Thursday, June 25, 2015

सीतामढ़ी - राष्ट्रीय एकता शिविर में एक दिन

सीतामढ़ी के राष्ट्रीय एकता  शिविर में 12 जून की सुबह के वक्त जमा शिविरार्थी। 
सीतामढ़ी पहुंचते हुए रात का अंधेरा हो चुका है। पर मेरी मंजिल है गोयनका कॉलेज जो शहर में ही है। यहां पर राष्ट्रीय युवा योजना का राष्ट्रीय एकता शिविर लगा हुआ है। मैं इस शिविर में दो दिनों के लिए हिस्सा ले रहा हूं। वैसे तो शिविर हफ्ते भर का होता है। पर आजकल मेरे पास इतना लंबा वक्त नहीं है कि हफ्ते भर शिविर में रह सकूं। गोयनका कॉलेज परिसर में पहुंचते ही तमाम पुराने दोस्तों से मुलाकात होती है। मैं एसएन सुब्बराव जी से मुलाकात कर अपने शिविर के साथियों के संग रात्रि भोजन और सोने के लिए चला जाता हूं। 


अब बात करते हैं कैसा होता है शिविर का एक दिन....ठीक 4.55 बजे राइजिंग कॉल की सिटी बजती है, घंटा बजता है और सारे शिविरार्थी दौड़ पड़ते हैं गोल पोस्ट की ओर। सावधान के साथ। शुरू हो जाता है प्रयाण गीत नौजवान आओ रे नौजवान गाओ रे...लो कदम बढ़ाओ रे लो लो कदम मिलाओ रे.. देश भक्ति का ये गीत आलस भरे शरीर में जोश भरने का काम करता है। ये गीत बालकवि बैरागी की रचना है। गीत के  बाद समय मिलता है 45 मिनट का नित्यक्रिया के लिए। इसी दौरान होता शिविर का चाय काल। चाय के बाद एक बार फिर 6 बजे जुट जाते हैं रैली पोस्ट पर। इस बार 15 मिनट व्यायाम और योगासन के लिए। आजकल शिविर में फ्लैग होस्टिंग को जोड़ा गया है। इस दौरान राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लहराया जाता है। युवाओं को तिरंगा फहराने का सही तरीका सिखाया जाता है।
सीतामढ़ी के राष्ट्रीय एकता  शिविर में 12 जून की सुबह के वक्त जमा शिविरार्थी। 


इसके बाद का समय तय होता है श्रमदान के लिए। हर रोज दो घंटे श्रमदान शिविर की दिनचर्या में शामिल है। कोशिश ये रहती है कि सात दिनों के शिविर में श्रमदान से कोई निर्माण कर दिया जाए या फिर किसी गंदे स्थल की पूरी तरह सफाई कर डाली जाए। श्रमदान शिविर का मुख्य हिस्सा है जो सालों से चला आ रहा है...शिविरार्थी गीत गाते हैं---- करना है निर्माण हमें नवभारत का निर्माण। श्रमदान वैसे शहरी लोगों को श्रम का महत्व समझाता है जो आमतौर पर कभी श्रम नहीं करते। कई लोग इस सीख को शिविर के बाद भी घर जाने पर सालों भर जारी रखते हैं।
सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज में राष्ट्रीय एकता  शिविर में श्रमदान करते शिविरार्थी। 

श्रमदान के बाद बारी आती है रैली की। राष्ट्रीय एकता का अलख जगाते देश भर के अलग अलग राज्यों से आए युवा शहर में 6 से 10 किलोमीटर तक की रैली निकालते हैं। इस रैली में दिल्ली हो या गुवाहाटी, अपना देश अपनी माटी जैसे नारे लगाए जाते हैं। सडकों पर रैलियां तो बहुत निकलती हैं, पर ऐसी रैली जिसमें 20 से ज्यादा राज्यों को युवक युवतियां शांति और राष्ट्रीय एकता के नारे लगाते हों ऐसा कम ही होता है। लोग रैली को कौतूहल से देखते हैं। एक अलग किस्म का माहौल बनता है। 

भाषा सीखें, कौशल सीखें-  रैली के बाद शिविर में दो घंटे का सत्र होता है लैंग्वेज एक्सचेंज और कल्चर एक्सचेंज का। इस दौरान हिन्दी जानने वाले लोग, तमिल, तेलुगु, मलयालम जैसी कोई भी दूसरी भारतीय भाषा सीखते हैं। सात दिन में लोगों को समान्य संप्रेषण जैसी भाषा आ जाती है। ऐसे कार्यक्रम में देश भर से आए लोगों में मैत्री में भी काफी इजाफा होता है।

इसके बाद ब्रेक होता है नहाने के खाने के लिए। खाने की शुरूआत भोजन मंत्र से होती है। साथ में खेलें साथ में खाएं, साथ करें हम अच्छे काम, जब तक सबका भला न होगा नहीं करेंगे हम आराम। इस मंत्र के साथ खाने पर जाते है। सभी शिविरार्थी अपना थाली ग्लास अपने घर से लेकर आते हैं। लाइन लग कर खाना लेते हैं। कई बार रसोई में मदद भी करनी पड़ती है। पर खाते वक्त खाना कैसा भी बन हो, आज का खाना सबसे अच्छा कह कर जीमते हैं। सीतामढ़ी में जून में आम का मौसम था तो हर खाने के साथ लोगों को आम जरूर मिल रहा था।

और अब दोपहर के खाने का वक्त है....
 भोजन के बाद थोड़ा आराम और उसके बाद कई बार चर्चा सत्र होता है जिसमें विभिन्न मुद्दों पर लोगों को बोलने का मौका मिलता है। शिविर के दौरान कई बार शाम को 4 से 6 बजे के बीच भी रैली निकाली जाती है। शाम 6 बजे हर रोज सर्व धर्म प्रार्थना होती है। ये आयोजन शहर के अलग अलग हिस्से में होता है। प्रार्थना के बाद डेढ़ घंटे का सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है। रात 9 बजे भोजन के बाद शुरू हो जाता है सोने का वक्त। तो ऐसा होता है शिविर का एक दिन।
सीतामढ़ी रात को शिविर में मच्छरों ने खूब काटा। मैं रात भर ठीक से सो नहीं पाया। कई शिविरार्थियों ने मच्छरदानी का इंतजाम भी कर लिया है।
सुबह सुबह शिविर में श्रमदान का समय। 

सुबह सुबह उठकर मैं पिताजी के दोस्त लक्ष्मीनारायण साह से मिलने उनके घर पहुंचा। कई साल पहले 1999 में उनके घर आना हुआ था। उनका घर लक्ष्मीनारायण हाईस्कूल के पीछे था। कई साल बाद आने पर मैं उनका घर भूल गया था। बिहार के शहरों में लोग मकान नंबर से नहीं बल्कि नाम से ही पहचाने जाते हैं। तो पड़ोस के एक दुकानदार ने मुझे उनका सही घर बता दिया। बिना किसी सूचना के अचानक सुबह सुबह अपने घर देखकर उनकी खुशियों का ठिकाना नहीं था। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य -- vidyutp@gmail.com
( NYP NATIONAL INTEGRATION CAMP, SITAMARHI, GOENKA COLLEGE, BIHAR ) 

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