओं का था। 1993 में जब सदभावना रेल यात्रा चली तो आठ महीने की इस यात्रा में मैंने शुरुआत के तीन महीने योगदान किया। इस दौरान मेरे पास ऑफिस मैनेजमेंट की जिम्मेवारी थी। इसके बाद में किसी भी शिविर में नहीं जा सका।
दिसंबर 1995 में रेल यात्रा के दौरान जम्मू मे

 एमए और पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद नौकरी में आ गया। लिहाजा कभी शिविर में जाने के लिए समय नहीं निकाल पाया। हां 1994 और 1995 में सदभावना रेल यात्रा के दूसरे और तीसरे चरण में थोड़े थोड़े दिनों के लिए जरूर पहुंचा पर पंजीकृत रेल यात्री के तौर पर नहीं। 1998 के जून महीने में महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा में हुए सक्रिय कार्यकर्ता सम्मेलन में एक बार फिर मैं व भाई तड़ित प्रकाश गए। नौकरी में आने के बाद भले किसी शिविर में नहीं जा सका। पर तय किया कि अपने पेशे में रहकर एक सुंदर विश्व और एक सुंदर भारत के निर्माण के लिए जो कर सकता हूं करने की कोशिश करूंगा। ये कोशिश जारी है। नौकरी के सिलसेले में पटना, मेरठ, पानीपत, लुधियाना जालंधर और हैदराबाद में रहा। इस दौरान सुब्बराव जी से लगातार संपर्क में रहा। 2011 में सोनीपत में हुए बाल शिविर में एक दिन के लिए अपने बेटे अनादि के साथ गया। तब अनादि छह साल के थे। 
जनकपुर (नेपाल) जून 2015 

बेटे  अनादि को भाई जी का आशीर्वाद पालने में ही मिल गया था। जनवरी 2006 में अनादि छह माह के थे। पटना में नेहरु युवा केंद्र के राष्ट्रीय शिविर में सुब्बराव जी मुख्य मेहमान के तौर पर गए थे। पत्नी माधवी ने मेरी सलाह पर भाई जी से संपर्क किया कि आपसे मिलना चाहती हूं। इससे पूर्व वे मेरे विवाह के बाद जालंधर में 1993 में भाई जी से बिलगा गांव के डीएवी स्कूल में मिल चुकी थीं। भाई जी को जब पता चला कि माधवी विद्युत का छह माह का एक बेटा भी है तो उन्होंने कहा, तुम कहां इस भीड़ में आओगी मैं ही  तुम्हारे घर पहुंचता हूं। पटना के सुनील सेवक के साथ सुब्बराव जी मुसल्लहपुर हाट स्थित मेरे ससुराल हरि निवास पहुंचे और नन्हे अनादि को आशीर्वाद दिया। दो साल के अनादि को हैदराबाद में एक बार फिर भाई जी का आशीर्वाद प्राप्त करने का मौका मिला। सुब्बराव जी बच्चों से मुलाकात में उन्हें गुब्बारा देना नहीं भूलते। उनकी जेब में हमेशा कुछ गुब्बारे रहते हैं। आशीर्वाद में अनादि न जाने उनसे कितने गुब्बारे ले चुके हैं।
दिल्ली गांधी शांति प्रतिष्ठान - कमरा नंबर 11 ( साल 2013)

 दाना-पानी की तलाश में मैं शहर दर शहर बदलता रहा। भाई जी मुझसे हर मुलाकात में पूछते अब कौन से शहर में हो। हर बार मुझे अपनी डायरी में आपका पता बदलना पड़ता है। पर अब मैं 2007 से लगातार दिल्ली में हूं।  और ये बड़े सौभाग्य की बात है कि सुब्बराव जी जैसे महामानव की डायरी में मेरा पता है। वे जब मिलते हैं मेरे सारे भाई बहनों का हाल चाल पूछ लेते हैं। मैं ही क्या जिन लोगों ने भी सुब्बराव का जितना भी सानिध्य पाया है आने वाले दिनों में रश्क करेगे मैं कभी ऐसे महामानव के सानिध्य में था, जो एक सुंदर विश्व के निर्माण का सपना लगातार देखता था और लोगों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता रहता था।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

(BHU, VARANASI, BILGA, PUNJAB, BIHAR, HAJIPUR, PATNA, DELHI, HYDRABAD ) 


Wednesday, July 22, 2015

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन - रोज गार्डन चंडीगढ़

स्वतंत्र भारत की खूबसूरत रचना है चंडीगढ़। इस शहरों को फ्रेंच वास्तुविद ला कारबुजिए ने डिजाइन किया। तमाम बाते हैं जो शहर को खास बनाती हैं। साल 2016 में इसके खास डिजाइन के कारण इसे विश्व विरासत स्थलों की सूची में यूनेस्को ने शामिल कर लिया है। खास तौर पर दो राज्यों पंजाब और हरियाणा राजधानी के भवनों की संरचना इसे नायब शहर बनाती है। पर चंडीगढ़ शहर रॉक गार्डेन के अलावा रोज गार्डेन यानी गुलाबों के उद्यान के लिए भी जाना जाता है। गुलाबों का ये उद्यान चंडीगढ़ बस स्टैंड से थोड़ी दूरी पर ही सेक्टर 16 में स्थित है। खासकर वसंत के मौसम में यहां गुलाबों की क्यारियां जन्नत सा नजारा पेश करती हैं।

रोज गार्डेन का नाम भारत के पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर जाकिर हुसैन के नाम पर जाकिर हुसैन रोज गार्डेन रखा गया है। इस उद्यान का निर्माण 1967 में कराया गया। यह सिटी ब्यूटीफूल की खूबसूरती में चार चांद लगाता है। यह एशिया का सबसे बड़ा गुलाबों का उद्यान माना जाता है। यहां पर गुलाब की 1600 से ज्यादा वेराइटी मौजूद है। यहां गुलाब के 17 हजार से ज्यादा पौधे लगाए गए हैं। आप देखते देखते और गिनते गिनते थक जाएंगे। पर वेराइटी खत्म होने का नाम नहीं लेगी। 


ये उद्यान 27 एकड़ में फैला हुआ है। गुलाब उद्यान में कई प्राचीन किस्म के बड़े पेड़ भी हैं। उद्यान में कई औषधि महत्व वाले दरख्त भी लगाए गए हैं। हर साल फरवरी महीने में रोज गार्डन में उत्सव मनाया जाता है। तब वसंत की मादकता के साथ लाल गुलाब की सुंदरता चरम पर होती है। इस मौके पर आने वाले युवा उद्यान का सौंदर्य और बढ़ा देते हैं। उद्यान में आप गुलाब की कई ऐसी दुर्लभ किस्में भी देख सकते हैं जो आपने अभी तक नहीं देखी हों। अगर आप चंडीगढ़ जाएं तो थोडा वक्त फूलों के साथ गुजारने के लिए भी जरूर निकालें। किसी शायर ने कहा है-

जिंदगी है बहार फूलों की...दास्तां बेशुमार फूलों की...
तुम क्या आए तसवुर में..आई खूशबू हजार फूलों की

चंडीगढ का बस स्टैंड देश के जितने भी बस स्टैंड मैंने देखे है उनमें चंडीगढ़ का बस स्टैंड काफी बेहतर है। कैंपस में रेस्टोरेंट, होटल, दुकानें, सैलून, टायलेट, पार्किंग सब कुछ। अब हालांकि देश के कुछ और शहरों के बस स्टैंड बेहतर बनाए गए हैं। पर चंडीगढ़ का बस स्डैंड काफी पहले से बेहतर है। पहली बार 1993 में चंडीगढ़ यात्रा में मैंने इस बस स्टैंड को देखा था। यहां से हरियाणा, हिमाचल और पंजाब के हर शहर के लिए बसें मिलती हैं। यहां आप बड़े आराम से इंतजार के कुछ घंटे गुजार सकते हैं।

चंडीगढ़ में कहां ठहरें - सिटी ब्यूटीफुल में वैसे तो ठहरने के लिए तमाम विकल्प हैं। पर अगर आप सस्ते मे ठहरना चाहते हैं तो सूद धर्मशाला से अच्छी कोई जगह नहीं है। सूद धर्मशाला कहने को धर्मशाला है पर यहां पर फेमिली रूम कूलर वाले कमरे और एसी रूम भी मौजूद है। यहां हमेशा हाउसफुल जैसी स्थिति रहती है। हालांकि कोई एडवांस बुकिंग नहीं होती। धर्मशाला में नीचे एक अच्छा भोजनालय भी है। सूद धर्मशाला सेक्टर 22 में स्थित है।

सूद धर्मशाला - SOOD DHARMSHALA- 
फोन +(91)-9814704661 +(91)-172-2700223, 2703711, 4600223  किसान भवन के पास, सेक्टर 22 के मार्केट के पीछे से प्रवेश जन मार्ग, चंडीगढ़ – 160022

- vidyutp@gmail.com

Tuesday, July 21, 2015

तुझसे मिलना पुरानी दिल्ली में – दिल्ली जंक्शन



दिल्ली जंक्शन मतलब पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन बनने से पहले दिल्ली जंक्शन ही दिल्ली का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन हुआ करता था। कुल प्लेटफार्म संख्या में यह आज भी दिल्ली का सबसे बड़ा रेलवे स्टेशन है। पर नई दिल्ली जंक्शन बनने के बाद आम बोलचाल में लोग इसे पुरानी दिल्ली कहने लगे हैं।

सन 1864 में आई पहली रेलगाड़ी
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन की शुरुआत 1864 में हुई थी। हावड़ा की तरफ से पहली रेल यहां इसी साल आई थी। तब यह स्टेशन इतना भव्य नहीं था। दिल्ली जंक्शन का स्टेशन कोड डीएलआई है। इस रेलवे स्टेशन पर कुल 18 प्लेटफार्म हैं। इनमें से कई प्लेटफार्म दो हिस्से में बंटे हुए हैं। यानी पूरब की तरफ का नंबर दूसरा है तो पश्चिम की तरफ का नंबर अलग है। यहां से करीब 250 रेलगाड़ियां हर रोज खुलती हैं।

1903 की है स्टेशन की इमारत
दिल्ली जंक्शन रेलवे स्टेशन का भवन बाहर से काफी भव्य दिखाई देता है। इसकी मुख्य बिल्डिंग लाल रंग की बनी हुई है। यह इमारत ब्रिटिश कालीन है। इसका निर्माण 1900 में शुरू होकर 1903 में पूरा हुआ था। इसका डिजाइन लालकिला से प्रभावित है। इस भवन को देश के प्रमुख खूबसूरत रेलवे स्टेशन भवन में शामिल किया जाता है। मुख्य भवन के दूसरी तरफ दिल्ली की बहुत पुरानी दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की बिल्डिंग है। किसी जमाने में  दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर घोड़ा गाड़ी यानी तांगो की भरमार रहती थी। पर अब यहां पर तांगे नहीं दिखाई देते।

कई लाइनें आकर मिलती हैं
जब आप 1950 से 1970 के दशक की फिल्में देखेंगे जिसमें अगर दिल्ली रेलवे स्टेशन नजारा आता है तो पुरानी दिल्ली स्टेशन को ही दिखाया जाता था। पुरानी दिल्ली स्टेशन पर कई दिशाओं से आकर लाइन मिलती है। पुराने लोहे के पुल से होकर गाजियाबाद से लाइन आती है। वहीं सदर बाजार की तरफ से नई दिल्ली की लाइन आती है। पश्चिम की तरफ लाइन सराय रोहिल्ला और सब्जी मंडी की तरफ जाती है। यह एक अति व्यस्त रेलवे स्टेशन है।

कभी मीटर गेज लाइन भी थी
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर शुरुआत में मीटर गेज की लाइन भी हुआ करती थी। 1876 में यहां राजपुताना स्टेट रेलवे मीटर गेज लाइन आकर मिली। खास तौर पर राजस्थान-गुजरात की तरफ जाने वाली रेल लाइनें मीटर गेज वाली थीं। बाद में पुरानी दिल्ली से मीटर गेज को हटाकर सराय रोहिल्ला को मीटर गेज का प्रमुख स्टेशन बना दिया गया। दिल्ली जंक्शन से 1994 में मीटर गेज पूरी तरह से विदा हो गया। 1904 में यह स्टेशन आगरा दिल्ली रेलवे लाइन से भी जुड़ गया। पर 1926 में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन बनने के बाद आगरा तरफ से आने वाली रेलगाड़ियों का ठहराव नई दिल्ली में होने लगा।

मेट्रो के चांदनी चौक स्टेशन से जुड़ा
अब पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के मेट्रो ट्रेन के चांदनी चौक रेलवे स्टेशन से भी जुड़ गया है। चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन से उतरने के बाद आप अंडर ग्राउंड रास्ते से होकर पुरानी दिल्ली स्टेशन के परिसर में सीधे निकल सकते हैं। अगर आप कश्मीरी गेट बस अड्डे की ओर से आ रहे हैं तो पुरानी दिल्ली स्टेशन के पीछे की तरफ से भी प्रवेश कर सकते हैं।

सोलर लाइटों से गुलजार
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की तुलना में पुरानी दिल्ली स्टेशन वाकई पुराना ही लगने लगा था। पर हाल के दिनों में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म का भी सौंदर्यीकरण किया गया है। साल 2016 में पुरानी दिल्ली स्टेशन के भवन पर सोलर प्लांट भी लगाया गया है जिससे स्टेशन पर रोशनी के बिजली बनाई जाती है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
-        ( OLD DELHI RAILWAY STATION, DLI, JUNCTION )

Monday, July 20, 2015

गोल्डेन बीच चेन्नई की तिलिस्मी दुनिया

चेन्नई शहर के बाहरी इलाके में स्थित है गोल्डेन बीच की तिलिस्मी दुनिया.। चेन्नई घूमने वालों की यह खास पसंद है। गोल्डेन बीच को आप तमाम हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों में देख चुके हैं। यह निजी तौर पर विकसित किया गया समुद्र तट है जहां पर कई घंटे परिवार के साथ घूमने का आनंद लिया जा सकता है। यहां पर स्विमिंग पुल, गो कार्टिंग, वाटर गेम्स लाइव कल्चरल प्रोग्राम का आनंद आप ले सकते हैं। आजकल एक्वेरियम और जुरासिक पार्क जैसी चीजें भी गोल्डेन बीच में जोड दी गई हैं। चेन्नई के ईस्ट कोस्ट रोड पर स्थित है गोल्डेन बीच। बच्चों को गोल्डेन बीच बेइन्तहा पसंद आता है। बच्चे यहां आकर मस्ती में खो जाते हैं।


उड़ने दो परिंदों को शोख हवा में...

फिर लौटकर बचपन के दिन नहीं आते...

गोल्डेन बीच मुख्य शहर से कोई 30 किलोमीटर बाहर है। यहां जाने के लिए बसें और आटो रिक्सा आदि शहर के हर कोने से उपलब्ध रहते हैं। यह चेन्नई के सबसे सुरक्षित और साफ सुथरे समुद्र तट में गिना जाता है। यहां आप अपने परिवार के साथ यादगार पल बिता सकते हैं। बच्चे हों या फिर बड़े सबको यहां पर खूब आनंद आता है। मिलेनियम टावर, पनीर फोर्ट और आदमी की मूर्ति यहां के मुख्य आकर्षण है। एक आदमी है जो मूर्ति बना खड़ा रहता है। आप उसके कई मिनट तक देखते रहिए पर उसका पोस्चर नहीं बदलता। आंखों की पलकें भी नहीं झपकती। बड़ा अभ्यास है उसका। गोल्डेन बीच में आने वाले लोग इस आदमी को कौतूहल से देखत रहते हैं।

गोल्डेन बीच में पांच हजार से ज्यादा फिल्मों और टीवी सीरियलों की शूटिंग हो चुकी है। बॉलीवुड की कई फिल्मों की यहां शूटिंग हुई है। कई फिल्मकार तो गोल्डन बीच के दृश्य अपनी फिल्म में डालना बाक्स आफिस पर सफलता की गारंटी मानते हैं। खासतौर पर फिल्मकार यहां पर गाने की शूटिंग करते हैं। यहां अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, गोविंदा, कमल हासन, रजनी कांत, नागार्जुन जैसे नामचीन सितारे शूटिंग करने आ चुके हैं। जब आप गोल्डन बीच का नजारा कर रहे होते हैं तो कई दृश्यों को देखकर आपको याद आता है कि आप इसे किसी फिल्म में देख चुके हैं। गोल्डन बीच में समुद्र के किनारे खड़ा एक नकली जहाज का विशाल माडल भी देखा जा सकता है।

गोल्डेन बीच  में डोसा - 1992 के जनवरी में सुनील सेवक और राजीव सिंह के साथ 
गोल्डेन बीच के प्रवेश द्वार पर दर्शकों के लिए क्लाक रूम का भी इंतजाम है जहां आप अपनी अतिरिक्त वस्तुएं रख सकते हैं। वास्तव में यह के बड़ा समुद्र तटीय रिजार्ट है। यहां पर खाने पीने के लिए रेस्टोरेंट भी है। पर खाना बाजार से थोड़ा महंगा है। मैं चेन्नई 1992 जनवरी में गया था तब अपने साथी सुनील सेवक और राजीव कुमार सिंह के साथ गोल्डेन बीच घूमने पहुंचा था।

खुलने का समय – गोल्डेन बीच सुबह 11 बजे से शाम 7.30 बजे तक सातों दिन खुला रहता है। यहां प्रवेश के लिए टिकट 295 रुपये प्रति व्यक्ति से आरंभ होता है। बच्चों का टिकट थोड़ा सा ही कम है। बच्चों का टिकट 245 रुपये से आरंभ होता है। आप इसके लिए टिकटें आनलाइन भी बुक करा सकते हैं। यहां आप अक्तूबर से फरवरी के बीच जाएं तो बेहतर है तब चेन्नई का मौसम अच्छा रहता है।
यहां करें ऑनलाइन टिकट बुकिंग - http://www.ticketnew.com/OnlineTheatre/online-movie-ticket-booking/Events/VGP-Universal-Kingdom.html


-vidyutp@gmail.com
( GOLDEN BEACH,  CHENNAI) 

Saturday, July 18, 2015

हिंदुस्तान के बेहतरीन नजारें देखें बाहुबली में

केरल के त्रिशूर जिले में स्थित अथिरापाली झरना। 
मनोरंजन के लिहाज से साल 2015 की शानदार फिल्म बाहुबली – द बिगनिंग की शूटिंग में हिंदुस्तान के बेहतरीन नजारों को देखा जा सकता है। फिल्म शुरू होती है एक नदी और झरने के बैकड्राप से। ये झरना भारत के केरल राज्य के त्रिशूर जिले में हैं। फिल्म में हीरो प्रभाष को पहाड़ों पर मुश्किल चढ़ाई करते हुए देखा जाता है। इसके लिए प्रभाष ने रॉक क्लाइंबिग का लंबा प्रशिक्षण भी लिया। फिल्म के इस हिस्से को ही शूट करने में 109 दिनों का समय लगा।यानी तकरीबन आधे घंटे के फिल्म के हिस्से की शूटिंग के लिए झरने के आसपास 109 दिनों तक फिल्म की क्रू यहां पर रही। तकनीक के कमाल से झरना फिल्म में और भी भव्य दिखाई दे रहा है। इस झरने को देखकर लोगों के मन में कौतूहल होता है कि आखिर ये झरना है कहां पर...लेकिन ये कोई विदेश का नजारा नहीं है...


तो हम बात कर रहे हैं अथिरापाली वाटर फाल की है। यहां पहाड़ से 80 फीट नीचे जलधाराएं गिरती हैं जो अत्यंत मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती हैं। अथिरापाली को भारत का नियाग्रा भी कहा जाता है। ये जलधारा आगे चालकुडी नदी का रुप ले लेती है। यह केरल का लोकप्रिय पिकनिक स्पाट है। इसके पास में छारपा और वाजाचाल वाटर फाल भी पास में देखे जा सकते हैं। अथिरापाली से वाजाचाल की दूरी पांच किलोमीटर है। अथिरापली शोलायार संरक्षित वन क्षेत्र में पड़ता है। आप यहां शोलायार डैम देखने भी जा सकते हैं। अथिरापली में बर्ड वाचिंग और प्राकृतिक सौंदर्य देखने के प्रयाप्त मौके हैं। यहां ट्रैकिंग के अलावा वनऔषधि उद्यान भी देख सकते हैं। यहां आप हिरण, बंदर जैसे वन्य जीव भी देख सकते हैं। अथिरापाली में सैलानियों के लिए व्यू प्वाइंट बनाए गए हैं जहां से झरने का शानदार नजारा दिखाई देता है। पर पानी में उतरना खतरनाक हो सकता है। आप यहां दिए गए निर्देशों का पालन जरूर करें।
इस साइट पर जाकर देखें झरने का लाइव नजारा - https://www.youtube.com/watch?v=A15U9A3hiIY
कैसे पहुंचे – अथिरापाली का निकटतम शहर चलाकुडी है। चलाकुडी रेलवे स्टेशन से अथिरापाली की दूरी 35 किलोमीटर है। त्रिशूर से चलाकुडी की दूरी 30 किलोमीटर है तो एर्नाकुलम (कोचीन) से चलाकुडी की दूरी 43 किलोमीटर है। आप कोचीन में रुककर एक दिन में अथिरापली घूमने की योजना बना सकते हैं। घूमने का समय सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक का है। टिकट 8 से 5 बजे तक प्राप्त किए जा सकते हैं। टिकट दरें 15 रुपये प्रति व्यक्ति है।
कहां ठहरें -  अथिरापाली में रहने के लिए डारमेटरी रेस्ट रूम भी उपलब्ध है। वैसे अथिरापाली में रहने के लिए कई लग्जरी होटल भी उपलब्धहैं। आप चाहें तो कोचीन, चलाकुडी या त्रिशूर में भी ठहर सकते हैं।  http://www.athirapallytourism.org/
करनूल के पास रॉक गार्डन। 

अब बात फिल्म के दूसरे शूटिंग लोकेशन की बादलों की शूटिंग के कुछ लोकेशन महाबलेश्वर से लिए गए हैं, जहां मानसून में बादल सड़कों पर उतर आते हैं। बाहुबली फिल्म में काफी दृश्य आंध्र प्रदेश के करनूल जिले के रॉक गार्डन के हैं। करनूल का रॉक गार्डन करनूल शहर से 20 किलोमीटर आगे एनएच 18 पर ओरवाकाल गांव में स्थित है। यह 100 एकड़ में फैला है। यहां प्राकृतिक रुप से पहाड़ियां हैं जिन्हें देखने लोग पहुंचते हैं। कई फिल्मों की पहले भी शूटिंग हो चुकी है। यहां पर एपटीडीसी की हरिता रेस्टोंरेंट स्थित है। यहां भी आप कुछ घंटे के लिए घूमने जा सकते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य देखकर आनंद आएगा।
रामोजी फिल्मसिटी में बाहुबली का सेट। 
फिल्म का ज्यादातर हिस्से की शूटिंग हैदराबाद के रामोजी फिल्म सिटी में की गई है। एक गाना और महिष्मती सम्राज्य का सेट रामोजी फिल्मसिटी में लगाया गया था। वही रामोजी फिल्म सिटी  जहां मैंने साल 2007 में तकरीबन एक साल गुजारा। फिल्म में युद्ध का पूरा दृश्य रामोजी फिल्म सिटी में फिल्माया गया है। इस दौरान 2000 कलाकारों को शामिल किया गया था। हालांकि फिल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग बल्गारिया में भी की गई है, लेकिन ऐसा तमिलनाडु में फिल्म कलाकारों की हड़ताल के कारण करना पड़ा। फिल्म का अधिकतम पोस्ट प्रोडक्शन काम भी रामोजी फिल्मसिटी में हुआ है। यह संयोग ही है कि फिल्म के निर्दशक एस एस राजमौली ने अपना कैरियर भी इनाडू टेलीविजन के धारावाहिकों के निर्देशन के साथ ही शुरू किया था।
vidyutp@gmail.com

  


Friday, July 17, 2015

मस्त आटोरिक्शा है केएपीएल का क्रांति

शेखावटी क्षेत्र के शहर झुंझनू में जो आटो रिक्शा सबसे ज्यादा चलता दिखाई दिया था वह था केएपीएल का क्रांति। यह परंपरागत तीन पहिया की तुलना में थोड़ा लंबा है। पर देखने में चौड़ाई थोड़ी कम लगती है।

इस आटो में एक सीट आगे की तरफ है तो दूसरा सीट पीछे की तरफ। पीछे की तरफ की सीट में लेग स्पेस ज्यादा दिया गया है। यहां चाहे तो सामान भी रखा जा सकता है। पीछे वाली सीट के सामने दो बड़े स्टील रॉड बांए और दाहिने तरफ लगाए गए हैं। इसे पीछे बैठने वाला आसानी से पकड़ कर बैठ सकता है। संतुलन बना रहता है। पीछे बैठने का दूसरा फायदा है कि आप पूरे शहर का दाहिने बाएं नजारा करते हुए आगे बढ़ते हैं।

इस तरह के आटो रिक्शा सीकर शहर में भी चलते हुए नजर आए। थोड़ा शोध करने पर पता चला कि ये आटो रिक्शा कुरुक्षेत्र का बना हुआ है। शेखावटी के आटो वाले केएपीएल के क्रांति को अदभुत ढंग से सजा संवार कर रखते हैं। इस आटो को चारों तरफ से खूब फूलपत्तियों से संवार कर रखा गया है। कंपनी से आने वाली मूल चेसिस को आटो रिक्शा वाले अपने मनमाफिक सजा संवार कर तैयार कराते हैं। आटो वाले सवारी का ज्यादा इंतजार नहीं करते। दो आगे की सीट पर और दो पीछे की सीट पर लोग बैठे नहीं की आटो चल पड़ा मंजिल की ओर। सीटें आरामदेह है।
दिल्ली के टाटा मैजिक की तरह कोई कसम कस नहीं। महिंद्रा के आटो रिक्शा की तुलना में क्रांति पतला है पर लंबा है। ये गुजरात के छकड़ा की तरह देखने में ग्लैमरस लगता है। आटो वालों ने इसे जिस तरह से सजाया हुआ है उसे देखकर इसका सौंदर्य और बढ़ जाता है। हालांकि डीजल चलित होने के कारण यह तेज आवाज करता है।




केएपीएल द्वारा निर्मित आटो रिक्शा हैं। केएपीएल यानी कुरुक्षेत्र आटोमोबाइल्स प्राइवेट लिमिटेड। इसका लोकप्रिय माडल है क्रांति 435 सीएल। इसमें ग्रीव्ज का डीजल इंजन लगा है। इसका फ्रंट कम चौड़ा दिखाई देता है। बनावट में ये तीन पहिया पतला और लंबा है। इस कंपनी का निर्माण केंद्र हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में है, जबकि मुख्यालय कुरूक्षेत्र में है। कंपनी के संचालक जेएस सैनी हैं। ( http://kaplvehicles.com/ ) हालांकि क्रांति जैसा आटो रिक्शा एपीआई भी बनाती है पर शेखावटी में क्रांति की धूम है।

हालांकि शेखावटी के शहरों में केएपीएल के क्रांति के अलावा एपीआई के बने हुए भी इसी माडल के आटोरिक्शा दिखाई दे जाते हैं। पर क्रांति का जवाब नहीं। आटो वाले बताते हैं कि क्रांति का रखरखाव सस्ता पड़ता है और यह माइलेज भी बेहतर दे जाता है। गाड़ी का चेसिस मजबूत है सालों साल साथ निभाता है। तो चलें आटो रिक्शा में...आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा...

 विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com

Thursday, July 16, 2015

शेखावटी में लें मारवाड़ी खाने का स्वाद

खाटू श्याम में लस्सी 
जयपुर की एक सुबह। सिंधी कैंप के बाहर एक होटल मे नास्ते में एक पराठा लेकर आगे के सफर पर चल पड़ता हूं। वैसे राजस्थान में लोग मिर्ची खूब खाते हैं। सुबह में यहां पर मिर्च के बड़े-बड़े पकौड़े मिलते हैं। दुकानदार इसे काटकर कई टुकड़े कर प्लेट में पेश करते हैं। पर मुझे मिर्च पसंद नहीं है। मिठास पसंद है। 

दोपहर हो गई है तो खाटू श्याम में लस्सी पीना पसंद करता हूं। मिट्टी के करूआ में लस्सी। महज 20 रुपये में। स्वाद भी काफी कुछ बनारस की लस्सी के ही जैसा। गन्ने का जूस तो हर जगह मिलता है जो गर्मियों में प्यास बुझाता है।
खाटू श्याम से सीकर के लिए बस लेता हूं। बस ग्रामीण इलाकों से होती हुई पलसाना पहुंचती है। यहां पर रींगस सीकर एक्सप्रेस वे आता है। यहां पर शेक मिल रहा है। इसमें आम के साथ खरबूजा भी मिला हुआ है। इसका अपना अलग स्वाद है। गरमी में तरावट तो देता ही है। रानौली, रैवासा धाम होते हुए बस सीकर पहुंचती है।

दोपहर हो गई लिहाजा भूख लगी है। सीकर बस स्टैंड  के एक भोजनालय में 50 रुपये की थाली है। इसमें राजस्थानी घी चुपड़े फुलके हैं। दाल और दो सब्जी के साथ। फुलके की गिनती नहीं है चाहे जितनी खाओ।

खाने के बाद मैं अगली बस लेता हूं सालासर के लिए। यहां टिकट काउंटर पर मुझे पता चलता है कि राजस्थान रोडवेज की बसों में महिलाओं को 30 फीसदी का रियायत मिलता है सालों भर। चैलासीसेवद बड़ीकछावासुतोद होते हुए बस सालासर पहुंचती है लगभग दो घंटे में। दूरी है 55 किलोमीटर। सालासर में बालाजी के दर्शन के साथ यहीं रात्रि विश्राम करना है। मंदिर के पास एक धर्मशाला में कमरा मिल गया है।





सालासर में रात के भोजन के लिए पहुंचता हूं गंगानगर सेवा सदन में। यहां 50 रुपये की थाली है। मारवाडी बासा की तरह नीचे बैठकर जीमने का इंतजाम। यहां भी चपाती चाहे जितनी भी खाओ। सालासर के कई सेवा सदनों में शाकाहारी भोजनालय संचालित होते हैं। जहां आप पेटभर खा सकते हैं। कई भोजनालय को 24 घंटे भोजन परोसते हैं।
लक्ष्मणगढ़ का मुरली मनोहर मंदिर। 

झुंझनू वाया लक्ष्मणगढ़-मुकुंदगढ़ -  अगले दिन सालासर से आगे बढ़ता हूं। यहां से झूंझनू के लिए सीधी बस नहीं मिल रही है। बस स्टैंड से मुंकुदगढ़ की बस मिलती है। रास्ते में नांगलूणा, जाजोद के बाद लक्ष्मणगढ़ नामक कस्बा आता है। यहां एक किला दिखाई देता है। पर मैं उसे देखने के लिए समय नहीं निकाल पाता। हल्की बारिश के बीच शहर के बीच में मुरली मनोहर मंदिर के पास बस रुकती है। लक्ष्मणगढ़ में निजी क्षेत्र का मोदी विश्वविद्यालय खुल गया है। http://www.modyuniversity.ac.in/ 


चुरू सीकर रेल लिंक पर लक्ष्मणगढ़ सीकर रेलवे स्टेशन है। बस यहां से आगे बढ़ती है। बराला के बाद मुकुंदगढ़ चौराहे पर बस मुझे उतार देती है। मुकुंदगढ़ झुंझनू जिले का कस्बा है। मुकुंदगढ़ के बाजार में नींबू पानी पीने के बाद यहां से दूसरी बस लेता हूं झुंझनू के लिए। मुकुंदगढ़ से कोई 30 किलोमीटर दूरी है झुंझनू की। झुंझनू में मोरारका कालेज समेत कई शिक्षण संस्थान है। अब वहां जेजेटीयू यानी जगदीश प्रसाद झाबरमल टीबडेवाला यूनीवर्सिटी खुल गई है। (
http://jjtu.ac.in/) ये विश्वविद्यालय चुडाला में चुरू रोड पर ( स्टेट हाईवे नंबर 37) स्थित है।




झुंझनू में रानी सती मंदिर के दर्शन के बाद वहां के प्रसाद गृह (भोजनालय) का कूपन खरीदता हूं। यहां 70 रुपये का कूपन है। मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश के बाद बायीं तरफ भोजनालय है। चप्पल निकालकर भोजनालय में प्रवेश के बाद गर्म पानी के नल पर हाथ धोने की सलाह दी जाती है। खाने की थाली सामने है। भिंडी की सब्जी, दो और सब्जियां, दाल, रायता, घी चुपडी चपातियां और चावल। सब कुछ चाहे जितना खाओ। विशुद्ध मारवाडी खाना। स्वाद ऐसा कि लंबे समय तक न भूले।

तो राणी सती मंदिर का दिव्य प्रसाद लेकर हम आगे बढ़े। झुंझनू से दिल्ली की बस में। बागड धाम के बाद आता है
 चिड़ावा। यहां के पेड़े खूब मशहूर हैं। हालांकि हमने खरीदे नहीं। इसके बाद आता है सिंघाना। फिर पचेड़ी। ये हरियाणा की सीमा है। यहां पर खुली है निजी क्षेत्र की सिंघानिया यूनीवर्सिटी। http://singhaniauniversity.co.in/ इसके बाद बस नारनौल की ओर दौड़ रही है। हरियाणा के शहर नारनौल में कई जगह जल कुटीर दिखाई दिए लोग यहां निःशुल्क पानी पिलाते हैं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com